कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
ब्रह्माण्ड
कबीर- मनहीको परमोद ले, मनहीको उपदेश ।
जो योमन 'परमोद ले, तो सुख हो सब देश ॥
कबीर- बात बनाए जग ठगा, मन 'परमोद्यो नाहिं ।
कहैं कबीर मन लेगया, लख चौरासी माहिं ॥
कबीर औरनके उपदेशसे, मुखमें पड़ गई रत ।
रास' बेगाने राखिके, खायो अपना खेत ॥
कबीर पण्डितसे तैं कह रहा, भीतर' बेघे' नाहिं ।
औरनको परमोदता', गया 'मेहरकी बाह ॥
कबीर 'अजहूं तेरा सब मिटे, जा माने गुरुसीख' ।
जवलग तू घरमें रहे मत कहूं मागे भीख ॥
बुद्धि तथा विश्वास सब शरीरसे संबंध रखता है । सो शरीर झूठा है और उसका कोई समान सच्चा नहीं है । यह समस्त विश्वासके अधीन है । यदि बुद्धि मान न लेतो किसी नियमका विश्वास न हो । इस शरीरके साथ बुद्धिही झूठी ठहरी फिर विश्वास कैसे सत्य ठहर सकते हैं । यदि यह शरीर मिट जानेवाला न हो तो सदैव एकही समान स्थिर रहे जो कुछ है वो अस्थिर तथा अल्पस्थायी है । यदि उसपर मैं विश्वास करूँ तो अंधकारसे कदापि न निकलूँ । जितनी विद्या कार्य और पुस्तक पाठसे हैं सो सब स्थूल शरीरसे ठहराए हुए हैं । समस्त अस्थिर शरीरकी भाँति हैं इस कारण इस संसारके पढ़े लिखे तथा अपढ़ सब एक समान हैं । क्योंकि, अपनी यथार्थतासे दोनों समान रूपसे अनभिन्न हैं । स्थिरता मृत्युके समय नाश हो जाती है पर उसके कर्मका संबंध उसके साथ रहता है । वह नरक वैकुण्ठके समीप जिस योनि एवं अवस्थाके योग्य होता है वहाँही खींच ले जाता है दूसरी योनिमें प्रविष्ट करा देते हैं । स्थिरताकी मृत्युमें न उसका वेद अथवा पुस्तकोंका पाठ काम आता है न उसकी विद्या कार्य उसको आवागमनसे छुडा सकते हैं वैकुण्ठनरक उसके आसपासकी जगह और चौरासी लाख योनि सब इसी स्थूल शरीरके ठहराए हुए इसीके समान नाश होनेवाली हैं, कोई बची नहीं रह सकती । आन्तरिक ज्ञान बाहरी विचार कार्य करनेका बल ये सब जब मिथ्या ठहरे तो बुद्धि और विश्वास कैसे सत्य माने जा सकते हैं । मृत्युके समय जहाँ इस जीवका ध्यान दौड़ जाता है उसीके अनुसार यह शरीर पाता है । मृत्युके बाद जब मनुष्यका
शरीर पाता है तब अपनी पूर्व करनीके अनुसार ही पाता है । सूरत तथा ज्ञान भी वैसाही होता है । यदि पशु योनिमें जावे तो भी अपने पूर्व काय्योंके अनुसार यह दुःख सुख पाता है । कितने पशु शिक्षाग्राही होते हैं । कितने पशुओंको भविष्यका वृत्तान्त मालूम रहता है इसका कारण यह है कि, उन लोगोंमें जो पूर्वकालमें विद्याकी ज्योति थी उसके प्रभावसे वर्तमान शरीरमें भी कुछ विकास करती है । मनुष्योंके समान कोई कोई पशु भी भविष्यत्का हाल जानते हैं एवं शिक्षाग्राही होते हैं । यह जीव समस्त गुण तथा हुनरोंकी जननी है, पर जबलों यह दूषित है तबलों कर्मोंका गुलाम है । यह पढ़े लिखे तथा अपढ़ दोनोंको एक समान है, दोनोंका विश्वास एकसा है क्योंकि, जिस देशमें वेद तथा पुस्तकें हैं उस देशके लोग तो उन्हींके अनुसार विश्वास करते हैं जहाँ वेद तथा पुस्तक कुछ नहीं है, वहाँके लोग जैसा कुछ अपनी बुद्धिसे ठहराते हैं वही करते हैं, कितनेही टापू हैं जहाँके लोग अक्षरतक भी नहीं पहचानते वहाँके लोग जैसा कि, कुछ उन लोगोंने अपनी बुद्धिसे ठहराया, वही मृत्युतक उनको दिखाई दिया करता है । इसी प्रकार एम्रिकादेशके प्राचीन निवासी ऐसा अनुमान किया करते थे कि, जो वस्तु अथवा जो जीव इस पृथ्वीपर नष्ट होते हैं उसी सूरतमें दूसरे जीव प्रगट हो जाते हैं । उसका एक विचित्र उदाहरण में ग्रंथ कबीर भानु-प्रकाशमें लिखा जा चुका है । देखलो जैसा जिसको गुरु मिला वैसीही उसकी बुद्धि तथा वैसाही उसे विश्वास हो गया है ।
पारकारनलकी साखी ।
कबीर बेड़ा सारका, ऊपर लादा सार ।
पापीका पापी गुरु, यों बड़ा संसार ॥
कबीर जाका गुरु है अँधरा, चेला खरा निरंधर ।
अन्ध अंधको ठेलियाँ, परे कालके फंद ॥
कबीर कौंचे गुरुके मिलनसे अगली मिलगई ।
चाल थे हारे मिलनकों, "दूनी विपत" पड़ी ॥
कबीर अंधा गुरु अंधा जगत्, अंधे हैं सबदीन ।
गगनमंडलमें बजरही, सुवनि अनहद बीन ॥
कबीर झूठे गुरुके पक्षको, तजत न कीजे बार ।
द्वार न पावे शब्द नहीं, भटकें बारम्बार ॥
१ नाव आदिका समूह, २ सत्यपुरुष, ३ डूबगया, ४ पूरा, ५ अज्ञानी, ६ ढकेला,
७ अघूरे, ८ अगाडीकी, ९ डूबगई १० दुगुनी, ११ विपत्ति, १२ दुखी, १३ आकाशी नक्कारे
१४ छोड़ते, १५ देर, १६ मार्ग ।
जो कोई पागल हो जाता है वो सदैव कुछका कुछ काम करता रहता है। वो अपनी जानसे पागल नहीं है पर दूसरोंके देखनेमें वह विक्षिप्त जान पड़ता है। जितने पागल हैं वे सब निराले हैं उनका एक तौरसे भिन्न ढङ्ग नहीं है जितने बुद्धिमान् ज्ञानी और अपने यथार्थको जान चुके हैं सबका एकही मत है, अतः जिसको वह ज्ञानी गुरु मिले वही भाग्यवान् होगा जितने सिद्ध साधु ऋषि पीर पैगम्बर, वली नबी होते हैं सभी ब्रह्माण्डके भीतरका समाचार देते हैं। नरक वैकुण्ठ तथा उसके आसपास, समस्त विद्या और कहानी किस्से हैं जो वेदपुराण आदि थे भी उसके बाह्यान्तरका समाचार देते हैं, यहाँही लों उसके विवरणके वृत्तान्त तथा कामधाममें समस्त मनुष्य फँस रहे हैं, ये पिण्ड तथा ब्रह्माण्ड दोनोंही शिरसे परंपर्यन्त मिथ्या हैं। इन दोनोंमें कोई सचाई एवं दृढ़ता नहीं है।
पिण्ड ब्रह्माण्ड दोनोंका मिथ्यात्वप्रतिपादन।
पिण्ड और ब्रह्माण्ड दोनों मिथ्या हैं उसके सब साक्षान झूठे हैं। क्योंकि, जल की बूंद भूमिपर गिरते ही भूमि उसको सोख लेती है इससे उत्पत्ति होती है। शरीर बनकर क्रमशः बड़ा होता है फिर घटने लगता है फिर मर जाता है, इस कारण यह मिथ्या है। जब कोई जीव मर जाता है तब भूमितत्त्व सूक्ष्म है उसका स्थान हृदयमें है वह गलकर जलमें मिल जाता है। जलका वास पेटमें है जल शुष्क होकर अग्निमें समा जाता है इस सूक्ष्म अग्निका स्थान पित्तमें है, उस पित्तको अग्नि समस्त शरीरके जलको सुखाकर आप वायुमें समा जाती है। इस वायुका वास नाभिमें है। इस नाभिकी वायु समस्त अग्निको समेट लेती है। यह अग्नि जल वायु आदि सब मिलकर आकाशमें समाजाते हैं। पाँच तत्त्व तीन गुणसे, तीन गुण अहंकारसे, अहंकार महातत्त्वसे, महातत्त्व ब्रह्मसे। इसी प्रकार ब्रह्माण्डकी प्रलय होती है। पिण्ड ब्रह्माण्ड दोनोंकी एकही ढङ्गसे प्रलय होती है, जब समस्त रचना निरञ्जनमें समाजाती है तो वह शून्य स्वरूप होकर शून्यमें फिरता रहता है। जब निरञ्जनको शून्यमें फिरते २ सत्तर युग बीत जाते हैं तब उसके मनमें अकेले रहनेके कारण घबराहट उत्पन्न होती है। इस घबराहटके कारण अपने एकान्तके निवासको भला नहीं समझता। तब सत्यलोकके आसपास जाकर सत्यपुरुषसे निवेदन करता है कि, अब मैं एकान्तके रहनेको अच्छा नहीं समझता हूँ। सृष्टि रचना किया चाहता हूँ, तब सत्य पुरुषकी आज्ञा ज्ञानीजीको होती है कि, निरञ्जनसे जाकर कहो, अब सृष्टिको उत्पन्न करो। तब सत्यपुरुषकी आज्ञानुसार ज्ञानीजी शून्यमें निरञ्जनके पास जाकर कहते हैं कि,
ए निरञ्जन ! अब तुम रचना करो । निरञ्जनजी आकर कर्मजीकी पीठपर पृथ्वीको बनाते हैं, वे अपने मुंहसे आद्याको उगल देते हैं । दोनोंके संयोगसे तीनों गुण तथा समस्त सृष्टिकी उत्पत्ति होती है । पहले जब उत्पत्ति होती है तब सत्यस्वरूपी ही उत्पन्न होती है । सब निर्दोष होते हैं । वह सत्या अनेक कालपर्यन्त निर्दोष चली जाती है । फिर कुछ कालोपरान्त उनमें पाप लगता है, तब क्रमशः मनुष्य पापोंमें फँसते हैं और जप तप तथा भक्ति मुक्तिकी ओर ध्यान देते हैं तब आचार्य और गुरुलोग मनुष्योंको उपदेश करते फिरते हैं । पर सारे गुरु ब्रह्माण्डके भीतरकी सुध रखते हैं, ब्रह्माण्डके भीतरकी विद्या रखते हैं । पारख गुरुके अतिरिक्त दूसरेमें यह सामर्थ्य नहीं है कि, ब्रह्माण्डके पार पहुँचा सके कारण यह कि, किसी अन्य गुरुको इसकी तनिक भी सुध नहीं कि, भवसागर पार जानेके निमित्त कौनसा मार्ग और कौनसा उपाय आवश्यक है ? सहस्रों ऋषि मुनि कहते हैं कि, पिण्ड तथा ब्रह्माण्ड दोनों झूठे हैं पर वे लोग जान बूझकर फिर क्यों मिथ्यासे लग रहे हैं ? झूठ छोड़कर सत्यसे क्यों नहीं मिलते ? कारण यह कि, जो कोई जानबूझकर झूठसे संबंध रखता है सो वास्तवमें मनुष्यतासे पृथक् हैं ।
प्रत्यक्ष में यह देह मिथ्या दिखाई देती है तो भी पाशविक बुद्धिको विश्वास नहीं होता । जब कोई जीव मरता है, तब उसको काटो तो उसमें एक बूंद जलका भी नहीं रहता, अग्निकी उष्णता और वायुका नाम चिह्न बचा रहता है और कुछ नहीं जाना जाता कि, वे कहाँसे आये और कहाँ चले गये । वास्तवमें वे इतःपूर्व भी कुछ नहीं थे और फिर भी कुछ बचे न रहे । इसी प्रकार साधु सिद्ध लोग होते हैं जिन्हें कि अपना शरीर पलट लेनेकी और अन्य प्रकारकी सिद्धियाँ तथा सामर्थ्य प्राप्त हो चुका है, वे तुरन्त अपनी देह पलट लेते हैं । तनिक भी विलम्ब नहीं लगता । मनुष्य किसी पशुकी सूरत हो जावें, अन्तर्धान हो जावें, उपस्थित रहें, एक रहें, अथवा अनगिनती हो जावें । यदि यह देह सत्य होती तो एक देह छोड़ दूसरी स्वीकार करनेके समय पूर्वकी देह कहीं दिखाई देती वह पूर्व देह कहीं रखनेकी चिन्ता करलेता तब दूसरी स्वीकार करता, जब वह पहलेकी शरीरको छोड़कर बिना झंझट और चिन्ताके दूसरी स्वीकार कर लेता है कहीं अन्य शरीरका चिह्नतक भी नहीं दीखता इससे निस्संदेह जान लेना चाहिये कि, ये दोनों शरीर पिण्ड तथा ब्रह्माण्ड कुछ नहीं । अज्ञानसे मनुष्य उसको सत्य मान रहा है । झूठको सत्य जान रहा है । इस कारण यह शरीर
नितान्तही भ्रम और शून्य है, नितान्तही तुच्छ है, इसको प्यार करनेवाले सदैव आवागमनके बन्धनमें पड़े रहेंगे।
ग्रन्थल—सब 'जाबजा वत'लान है मुख'बिर न 'रब रह'मान है।
नहि मुक्तिका 'सामान है बुतलान है बुत'लान है ॥
जो देख बेजावी कुरह सो भर्म अँधेरी है पुरा।
ह'रसि'न्त खींच और तान है बुतलान है बुतलान है ॥
कल्लाश ओ शाहो गदा अलहाम वही कलमः निदा।
तह'दतकी नहि "शायान है बुतलान है बुतलान है ॥
जो गुप्त और शुनीद है और "दीदनी और "दीद है।
जो हेच इल्म उरफान है बुतलान है बुतलान है ॥
जानाना "असल इसरारको सब पूजते करतारको।
"बरपा जो चारों खान है बुतलान है बुतलान है ॥
"आदम न सच पहचानता झूठेहीसे मन मानता।
क्या ज्ञान और क्या ध्यान है बुतलान बुतलान है ॥
अँधेर'पुरमें है खड़ा 'कदमें तेरे आजिज पड़ा।
धोखेमें इत्र इनसान है बुतलान है बुतलान है ॥
शब्दका विषय।
प्रारम्भमें एक शब्द निकला, वह शब्द जिससे निकला उसको कोई नहीं पहचानता, व्यर्थही लोग आपसमें झगड़ते चले आते हैं, यह शब्द एक सत्य है, पर दूसरे व्यवहारी शब्द और वाक्य बहुतायतमें होते हैं एकमें कदापि नहीं। कारण यह कि, पहले शब्दका कर्ता होगा, इसके उपरान्त शब्द होगा। बिना शब्द करनेवालेके शब्द सुनाई नहीं देता। यदि पहले शब्द करनेवाला न होता तो शब्द न होता। शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध ये पाँचों तत्त्व तथा तीनों गुण मिथ्या हैं। समस्त धर्म और मत प्रगट हैं फिर शब्द कैसे सत्य माना जावे? कोई शब्द बिना जोड़ेके नहीं। जब स्थिर वायुको चलानेवाली वायु चीरकर महावेगसे चलती है तब भौंति २ के शब्द होते हैं। इस विषयपर ऋषीश्वरोंका पुराना वाद विवाद चला आता है। न्यायदर्शन और सांख्यमें इसका भलीभाँति निर्णय किया है। इसके भली प्रकार लत्ते उड़ाए
१ प्रत्यक्ष २ कथन, ३ कहनेवाला, ४ ईश्वर, ५ कृपालु, ६ साधन, ७ शकलमात्र, ८ प्रत्येक, ९ दिशा, १० परमात्मा, ११ योग्यता, १२ देखनेलायक, १३ देख भाल, १४ मुख्य १५ व्यापक, १६ मनुष्य, १७ अँधेर नगर, १८ चरणोंमें।
हैं। पूर्णतया काटा छोटा है देखो न्यायदर्शनमें गौतम इस विषयपर इस प्रकार विवाद करते हैं न्यायसूत्रवृत्ति २-२-१३ वैखरीका शब्द अनादि नहीं हो सकता। क्योंकि, प्रथम तो उसका आरम्भ है। यह बोलके समय ही सुना जाता है, तीसरे वह बनावटी कहा गया है। अगले सूत्रोंमें विस्तार पूर्वक कहा गया है जो चाहे सो देखले। न्याय दर्शनके सूत्रोंमें वे परिणाम निकालते हैं कि, वैदिक शब्दको छोड़कर बाकी अनादि नहीं, सदैव वायुद्वारा कानोंमें आता है यहाँ तक कि, कितने ही सूत्रोंमें दृढ़ प्रमाणोंद्वारा उसका खण्डन किया है।
कपिलजी शब्दके अनादि होनेकी बातको मानते हैं। उनका कथन है कि, वैदिक शब्द अनादि है दूसरे प्रत्यक्षमें बनावटी जान पड़ते हैं। फिर यह परिणाम निकालते हैं कि, वेदोंके अनादि होनेकी बात सर्वथा सत्य है, सम्भव भी है। इस शब्दको लोग उत्पन्न करता और उसीसे उत्पत्ति मानते हैं।
कारण यह है कि केवल एक शब्द ओम् द्वारा तीनों लोक और चारों वेद बने हैं। वही उत्पतिकर्ता तथा उत्पत्ति बनकर अनगिनती दिखाई दे रहा है।
छन्द झूलना।
झूठही नाद है झूठही बुंद है, झूठही झूठको खेल सारा।
झूठ मूरत बनी झूठ सूरत बनी, झूठही झूठको स्वैग धारा ॥
झूठ दर्शन कहे झूठ परसन कहे, झूठ निराकार और शब्द सो है।
झूठ अंधकार है झूठ झंकार है, झूठही झूठको चित्त मो है ॥
झूठ गुण तीन और पाँचही तत्त्व हैं, झूठकी कथन यह जगत कर्ता।
झूठही योग है झूठही भोग है, झूठके फँदमें झूठ परता ॥
झूठ जञ्जालते काल धर खात है, झूठके पारखे कौन जाए।
झूठही जगत है झूठही भगत है, झूठ विस्तार चहुँ ओर छाया ॥
झूठ और सत्य दोऊ मिला यह जगतमें, भगत है सोई जो जान सकता।
परम अनन्द जिन झूठ जगमें खेला, सत्य कबीर एक सत्यवक्ता ॥
छः गुरुकी शिक्षाके भीतर जितनी बातें हैं यहाँ तक मायाके सम्बन्धमें वार्तालाप रहता है। पर जब सातवें गुरुकी शिक्षा मिलती है, तब मायाके सभी संबंध टूट जाते हैं। फिर किसी प्रकारका संदेह नहीं रहता। जब सातवें गुरुकी शिक्षा मिलती है वह अवस्था किसीसे कही नहीं जाती। इन सातों गुरुके उपर स्वयम् कबीर साहब सत्यपुरुष हैं। उसके वाक्य पवित्र है उसमें कोई संदेह नहीं। यदि उसके वाक्यमें कोई संदेह करे तो उसके भाग्यका दोष है। विज्ञान
देहपय्यंत तो विवाद है। पर इस देहमें कोई विवाद नहीं रहता। वह कबीर साहबकी दयासे प्राप्त होती है।
तरजीअ बन्द ।
देख हालत वह खुर्द सालीका । फ़िक्रकर सूरत कमालीकी ॥
नेको बंद फ़ेलके जो कैंदमें थे । आई रहमत जो लायंजालीकी ॥
ख्वाब गफ़लतमें खूब सोए थे । क्या खबर नेको बंदके चालकी ॥
रहम रहमान जब हुई नाजिल । दूरकी दर्द जाँ बवालीकी ॥
पावे अबदी हयाततो दरगोर । मेह्नुकर जब कबीर बन्दिछोर ॥
जानते दास उसकी शौकतो शान । आदमी जन्नतजनान क्या जान ॥
आलम अंधा जो सारे हैं मुरदार । नहीं पहचान कादिर रहमान ॥
भूलकर मरत सब हैं भडी चाल । कोई दाना है बाकी सब नादान ॥
दूसरे पैरवी करें खुदपीर । चार है वान एक है इनसान ॥
फिर न बाकी रहे कोई शरशार । मेह्नुकर जब कबीर मन्दिछोर ॥
जुहद सदाह जन्म कमाया था । रस्तगारीको राह न पाया था ॥
वेद ख्वानी तिहारतो तकवा । योगयुक्तिसे दिल लगाया था ॥
आप महर्मन बातनी इसरार । और को आनकर सिखाया था ॥
बेखबर सब जो अपनी बखबरी । अंधको अंधराह दिखाया था ॥
पावे आजिज पकड़तू अपना चोर । मेह्नुकर जब कबीर बन्दिछोर ॥
यथा— है जो हर दोहरजहाँ का गुरु पीर । जगमें ऐसे मिलाशकर जा शीर ॥
देखना चार कर न कुछ ताखीर । वह मेहरबां हो देखकर दिलगीर ॥
टूट जावेगी कालकी जञ्जीर । सिद्ध साधू जपो कबीर कबीर ॥
कलके साहबकी वस्फ गाओगे । इससे बेहद अजरको पाओगे ॥
फिर न दरियामें गोता खाओगे । और सदहाको रह दिखाओगे ॥
टूट जावेगी कालकी जञ्जीर । सिद्ध साधू जपो कबीर कबीर ॥
चल जिधरको उधर है यमका जाल । सारे जाँदारको फँसाए काल ॥
लैपकड़ जान दिलसे सतकी चाल । तेरा कोई न बीका होवे बाळ ॥
टूट जावेगी कालकी जञ्जीर । सिद्ध सार जपो कबीर कबीर ॥
रहम रब्बानी तब हवीदा हो । गैबका नूर दिलपे पैदाहो ॥
हुम्बे महबूबमें जो शैदा हो । नफ़स गुरिन्दः पिसक पैदा हो ॥
टूट जावेगी कालकी जञ्जीर । सिद्ध साधू जपो कबीर कबीर ॥
जमके जञ्जीरसे यह जकड़ा था । हाथपों हिलनेसे जो अकड़ा था ॥
गोया आदम नहीं यह लकड़ा था । डूबे, आजिजको उसने पकड़ा था ॥
टूट जावैगी कालकी जंजीर । सिद्ध साधू जपो कबीर कबीर ॥
मुखम्मस तर्जीअ बंद ।
सच है जो छिपा झूठके तस्वीर अयों ।
झूठका खेल खुला सब है जो बानिए ध्यान ॥
झूठ हर जायमें मामूर यहाँ और वहाँ ।
झूठसे दीप सभी लोक व नौखंड हुवा ॥
साँच को ढ़ाँक लिया झूठ जो परचण्ड हुवा ।
अकल और कयास वहम दिल दूर जहाँ ॥
सो सब है बहलकए झूठदरपरदहनेहाँ ।
सब झूठ है जानलीजे जो नामो निशों ॥
इसमें न सफा सूरत भरभण्ड हुवा ।
साँचको ढ़ाँक लिया झूठ जा परचण्ड हुवा ॥
झूठमें लगरहे और झूठको ढूँढ सारे ।
सब चाल चले भेडको काजिब प्यारे ॥
झूठकी किश्ता चढे झूठको काजिबतारे ।
झूठका खेल जा सब पिण्ड व ब्रह्मण्ड हुवा ॥
साँचको ढ़ाँक लिया झूठ जो परचण्ड हुवा ॥
झूठके है सारे पैरू नहीं सच ढूँढ कोई ।
झूठके बीचमें सच सूरत पोशीदा दोई ॥
पावे आजिज सच सो तर्क जो कर दिलकी हुई ।
जानते कोई न सच इसलिए यमदण्ड हुवा ॥
साँचको ढ़ाँक लिया झूठ जो परचण्ड हुवा ॥
गञ्जल ।
यह सब कुछ खेल है बीराट नटका । कुतुब औ वेद पढ़ पढ़ जीव भटका ॥
निरञ्जन नटके जादू कौन जाने । यह तीनों लोक इसमें यौही अटका ॥
न पहचानै हुए सब ज्ञान अंध । न हरगिज छूटता है दिलका खटका ॥
भरभौडम सबको कैंद करते । सके क्यों तोड़ सुनिये मोह भटका ॥
बरोनी सब तमाशा यह जो देखे । न जाने यह दखनी खेल घटका ॥
है भूले साधु और पीरो पैगम्बर । नहीं कुछ भेद इस जादूकी हटका ॥
जो जाने भेद इसरारे नेहानी । तो फिर आदम न इस नजदीक फ़टका ॥
जो मुरशिद मेहूँवाँ रह बरहो उसका । तो वह जीव फिर न भवसागरमें अटका ॥
यही तदवीर आजिज है न कोई और । लगा एकतार धुन सतनाम रटका ॥
समस्त धर्मोंका वृत्तान्त ।
समस्त धर्म जो अभीतक पृथ्वीपर प्रचलित हुए तथा होंगे वे सब केवल एक ओम् शब्दके आधार पर हैं । इसी ओम्द्वारा चार वेद तथा तीनों लोकोंकी स्थिति है तीन वेद अर्थात् ऋग, यजुः, साम, अथर्व ये चारों असल हैं । इन चारोंकी पहुँच सत्यपुरुषके सत्यलोकतक है । देखो अथर्वण वेद प्रश्नोपनिषद्-सत्यकाम ऋषि अपने गुरु पिप्पलाद ऋषिसे प्रश्न करता है यह पाँचवाँ प्रश्न और ५९ मंत्र है ।
ऋग्निरेतंयजुर्भिरन्तरिक्षंसाम्भिर्यत्कवयो वदन्ति ।
तमोङ्कारेणैवायतनेनान्वेति विद्वान्यत्सच्छान्तमजरममृतमभयंपरञ्चेति ॥
जैसे समस्त पृथ्वीके मनुष्य पूजते तो विष्णुको हैं पर अपनी अविद्याके कारण दूसरा परमेश्वर समझकर एक दूसरेसे लड़ते झगड़ते हैं । इसी प्रकार समस्त संसारके निमित्त चलन इस वेदमें लिखे हैं । शब्द अथवा ओम्हीपर समस्त संसारको उपदेश दे दिया है । समस्त बैरागी ब्राह्मण और संन्यासी तो प्रत्यक्षमें विष्णुपूजा किया करते हैं पर दूसरे लोग अपने अज्ञानवश कोई अन्य परमेश्वर ठहरा रहे हैं । छः दर्शन और छियानवें पाखण्ड और समस्त संसारके अच्छे बुरे मनुष्य इसी परमेश्वर के अधीन हैं । वही ब्रह्म जीव और माया है । वही तीनों परमेश्वर हैं । वही पुरुष और प्रकृति है । वही ब्रह्म और माया है । बौद्ध धर्मों अथवा चीनवालाका योग और यज्ञ है । योग पुरुष चिह्न तथा यज्ञ स्त्रीत्वका चिह्न है । वही आद्या, निरञ्जन, ब्रह्म और शक्ति कहो सब एक बात है । योगी और संन्यासी शिवको पूजते हैं । उनका गुरु शिव है । इस कारण शिवलिंगकी पूजामें संलग्न हुए, वेदान्ती अद्वैत ब्रह्मका समाचार देते हुए द्वैतको पूजते हैं । इसका कारण यह है कि, समस्त संसारमें द्वैतका हुल्लड है । अद्वैत तो छिपा हुवा तथा विलोपित है, वह तो कहने सुननेमें आता नहीं, समस्त काय्योंसे मनुष्य अनभिज्ञ हैं, अज्ञानावस्थामें उसकी बीतती है, समस्त आज्ञाएँ वेदकी हैं । प्रत्यक्षमें दो मत संसारमें वेदको विरुद्ध माने जाते हैं—जैन तथा बौद्ध । सो ये दोनों भी वेदके ही हैं, अज्ञानसे उससे उसमें अन्तर दिखाई देता है । बौद्ध तो अब भारतवर्षमें नहीं हैं, पर जैन तो अनेक हैं ये लोग पञ्च परमेष्ठी मानते हैं । परमेश्वर कोई नहीं सो उनके पञ्च परमेष्ठी यह हैं । १ अरहन्त—२ सिद्ध—३—