सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

बलिका निषेध

निकालना चाहा, पर उस लिङ्गका अन्त उनको नहीं मिला। तब विवश होकर उसको उन्होंने छोड़ दिया और हिन्दू उसको पूजते हैं।

नानकशाह महाशयकी जन्मसाखीमें लिखा है कि, जब आप भवकेमें गए तब मरदानाने पूछा कि, गुरुजी ! इस भवकेके भीतर क्या है ? तब नानकसाहबने उत्तर दिया कि, तुम जाकर देखो। तब मरदानाने कहा कि, मुझको यहाँके झाड़ू देनेवाले भीतर जाने न देंगे। तब नानकसाहबने कहा कि, तू जा, तू सबको देखेगा पर तुझको कोई न देखेगा। मरदाना भीतर जाकर देख आया। फिर नानकसाहबने पूछा, क्या देखा ? तब मरदानेने कहा कि, वहाँ देखनेको क्या है ? भवानके भीतर एक नग्न मूर्तिमात्र पड़ी है, दूसर, कुछ नहीं। तब नानकशाहने कहा कि, वह शिवजीकी मूर्ति है। मुहम्मदसाहब और अलीने समस्त मूर्तियोंको तोड़ा तथा पृथक् किया, पर उस मूर्तिको हटा नहीं सके। मुहम्मद साहबके पीछे खूबवार हुसेनी नामक एक बादशाह हुवा। उसने उस मूर्तिको अलग करना चाहा। तब उसके सारे शरीर तथा उसके समस्त सैन्यमें आग लग गई। सब मरने लगे तब उस बादशाहने अपने दोषके निमित्त क्षमा-प्रार्थना की। इस कार्यसे हाथ रोका। तब उसको और उसकी फौजको सुख मिला।

भवतवर पीपा कबीर साहिबके गुरु भाई थे। आपका बाहा विश्वास था जो कि कबीर साहिबका है। आप भी उसी तत्त्वके उसी पथसे उपासक थे जिसकी तत्त्वसे तथा जिस पथसे कबीर साहिब थे। पीपाके विश्वासकाही प्रभाव था कि सच्ची द्वारिकामें पहुँच गया कबीर साहिबके राम मंत्रके विश्वासकी करामात थी कि सिद्ध पदवी पाई। यद्यपि असत्में सत्का विश्वास उतना लाभदायक नहीं होता जितना कि सद्दस्तुका होता है संवादी भ्रम तो साक्षात् कल्याणकारी दीखताही है। पर झूठे विश्वासमें सुख नहीं है भक्तोंके श्रद्धा विश्वास निराले हुआ करते हैं उनकी दीवानगी अनन्य भक्तिको लिये हुए होती है। जो कुछ वो चाहते हैं सत्य पुरुषको वही बनना पड़ता है। इसका रहस्य साधारण व्यक्ति नहीं समझ सकते। इसे वे ही समझ सकते हैं जिनके दिलमें कुछ प्रकाश हो।

जीवकी हालत ।

पहिलेमें कुछ और था पर जब मेरी यथार्थ अवस्था बदल गई और मैं दूसरी अवस्थामें आया तब मैं भ्रमका पुतला हो गया और मैं सहस्रों प्रकारके धर्म कर्म स्थिर करने लगा। एक धर्मको मैं सच्चा ठहराता हूँ तथा दूसरेको झूठा समझता हूँ अनगिनती धर्म मैंने स्थिर किए और कर रहा हूँ और भविष्यमें

करूँगा। सो सब मेरे भ्रमकी अवस्थामें ठहराए गये हैं। एक स्थिर करता हूँ तथा दूसरे को काटता हूँ न मेरी बुद्धि ठिकाने है और न मेरे विश्वास स्थिर हैं। मैं अपने पागलपनमें सब कुछ कर रहा हूँ। इसी पालगपनेकी अवस्थाको मैं अपनी बुद्धि अवस्था मानी तथा दूरदर्शिता समझता हूँ। यद्यपि यह सब बातें मैं अपने अज्ञानावस्थामें करता हूँ। जबसे मैं भ्रममें पड़ा तबसे मैंने अपने निमित्त दो मकान बनाएँ। इन्हीं दोनों मकानोंमें रहा करता हूँ। एकका नाम पिण्ड तथा दूसरेका नाम ब्रह्माण्ड है। ये दोनों पागलखाने हैं मैंने अपने मकानमें नौ महल बनाए वे ये हैं—दानमयीकोश शब्दमयी कोश बाणमयीकोश आनन्दमयी-कोश मनुमयीकोश प्रकाशमयीकोश ज्ञानमयीकोश आकाशमयीकोश प्रज्ञानमयीकोश।

इस नौ महला मकानमें मैं रहने लगा। जब जिस महलमें जाकर बैठता हूँ तब मेरा ढङ्ग वैसाही हो जाता है। सब बल धन इत्यादि उसीके अनुसार प्राप्त होता है। मेरी स्थिति सदैव इसी नौमहला मकानमें रहती है। बाहर जानेका बल नहीं। कभी मैं नदी कभी बूंद बन जाता हूँ। नदी बूंद दोनोंमें एकही कौतुक है। मैं अपने असलको भूल गया। मैंने अपने गलेमें मालाको पहनकर इधर उधर ढूँढ़ता फिरता हूँ। मैं अपने कानपर लेखनी रखकर भूल गया ढूँढ़ता फिरता हूँ। जब किसीने कहा कि, कलम तो तुम्हारे कानपर है तब मैंने अपनी कलम पायी। मैं जान बूझकर भटकता रहा, दूसरेके बतलानेका ओहताज हो गया। इस प्रकार मैं अपनी पूर्वावस्थामें पृथक् होकर दूसरोंके बतानेका ओहताज हो गया। पिण्ड तथा ब्रह्माण्ड दोनों हमारे बनाए हैं पर मैं भूल गया। नहीं जानता कि, किसने बनाया। आपको और तथा बनानेवालेको और जानता हूँ। मैंही दास तथा मैंही परमेश्वर बन बैठा, असली परमेश्वरको मैं नहीं जानता, नहीं पहचान सकता, असल परमेश्वर मेरे कहने सुननेसे परे हैं। उसको न पहचाननेसे मैं पागल बन रहा हूँ। मेरे जप तप पूजा वंदना आदिक सब भ्रम हैं, इनके, द्वारा जो कुछ प्राप्त होता है वह सब अस्थायी तथा जल परकी लकीरके समान है। कबीर साहबका वचन है कि, ये सब मनुष्योंके कर्म हैं सो सब भ्रम हैं यही बात देवी भागवतके नवें स्कन्ध और १९ अध्यायमें देखा—महामायाका वचन है कि, सात करोड़ महामंत्र जो हैं सो सब मेरे नाम हैं। अतः जो वेद शास्त्र हैं और जो कहने सुननेमें आता है सो सब माया है जो कुछ माया है, सो सब भ्रम और धोखा है। मायाको माया खाजाती है। जो मायासे पृथक् है वो ही बचा है। दूसरे सब नष्ट हो जावेंगे मैं जब सर्जन कर्ता बन बैठता हूँ तब जानता हूँ कि,

यह सब सृष्टि मेरी है । जब मैं स्वयं सृष्टि बन जाता हूँ तब कहता हूँ कि, यह रचयिता मेरा है । इसी प्रकार जब बादशाह बन जाता हूँ तब कहता हूँ कि, यह सब प्रजा मेरी हैं । जब मैं धनहीन तथा दरिद्र हो जाता हूँ तब कहता हूँ कि, यह मेरा सच्चाट है और मैं इसकी प्रजा हूँ । मैं ही तो बादशाह हूँ मैं ही प्रजा हूँ । न बादशाह कुछ है न प्रजा कुछ है । केवल एक जीव है, उसका कुछ नाम रखलो । न यह मनुष्य है, मनुष्यका जन्माया हुआ है । पशु पक्षी जड़ चैतन्य सभी कुछ यह है पर सबसे पृथक् यह है । मैं नहीं जानता कि, पहले मैं क्या था । अब मैं क्या हूँ । मैं पाँच तत्त्व तीन गुण तथा चौदह इन्द्रियोंसे पृथक् हूँ । तथा संयुक्त भी हूँ । मैं अब भ्रमरूप हूँ । मैं पहले एक भ्रम था फिर अनेक हो गया । मैं ढोल बजाता हुआ जाता हूँ एक दूसरा भ्रम व्याहकर लाता हूँ । एक भ्रम दूसरे भ्रमके साथ मिलावट करते हैं तब दूसरा तीसरा फिर चौथा भ्रमरूप लड़का लड़की उत्पन्न होते हैं फिर उनके प्रेममें फँसकर मर जाता हूँ । जब एक भ्रमके साथ दूसरा भ्रम हुआ तब अनगिनती भ्रम एकसे अनेक हो जाते हैं । जैसे बाँसके रगड़नेसे आग निकलती है वो समस्त बनको भस्म कर देती है इसी प्रकार जब एक भ्रमके साथ दूसरा भ्रम हुआ तब उसके समस्त सुकार्य तथा भले कामोंको भस्म करके राखमें मिला देते हैं । यह अज्ञानवश कहता है कि मेरी स्त्री, मेरा पुत्र, मेरी पुत्री मैं अपने बाल बच्चोंके निमित्त कमाई करूँ । कमाकर उनका पालन करूँ । यह मूर्ख इतना नहीं सोचता कि, जिसने मुँह पेट बनाया है वही पालन भी करेगा मैं बाल बच्चोंके सोचमें जोमरता हूँ सो मेरा क्या किया होता है । जिसने मुँह और पेट बनाया उसीने आटा दाल नमक आदिक सब कुछ बनाया । जीवन-भर कमाईके ध्यानमें फँसकर खराब होता है । अपने परमेश्वरकी वंदनाकी ओर तनिकभी ध्यान नहीं देता है न सोच तथा विचारही करता है कि, मैं किस-कारण मनुष्य कहलाता हूँ । मनुष्यता क्या है । यदि मैं मनुष्य हूँ तो मुझको अवश्यही मनुष्यताकी ढुंढाई करनी चाहिये ? जब मैं मनुष्यता पर अधिकृत होता हूँ तब मेरा समस्त कार्य पूरा होगा । जबलों केवल मेरी सूरत मनुष्योंकी है कार्य पशुओंका है बुद्धि पशुओंकी है, तबलों मैं कदापि मनुष्य नहीं हूँ । इस कारण मुझको अवश्यही उद्योग करना चाहिए, । जिसमें मनुष्यताकी बातोंको प्राप्त करूँ । जबतक मुझमें मनुष्यता न हो तबतक मैं कदापि मनुष्य नहीं समझा जा सकता हूँ ।

चार-पशु

क. ११ पृ. ११७—नरपशु गुरुपशु, वेद पशु, तिरयापशु संसार ।

कहैं कबीर सो पशु नहीं, जाके विमल विचार ॥

कबीर साहब कहते हैं कि, इस संसारमें चार पशु हैं। ये पूरे तथा पक्के पशु भीतरी आँखोंसे अंधे हैं। यद्यपि वे बाहरी आँखोंसे देखते हैं तथापि अंधोंके समान समझे जाते हैं। ये चारो पशु, मूर्खता तथा नासमझीके खूंटोंके साथ बंधे पड़े रहते हैं।

नरपशु ।

नरपशु, पशुरूपी वह मनुष्य है जो बिनाजाँचे किसीके कहनेसे विश्वास करके उसका पीछा करे। जैसे किसीने कहा कि, कौवा तेरा कान लिये जाता है तो वे नहीं टटोले पर कौवेके पीछे दौड़े। यह नरपशु अपने मनमें नहीं सोचता कि, मैं उसके कहनेका विश्वास क्यों करूँ मेरे कान तो मेरी देहमें है। पर वह कहता है कि, अमुक मनुष्य जो कहता है उसकी बात मिथ्या कैसे ठहर सकती है? इसी प्रकार यह एक उदाहरण है :—

दृष्टान्त ।

एक राजा था उसके पास एक बड़ा श्रेष्ठ बुद्धिमान मंत्री था। वो राजा तो मूर्ख तथा नरपशु था। उसके मंत्रीका नाम मूच्छु था। इस मंत्रीसे समस्त दरबारी महान् शत्रुता रखते थे। सब चाहते थे कि, मूच्छु किसी प्रकार हट जावे तो हम राजाको भलीभाँति लूटें। पर मूच्छु बड़ा चैतन्य रहता था। बड़ी नमकहलालीके साथ काम किया करता था। राज्यमें किसी प्रकारकी बाधा उपस्थित नहीं होने देता था। एक बार इस राजाको चढ़ाईकी आवश्यकता हुई।

वैरी राजाका दुर्ग बड़ा दृढ़ था कि, उसका टूटना दुष्कर था तब समस्त अन्यान्य कर्मचारियोंने सलाह की कि, इस अवसरपर मूच्छुको भेजना उचित है। जिसमें यह जब वहाँ जावेगा तो निश्चय मारा जावेगा। सबोंने मिलकर राजासे कहा कि, ऐ महाराजा ! आप इस युद्धमें मूच्छु मंत्रीको भेजो तो वह दुर्ग हस्तगत होगा। राजाने कहा मान लिया मूच्छुको भेजा, वह गया। लड़ भिड़कर उस दुर्गको करकवलितकर लिया। समस्त वैरी अधीन हो गए। तब मूच्छुके वैरियोंने आपसमें परामर्श किया कि, अब तो मूच्छु विजयी हुआ। इस राजाके सामने उसकी बड़ी मान मर्यादा होगी। हम लोगोंका निरादर होगा। इस कारण अब कुछ धोखा करना चाहिए। तब इन सबोंने आकर कहा कि, महाराजा ! मूच्छु तो मारा गया। हम लोगोंने दुर्गको विजय कर लिया। मूच्छु भूत हो गया। इस राजाको विश्वास हो गया उसने मूच्छुके स्थान दूसरा मंत्री रख लिया। जब मूच्छुने सुना कि राजाने दूसरा मंत्री रख लिया, तब उसको संसारसे बड़ी घृणा होगई। भगवद्भजनमें लग गया। मूच्छुके वैरियोंने राजाको

सिखला रक्खा था कि, अब मूच्छु भूत बनकर फिरा करता है । यदि वह आपके समीप आवे तो उसको कदापि आने न देना एकदं उसको देखकर भागना । कारण यह कि, जो कोई उसके समीप जाता है उससे वह चिपट जाता है । यह बात राजाके मनमें भली प्रकार बैठ गई । एक दिवस राजा आखेट करनेके निमिख बनको गये । मूच्छु एक पेड़के नीचे बैठकर भगवद्भजनमें लीन था । जब राजा बनमें गया तब मूच्छु मंत्रीको बूझके नीचे देख जान लिया कि, यह वही मेरा मंत्री है जो प्रेत हुआ है । ऐसा न हो कि, यह भूत मुझसे चिपट जावे । राजा तुरंतही अपना घोड़ा दौड़ाकर भाग गया । उस नरपशुको तनिक भी सुध नहीं हुई कि, इस चकमेको तो जान जाय ।

दूसरा दृष्टान्त ।

एक राजाने अपने नौकरोंको घाटपर भेजा कि, धोबीसे वस्त्र धोनेको सहेजदें । भूत्य जब घाटपर धोबीके पास गया तो देखा कि, धोबी सूढर सूढर कर रो रहा है । इस धोबीको रोता देखकर राजाके भूत्यने पूछा कि, तू क्यों रोता है ? उसने उत्तर दिया कि, सूढर मर गया । यह बात सुनकर राजाका भूत्य भी सूढर सूढर कहकर रोता हुआ राजाके पास लौट गया । राजाने पूछा तू क्यों रोता है ? उसने उत्तर दिया कि, सूढर मर गए । उसे रोता देखकर राजा भी सूढर सूढरकर रोने लगा । राजाके रोते हुए, राजाके महलकी समस्त रानियाँ और समस्त नगर सूढर सूढर कहकर रोने और पछाड़ खाने लगे । कुछ कालोंके पीछे राजाका मंत्री आया । राजाको रोते तथा समस्त नगरको शोकाकुल देखकर उसने पूछा कि, ए महाराज ! आपके विलापका क्या कारण है और समस्त नगरमें ऐसा शोक क्यों फैला हुआ है ? तब राजाने कहा कि, सूढर मर गए । तब मंत्रीने पूछा कि, सूढर कौन था ? तब राजाने कहा कि, मैं तो नहीं जानता । अपने भूत्यको रोता देखकर मैं भी क्रंदन करने लगा था । मंत्रीने उस भूत्यको बुलाकर पूछा कि, सूढर कौन था जिसके निमित्त तू रोता था । भूत्यने उत्तर दिया कि, मैं कुछ नहीं जानता पर धोबी सूढर सूढर करके रोता था । उसको देखकर मैं भी रोने लगा तब मंत्रीने उस धोबीको बुलाया और पूछा कि, तू बतला कि, सूढर कौन था जिसके निमित्त तू रोता था ? तब धोबीने उत्तर दिया कि, मेरे पास एक गदहेका बच्चा था उसका नाम मैंने सूढर रख दिया था उसको मैं बहुत चाहता था वह आज घाटपर मर गया उसके दुःखसे मैं रो रहा हूँ ।

गुरुपशु ।

गुरुपशु वह है कि, जो बिना ज्ञांचे शिष्य किया करता है । जो शिष्य

समझदार होता है पहले भलीभाँति समझबूझ लेता है तब गुरु करता है। चार बातोंकी जाँच करलेना चाहिए। अर्थात् गुरु, शास्त्र, आचार्य, ईश्वर, ये चारों बातें जब भली भाँति जानी, जाय तब गुरु करना उचित है। प्रथम गुरु, सर्वतोभावसे योग्य हो। द्वितीय शास्त्र निर्दोष तथा निष्कलङ्की हो। तीसरे धर्मका अग्रगण्य सब प्रकारसे योग्य तथा निर्दोष हो। चौथे यह जानना चाहिये कि, वह गुरु किस ईश्वरकी भक्तिमें लगाता है। जिस ईश्वर अथवा देवताकी प्रार्थना बतलाता है वह देवता कैसे गुण तथा क्या बल रखता है ? हमें वह छुटकारा देसकता है वा नहीं ? यदि वह सर्वतोभावसे योग्य तथा सामर्थ्यवान् है तो उसका पूजन उचित है क्योंकि मनुष्य अंधे गुरुसे मुक्ति नहीं पा सकता है।

साखी - कबीर - जाको गुरु है अंधरा, चेला खरा निरंध ।

अंध अंधको ठेलिया, परे कालके फंद ॥

चौपाई - गुरु गुरु कहत सकल संसारा । गुरु सोई जिन तत्त्व विचारा ॥

प्रथम गुरु हैं पिता व माता । रज वीरजके सोई दाता ॥

दूसर गुरु है मनकी दाई । ग्रीहवासकी वंद छोड़ाई ॥

तीसर गुरु जो धरियानामा । लै लै नाम पुकारै गाभा ॥

चौथे गुरु जिन दीक्षा दीना । जगव्यवहार रहत सब चीना ॥

पँचवें गुरु जन वैष्णव कीना । रामनामको सुमिरन दीना ॥

छठवें गुरु जिन भ्रमगढ़ तोड़ा । दुविधा मेट एकसे जोड़ा ॥

सातवा गुरु सत शब्द लिखाया । जहाँका ततले तहां समाया ॥

साखी - कबीर - सात गुरु संसारमें, सेवक सब संसार ।

सतगुरु सोई जानिए, भवजल उतारे पार ॥

कबीर कान-फूँका गुरु, हृदका बेहृदका गुरु और ।

बेहृदका गुरु जब मिले, तो लहे ठिकाना ठौर ॥

अर्थ-कबीर साहिब कहते हैं कि, जिसका गुरु अन्धा है उसका चेला उससे भी अधिक आंधरा होगा, अन्धागुरु चेलाको अन्धकारकी ओर ही ठेलता है इस तरह दोनों ही नरकके फन्देमें फस गये। कालने उन्हें कवलित कर लिया सारा संसार गुरुगुरु कहता है, पर वही गुरु है जो तत्त्वका बिचार रखता है। सबसे पहिले तो मा और बाप गुरु हैं क्योंकि, वे ही अपने रज वीर्यसे शरीरको उत्पन्न करते हैं। दूसरी गुरु सुखपूर्वक जतन करानेवाली दाई है जिसने गर्भवासकी कैंद छुटादी। नाम करण करने वाले तीसरे गुरु हैं क्योंकि, सब लोग उन्हींके रखे नाम से बोलते हैं। यज्ञोपवीत कराने वाले तथा पढ़ाने लिखाने और व्यव-

हार सिखानेवाले चौथे गुरु हैं । पाँचवे गुरु वे हैं जिन्होंने वैष्णव बना राम नामका मंत्रका सुमिरन देकर भगवान्की ओर लगाया । भ्रमदुर्गके तोड़ने वाले छठे गुरु हैं । जिन्होंने दुविधा मिटाकर एकसे नेह लगवा दिया । सातवे वे गुरु हैं जो शब्द लिखा दिया जिससे यथार्थ तत्त्व जान उस तत्त्वमें निमग्न हो गया अथवा संसारका तत्त्व लेकर इसे जैसेका जैसा दिखा दिया । मैं जहाँसे आया था वहीं जा दाखिल हुआ । कबीर साहिबका कथन है कि, दुनियाँमें सात गुरु हैं सारा संसार इन्हींका सेवक है । सतगुरु या सातवों उसीको समझिये जो भवसागरसे पार लगादे । कानफूका तो हृदका गुरु है । बेहद (ब्रह्म) का नहीं । जब बेहदका गुरु मिल जाता है उस समय वो औरका और ही हो जाता है । संसारीका असंसारी एवं अल्पज्ञका सर्वज्ञ बन जाता है ।

जो शिष्य होना चाहे वह पहले भली भाँति जाँच करे । जो कोई बिना जाँचे गुरु करता है वो बिगड़ता है । अँधेरे कुएमें गिरता है ।

अंधोंका पन्थ ।

एक अंधा पुकार पुकारकर कह रहा था कि, मुझको सातों आकाश और वैकुण्ठ सब कुछ दिखाई दे रहा है । उसके पास एक मनुष्य खड़ा था । वह अंधेसे कहने लगा कि, ए भाई ! मुझे भी वह आकाशका मार्ग बता ? अंधेने कहा कि, तूभी आँख फोड़वावे तो तुझको भी दिखाई देने लगे । उसके कहनेसे अपनी आँखें फोड़वाई । उसकी आँखें फुट गईं तब उसने कहा कि, मुझे तो कुछ भी दिखाई नहीं देता । तब पहलेके अंधेने उसे सिखाया कि, तू भी मेरी तरह कह । वह भी उसी प्रकार कहने लगा कि, मुझे समस्त स्वर्ग दिखाई देते हैं । मेरी भीतरकी आँखें खुल गईं । तब इन दोनोंकी बातें सुनकर एक तीसरेने भी अपनी आँखें फोड़दी । फिर चौथे पाँचवने आँखें फोड़वाईं । जो कोई आँखें फोड़वाता उसको पहलेका अंधा सिखा देता कि, जैसे मैं कहता हूँ इसी प्रकार तू भी कह । वह भी वैसाही कहने लगता था । तात्पर्य यह कि, बीस तीस मनुष्योंने मिलकर अपनी आँखें फोड़वालीं । तब एक और मनुष्य आया उसने भी अपनी आँखें फोड़वाईं और जब उसको कुछ दिखाई नहीं दिया तो उसने कहा कि, मुझको तो कुछ दिखाई नहीं दिया ? तब पहलेका अंधा उसको सिखलाने लगा कि, तूभी इसी प्रकार कह जैसे कि, हमलोग कह रहे हैं । उसने कहा कि, मैं ऐसा कभी भी न करूँगा । दूसरे अंधोंसे पूछा कि, तुमको क्या दिखाई देता है ? सबोंने कहा कि, हम सबने इस पहलेके अंधेके कहनेसे अपनी आँखें