कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
नारदजीकी कथा
हैं एकही दोनों न कं उनमें आजिज । कोई विष्णुको पूजे कोई दिलदार मसीहा ॥
यह धर्म सारी पृथ्वीपर प्रचलित है । पादरी लोग सब देशों, शहरों, गावोंमें फिर २ कर उपदेश दिया करते हैं । इसमें किसी प्रकारका कोई ऐसा धार्मिक नियम नहीं है जिसके कि, करनेमें इस धर्मवालोंको कुछ कठिनता जान पड़े । रोज़ा नमाज़, पूजा, पाठ, कोई भी ऐसा नियम नहीं, जो अवश्य करना पड़ता हो । हाँ ! पादरियोंको तो कुछ नियम मानने पड़ते हैं, क्योंकि, उनको वही काम है । पादरियोंके भी भजनका कोई विशेष नियम नहीं, वरन् रविवारको गिर्जाघरमें जाकर उपस्थित होना और आये हुये लोगोंको बाइबल आदि किसी-धार्मिक पुस्तकका कुछ भाग पढ़कर सुनानाही उनका नियम है ।
पहले इस धर्मके फकीर (पादरी) लोग भजन और संयम किया करते थे, गुफाओंमें बैठकर ईश्वरके नामका अभ्यास किया करते थे, जिससे उनका अन्तःकरण शुद्ध और प्रकाशमय होता था । अब पादरियोंमें यह बात कहीं नहीं पाई जाती । ईश्वरके नाम स्मरण, बिना अन्तःकरणकी शुद्धि और ज्ञानका प्रकाश प्राप्त होना कठिनही नहीं वरन् असम्भव है ।
इतिहासोंसे जाना जाता है कि, वे पादरी, जिनसे कि, ईश्वरके नामका स्मरण और ईश्वरकी भक्तिका प्रकाश ईसाई धर्ममें फैलता था वे अब नहीं हैं । न उनका उपदेश किया हुआ नामही इन धर्मवालोंमें शेष रहा । वह नाम जिससे ईसाई साधु लोग ईश्वरी ज्ञान प्राप्त करते थे अब उसका कहीं पता नहीं । वर्तमानके ईसाईलोग नाम तो क्या लेंगे, वरन् अन्य धर्मवालोंको ईश्वरका नाम लेते देखकर हँसी, ठट्ठा उड़ाते हैं । यहाँ तक कि, उनके खण्डनमें सैकड़ों पुस्तकें छापकर प्रकाशित भी कर चुके हैं ।
जो भोजन भक्ति ईसाइयोंमें प्रथम भी थी अब उसका लेश भी नहीं रहा वरन् सबके सब सांसारिक विषय वासनाओंमें पड़कर ईश्वर भूल बैठे हैं, जो धर्मके उपदेशक पादरी लोग हैं, भारी २ वेतन पाते हैं, बगी और घोड़े दौड़ाते हैं, विषय वसानामें खूब मस्त रहते हैं; वे ईश्वरका नाम क्या जान सकते हैं ।
यह वर्तमानके विद्याभिमानी, पक्षपाती, धर्मद्वेषी और ढोंगियोंका कर्तव्य है कि, अब संसारसे ईश्वरके नामका जप स्मरण सब उठ गया । कुत्ब मुकद्दस (पवित्र पुस्तक) बाइबिलमें अपनी सम्मति मिलाकर बहुत भेद डाल दिया । उसमें जो गुण पहले था वह अब नहीं रहा । धर्मद्वेषी और विद्याभिमानियोंकी समझमें सूक्ष्म भेदकी बातें नहीं आती, बाहरी साधारण बातोंको कुछ २ समझ कर अपने विचारोंके ढंगकी बना लिया है । वास्तवमें उनका कुछ
अपराध नहीं, जैसी उनकी बुद्धि है वैसेही बनाते और करते हैं । विद्याभिमानियोंको अंतरीय प्रकाश कभी नहीं होती, फकीरोंको अंतर प्रकाश मिलता है, उससे वे लोग जो कुछ जानते हैं उसे दूसरेसे नहीं प्रगट कर सकते ।
अंतरीय प्रकाश, बिना सच्चे संत और सच्चे गुरुको कदापि नहीं मिल सकता । यही कारण है कि, सच्चे संत और विद्याभिमानी तथा संसारको चाहनेवाले ढोंगियोंमें सदासे भेद चला आता है । सच्चे संत और सच्चे साधु, ढोंगियों और मिथ्या विद्याभिमानियोंको ढोंग पाखण्ड और मिथ्या अभिमान छोड़नेको कहते हैं। तब वे कहते हैं कि, मुझे प्रत्यक्ष कुछ लाभ दिखलाओ। वो बात होनेवाली नहीं क्योंकि, सत्य विचार और निर्णयके बिना अंतरीय प्रकाश, नहीं मिल सकता । जो सर्वदा सांसारिक व्यवहार और विषयवासनामें फँसा रहेगा उसको प्रकाश कहाँसे मिले ? जो सच्चा ईसाई हो इनजीलके अनुसार कर्म करे तनिक भी विभिन्नता न होने दे तबही ज्ञानका प्रकाश प्राप्त कर सकता है ।
ईसाइयोंने साधुओंकी निन्दा करनी आरम्भ करदी। संत लोग इनसे अलग हो गये । संतोंके अलग होनेसे गुरु कहाँ रह सकते हैं ? गुरुही नहीं रहे तो पथ कौन बतावे ? इस समयमें इस धर्मके लोग साधुओंके स्थानमें पादरियोंको मानते हैं । सर्व प्रकारके शुभ कर्म करते हैं पर वह बात नहीं कि, जो सन्तोंके उपदेशसे मिलता है। क्योंकि, जब संसारीका गुरु संसारी हुआ तो; जैसे कीचसे कीचके धोनेसे शुद्धता नहीं होती उसी तरह गृहस्थी गुरुसे किसी प्रकार कल्याण नहीं हो सकता जबतक अवधूत, विरक्त, गुरु और आचार्य न मिलेगा तब तक कल्याण होना असम्भव है, जब गुरु विरक्त होगा तब भी सत्यके प्रकाश का मार्ग बतावेगा । इस धर्ममें रोजा निमाजकी कुछ भी ताकीद नहीं है यही कारण है कि, इस धर्मके लोग इन्द्रिय दमन नहीं कर सकते । इसमें बड़े २ विद्वान्, बुद्धिमान और शूरवीर लोग हैं इनके पास द्रव्य उपार्जनकी जैसी युक्ति है वैसे संसारकी किसी भी जातिमें न होगी । पर धार्मिक विचारमें ऐसे कच्चे हैं कि, उनके बराबर धर्ममें, पीछे संसारकी छोटीसे छोटी जाति भी नहीं है ।
सुना गया है कि, थोड़े दिनोंसे मेजर टकर साहब नामक किसी अंगरेजने मुक्ति फौज नामक एक मण्डली बनाई है, जिसमें सबके सब साधुओंके भेषमें रहते हैं, मन और इन्द्रिय दमन भी करते हैं । शायद वे लोग इनजील से उस वचनका कुछ आशय समझते होंगे कि:—
हजरत ईसाने किस लिये कहा कि, जो कोई अपना सलीब उठावे अपनेको भूल जावे, वह मेरे पीछे आवे प्रतिदिन सलीब उठावे । जिसने बाइबुलकी इस बातका आशय समझ लिया वही सच्चा ईसाई हुआ ।