कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
धर्मके चार चरण
करने लगे । आपके वचनको सुनकर लोग आश्चर्य मान गोदमें उठाकर प्यार करते हुए कहते कि, यह किसका बालक है ? यह यहाँ भूलकर आगया है । इसको बाहर छोड़ आओ ।
जब लोग सतगुरुको बाहर छोड़ आये, तो सुन्दर युवकका स्वरूप धारण कर उपदेश करने लगे । लोग कहने लगे कि, यह अपरिचित पुरुष है इसको घरमें मत आने दो. इसका कुछ विश्वास नहीं । जब इस प्रकार लोगोंने उस अवस्थाका भी विश्वास नहीं किया तो वृद्ध पुरुषका स्वरूप धारण कर उपदेश किया तब लोग क्रोध करके कहने लगे कि, यह बूढ़ा हो गया इस कारण इसकी बुद्धि भ्रष्ट होगई है कुछका कुछ बकता है ।
जब प्रगटमें लोगोंका यह रङ्ग ढङ्ग देखा तो अन्तर्धान होकर आकाश वाणी द्वारा उपदेश करने लगे । लोगोंको महान् आश्चर्य हुआ कि, यह अंतरिक्षसे कौन बात करता है ? इसी सोच और विचारमें सन्देहही करते रह गये । किसी किसी अंकुरी जीवोंने मान भी लिया । फिर सतगुरु सत लोकको पधार गये ।
९३ प्रश्न—भारतमें भाव भक्तिकी अद्वैतता, भारतवर्षमें जैसी भक्ति और सेवा है ऐसी और कहीं है कि, नहीं ?
उत्तर—आज कल पृथ्वीका जो जो एशिया, अफ्रिका, अमेरिका और योरप आदि द्वीप जाने गये हैं उन सभोंमें भारतके तुल्य भाव भक्ति और आत्म उन्नति नहीं है ।
भारतमें भी उत्तम मध्यम और कनिष्ठ भेदसे तीन प्रकारके साधु रहते हैं । कबीर पंथियोंकी उत्तम श्रेणी है, मध्यम श्रेणीमें सब तपस्वी और योगीआदि हैं । निकृष्ट श्रेणीमें वे हैं जिनके कि, ऊपर आकाशी पुस्तकें उतरी हैं जैसे पैगम्बर और सिद्ध लोग, ये लोग केवल उसी अंतरिक्षकी वाणी आज्ञाका भरोसा रखते हैं । जिनका उन्हें कुछ ज्ञान नहीं कि, कहाँसे आता है ? कौन भेजता ?
स्वपत्र सुदर्शन केवल पाँच ग्रास खाते थे; महाराजा युधिष्ठिर के यज्ञमें स्वपत्र सुदर्शनके भोजन किये बिना घण्ट नहीं बजा । महारानी द्रौपदीने दुर्वासा को केवल एक लंगोटीका दान दिया था जिसके पुण्यसे द्रौपदीकी प्रतिष्ठा रही यानी दुःशासन जैसा पहलवान द्रौपदीको नंगी करनेके लिये उनका कपड़ा खोलने लगा तो उस समय कपड़ा इतना बढ़ा कि, बड़ा ढेर लग गया पर द्रौपदीजी नंगी नहीं हुई इसपर गोस्वामी गरीबदासजी कहते हैं कि—
गरीब, इन्द्र भयै है धरम ते, यज्ञ है आदि युगादि ।
शंख पंचायन जब बजै, पंच ग्रासी साधु ॥
गरीब, द्रौपदी दिल जाना, स्वपत्र चरण पिय धोय ।
बाजे शंख सरब कला, रही आवाज न गोंय ॥
गरीब, द्रौपदी चरण जल, व्रत लिय सुपत्र संग नहीं कीन ।
बाजे शंख असंख धुन, गण गंधर्व भये लीन ॥
गरीब, पीताम्बरको फाड़िके, द्रौपदी कीनी लीर ।
अंधेको कौपीन कस, घनी बधायो चीर ॥
९४—प्रश्न—संसारीकी मुक्ति, जो संसारी बहुत जंगलमें फँसा है इसकी मुक्ति किस तरह होगी ?
उत्तर — साधु सेवाके बिना संसारीको भक्ति और मुक्तिकी राह नहीं मिल सकती । सतगुरु साधु सेवासेही प्रसन्न होता है, जहाँ साधुसेवा नहीं होती है वहाँ स्वयं सतगुरु जाता है साधु सेवाही है जो सतगुरुका कृपापात्र बना देती है ।
श्रीनगरके राजाकी कथा ।
श्रीनगरका राजा राममोहनराय महान् विद्वान् वेद पाठी और वेद विधिपूर्वक सब कर्म करनेवाला एवं साधु सेवी था । काश्मीरसे लेकर पहाड़के किनारे के प्रदेश सबही उसके अधिकारमें थे । जिस समय वह राज करता था वह सतयुग का समय था, सतगुरु सतसुकृतके नामसे प्रसिद्ध थे । गुरु महात्ममें लिखा है, धर्मदासजी प्रश्न करते हैं और सतगुरु उत्तर देते हैं ।
सत्त कबीर वचन ।
चौ०— पुरुष आवाज आये भौसागर । सत्त सुकृत हम नाम उजागर ॥
उत्तर दिशा गयो निज ठामा । पहुँच्यो श्रीनगर तहाँ ग्रामा ॥
मोहन राव तहाँको राजा । भक्ति करे मेटि कुल लाजा ॥
सुन्दर बदन रूप अधिकाई । प्रजा सुखी राज सुख पाई ॥
सुचि सज्जन अतिज्ञान उजागर । दीन लीन सन्तनसे आगर ॥
करत खोज साधनसे प्रीती । अति आनन्द रूप सुख रीती ॥
भांति भांतिके मण्डप छावे । साधु संत आदर करि लावे ॥
करे महोत्सव साधु बुलाई । परम पुरुष निशिदिन मन भाई ॥
निशि दिन वेद कथासे प्रीती । कौन भांति जीव यमसे जीती ॥
दोहा— खोज करत चित व्याकुल, ढूँढा सकलो भेख ।
सिरजन हार बतावहूँ, सबहीं कहत अलेख ॥