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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

कबीर साहिबका सत्यपुरुषकी आज्ञा पाकर आगे बढ़ना कालका अपने बारह पन्थकी बात०

पहुँचा । तब उन्होंने अपने विचारोंको छोड दिया और पुरुषोत्तमपुरमें आचार नहीं चला । इस बातको जो कोई जानना चाहे वह भक्तमालको देखले ।

आठवाँ प्रकरण ।

तीसरी बार कलियुगमें कबीर साहबका पृथ्वीपर प्रगट होना
और शवपत्र सुदर्शनके माता-पिताको मुक्तिका उपदेश
देना और बालरूप धारण करके कमलोंके पुष्पोंमें
तालाबपर लक्ष्मणा ब्राह्मणीको मिलनेकी कथा ।

शवपत्र सुदर्शनजी कबीर साहबके शिष्य हुए परन्तु उनके माता पिता नहीं हुए । जब सुदर्शनजीकी देह छूटी और सत्य लोकको गये, तब उन्होंने सत्य-कबीरसे निवेदन किया कि, हे सद्गुरु ! मेरे माता पिताकी मुक्ति करो । तब कबीर साहब उनका निवेदन स्वीकार करके पृथ्वीपर आये । शवपत्रके जो माता पिता थे वह दोनों डोमका शरीर छोडकर ब्राह्मण और ब्राह्मणी हुए थे, और चन्द्रवारे नगरमें रहते थे । पहले उनका नाम कुलपति और महेसरी फिर नरहर लक्ष्मणा हुआ । इस चन्द्रवारे नगरके तडागमें कबीरसाहब कमलोंके पुष्पोंमें एक छोटे बच्चेकी सूरत होकर रहे । प्रातःकाल वह ब्राह्मणी जब स्नान करनेको आयी तब स्नानादिसे निवृत्त होकर अपना अंचल पसारकर सूर्य भगवान्से पुत्र मांगने लगी क्योंकि, वह निःसंतान थी । उसी समय गुप्तरीतिसे कबीरसाहब उस ब्राह्मणीके अंचलपर आगये । इसपर उस ब्राह्मणीको निश्चय हुआ कि, सूर्य भगवानने मुझको बेटा दिया है वह पुत्रको लेकर अपने घरको आयी । ब्राह्मण ब्राह्मणी दोनों प्रसन्न होकर सेवा करने लगे । जब कबीर साहबको रात्रिके समय पलंगपर लेटाते और प्रातःकाल बिछौना झाड़ते तब प्रति दिवस एक तोला सुवर्ण बिछौनेके नीचेसे निकल पड़ता । इस प्रकार वे ब्राह्मण तथा ब्राह्मणी धनाढ्य होगये, और कबीर साहबकी दयासे उनका दारिद्र्य दूर हो गया । देखो ग्रंथ अनुरागसागर और निर्भयज्ञान इत्यादि वहाँ यह कथा विस्तारसे है । प्रमाण आगे ।

जब कबीर साहब, कुछ बड़े हुए तब दोनोंको सिखलाने लगे कि मैं तुम्हारा गुरु हूँ, तुम हमारा शब्द मानो तो मैं तुम्हारा उद्धार करूँगा और तुम्हारे आवा-गमनका बंधन टूट जावेगा । पर उन दोनोंको सत्यगुरुके कहनेका निश्चय नहीं हुआ । बालक जानकर कहना नहीं माना, तब कबीर साहब उनके गृहसे अन्तर्धान हो गये ।

कालका कबीर साहिबसे जगन्नाथ स्थापनाका वरदान मांगना

नवों प्रकरण ।

कबीरसाहबकी ४ थी, ५ वीं, ६ छठी और ७ वीं बार
प्रकट होनेका वृत्तान्त ।

४—"मूसा बोध" जिसमें कबीर साहबका हजरत मूसाको शिक्षा देनेका वर्णन है ।

५—"दाऊद बोध" जिसमें सदगुरुने हजरत दाऊदको उपदेश किया है ।

६—"सुलेमान बोध" जिसमें कबीर साहबने नवी सुलेमान बादशाहको शिक्षा दी है ।

७—"ईसा बोध" इसमें कबीर साहबने ईसाको उपदेश किया है ।

ये चारों बोध, मैंने अभीतक नहीं देखे, अपने कानोंसे तो सुना है कि, ये सब ग्रन्थ कबीर पंथियोंके पास हैं । ढूँढने तथा देखनेसे इनकी व्यवस्था प्रगट होगी । ×

दशवाँ प्रकरण ।

मुहम्मद साहबको चेतानेका वृत्तान्त ।

आठवीं बार कलियुगमें कबीर साहबका पृथ्वीपर प्रगट होना ।

(मुहम्मद साहबको रक्तपातसे हटाना, मेआराज मुहम्मद होना और मुहम्मद साहबको सत्यपुरुषका दर्शन कराना । सब आकाशोंकी सैर कराकर फिर मक्कः नगरमें प्रवेशित कराना और मुहम्मद तथा समस्त मुहम्मदियोंको मुक्तिकी आज्ञा कराना तथा रसुलल्लाःको पाँच कलमा पढ़ाना । चार कलमा प्रगट करने और पाँचवाँ कलमा गुप्त रखनेके निमित्त सावधान करना और मुहम्मदसाहबको आशीर्वाद देकर अन्तर्धान होजानेका वृत्तान्त वर्णन ।)

मुहम्मद साहबको चालीस वर्षकी वयमें पैगम्बरी मिली तब उन्होंने मुसलमानी धर्मका प्रचार किया । वह बलपूर्वक लोगोंको मुसलमान करने लगे और बहुत लोगोंको बंदी बनाकर उनके हाथ पैरमें जञ्जीरें डाल दीं और आज्ञा दी कि, जो मुसलमान होजावे उसको जीवित रखो तथा अन्यान्यका घात करो । बहुतसे मनुष्य मारे गये, जब व्यथित मनुष्योंकी क्रंदनध्वनि सत्यलोकपर्यन्त पहुँची, तब सत्यपुरुषको दया आयी और मुक्तामणिजीसे कहा कि, हे मुक्तामणिजी !

× ये सब ग्रन्थ मेरे पुस्तकालयमें उपस्थित हैं, सदगुरुकी कृपा होगी तो समयपर प्रकट करनेका प्रयत्न किया जायगा.

अनुवादक—श्रीयुगलानंद बिहारी.