कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
तीसरे जिबरूत मुकामका वर्णन चौथे, पांचवें और छठे मुकामोंका वर्णन
श्री कबीर साहबजीके भण्डारेकी कथा ।
कबीरकसोटी जब ब्राह्मणोंने देखा कि, अब तो कबीर साहबका विशेष गौरव हुवा, हम लोगोकी कोई युक्ति नहीं चली, तब सबने परामर्श करके यह निश्चय किया कि, अब ऐसी युक्ति करनी चाहिए जिसमें कि, कबीरसाहबकी प्रतिष्ठा भङ्ग हो जावे । तब उन लोगोंने चार ब्राह्मणोंको नियत किया कि, तुम लोग देश देशान्तरोंमें जाकर समाचार दो कि अमुक दिवस कबीर साहबका भण्डारा है । सब संत महंत कृपा करके आवें । तब उन चारों ब्राह्मणोंने डाढी मूँछ मुँडवाकर वैष्णव वेष बनाया । उन चारोंने दो दो चले किये । यह सब बारह हुए, ये बारहों ब्राह्मण सब स्थानोंमें दौड़ गए और समस्त संत महन्तोंसे कहा कि, अमुक दिवस कबीर साहबका भण्डारा है ।
यह बात सुनकर समस्त संत महंत उस दिन कबीर साहबकी कुटीपर आए । बडी भीड़ हुई । कबीर साहबने अपना इकतारा लेकर बनका मार्ग लिया शब्द गाते हुए सत्यलोककी ओर दृष्टि की । तब सत्यलोकके हंस, मनुष्यस्वरूप धारण करके उत्तर पड़े लाखों बोरे नाना प्रकारके स्वादिष्ठ पकवानोंके लेकर आ पहुँचे । केशव बनजारा मेवे तथा अन्यान्य वस्तुएँ लेकर आ पहुँचा । नौ लाख बोरे खानेकी वस्तुओंके भरकर केशव बनजारा आया था, भण्डारा आरंभ हो गया । सब साधुओंकी सेवा तथा पहुनई आरंभ हो गई । किसीको इस बातकी सुध नहीं कि, ये कौन लोग हैं तथा कहाँसे आए हैं, जो भण्डारा कर रहे हैं । पन्द्रह दिवसपर्यन्त बराबर भण्डारा होता रहा इसके पीछे समस्त संत महंतोंको भेटे तथा वस्त्रादिक देकर विदा किया । सब धन्य कबीर धन्य कबीर एवं जय कबीर कहते हुए विदा हुए सब द्वेषी ब्राह्मण मूँह पसारकर रह गए कुछ न बन पड़ा । देवी भागवत छठएँ स्कंधके ग्यारहवें अध्यायके ४२-४५ में लिखा है कि, जो त्रेता और द्वापरमें राक्षस थे वेही अब कलियुगमें ऐसे ब्राह्मण हैं जो पाखण्डमें लगे हुए हैं प्रायः सज्जन मनुष्योंको ठगते हैं झूठे तथा वेदके धर्मसे हीन हैं, कपटी, चूस्त चालाक-धमंडी वेदविहीन, शूद्रोंकी सेवा करनेवाले हैं तथा कोई कोई अनेक अपधर्मोंको प्रवर्त करते हैं । वेदनिन्दक, क्रूर, धर्मशत्रु और गप्पी हैं ॥ कबीर साहबने भी अनेक बार कहा है कि, कलियुगके वे ब्राह्मण राक्षस हैं इस कारण वे साधुओंसे वैर करते हैं ।
लक्ष्मीजीका कबीर साहबको लुभानेकी इच्छासे आना और विफलमनोरथ होकर लौट जाना ।
विष्णुने लक्ष्मीजीसे कहा कि, तीनों लोकमें तो ऐसा कोई नहीं है जो तुम्हारे
नयनबाणरूपी, लोभद्वारा आहत न हुआ हो। तुम्हारी मोहिनी मूर्ति और तुम्हारी कटाक्षद्वारा अपनेको न भूल गया हो। पर जब तुम कबीर साहबपर अपना जादू डालोगी तब मैं तुम्हारे मनमोहनमंत्रकी प्रशंसा करूंगा। इस कारण तुम काशीजी जावो। कबीर साहबके हृदयको हस्तगत करलो। लक्ष्मीजी काशीमें कबीर साहबके पास अत्यंत हावभावके साथ आ सामने खड़ी होकर कहने लगीं कि, ऐ महाराज ! आप मुझको अपने घरमें रखो। मैं आपके पास निवास किया चाहती हूँ। तब कबीर साहबने उसकी ओर दृष्टिपात भी नहीं किया और कहा कि, ए लक्ष्मी ! तू मेरे समीप क्यों आई है ? क्या स्वर्गलोक उजाड़ पड़ा है जो तू मेरे पास यहाँ आई है—मुझे तेरी कामना नहीं है तू यहाँसे शीघ्र चलीजा तब लक्ष्मीने अत्यंत नम्रता की कि, महाराज ! मुझको चार दिन तो अपने घरमें रहने दो। तब कबीर साहबने कहा कि, तू यहाँसे चली जा। धन अनेकों अनर्थोंकी जड़ हो जाता है मैं तो निर्धनही अच्छा हूँ। लक्ष्मी निराश होकर वैकुण्ठको पलट गई इसके पीछे देवराज आये और कहने लगे कि, कबीरसाहब आप जो कुछ राजकाज धन सम्पत्ति मांगें वो सब मैं दूँ। कबीर साहबने कहा कि, इन सब वस्तुओंकी तो मुझको कामना नहीं है, यदि तुम्हारे पास वह नाम हो कि, जिससे आवागमन मिट जावे तो वह मुझको अवश्य दीजिये। उसने कहा कि, यह तो अभी मेरे अधिकारसे बाहर है, पीछे धन्य कबीर धन्य कबीर ऐसा कहते हुए निजलोकको चले गए। ये सब कौतुक जब सिकन्दरशाह देख चुका तब उसने कबीरसाहबको उत्तम वस्त्र पहनाए। जड़ाऊ मुकुट शीशपर रक्खा। आपको हाथीके ऊपर सवार करा पीछे आप खड़ा हुवा चंबर करता तथा सत्यगुरुकी प्रशंसा करता हुवा अपने साथ ले चला। यह लीला देखकर समस्त काशीके लोग चकित हो रहे। ब्राह्मण और मुल्ला काजी इत्यादि सबके मस्तककी वायु पृथक् हो गई। शाह सिकन्दर कबीर साहबको दिल्लीको ले गया। उस समय शंखतकीके मनमें अत्यंत खेद हुआ। कबीर साहबकी आश्चर्यमय लीलाएँ तो अगणित हैं जिनका विवरण देवता तथा मनुष्य कोई नहीं कर सकता मैं भी उन सबको यही छोड़ता हूँ। केवल आवश्यककी बातें लिखता हूँ। जब कबीर साहबने अपना धर्म पृथ्वीपर प्रचलित किया, सत्य पुरुषकी भक्ति प्रगट की और सत्य-
दश सोहंगका हाल।
कबीर साहबने ग्रन्थ मुहम्मदबुद्धिमें जिन दश स्थानोंका विवरण किया है वह यही दश सोहंग हैं। १—सत्यपुरुष सोहंग। २—सहज सोहंग। ३—अंकुर सोहंग। ४—इच्छा सोहंग। ५—सोहंग सोहंग। ६—अचिन्त्य सोहंग। ७—अक्षर