कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
तिमिर लिंगको रोटीका फल, शास्त्र जैन साहित्यका दृष्टान्त
मैं त्रिगुणसे परे हूँ, मुझे कोई भी नहीं जान सकता, मैं सर्वका साक्षी द्रष्टा हूँ । यह परोक्ष ज्ञानका वर्णन हुआ ।
अब अपरोक्षका वर्णन सुनो । अपने शरीरके अन्तर बाहरके दोषोंको भली प्रकार जानता है इसी प्रकार दूसरोंके शरीरकी उपाधिको भी जानता है, तीनों अवस्थायोंके दुःख सुखसे भली प्रकार विज्ञ होकर जाग्रत स्वप्न-सुषुप्तिकी सब सुधि रखता है । इन्द्रियोंके कर्म्मोंसे भली प्रकार विज्ञ होता है सारे संसारको नाशमान् और अपनेको अविनाशी जानता है, अपने आपको सब शक्तिमान् समझता है, सब प्रकारकी सामर्थ्य रखता है, होनीको अनहोनी और अनहोनीको होनी कर देखलाता है । इस प्रकार षट् ऐश्वर्य जिसमें हो वह जगत्का ईश्वर कहलाता है, सब प्रकारकी ऋद्धि सिद्धि उसके आधीन होती है, सृष्टिकर्ता करके पूजा जाता है । यह प्रथम अपरोक्ष ज्ञान कहलाता है ।
अब दूसरे अपरोक्ष ज्ञानका वर्णन करता हूँ—जिसको तीनों कालका ज्ञान हो, जिसकी दृष्टिसे तीनों काल उठ गये हों, जिसकी दृष्टिसे सर्व त्रिकुटी नष्ट होगई हो, जिसका कुछ भी शेष न हो, मैं सत्य हूँ मुझसे अतिरिक्त सब असत्य है, अर्थात् तीन कालमें आत्मभिन्न कुछ हुआही नहीं । ऐसे ज्ञानीको शिव कहते हैं ।
असिपदसे दो प्रकारके विज्ञानका कथन ।
जो कोई जान बूझकर जड़ अवस्थाको धारण करले और ऐसा बन जावे जैसे मछप मतवाला बनजाता है, एक अनेककी सुध नहीं रहती है, परम आनन्दमें निमग्न होजाता है । इसमेंभी दो प्रकार होता है—एक तो असत्यविज्ञानी जो बनावटसे ऐसी दशाको धारण कर लेता है अर्थात् मनमें द्वैतका लेश रहता है परंतु हठसे अथवा बनावटसे दम्भ करके ऊपरसे बाल मूक पिशाच जड़की अवस्था दिखलाता है । सत्य विज्ञान धार्मिक पुरुष वह है जिसकी दृष्टिमें द्वैतका लेश भी न हो आपहीको जगत्, आपहीको ब्रह्म, आपही को कर्ता, आपहीको कर्म्म, आप हीको द्रष्टा, आपहीको दर्शन, आपहीको दृश्य, जो कुछ बोलता और सुनता है सो आपही है, आपही डोलता है आपही डोलाता है अपनीही लीला सब प्रगट है । दूसरा कोई दृष्टि नहीं आता है जिसकी दृष्टिमें ऐसा हो उसे सत्य विज्ञानी कहते हैं । यही तत्वमसिके तीनों पदका संक्षेप विवरण है ।
पारखपद ।
अब स्वसम्बेदके अनुसार पारख पदका वर्णन करता हूँ — तत्वमसिके तीनों पद भ्रम और मिथ्या हैं । उनमें अन्धकार रहता है जिसके कारण अपने
स्वरूपकी सूक्ष्मताको नहीं जान सकते। तत्वमसिके तीनों पदोंके ऊपर पारखपद है। वही सत्यपद है, उसीसे जीवोंकी मुक्ति होती है। जो कोई पारख पदको प्राप्त कर लेता है वह पारखी कहलाता है। पारखी गुरु सब धर्म और धोखेको नष्ट कर देता है। एक, अनन्त, बाहर, भीतर, पिण्ड, ब्रह्माण्ड सबके भेद कसर खोटको भिन्न २ करके परखा देता है। पारख पदको प्राप्त हुआ पुरुष फिर कभी उससे पतित नहीं होता। तत्वमसिके तीनों पदको इस जीवने मानकर निश्चय कर रखा है इस कारण ये सत्य दीखते हैं, नहीं तो यथार्थमें तीनों पद निर्मूल और भ्रम मात्र हैं क्योंकि जो कुछ इसने अपने मनसे मान लिया निश्चय कर लिया वो सब भ्रम और धोखा है यह मन आशा तृष्णामें फँसाकर भव सागरमें डुबाने-बाला है, इसके उपदेशसे किस प्रकार तर सकता है? इससे तरनेकी आशा रखना मृगतृष्णाके जलसे प्यास बुझानेके समान है। पारख गुरु हंसपद प्राप्त होता है। तत्वमसिके अभिमानी शुद्ध स्वरूपको नहीं पा सकते, सब प्रकारसे अहङ्कारको त्याग करही पारख गुरुसे सत्य स्वरूप प्राप्त होता है।
जन्म मरणकी सात शाखायें।
जीव अपने सत्यस्वरूपसे पतित होकर विरह और प्रेममें फँसकर अपने यथार्थ स्वरूपको विस्मरण कर देता है। फिर इधर उधर दूँढने लगता है कुछ आधार नहीं पाता तो थककर कहने लगता है कि, मेरा ईश्वर निर्गुण निराकार है बेचून बेचरा है। इस प्रकार आदिमें जब जीवोंने नानाप्रकारकी कल्पना और निश्चय करके कुछ प्राप्त नहीं किया तो दुखीके दुखी रहे, शिव ब्रह्मा और सनकादिक ऋषियोंने नाना प्रकारकी वाणी बनाई सब जीवोंको विरह लगाया सब जीवोंको वाणीका विष चढ़ गया। जब उसमें अचेत हुए तब आशा और भय अर्थात् रौचक और भयानकमें नाना प्रकारकी आशा करके फँसे उसीको जन्म मृत्युका बीज कहते हैं। उसी बीजसे सात शाखायें उत्पन्न हुईं।
ॐ श्रीं रं सौं ऐं ह्रीं क्लीं।
अ इ उ ए व ह म
आशा तृष्णासे ये सातबीज उत्पन्न हुये, इन बीजोंमेंसे प्रत्येककी भिन्न २ सात शाखायें हुईं। १ कर्म, २ उपासना, ३ योग, ४ ज्ञान, ५ उत्पत्ति, ६ स्थिति और ७ नाश। इन सातोंमेंसे प्रत्येककी सात शाखायें हुईं, जिनका विस्तार बहुत है पर यहाँ संक्षेपसे लिखता हूँ।
१ कर्मकी सात शाखायें—अ-अर्थात् कर्मकी नाना प्रकारकी रीतियाँ हैं— १ यजन, २ याजन, ३ अध्ययन, ४ अध्यापन, ५ दान, ६ प्रतिग्रह, ७ मैथुन।
यजन—इसलोककी, याजन—पर लोककी, अध्ययन—विद्याभ्यास करना, अध्यापन—अभ्यास कराना, दान देना, प्रतिग्रह (संग्रह करना—अर्थात् दान लेना) और मैथुन कर्मोंकी यही सात शाखायें हैं ।
२ उपासनाकी सात शाखायें—इ—अर्थात् श्री बीज—१ शिव, २ विष्णु, ३ गणपति, ४ सूर्य, ५ शक्ति ६ राम, ७ कृष्ण ये शाखायें हैं, इनके सात करोड़ महामंत्र हैं । जारण, मारण, वशीकरण, उन्मत्तता, आकर्षण स्तम्भन मोहन येही फल हैं ।
३ योगकी सात शाखायें—इसका बीज रं है, १ हठयोग, २ कुण्डलिनी योग, ३ लम्बिका योग, ४ तारक योग, ५ लय योग, ६ अमनस्क योग, ७ साङ्ख्य योगये शाखायें हैं । समाधि फूल और सिद्धि फल है ।
४ ज्ञानकी सात शाखायें—सोहं बीजका ज्ञान अंकुर है उसकी सात शाखायें हैं—२ शुभइच्छा, २-स्वविचार, ३-तनुमानसा, ४ सत्त्वापत्ति, ५ असंशक्ति, ६-पदार्थाभाविनी, ७ तुरिया । परोक्ष ज्ञान फूल है । अपरोक्ष ज्ञान फल है ।
५ उत्पत्तिकी सात शाखायें—ऐं बीज है, उत्पत्ति अङ्कुर है, उसकी सात शाखा हैं—१ शब्द, २ स्पर्श, ३ रूप, ४ रस, ५ गन्ध, ६ इच्छा और ७ वासना ।
शब्द—बादलके गरजनसे और नाना प्रकारके शब्दोंसे कीड़े, मकोड़े और मँढक, जोंक आदि उत्पन्न होते हैं ।
(२) स्पर्श—मैथुनसे जो जीव उत्पन्न होते हैं ।
(३) रूप—अनल पक्षी आदिक बहुतसे जीवधारी केवल दृष्टिसे उत्पन्न होते हैं, वे सब रूप सृष्टि कहलाते हैं ।
(४) रस—इससे समस्त जलके जीवोंकी उत्पत्ति है, वृक्षोंके फलके कीड़ोंकी उत्पत्ति भी इससे ही होती है ।
(५) गन्ध—इससे उषमज योनिकी उत्पत्ति होती है ।
(६) इच्छा सिद्धि योनि है—योगेश्वर लोग अपनी इच्छासे चाहें जैसा स्वरूप धारण करलें जहाँ चाहें चले जाय, एकका अनेक स्वरूप बना लें, लघु दीर्घ आदिक हो जावें, इसीको सिद्धि योनि कहते हैं ।
(७) वासना—वासनासे देवता भूत प्रेतादिककी देह बनती है, यही सात प्रकारकी उत्पत्ति है । स्त्री फूल है । पुरुष फल है ।