सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

तारीख खातमा

अन्तमें सब भ्रमही भ्रमकी बातें ठहरेंगी । जबतक मनुष्यमें निर्मल विचार नहीं आता, जबतक मिथ्याको सत्य तथा सत्यको मिथ्या मान रहा है और यथार्थतासे वंचित है ।

अष्टाईसवाँ प्रकरण

वेदोंकी आज्ञाका पालन कहाँ और कबतक अवश्यमेव माननीय है ? उनचास करोड योजन निरञ्जनका शरीर है । सो हमारा यह ब्रह्माण्ड है और इस ब्रह्माण्डके रहनेवालोंके निमित्त इस वेदका अनुसरण करना उचित ठहराया गया जबतक मनुष्य इस ब्रह्माण्डके भीतरके पदार्थोंमें आसक्त रहेगा तबतक इसके भीतर बन्द रहेगा और वेदोंकी आज्ञाओंका अनुसरण करनाही पड़ेगा, जैसे यह ब्रह्माण्ड उनचास करोड योजनका है वैसे ही इस ब्रह्माण्डसे दूना कूर्मजीका शरीर है । इस कारण वह इससे बड़ा ब्रह्माण्ड है । इस प्रकार कोई बड़ा कोई छोटा अगणित ब्रह्माण्ड हैं उन अगणित ब्रह्माण्डोंमें अनन्त प्रकारकी रचनायें हैं, जिनका विवरण हो नहीं सकता । प्रत्येक ब्रह्माण्डके निमित्त एक एक शासक तथा राजा हैं जो, उनके ईश्वर कहलाते हैं और उन ब्रह्माण्डोंके रहनेवाले उसीको अपना कर्त्ता तथा स्वामी जानते हैं । जैसे भेड बकरियाँ अपने चरवाहेके अतिरिक्त दूसरेको नहीं जानतीं; यही अवस्था अल्पज्ञोंकी है, वे क्या जानें कि, असली परमेश्वर क्या है ?

उनतीसवाँ प्रकरण

समुद्रमंथन तथा तीन कन्याओंका वृत्तान्त ।

*अब पहला विवरण पुनः आया । देखो ग्रन्थ स्वासगुञ्जार और अनुरागसागरमें लिखा है कि, जब इस प्रकार वेद प्रकट हो गये, तब, निरञ्जनने यह काम किया कि, चारों वेदोंको आज्ञा दी कि, तुम जाकर समुद्रमें छिप रहो । उधर आदि भवानोंने अपने शरीरसे तीन कन्याएँ प्रकट कीं और उनको आदेश दिया कि, तुम समुद्रमें जाकर छिप रहो । अपनी माताकी आज्ञा पातेही वह तीनों कन्याएँ जाकर रत्नाकरमें छिप गईं । यह कौतुक जो अध्याने किया इसे ब्रह्मा विष्णु महेश तीनोंने नहीं जाना । इसके उपरान्त निरञ्जनने अध्याको कहा कि, वह अपने तीनों पुत्रोंको समुद्र मथनेकी आज्ञा देवे । तब अध्याने तीनों पुत्रोंसे कहा कि, तुम जाकर समुद्र मथो और तीनोंने ऐसाही किया । समुद्रमेंसे

बहुतेरी वस्तुएँ निकलीं, जिन्हें लोग चौदह रत्न कहते हैं। फिर उन सब वस्तुओंको तीनों भाइयोंने ज्योंका त्यों लाकर अपनी माताके समक्ष रख दिया। तब उनकी माताने उन वस्तुओंको उन तीनोंमें बाट दिया। सरस्वती तथा चार वेद ब्रह्माके भागमें आये, लक्ष्मी विष्णुके बखरोंमें पड़ गयी और सती शिवको मिलीं। तीनों भाई पत्नियोंको पाकर अत्यंत हर्षित हुए इन्हीं तीनोंके वंशसे समस्त संसार है।

तीसवाँ प्रकरण

ब्रह्माका वेदपाठ और पिताकी जिज्ञासा।

जब ब्रह्माने वेद पाया और उसको पढ़ा तब उसमें देखा कि, एक विराट पुरुष है जिसका शिर आकाशमें और पावें पातालमें, चारों दिशा उसके कान और सूर्य चन्द्र उसके नेत्र हैं—

ब्रह्मा वेद पठन तब लाग। पठत वेद तब भा अनुरागा।

कहे वेद पुरुष इक आही। है निरंकार रूप नहीं ताही ॥

शून्य माहि वह जोत दिखावे। चितवत देह दृष्टि न आवे ॥

स्वर्ग सीस पग आहि पताला। तेहि मत ब्रह्मा भौ मतवाला ॥

चतुरानन कहि विष्णु बुझाया। आहि पुरुष मोहि वेद लखाया ॥

पुनि ब्रह्मा शिवको अस कहई। वेद मथत पुरुष इक अहई ॥

(अनुराग सागर)

तब ब्रह्माने विष्णुसे कहा कि, देखो भाई विष्णु ! वेद इसी विराट पुरुषको बतलाता है और भाई शिव आप भी सुनो और देखो; वेद बतलाता है कि, एक पुरुष ऐसा है जिसकी मूर्ति शून्यमें दिखाई देती है। तब ब्रह्मा अपनी माताके समीप जाकर कहने लगे कि, हे माता ! वेद बतलाता है और उसमें स्पष्ट लिखा है कि, एक पुरुष है और तू कहती है कि कोई नहीं; यह बात सुनकर अध्याने कहा कि बेटा, ! यदि तुझको अपने पिताके दर्शनोंकी अभिलाषा है, तो तू अक्षत तथा पुष्पादि लेकर जा और उसका दर्शन तथा पूजाकर आ। माताकी आज्ञा पातेही ब्रह्मा अक्षतादि लेकर उत्तरकी ओर चल पड़े और जाते जाते उस स्थान तक पहुँचे जहाँ तनिकभी सूर्यकी ज्योति नहीं थी, और पूर्णतया अंधकार था—वहाँ पर जाकर ब्रह्मा अपने पिताके दर्शनकी कामनासे समाधि लगाकर बैठ गये ॥

इकतीसवाँ प्रकरण

गायत्रीका प्रकट होना ।

ब्रह्माकी उस समाधिमें चारों युग बीत गये पर ब्रह्माको पिताका दर्शन नहीं हुआ । तब अद्याने मनमें चिन्ता किया कि, बिना ब्रह्माके सृष्टिको कौन रखेगा ! किसी युक्तिसे ब्रह्माको बुलाना चाहिये । तब उसने अपने शरीरसे मैल निकाला और उस मैलसे एक कन्या बनायी । और उसका नाम गायत्री रखी । कन्याने अपनी मातासे पूछा कि, हे माता ! तुमने मुझे किस निमित्त उत्पन्न किया है ? अद्याने उत्तर दिया कि, बेटी तेरा बड़ा भाई ब्रह्मा है और वह अपने पिताके दर्शनोंके निमित्त उत्तर दिशाको गया है, वह किसी युक्तिसेभी अपने पिताके दर्शन नहीं पासकता और यहाँ उसके बिना संसारकी उत्पत्ति हो नहीं सकती । इस लिये तू जा और उसको समझाकर ले आ, जिसमें संसारकी उत्पत्ति हो ।।

बत्तीसवाँ प्रकरण

पुष्पावतीकी उत्पत्ति और ब्रह्माकी वापसी ।

अपनी माताकी आज्ञा पातेही गायत्री उत्तरकी ओर चली और चलते २ उस स्थान पर जा पहुँची जहाँ ब्रह्मा समाधि लगाकर बैठा था । ब्रह्माकी अखंड समाधि लग रहीथी, और गायत्री खड़ी सोच रही थी कि, अब मैं क्या करूँ, ब्रह्माको समाधिसे कैसे जगाऊँ ? ऐसा न हो कि, ब्रह्मा मरे जगानेसे समाधिसे जागकर क्रुद्ध हो और मुझको शाप देवे । इस प्रकार गायत्री अपने मनमें सोच ही रही थी कि, उसके ध्यानमें अद्या समायी और उससे कहा कि हे, गायत्री ? तू ब्रह्माके चरण छू तो ब्रह्मा जागेगा । गायत्रीके ब्रह्माका पैर छूतेही ब्रह्माके नेत्र खुलगये तब उसने गायत्रीको अपने सामने खड़ी देखा । फिर अत्यंत रुष्ट होकर कहने लगा कि, तू कौन दुष्टा पापिनी है कि, मुझको मेरे पिताके ध्यानसे जगा दिया, मैं तुमको शाप दूंगा । तब गायत्रीने कहा कि, मेरा कोई दोष नहीं है, यथार्थ बात जानकर तब मुझको शाप देना । तुम्हारी माताने तुम्हें लेनेके लिये मुझको भेजा है, सो तुम शीघ्रचलो नहीं तो पछतावोगे । तब ब्रह्माने उत्तर दिया कि, मैं कैसे चलूँ मुझे पिताके दर्शन तो हुएही नहीं । तब गायत्रीने कहा कि, तुम्हें किसी युक्तिसेभी पिताका दर्शन तुमको न होगा । तब ब्रह्माने गायत्रीसे कहा कि, यदि तू मेरी साक्षी माता के सामने दे कि, मैंने अपने पिताका