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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

कबीर साहबकी चार वाणी और चारों वेदोंका वर्णन

लेलेवें । इसी भयसे वह उनको बहुत कष्ट देने, उनसे कठिन परिश्रम कराने और उनके बच्चोंकी हत्या करने लगा । उनके बेटोंको तो वह मार डालता और उनकी बेटियोंको जीवित रखता । इस प्रकार जब उनपर दारुण दुःख उपस्थित हुआ तब खुदाने उनपर दया प्रगट किया ।

इकसठवाँ प्रकरण

मूसाकी उत्पत्तिका वृत्तान्त ।

उमराव नामक एक इब्रानी था । उसका पुत्र मूसा उत्पन्न हुआ । वह मूसा बड़ाही सुन्दर था उसके माता पिताको बड़ी दया आयी कि, उसको फिरऊनके हाथ कैसे सौंपें । इससे उन लोगोंने उस बालकको टोकरीमें रक्खा और नदीके किनारे झाऊके वृक्षमें रख आये संयोगन फिर उनकी बेटी वहाँ स्नान करनेको गयी और उसने उस बच्चेको देखा, उसको उसपर दया आयी, उसने उस बच्चेको अपनी लौडीको सौंप दिया और वह दासी उस लड़केको अपने घर ले आयी । वह उसका पालन पोषण करने लगी, जब वह सीखने योग्य हुआ तब वह उसको शिक्षा देने लगी । यह मूसा फिरऊनकी बेटिका गोद लिया बालक ठहरा । वह मूसाको अपना बेटा समझकर उससे बड़ा प्रेम किया करती थी । मूसा मिस्र देशकी शिक्षा पाकर परम विद्वान् हुआ । जब उसका वय चालीस वर्षका हुआ तब उसने एक इब्रानीका पक्ष करके एक मिसरीको मार डाला, फिर उसको फिरऊनका भय हुआ कि, मिसरीके बदले में भी मारा न जाऊँ । तब वह मिश्रदेशसे भागकर कनआँमें गया और मदियानामें रहने लगा । वहाँ पितरू नामी एक इब्रानीकी बेटीके साथ उसका विवाह हुआ । वह अपने श्वशुरकी भेड़ बकरियाँ चराया करता था ।

कुछ दिनोंके पश्चात् खुदाने आज्ञा दी कि, ऐ मूसा ! तू मिस्रदेशको जा और अपनी जातिको फिरऊनके जुल्मसे बचा ।

उस समय मूसाकी उम्र अस्सी वर्षकी थी, कारण यह कि, मूसामें चालीस वर्षके वयमें मिस्रदेशसे भागा था और वह चालीस वर्षतक अपने श्वशुरकी भेड़ बकरियाँ चराता रहा । परमेश्वरकी आज्ञासे मूसा मिस्रदेशको गया, परमेश्वर उसके साथ था । उसने अनेक चमत्कार दिखलाये । तब फिरऊन बादशाहने इब्रानियोंको मूसाके साथ जानेकी आज्ञा दी । जब मूसा तीनलाख इब्रानियोंको लेकर, जिन बाल युवा बृद्ध बालिका स्त्री वृद्धा सभी थीं, मिस्रदेशसे कनआनकी ओर चला और लाल समुद्रके समीप पहुँचा, अर्थात् एक पड़ाव तक कूच कर आया । तब फिरऊन पछताया कि, इब्रानियोंको तो हमने बिदा कर दिया, हमारी सेवा

तथा बेगार कौन करेगा । यह सोचकर उसने आठ लाख फौज लेकर उनका पीछा किया । जब यहूदियोंने देखा कि, फ़िरऊन हमारे पीछे धावा किये आरहा है, तब वे रोये और पुकारा कि, मूसाने व्यर्थही हमारे प्राण नाश किये । क्यों कि, हमारे दोनों ओर दो पर्वत हैं सामने लाल समुद्र है । और पीछे २ फ़िरऊन अपने दलबल सहित चढा चला आता है, हम अब कहाँ जायँ कहीं भागनेकी राह नहीं रही । तब मूसाने खुदासे प्रार्थना की । तब खुदाने कहा कि, ऐ मूसा तू नदीमें अपना सोंटा मार मूसाके सोंटा मारतेही समुद्रका जल फट गया और पानी दोनों ओर पर्वतके समान खड़ा हो गया । मध्यमें शुष्क पथ प्रगट हुआ । अब मूसा समस्त इब्रानियोंको अपने साथ लेकर पार उतर गया । पीछे फ़िरऊन आया और अपने दलबलसहित उसी समुद्रीय रास्तेसे पार जाना चाहता और समुद्रमें घुसा, तब फिर परमेश्वरने आज्ञा दी कि, ऐ मूसा ! पुनः समुद्रकी ओर सोंटा बढ़ा । मूसाने वैसाही किया । तब दोनों ओरका जल मिल गया और फ़िरऊन ससैन्य मर गया । पश्चात् मूसा प्रसन्नतापूर्वक बनी इसराईलको अपने साथ लेकर चला । जब वह सीना पहाड़के समीप पहुँचा और पडाव किया तब मूसाका आसमानी रङ्गका परमेश्वर बैकुण्ठसे सीना पहाड़ पर उतरा । उस समय समस्त पर्वतसे धुँवाँ उठने लगा और वहाँ पर मूसा तथा आसमानी रङ्गके परमेश्वरसे बातें होने लगीं ।

इस स्थानपर खुदा (विष्णु महाराज) ने ऋग्वेदसे कुछ बातें निकालकर और सांसारिक रीत व्यवहारको इच्छानुसार वर्णनकर, उसे बनी इसराईलके योग्य समझकर, मूसाको प्रदान किया । वही किताब मूसाकी तौरीतके नामसे विख्यात हुई । यह पहली किताब है जो पश्चिमीय देशवासियोंको मिली । यद्यपि उसका ढङ्ग बदल गया पर उसको ऋग्वेदही मानना चाहिये । कोई तौरीत पढे और कोई ऋग्वेद पढे, एकही फल प्राप्त होगा, इसमें कोई संदेह नहीं है ।

बासठवाँ प्रकरण

दूसरी किताब जबूरका वृत्तान्त ।

यह किताब जबूर दाऊदके लिये उत्तरी, यह जबूर पुस्तक सामवेदसे है । सामवेद गीतों तथा पदोंसे भरा हुआ है सो वही जबूर पुस्तक है, दाऊद कवी बड़ा गवैया था । वह परमेश्वरके प्रेममें लीन रहा करता था, बडे प्रेमके साथ खुदाकी स्तुति रागोंमें किया करता था । उसके रागोंमें इतना प्रभाव था कि, पाषाण भी मोम होजाता था । दाऊदके गीतोंकी बड़ी प्रशंसा किताबोंसे लिखी है और मूल इसका सामवेद है । और सामवेदके गुण तथा उत्तमता संसारमें प्रगट है, अंग्रेजी