सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

कुष्ठम ऋषि

वाटिका सहस्रों प्रकारके फल फूलसे भर गई। सहस्रों प्रकारके फल और फूल निकल पड़े जो कि, पहले कभी न देखे और न सुने गये थे। उन्हींसे वह वाटिका पूर्ण हो गई। फल फूलसे भरे वृक्षोंपर बुलबुल तथा भौंति भौंतिके पक्षी बोलने लगे। चारों ओरसे पक्षियोंका चहकारा सुनकर माली आश्चर्यसे चकित हुआ कि, यह वाटिका कैसे हरी-भरी हो गई? उसे बहुत फल फूल तथा मेवोंको लगा देखकर मालो बड़ाही हर्षित हुआ। उनमेंसे अनेक प्रकारके फूल, फल, मेवे डालियोंमें भर भरकर वह माली राजाके समीप आया, भेंट करके निवेदन करने लगा कि, महाराज! आपकी वाटिका हरी हो गई। भौंति भौंतिके फल, फूल और मेवे लग रहे हैं। हे महाराज! आपकी नौलखी फुलवारी ऐसे यौवनोंपर है कि, उसका वर्णन किया नहीं जा सकता है। राजाके समक्ष जब पुष्पों और मेवोंकी टोकरियाँ मालीने रखीं, तो वो देखकर राजा और उसके मन्त्रिवर्ग ऐसे चकित हुए कि, ऐसे फल फूल तथा मेवे हमने कभी देखे सुने न थे। न जाने ये कहाँसे आये? यह बात सुनकर राजा परम हर्षित हुआ। मन्त्रियों मुसाहबोंसे कहने लगा कि, आश्चर्यकी बात है। पश्चात् राजाने ज्योतिषियोंको बुलाया और वाटिका देखने चला। राजाके साथ समस्त मन्त्री मुसाहब तथा प्रजा थी। ज्योतिषियोंने कहा कि, महाराज! इस वाटिकामें कोई महापुरुष आकर बैठा है जिसके कारण यह वाटिका हरी भरी हो गई है। तब राजा उस वाटिकाको देखनेपर अत्यन्त ही आह्लादित हुआ। आज्ञा दी कि, इस वाटिकामें जाकर ढूँढो। लोग ढूँढने लगे। ढूँढते ढूँढते देखा कि, एक स्थानपर एक महापुरुष आसनमारे ध्यान लगाये बैठा है। सबोंने राजाको समाचार दिया। राजाने जाकर दण्डवत् प्रणाम किया। राजाके साथ समस्त मन्त्री तथा प्रजा आदिने दण्डवत् प्रणाम किया। राजा कहने लगा कि, मैं बड़ाही भाग्यवान् हूँ कि, ऐसे महापुरुषने मुझको दर्शन दिया जिसके कि, विराजने मात्रसे वर्षोंकी सूखी वाटिका हरी होगई राजाने सत्यगुरुका दर्शन किया तब हृदयमें ठण्ढक आई उसका चित्त स्थिर हुवा। राजाने कहा कि, महाराज! बारह वर्षसे यह वाटिका शुष्क पड़ी थी इसके समीप कोई नहीं आता था। आपके चरणरजसे यह वाटिका हरी भरी हो गई, आपके दर्शनसे मेरा हृदय प्रफुल्लित तथा प्रसन्न हो गया। अब महाराज! मुझपर दया दृष्टि डालिये, मेरे मस्तकपर हाथ रक्खिये। मुझको मुक्ति प्रदान कीजिये हे सत्यगुरु! मैं आपके साथ रहूँगा।

सत्य कबीर वचन।

चौ०—तुम तो कौल भुलाने भाई। किये कौल तुम गए भुलाई ॥

हे राजा ! जब तुम मातृगर्भमें थे तब तुम वचन बद्ध हुए थे कि, भजनके अतिरिक्त अब और कुछ न करेंगे, उस दुःखमें तो तुम पुकारते थे तथा हाय हाय करते थे कि मुझको इस दुःखसे निकालो, पर जब तुम गर्भके बाहर आये तब अपनी सारी प्रतिज्ञाओंको भूल शारीरिक कामना तथा पशुधर्मके वशीभूत होकर तुमने कैसे कैसे कुकर्म किये ? सत्यगुरुकी दयाको तुम एकबारही भूल गये, भोग विलासमें फँसकर अन्धे हो गये, मायाने तुम्हारे ज्ञानको बिलकुलही नष्ट कर दिया । जब यमदूत आवेंगे तुम्हारी मुश्कें बाँधकर नरकमें लेजावेंगे तब तुम्हारा कौन मित्र सहायता करेगा ? तुमको उनसे कौन छुड़ावेगा ? राजा ! तुम सोचो समझो कि, वे लोग जिन्हें तुम अपना मित्र समझते हो उनमेंसे कौन उस समय सहायक होगा ? कौन तुमको नरकसे बचावेगा ? मैं गर्भमें तुमको बहुत समझाया था, हे गँवार ! तू उन सब बातोंको भूल गया । मैंने सबसे घर घर पुकारकर कहा पर मेरा कहना किसीने भी न माना । इतनी बात सुनकर राजा बोला कि—

चौ०—अबतो सद्गुरु होहु सहाई । मोको जमसे लेहु छुड़ाई ॥
सबही करम बख्शकै दीजे । डूवत मोहिं उबारके लीजे ॥
सैन करि पालकी मँगवाई । लै सद्गुरुको माहिं बिठाई ॥
पाँव उभाड़ काँध धर लीन्हा । तबही महल पयाना कीन्हा ॥
सत्गुरु पगधर महलके माहीं । सब रानिनको राय बुलाहीं ॥
समरथ दरशन दीन्हौ आनी । धन धन भाग्य तुम्हारो रानी ॥
सत्गुरुको पलँग बैठाई । सब मिलि पाँव पखारो आई ॥
राजा भाखै शीष नवाई । मोको राखो गुरु शरनाई ॥
करिये सद्गुरु जीवको काजा । दया करो मैं लाऊँ साजा ॥
अब हम सरना लेब तुम्हारे । दया करो तन दुखत हमारे ॥

सत्यगुरु वचन ।

कस चल राजा लोक हमारा । मैं नहिं देखूँ लगन तुम्हारा ॥
कोटिन ज्ञान कथो असरारा । बिना लगन नहिं जीव उबारा ॥
जैसे लगन चकोर की होई । चन्द्र सनेह अँगार चुंगोई ॥
ऐसे लगन गुरुसे होई । धर्मराय शिर पर धर सोई ॥
तुम तो हो मोटे महाराजा । कैसे छोड़िहौ कुल मर्यादा ॥
कैसे छोड़िहौ मान बढ़ाई । कैसे छोड़िहौ मुख चतुराई ॥

कैसे छोड़िहो हाथी घोड़ा । कैसे छोड़िहौ ग्रन्थ मँडारा ॥
कैसे छोड़िहौ काम तरङ्गा । कैसे राजसे करो मन मङ्गा ॥
कैसे छोड़िहौ कनक जवहिरा । कैसे छोड़िहौ कुल परिवारा ॥
तुम तो उनकी बाँधी आसा । हम तो राजा कथैं निरासा ॥
जो तुम तजो अन्तरकी वासा । तवही चलो हमारे साथा ॥

राजा वचन ।

राजा कहें दोउ करजोरी । सुनिये समरथ विनती मोरी ॥
नगरके सब षट् वरन बुलाई । तेहि अवसर सब माल लुटाई ॥
तुम तो कह्यो बाहर लेउ वासा । मैं तो देहकी छाडी आसा ॥
अमृत वचन पियाओ आनी । हंस उबार करो निरवानी ॥
नगर कोट की छोड़ी आसा । निस दिन रहूँ तुम्हारे पास ॥
हुकुम करो सोई मैं लाऊँ । करो दया मैं शीश नवाऊँ ॥
उमँग उठे हर्षित मग मोरा । थकित भये जनु चन्द्र चकोरा ॥
सूखा बाग जो फल परकासा । तबसे पूजी मनकी आसा ॥
कसनी कसो सो सहुँ शरीरा । तबहुँ प्रीत न छोडूँ तीरा ॥
जो तुम कहो सो भक्ति कराऊँ । दया करो तो शीश चढ़ाऊँ ॥

सत्यगुरु वचन ।

तब समरथ अस शब्द उचारा । अब आरति काहो बिस्तारा ॥
चार गुरुको चौका कराओ । तिनका तोरायके जल अरपायो ॥
राजा गर्भ निवारौं तोरा । भाव भक्तिसे करो निहोरा ॥
भावभक्ति हम चाहैं राजा । धन सम्पत्तिसे नहिं कछु काजा ॥

तब राजाने कबीर साहबकी आज्ञानुसार समस्त सामग्री मँगा अत्यंत नम्रताके साथ विनय करने लगा कि, हे सत्यगुरु ! मैं आपकी शरणमें हूँ । मुझको यम फाँसीसे बचाओ । हे मेरे सत्यगुरु ! मैं महापापिष्ठ हूँ आपने मुझसा पापी भी कभी तारा है या नहीं ? ।

सत्यगुरु वचन ।

चौ० —तब सद्गुरु बहुतै बिहँसाना । फिर राजासे निर्णय ठाना ॥
सत्ययुगमें सत सुकृत नाऊँ । जाय सोरठमें धारचों पाऊँ ॥
खेमश्री ग्वालनहि उबारी । बह्तर जीव ले लोक सिधारी ॥
द्वादश पहुँचे पुरुषके पाँही । और हंस द्वीप रहौँही ॥
त्रेता मांहि मूनीन्दर नाऊँ । नगर अयोध्या धारचों पाऊँ ॥

जहँ मधुकर यक विप्रको नाऊं । चारसौ हंस लोक धर पाऊं ॥
हंस बयालीस लीन्हें सारा । पहुँच्यो महापुरुष दरबारा ॥
और हंस आनदीपमें किया । जिनजीव जैसे देह तब दीया ॥
अब द्वापरका कहूं विचारा । नृप नरहरि भुजकीन्ह उबारा ॥
सातसौ हंस परवानक कीना । कुटुम्ब सहित पायाना दीना ॥
चन्द्र विजय घर इन्दुमती नारी । तासंग राजा लियो उबारी ॥
केतो पूछो जीव सनेहा । गनत गनत नहिं आवै छेहा ॥
युगन युगन भवसागर आऊं । जो समझे तेहि लोक पठाऊं ॥
शब्द हमारा माने कोई । तो यमपुर नहिं जाय बिगोई ॥
इतनी बात कही समझाई । राजाके परतीत समाई ॥

यहाँ राजा अत्यंत नम्रतापूर्वक सत्यगुरुसे विनय करता है कि, मैं बड़ा भाग्यवान हूँ कि, सत्यगुरुने मुझको दर्शन दिया, फिर राजाने सत्यगुरुको चन्दन चौकीपर बैठकर कहा कि, मैं तो सत्यगुरुके चरणोंका सेवक हूँ । समस्त नगरमें समाचार पहुँचा । सब लोक दर्शनके लिये आये । बड़ा हल्ला मच गया कि, राजा जगजीवन अब लोकको जावेगा । तब राजाने अपनी समस्त रानियोंको बुलवाया, सभी आकर सत्यगुरुके चरणोंपर गिरीं ।

राजा जगजीवनकी रानियोंके नाम—चन्द्रमती, हनुमती, भानदेवी, भानुमती, बुद्धामती, प्राणप्यारी, सत्यभामा, अविकला, नामप्यारी, दिलदायक, रङ्गस्वरूपा, सूर्यमती ये हैं ।

राजा जगजीवनकी ये बारह रानियाँ तथा चार पुत्र थे । जब कबीर साहबने उन सबोंके शिरोंपर हाथ रखवा तो सबको अगम ज्ञान होगया । उन्होंने सत्यपुरुषका दर्शन करके अपनेको कृतार्थ किया ।

राजाके चारों पुत्रोंने आकर सत्यगुरुके चरण चूमे । राजा सारी रानियाँ तथा पुत्रोंसहित सत्यगुरुके शरणमें आया । पाँचसौ जीव इस राजाके साथ सत्यलोकको गये ॥

अध्याय १५.

कबीर साहिबके कलियुगके शिष्य ।

शाहंशाह इब्राहीम अद्वम् ।

सुलतान * इबराहीम अद्वम बड़ा सन्नाट् था । उसकी राजधानी बलखबुखारमें थी । यह बादशाह मुहम्मद साहबकी मृत्युके कुछ वर्षोंके पीछे ही हुआ था । इस बादशाहकी मृत्युकी तारीख पुस्तक जवाहिर फरीदीके अनुसार यह है—सुलतान इबराहीम अद्वमने २६ माह जमादिउल अब्बल सन २८० हिजरीमें इस संसारको त्यागकर उस संसारकी ओर कूंच किया था । यह बड़ा शाहंशाह जिसके कि अधीन बहुत बादशाह थे । बड़ाही चिन्तित हुआ कि, मुझको कोई सच्चे परमेश्वरका पथ दिखावे इसीमें दिन रात रहता था । यह बात बिना साधुओंकी दयाके प्राप्त नहीं हो सकती, इसलिये अनेक साधुओंसे उसने पूछा भी परन्तु कुछ पता न लगा, तब उसने बड़ाही ऋद्ध हो कहा कि, ये सब साधुगण मक्कार तथा झूठे हैं । यही नहीं अनेक साधुओंको पकड़कर कहा कि, अपने कौतुक दिखाओ । नहीं तो चक्की पीसो और हरासका खाना छोड़ दो । सब साधु चक्की पिसने लगे । इस प्रकार जब साधुगण विपत्तिमें फँसे तब समस्त साधुओंके राजा, समस्त संसारके रचयिता, परमात्माका दयालु हृदय विचलित हुआ । पितृक दयाने लहर मारी । सत्यगुरु कबीर बन्दी छोड़ जिन्दा साधुका स्वरूप धारणकर शहर बलखकी ओर रवाना हुये । पथमें जाते हुये देखा तो दो मनुष्य वाद विवाद कर रहे थे । एक कहता था कि काबा * आकाशपर है तो दूसरा कहता था कि, असम्भव बात है काबा पृथ्वीपर है ।

  • बलखका बादशाह इब्राहीम नानाकी गद्दीपर बैठ था इसके पिताका नाम अद्वम शाह था । इसकी उत्पत्तिका वृत्तान्त तो यों है कि एकवार अलमस्त फकीर अद्वमशाह बलखकी एकमात्र शाहजादीपर आशिक हो गये थे, सद्गुरुकी कृपासे शादीके बादके ४० अमूल्य मोती बंजीरको देनेपर भी सिसकते जंगलमें फिकवा दिये गये थे । इसके थोड़ी देरबाद मरी हुई शाहजादीको कबरसे निकालकर अपनी कुटीमें ले आये थे । वहाँ भूले हुए काफिलेके वैद्यने हाथमें नस्तर देकर उस शाहजादीको उस समय सजीव कर दिया । जब कि, आप उस मृतकको भी लकड़ियोंके सहारे खड़ी करके दुख भरे शब्दोंके साथ उसका दीदार कर रहे थे । जीवित होनेपर इस शाहजादीने फकीरी अख्तियारकी तथा अद्वमशाहके साथ शादी की । उसी पर्ण कुटीमें इब्राहीमका जन्म हुआ, बड़ा होनेपर पाठशालामें नानासे पहिचाना जाकर भासहित राजमहलमें पहुँच गया तथा नानाके मरनेपर उसकी जगह बादशाह हुआ । यह कबीर सागर नं. ६ सुलतान बोधके ६६ पेजसे लेकर ९४ तक पृष्ठ में लिखा हुआ है ।

  • मुसलमानोंका पूज्य स्थान जो अरब देशमें है जहाँ हज्ज करनेको जाते हैं ।