सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

कुता, रामकालका श्वान

एक प्रकारका तार तो चपचपा होता है दूसरा स्वच्छ तथा वारीक होता है । जो चपचपा होता है उसको तो वह वृक्ष अथवा दीवार इत्यादिसे लगा देती है वे दूर दूर तक तने रहते हैं । दूसरे तार जालके लिये हैं । इन्हीं तारों द्वारा मकड़ी अपना जाल बनाती है, इन्हीं जालोंसे आखेटको पकड़ती है । चिपचिपे तार तो घेरा करते हैं स्वच्छ तार केन्द्रके समान मध्यमें होते हैं । मकड़ियोंकी अनेक जातियाँ हैं ।

आठ आंखोवाली—कारसिका भूमिमें आठ आंखोवाली काली मकड़ी होती है । यह बहुत बलिष्ठ होती है, यह जानवरों तथा टिड़ियोंको पकड़ पकड़कर खाया करती है । मकड़ियोंके तारकी बनावट तथा सजावटके बारेमें अंग्रेजी पुस्तकोंमें बहुत कुछ लिखा हुआ है ।

चींटी

चींटी बड़ी परिश्रमी होती हैं । पूर्वकालसे विख्यात है कि, लड़ने तथा घरोंआ काम काज करनेमें यह बहुत निपुण होती हैं । यद्यपि ये छोटी हैं पर बहुत बलिष्ठ तथा दृढ़ हैं, जितना उसका शरीर अधिक है उससे दशगुणा बोज़ा उठाती है बहुत चुस्त चालाक होती हैं । शिर छोटा होता है, जाड़ बहुत दृढ़ होती है । उनका नीचेका होंठ छोटा और गोल चमचेके समान होता है । उसका पेट अण्डाकार होता है उसमें एक अथवा दो गोंठें होती हैं । नरके चार पर होते हैं । नरकी अपेक्षा मादा डील डीलमें बड़ी होती है व सम्भोग कालमें परदार होते हैं उनमें कितनीही मजदूरी तथा परिश्रम करनेवाली चींटियाँ होती हैं उनके जन्मभर पर नहीं निकलता । चींटियोंके घर बहुत अच्छे ढङ्गसे बने हुए होते हैं, उनकी बनावट बहुत विचित्र है । यदि बहारके आधे मौसमसे लेकर पतझड़के मौसम तक चींटियोंका घर देखा जावे तो पर तथा परहारसे भरा होगा । जो नर तथा मादा चींटियाँ हैं उनके पर चमकते होते हैं मिहनती चींटियोंके पर नहीं होते । परिश्रमी चींटियोंमें राजा तथा रानी कोई नहीं, केवल वे दास हैं ।

परवाली चींटियोंमें बादशाह बेगम तथा अमीर—भी होते हैं । राजा तथा अन्यान्य श्रेष्ठ चींटियाँ घरोंमें रहा करती हैं । जब वे बाहर निकलती हैं तो उनकी अरदलीमें सैन्य हुआ करती है । बाहर अकेले कदापि नहीं फिरती समस्त सैन्य उनकी प्रबन्ध तथा सेवामें रहा करती है, जिसमें वे अकेले बाहर न जावें यदि अमीरोंमें कोई अकेला बाहर निकल भी पड़े तो चौकीदार चींटियाँ उनको खींचकर भीतर कर देती हैं । ऐसी अवस्थामें तीन या चार चींटियाँ

उस भगोड़े अमीरको खींचकर भीतर करती हैं। पहरेदार चीँटियोंमें एक तरहका भाग जानेका स्वभाव होता है कि वे अपनी जन्मभूमिको छोड़कर भाग जाती हैं।

सहबास—जोड़ खानेके पीछे फिर कदापि पलट कर नहीं आतीं। उनका घर मादा विहीन होनेके कारण शीघ्रही उजाड़ हो जाता है। उनका जोड़ खाना विशेषतः घरके भीतर नहीं होता देखा गया है कि, चारों ओर जासूस फिरा करते हैं कि, जहाँ कहीं वे बच्चा जननेवाली मादा पावें पकड़ लावें। जासूस विशेषतः इसी विषयके लिये नियत किये गये हैं। यह बात जाँचसे जानी गई है कि, झुण्डके झुण्ड इधर उधर तितर बितर हो जाते हैं। जिसमें अच्छी मादा ढूँढ़कर ले आवें। उनके मकानके समीप न मिले तो दूर दूरकी यात्रा करती हैं। बहुत दूर दूर चली जाती हैं फिर लौटकर नहीं आतीं। समय पाकर नवीन बस्ती बसाने लगती हैं।

सहवासके बाद मौत—जोड़ खानेपर निश्चयही मर जाती हैं। दूसरे भी अन्यान्य कितने कीड़े मकोड़ोंके नर जोड़ा खानेके पीछेही मर जाते हैं। ऐसाही नियम चीँटियों का भी है। क्योंकि सेवक चीँटियाँ उनको पुनः अपने घर नहीं लातीं न उनकी ओर ध्यानही देती हैं। एक बार चीँटियाँ घरको छोड़ जाती हैं तो वे अवश्यही मर जाती हैं। क्योंकि, उनके पास न पर होता है न भोजन प्राप्तिका यंत्रही होता है।

चीँटियोंके पर—प्राचीन कालके मनुष्य ऐसा अनुमान करते थे कि चीँटियोंको नियत समयपर, पर निकलते हैं। वर्तमान कालके जानवरोंकी विद्याके प्रख्यात विद्वान परह्वेरेके विचारसे जान पड़ा कि, मादाके नियत समय-पर निकलते हैं, उगकर फिर गिर जाते हैं।

बच्चे—चीँटियोंके अण्डे ऐसे छोटे होते हैं कि, उनका नज़्ज़ी आँखोंसे देखना कठिन हो जाता है। दूसरे कीड़ोंके विपरीत चीँटियाँ अण्डे देती हैं उसी समय स्वेच्छापूरवक अपने पर गिरा देती हैं। जो मजदूर चीँटियाँ हैं वे समस्त अण्डोंको एक स्थानपर इकट्ठा करती हैं। जिस समय वे अंडे देतीं हैं उस समय बहुतेरी चाकर चीँटियाँ उनके चारों ओर एकत्रित रहती हैं। वे अण्डोंको एकत्रित करके पृथक् पृथक् मकानकी कोठड़ियोंमें पकनेके लिये सावधानीसे धर-देती हैं और पालती हैं। उनके पकनेके लिये वायुकी आवश्यकता होनेसे दिनके समय चीँटियाँ घरके टीलेके मुँहके समीप रखती जाती हैं। पर ऐसे स्थानोंमें धरती हैं जिसमें कि, सूर्यकी तपन आवश्यकतासे अधिक न होने पावे जितनी गर्मीकी आवश्यकता है उससे अधिक न लगने पावे, जब रात होती है उस समय