कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
किसका भजन करे ब्रचारोंका तत्त्व निर्णय
जबतक ईश्वरमें लीन हो ईश्वररूप नहीं हो जाते तबतक संत लोग भिन्न भिन्न श्रेणी और पदोंको भोगते रहते हैं।
इसी प्रकार ईश्वरके प्रेमो ईश्वरसे मिल जाते हैं, भेद नष्ट हो जाता है। सांसारिक प्रेम ईश्वरी प्रेमकी नकल है। यह संसार एक नदी है जिसमें प्रेमी लोग गोता लगाते हैं। जो सत्य अन्तःकरणसे जिसपर आशिक होगा वह उसीका रूप हो जावेगा। प्यारेके मिलनेके लिये सच्चे प्रेमके सिवा दूसरा कुछ नहीं चाहिये। जिसने सच्चे अद्वैत परमात्मासे मन लगाया वह उसीका रूप हो गया। वह अद्वैत अनूपम कबीर साहब है जिसकी स्तुति और प्रार्थना सब ऋषि मुनि करते आ रह हैं।
तरकीब बन्द।
तीन लोक पूर्ण है नारी। माया ब्रह्म जीव सब झारी ॥
सबही नारी नहीं नर कोई। ब्रह्मविष्णु आदिक त्रिपुरारी ॥
मृत्यु लोक और सर्ग पताला। तीन भुवन जम जाल पसारी ॥
कहे सुने वेद जो और बानी। सब नारी माया हंकारी ॥
सत कबीर पुरुष इक आया। मैं क्या कहूं कहें ऋषि राया ॥
जा कबीरकी अकथ कहानी। वाका भेद वेद नहीं जानी ॥
सुर मुनि जश निशिदिन गावे। नेति नेति कही उचरी बानी ॥
ऋषि मुनि परमहंसको बाना। तीन काल सो बिरद बखानी ॥
अबिचल पुरुष अखंड अपारा। सत्य कबीर पुरुष सोई ज्ञानी ॥
तामें सबही धरम और दाया। मैं क्या कहूं कहें ऋषि राया ॥
सत्य पुरुषके जो फरजन्दा। सदा काल सो ब्रह्मानन्दा ॥
ब्रह्मरूप समरथके वेटे। जिनकी कृपा कटें जम फन्दा ॥
सो सत्य पुरुष गुण गावे। उनके निकट नहीं दुख दन्दा ॥
सो सत पुरुष है आप कबीरा। परमानन्द सो आनंद कन्दा ॥
सो कबीर हैं अगम अमाया। मैं क्या कहूं कहें ऋषि राया ॥
वार पार है पुरुष कबीरा। यहां वहां सो दोनों तीरा ॥
देह बिदेह कहा नहीं जावे। वाको ज्ञान है अगम गंभीरा ॥
गो खुर सम उतरें भौसागर। गुन गावें मुनि वा गुरु पीरा ॥
अलख पुरुष निरबान है सोई। वाहीको सेवक धम्म धीरा ॥
सुयश जो वेद पुराणन गाया। मैं क्या कहूं कहें ऋषिराया ॥
कुशटम गरुड भुशंड रुक महिया । दत्त दिगंबर और दुरवासा ॥
धनुक जनक नारद सनकादिक । कोटिन ऋषि मुनि जिनकी आसा ॥
धरे जो देह बिदेह कहाये । गावें गुण मुनि मगन हुलासा ॥
अधम जीव उतरें भौपारा । सो देखे साहब निजपासा ॥
खुद कबीर सत पुरुष कहाया । मैं क्या कहूं कहें ऋषिराया ॥
गोरख ऋषभ कनक नूप जाना । योगधीर योगेश्वर नाना ॥
बंग देश पति मोहन राजा । इबराहीम अधम सुलताना ॥
अमर भूपाल और सुपच सुदर्शन । दास मलूक करें गुणगाना ॥
धरमदास है शिर ताजा । नानक दादू हंसन बाना ॥
सबकी बानीमें निर ताया । मैं क्या कहूं कहें ऋषि राया ॥
शाह सिकन्दर दिल्ली शाहा । देश मगध बिजली खां नाहा ॥
रामानन्द जासुगुन गावें । दास गरीब कहते गुन गाहा ॥
नाम देव रविदास गोस्वामी । भौसागरको पायो थाहा ॥
इन्द्रमती मन्दोदरी रानी । मुड़ कमाली प्रिती निबाहा ॥
जो पहचान अमर बर पाया । मैं क्या कहूं कहें ऋषि राया ॥
सिद्ध साध सब पीर पयम्बर । धर्मके यकता जो धरनी पर ॥
स्वर्ग और कोटिन ब्रह्माण्ड । तन धारी जो जीव चराचर ॥
वाणी अगणित पारको पावे । सुयश कबीर कथें सब तनधर ॥
परमानन्द दास बलिहारी । साहब सत्य कबीर एक नर ॥
करता पुरुष धरे नर काया । मैं क्या कहूं कहें ऋषिराया ॥
शब्द— काशीपुरीके वासी, सतगुरु काशीपुरीके वासी हो ॥
नाम कबीरा मतिके धीरा, जगसे रहित उदासी हो ॥
पांच पचीस कियो बस अपने, पकड़े मन मवासी हो ॥
माया मान बड़ाई छोड़ी, मिले राम अविनाशी हो ॥
सुर नर मुनिजन और योगीश्वर, वांछत मन सन्यासी हो ॥
मुक्ति क्षेत्र तजि गये मगह कर, ऐसी दृढ़ विश्वासी हो ॥
अग्नि न जरे धरनी न गड़े, पड़े न जमकी फांसी हो ॥
सहदेही पद माहिं समाये, देखा लोग विलासी हो ॥
हिन्दू तुर्क दोनोंसे बनाया, कर्म भर्म कियो नाशी हो ॥
दास गरीब वहाँ कोई यक पहुँचे, बातें बहुत बनासी हो ॥