कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
कबीर पन्यके प्रवर्तक महात्मा धर्म दासजी
सुन बाबर कलन्दर कबीर ऐसा था जो परमेश्वरके समान था उससे परमेश्वरमें किसी प्रकारकी विभिन्नता नहीं थी । उसे परमेश्वरसे जो भिन्न देखता है वो परमेश्वरका सेवक नहीं है । वह (कबीर) बड़ाही पवित्र है ।
फिर देखो ३१८ पृष्ठ, जब नानक शाह ध्रुव मण्डलमें पहुँचे तो वहाँ उनसे स्वयम् कबीरसाहबने आकर यों कहा—
चौ०—कहे कबीर सुन नानक भाई । हम तुमको उपदेश कराई ॥
फिर देखो १२७ पृष्ठ, जब, नानक शाह विरक्तकी अवस्थामें भाई लालूके घरमें गये उसने देखा तो उनके गलेमें जनेऊ था तब भाई लालू नानक शाहके लिये भोजन तयार करा बुलाने गया । नानकशाहने कहा कि, मेरा भोजन यहाँ ही ले आओ, भाई लालूने कहा कि, आपके गलेमें जनेऊ है बिना चौँकाके आप कैसे खाओगे ?
इससे स्पष्ट मालूम होता है कि, नानक शाह वैष्णव थे फकीरी अवस्थामें केवल वैष्णवहीके गलेमें जनेऊ तथा कण्ठी इत्यादि होती है, दूसरे किसीके नहीं होती ।
नानकशाह पञ्जाबसे भ्रमण करते हुये कुरुक्षेत्र गये । वहाँसे हरिद्वार पहुँचे वहाँसे पीलीभीत होते हुए अयोध्या जा विराजे, वहाँसे काशीजीमें जाकर कबीर साहबको मिले । अपने गुरुका दर्शन करके आनन्दको प्राप्त हुए ।
यह बात यहाँतक जानी गई सो लिखी गई । भविष्यमें भली भाँति प्रमाणित किया जावेगा । अब यहाँपर कुछ बातें नानक बोधमेंसे लिखना भी उचित है । वह वार्तालाप जो नानक शाह और कबीर साहबकी हुई वह यह है —
चौ०—देश पंजाव पहुँच सो जाई । जिन्दा रूप धन्यो सोभाई ॥
अनहद वाणी किया पुकारा । सुनके नानक दरस निहारा ॥
सुनके अमरलोककी वाणी । जान परा तब समरथ ज्ञानी ॥
नानक वचन
अरज सुनो प्रभु जिन्दा स्वामी । कहां अमरलोक बसे निजधामी ॥
कोई न जाने तुम्हरा भेदा । खोज थके ब्रह्मा चहुँ वेदा ॥
कोई न कहे अमर विज वानी । धन्य कबीर पुरुष तुम ज्ञानी ॥
आवागम ते कोई नहि छूटा । तीनलोक मुनिवर सब लूटा ॥
हम धरि जन्म बहुत तप कीन्हा । अमर भेद हमहूँ नहि चीन्हा ॥
कहु गुरु भेद सकल ब्रह्मण्डा । सात द्वीप पृथिवी नौ खंडा ॥
जिन्दा वचन
नानक अहो बहुत तप कीन्हा । निरङ्कार बहुतै दिन चीन्हा ॥
निरङ्कारते पुरुष निनारा । अजरदीप टाके टकसारा ॥
वहाँते प्रकट निरञ्जन काला । ताको कठिन भयङ्कर ख्याला ॥
तीन लोक उन दियो भुलाई । उन सँग पुरुष न एकौ पाई ॥
पुरुष बिछोह भयो तुम जबते । काल कठिन मग रोक्यो तबते ॥
जबते हमसे बिछुन्यौ भाई । साठ हजार जन्म तुम पाई ॥
धरि धरि देह भक्ति भल कीन्हा । फिर काल चक्र निरञ्जन दीन्हा ॥
निर्गुण मांहि निरञ्जन थाना । जप जप जाहि भये जिव हीना ॥
घाट रोंकि सत्पुरुष छिपावा । चार वेद कथ जीव भर्मावा ॥
यह गति सुना निरञ्जन केरी । सत्य पुरुष कोई बिरला हेरी ॥
गहो मम शब्द तो उत्तरो पारा । बिन सत शब्द गये यम द्वारा ॥
नानक वचन
धन्य पुरुष तुम यह पद भाखी । यह पद अमर गुप्त कहै राखी ॥
अरज हमार सुनो प्रभु स्वामी । तुमही कहि गुरु आदि निशानी ॥
तुम निज पुरुष गुप्त कहाँ रहिया । यह तुम हममें नाहीं कहिया ॥
जबते हम तुमको नहीं पावा । अगम अपार भरम फैलावा ॥
कहो गोसाई हमते ज्ञाना । पार पुरुष हम तुमको जाना ॥
काल दयाल तुम्ही निरवारा । सकल सृष्टिके तुम करतारा ॥
अमर लोक निज कहो निनारा । सकल सृष्टि तिरदेव पुकारा ॥
हम धरि देह बहुत दुख मानी । बहुत दिवसमें मिली निशानी ॥
पिण्ड ब्रह्ण्डको हमते कहिये । अगम गँभीर शब्दते लहिये ॥
इस स्थान पर कबीर साहबने नानक साहबको पिण्ड तथा ब्रह्माण्ड दोनोंका एक स्वरूप दिखाया है । कालपुरुषके धोखे तथा दगाका विवरण करके कहा है कि, हे नानक ! तू मेरे सार शब्दको स्वीकार करे तो भवसागरके पार उत्तर सकेगा । इतना सुनकर नानक साहबने कहा कि—
चौ०—धन्य पुरुष प्रभु निर्मल ज्ञानी । अजर सार निज तुम्हरी बानी ॥
धन्य कबीर परम गुरु ज्ञानी । भेद जो अमर सुनाई बानी ॥
वाह गुरु समरथ वाह गुरु जिन्दा । काट देव मम भव जल फन्दा ॥
जिन्दा वचन
सुन नानक निर्गुण व्यवहारा । करै भक्त सब काल पसारा ॥
मरे जिये यह संधि कहावै । जपतप करे तिरथ भरमावे ॥
काल सुमिरिके डुबकी मारें । खाली रहे अन्त में हारें ॥
वे नहिं पुरुष खोजको पावें । उलट पलट भवसागर आवें ॥
अब यहाँ कबीर साहब नानक साहबसे सब तीर्थ व्रत इत्यादिका विवरण करते हैं कि—विना यथार्थ ज्ञानके सबमें कालपुरुषकी धूर्तता तथा दगाबाजी ही होती है ।
नानक वचन
आगे सुनी न काहू जानी । धन्य कबीर पुरुष तुम ज्ञानी ॥
कालको चक्र कठिन बल जोरा । इतने जीव बचाओ मोरा ॥
बली पुरुष तुम कालको नाथा । अमरलोक मोहिं लेचल साथा ॥
निरङ्कार अब सुमिरौ नाहीं । फेर न जन्मों या जग माहीं ॥
तीनों लोक काल है देवा । जान परा अब हमको भेवा ॥
निर्गुण जपूं न सर्गुण ध्याऊँ । पारपुरुष तुम शरणा पाऊँ ॥
पुरुष पुरान मिले निजपीरा । खेवा मोर लगाओ तीरा ॥
अब यही सत्यगुरुने नानक साहबको अपना शब्द देकर कालपुरुषसे अलग किया है । फिर प्रलयका समस्त वृत्तान्त सुनाके काल पुरुषका सब ढङ्ग प्रगट किया है एवं भली भाँति समझा दिया है कि, हे नानक ! अब तुम पर कालका बल नहीं चलेगा, यदि मेरे पथपर अटल रहे तो ।
नानक वचन
धन्य पुरुष ज्ञानी करतारा । जीवकाज प्रकट संसारा ॥
यहाँ ते गया न साबित कोई । अजर पुरुष तुम निश्चल होई ॥
नाम कबीर जपै जिन जोई । ताकी फेंट न पकरै कोई ॥
धन्य कर्ता प्रभु बन्दी छोरा । ज्ञान तुम्हार महाबल जोरा ॥
दिया दान मोहि किया उबारा । कबहुँ न छोड़ूं शरण तुम्हारा ॥
मैंने सुना है कि, तावरीख अकबरीमें कबीर साहब और नानक साहबके विषयमें बातें अनेक लिखी हैं । दूसरी पुस्तकोंमें भी उपरोक्त बातें लिखी हुई हैं यहाँ तक कि, कितनेही साधुभी इस बातको जानते हैं । नानक शाह साहबको सत्यगुरुने कालपुरुषके देशसे छुड़ा करके अमर कर दिया, नानकजी हंस कबीर हो सुक्ति रूप हो गये, एवं अधिकारी होकर अपनी इच्छानुसार लोककल्याण करते रहे ।
कबीर साहब तो सम्बत् १५७५ विक्रमीमें अन्तर्धान हो गये पर नानक साहब पृथिवीपर अपना धर्म प्रचलित करते हुए सत्यपुरुषकी भक्तिका उप-
देश करते फिरे । जब सत्यलोकको गये तो वहाँसे कबीर साहबने उन्हें पृथिवी-पर भेज दिया कि, हे नानक ! अभी तुम पृथिवीपर जाओ आप नाम जपो तथा दूसरोंसे जपाओ । नानक साहब सत्यलोकसे पलटे, सत्य गुरुके वचनानुसार पृथिवीपर भ्रमण करते हुए लोगोंको उपदेश करते फिरते थे, उनके साथ भाई बाला और मरदानभी रहा करते थे, अपनी सिद्धिके बलसे दोनोंको अपनेही साथ उडाले जाते थे । नानकशाहसाहबका शरीर दिव्य तत्त्वका हो गया था, वे त्रिगुणातीत हो गये थे, उनको प्यासकी कुछभी चिन्ता नहीं थी । भाई बाला भी भूखका कष्ट सहन कर सकता था परन्तु मरदाना मीरासी (गानेवाला) भूख सहन करनेमें जरा कच्चा था । इस कारण जरासी भी भूख लगनेपर वह भूख भूख करके पुकारता था । एक दिवस वह नितान्तही विवश होकर कहने लगा कि, गुरुजी ! अब आप मुझको विदा कीजिये मैं अपने घरको जाऊँगा क्योंकि, मैं तुम्हारे साथ भूखा मरता हूँ ।
यह देख नानक साहबने उसे समझाया कि, तू घर मत जा, यहाँसे आठ कोसके ऊपर एक कूड़ा राक्षस रहता है, यह प्रायः मनुष्योंको पकड़ पकड़ कर खाता है । तुझको भी खा जावेगा । मरदानेने कहना न मान कर कहा कि, गुरुजी अब मुझे अपने घरवालोंका मोह लगा है, मुझे जाने दीजिये । यद्यपि नानक साहबने कईबार मना किया पर उसने न माना, उनसे बिदा होकर घरको चला । राहमें उसको कूड़ा राक्षस मिला और पकड़ लिया । कड़ाहमें तेल भरकर तपाने लगा जिसमें मरदानेको भूनकर उसमें खाजावे । जब कूड़ेने मरदानेको पकड़ लिया उसने देखा कि, यह तो अवश्यही मुझको भूनकर खालेगा, तब उसने नानक साहबका ध्यान करके कहा कि, गुरुजी ! अब मेरे प्राण बचाओ । मैंने जो आपका कहना न माना उसका फल मुझको मिल गया अब मैं आपकी शरणमें हूँ । अब आपकी आज्ञा कभी अस्वीकार न करूँगा । इस प्रकार उसने विनय की तब नानक साहबने सब कुछ मालूम कर लिया कि, कूड़ेने मरदानेको पकड़ लिया । अब भूनकर उसको खाया ही चाहता है । बालासे कहा कि, हे भाई बाला ! अब वह मुझको इस दुःखमें स्मरण करता है । तब बालेने कहा कि, गुरुजी ! आपने तो उसको बहुत समझाया था परन्तु उसने आपका कहना न माना । अब अच्छा है कि, कूड़ा राक्षस उसको खाजाय जो आज्ञा नहीं मानता उसकी ऐसीही दशा होनी चाहिये । नानक साहबने कहा कि, यह बात अच्छी नहीं, वह तो अब मेरे शरण में है । मैं कैसे उसकी सहायता न करूँ ? उस मरदाना पर दया आई । बालेको अपने साथ लिये एक पलभरमें उसके पास पहुँचे ।