कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
कबीरजीका उत्तर प्रासांगिक
दुखिया होय रैन दिन रोई । भोगी भोग करे सुख सोई ॥
दुर सुख भोग सोग सम जाने । भली बुली कछु मन नहि आने ॥
भली बुरीका करे सो त्यागा । निश्चय पावै पर बैरागा ॥
सोंगी अक्षय रैन दिन बाजै । सिद्ध साधु तहैं आसन छाजै ॥
साखी—आसन साधे आपमें, आपा डारै खोय ।
कहैं कबीर सो योगी, सहजै निर्मल होय ॥
भावार्थ—इस प्रकार सब जीव बन्धनमें पड़े हैं । कर्मकी फौसी सब जीवों को लगी हुई है । इससे छूटना असम्भव हुआ है । सहस्रों युक्तियाँ करता है परन्तु प्रतिदिन बँधा जाता है । ये तीनों लोक भवसागर (उत्पत्ति सागर) कर्मने बनाये हैं, इसी कर्मने यह भवसागर बनाया है । यही कर्म उस पर अधिकार कर रहा है । कर्मसे ब्रह्माण्ड और पिण्ड दोनोंकी स्थिति है । अनगिनती ब्रह्माण्ड हैं जिनकी कि, सीमाही नहीं है । यह ब्रह्माण्ड तथा पिण्ड दोनों अनगिनती नानाप्रकारके जीवोंसे परिपूर्ण हैं । जीवोंका अनगिनती स्वरूप तथा स्वभाव है । कि, जिनका कुछ विवरण हो ही नहीं सकता । किसीका वय लाखों वर्षका है । कोई ऐसे हैं कि, एक बार स्वोंसके आने जानेसे बहुत बार उत्पन्न होते और मर जाते हैं । कोई गरम हैं कोई अत्यन्त ठण्डे हैं ये सब जीव वासनासे भरे हुए हैं । इस भवसागरमें पड़े गोता खाया करते हैं । कभी स्वर्ग कभी नरक और कभी मृत्युलोकमें रहते हैं । इस चौरासी लाख योनिके जीवोंको सुख नहीं मिलता सदैव दुखी सुखी हुआ करते हैं चारों खानिके जीवोंमें न कोई सुखी और न सन्तुष्ट हैं, कर्मोंके बन्धनसे इनका आवागमन हुआ करता है । यह भवसागर पशुओंसे बसा हुआ है, इसमें प्रायः सच्चे मनुष्यका अभाव है, जीवोंके ही कर्मोंसे प्रेरित होकर ईश्वरको अवतार धारण करना पड़ता है, जीवोंके सुख दुखोंकी व्यवस्था उनके कर्मोंके अनुसार ही होती है, गोपियोंको गोपियोंके कर्मोंके अनुसार तथा कंसको कंसके कर्मोंके अनुसार फल मिला है । साहिबका हंस वही है जो कर्म जालको कच्चे धागेकी तरह काट दे क्योंकि, जबतक अपनेको कर्मोंके बखेड़ेसे नहीं बचाता उस समयतक साहिबके हंसोंमें नहीं संभाला जा सकता इस कारण कर्मोंपर विजय पाना प्रत्येक मुमुक्षुका कार्य होना चाहिये ।
नौ कोष
१ अन्नमयी कोष । २ शब्दमय कोष । ३ प्राणमय कोष । ४ आनन्दमय
१ दर्शनशास्त्रमें, अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय, और आनन्दमय ये पाँच कोष प्रसिद्ध हैं । कबीर सागर नं. ११ बोध सागर जीव धर्म बोधमें लिखा है कि—“पंचकोष यहि-
कोष । ५ मनोमय कोष । ६ प्रकाशमय कोष । ७ ज्ञानमय कोष । ८ आकाशमय कोष और ९ विज्ञानमय कोष । ये नौ कोषोंके नाम हैं ।
अब इनका संक्षेप विवरण सुनो :-
१. जो अन्नसे उत्पन्न हो और अन्नहीमें फँसा रहे वह अन्नमय कोष कहाता है ।
२-जो शब्दसे उत्पन्न हुआ और शब्दहीमें बन्द रहे वो शब्दमय कोष है ।
३-जो प्राणसे उत्पन्न होकर प्राणमें ही फँसा रहा वह प्राणमय कोष है ।
४-जो आनन्दसे उत्पन्न हो आनन्दमें ही फँसा रहा वह आनन्दमय कोष है ।
५-जो मनसे उत्पन्न हो मनमें ही बन्द रहे वह मनोमय कोष है ।
६-जो प्रकाशसे उत्पन्न होकर प्रकाशमेंही बन्द रहे वह प्रकाशमय कोष है ।
७-जो ज्ञानसे उत्पन्न हो एवं ज्ञानकेही बन्धनमें रहे वह ज्ञानमय कोष है ।
८-जो आकाशसे उत्पन्न हुआ होकर आकाशमेंही बन्द रहा हो वह आकाशमय कोष है ।
९-जो विज्ञानसे उत्पन्न हुआ विज्ञानमेंही बँधा,रहा वह विज्ञानमय कोष है ।
इन नौ कोषोंमें फँसा हुआ पारख पद नहीं पासकता, शरीर छूटतेही पुनः मातृगर्भमें प्रवेश करेगा । ये नौ कोष इस जीवके संकल्पसे हुए हैं । इन नौ कोषों को भली भाँति पहचानकर इन्हें छोड़ दे । पारखगुरुको पहचानकर उसकी ओर झुके, अपनेको पारखगुरुकी कृपाके योग्य बनावे तब पारखगुरु उसपर कृपा करके सब कोषोंके दोष गुण दिखा करके पारखपदपर स्थिर कर देंगे ।
अन्नमय तथा प्राणमयके बीच शब्दमय कोष है प्राणमय तथा मनोमयके बीचमें आनन्दमय कोष है । मनोमय और ज्ञानमयके बीचमें प्रकाशमय कोष है । ज्ञानमय और विज्ञानमय के बीचमें आकाशमय कोष है ।
मनुष्य जब समस्त उद्योग जप, तप, पूजा वन्दना योग समाधि, तीर्थ व्रत, आचार क्रिया इत्यादि जितनी युक्तियाँ हैं उनके और गुरुवोंके द्वारा दृढ़कर थक गया, छुटकारेका कोई पथ नहीं मिला तब इन नौ कोषोंमें उसने अपनी स्थिति की । इन घरोंके अतिरिक्त और किसी घरका पता नहीं लगा तब विवश होकर इन नौ कोषोंमें ही रहने लगा । इसकी कोई युक्ति काम न आई कि, जिससे कि आवागमनकी राह बन्द हो, इसमें किसका दोष है ॥
—विधि पहिचानी । प्रथम, अन्नमय, कोष बखानी ॥” इस तरह पाँचों कोषोंको पहिचान ले, सबसे पहिले अन्नमय कोषका वर्णन करते हैं । इस तरह कबीरपन्थके भी सांप्रदायिक ग्रन्थोंमें ५ ही कोष मिलते हैं । ये शब्दमय, प्रकाशमय, ज्ञानमय और आकाशमय चार और कहाँसे और कैसे बढ़ गये ? यह कबीरपन्थी और दार्शनिकजन अवश्य विचार करेंगे ।
नौ कोषोंका विवरण
१-अन्नमय कोष देह स्थूल । २-शब्दमय कोष देह विराट् । ३-प्राणमय कोष देह लिङ्ग । ४-आनन्दमय कोष देह हिरण्यगर्भ । ५-मनोमयकोष देह कारण । ६-प्रकाशमय देह अव्याकृत । ७-ज्ञानमय देह महाकारण । ८-आकाशमय देह मूल प्रकृति । ९-विज्ञानमय देह कैवल्य ।
१ अन्नमय कोष-जाग्रित अवस्था । क्षिमाभूमिका । पपील मार्ग । पृथ्वी-तत्त्व । रजोगुण । मुद्रा खेचरी । त्रिकुटी स्थानके जठराग्नि । घट आकाश काम जल । प्रध्वंसाभाव । ये इस कोषको हैं ।
२ शब्दमय कोष-स्वयं सिद्धि अवस्था । विराट् देह । पृथ्वी तत्त्व । गुण ब्रह्मा । मुद्रा सम्मुखी । कण्ठस्थान । विविध भूमिका । निर्मर्ग । महद अन-घट । जलपर्व । विम्बाकाश । सत्यलोक स्थान । महाप्रध्वंसाभाव । महाजल । ये इस कोशके हैं । अपना शरीर छोड़कर * योगी लोग दूसरे शरीरमें घर बना लेते हैं । सो शब्दमय कोष है ।
३ प्राणमय कोष-श्रीहठ स्थान । स्वप्नावस्था । सूक्ष्म जल तत्त्व । सतो-गुण । मुद्रा भूचरी । कामाग्नि । मठ आकाश । उद्यान वायु । विहङ्ग मार्ग । लिङ्ग देह ।
४ आनन्दमय कोष-आनन्दमय कोष-हिरण्य गर्भ देह । विशिष्टाद्वैत-भाव । गोलाहठस्थान । विष्णुलोक । मनभूमिका । तुरिया अवस्था (स्वप्न और सुषुप्तिके मध्य) योग अग्नि । रेचक वायु जल मार्ग । चाचरी मुद्रा । विष्णु-गुण । अभराकाश ।
५ मनोमय कोष-कारण देह । हृदय स्थान । सुषुप्ति अवस्था । स्वलिष्टा भूमिका । मन्दाग्नि । महदाकाश । अनन्य भाव कपिमार्ग । मुद्रा उत्मोलिनी । अग्नि तत्त्व । तमोगुण । प्राण वायु ।
६ प्रकाशमय कोष-हेठ पीठस्थान । अव्याकृत देह । शिवलोक । शिवगुण । चित्त भूमिका । प्रातः सन्धि अवस्था । ज्ञान अग्नि । अहम्भाव । पोहर्ष वायु । सूर्य मार्ग । शाम्भवी मुद्रा । चिद् चिद् विशिष्टाकाश । अनिमादिक आठ सिद्धि ।
७ ज्ञानमय कोष-नाभिस्थान । महाकारण देह । शुद्ध सतोगुण । तुरिया अवस्था । सुलिष्टता भूमिका । अत्यन्ताभाव । बड्वाग्नि । समान वायु । मन मार्ग । अगोचरी मुद्रा । चिदाकाश । सविकल्प समाधि ।
- योग शास्त्र विभूति पादके ३८ वें सूत्रमें तो यह लिखा हुआ है कि, चित्तके बन्धनके जो शरीरमें कारण हैं उनके ढीला करनेसे एवं चित्तके जाने आनेके मार्गके साक्षात्कारसे चित्त दूसरे शरीरमें प्रविष्ट हो जाता है इसके साथ सभी दूसरे शरीरमें घुस जाते हैं ।
८ आकाशमय कोष—मूल प्रकृति । देह पूर्णगिरी । स्थान निराश्रय लोक । ईश्वरगुण । अहम् भूमिका । मध्याह्न अवस्था । ब्रह्म अग्नि । कुम्भकवायु । आत्म भावनी मुद्रा । आनन्दाकाश । तुरियावस्था ये हैं ।
९ विज्ञानमय कोष—कैवल्य देह । भ्रमर गुफास्थान । तुरियातीत अवस्था । अन्तःकरण भूमिका । सर्वाधिष्ठान कलातीत कला । भावातीत भाव । पूर्ण बोधनी मुद्रा । निजाकाश । स्फूर्ती वायु । जैसाका तैसा । आत्मा आत्मा गुण । निर्गुण निर्गुण ब्रह्म । ये नौ कोष इस जीवके घर ठहरे । इन्हींमें यह भ्रमा करता है । जिस घरमें पहुँचता है वँसाही बन जाता है ।
आयु
इन पाँचों अहंकार तथा नौओं कोषोंमें जितने परमेश्वर और सेवक फँसे हैं सबकी आयु धन बल और विद्या आदि सभौका अन्त होता है । अंत रहित इसमें कोई नहीं । इस पर मैं कबीर साहबका वचन लिखता हूँ —
छन्द — जग चारो चल जाय चौकड़ी एक कहावे ।
तेउ बहत्तर जाँय इन्द्र यकराज करावे ॥
जाँय अठाइस इन्द्र विरञ्ची कोर भजीजे ॥
ऐसे दिनन सौ बरस विधि की आयु सुनीजे ॥
ब्रह्मा सहस व्यतीत विष्णुको घण्ट बजीजे ।
विष्णू द्वादश जाँय रुद्रकी पलक पुरीजे ॥
रुद्र एकादश जाँय ईशकी निमिष कहीजे ॥
ईश सहस चलजाँय शक्ति संहार करीजे ॥
शक्ति सहस चलजाँय कल्पका भेद जो लीजे ॥
विधि पति सोई कहत हैं भयाकल्प परमान ॥
कहैं कबीर अनगणित हैं गणित न आवे ज्ञान ॥
इन आयु और श्रेणियोंके ऊपर जो बड़ी बड़ी श्रेणियोंके प्रतिष्ठित पुरुष हैं उनका क्या हिसाब कहा जाय ? वो मनुष्य की समझमें क्या आवे । यह सब सीमाके भीतर हैं । इन सभोंका अन्त है । अनन्तको कौन जाने ?
सत्त्व तीन लोककी परमेश्वरी कर रहे हैं । सत्त्वकी उच्चश्रेणीपर कितने सन्त अधिकृत हैं उसकी इनको कुछ खबर नहीं है इन ऋषियोंसे बढ़ कर और भी ऋषि हैं उनसे बढ़कर भी और हैं । उनसेभी बढ़कर और हैं । इस प्रकार कितने ऋषि मुनि एक दूसरेसे उच्च श्रेणीपर अधिकृत हैं । केवल शक्ति तथा प्रभावमें सीमाबद्ध हैं । इन ऋषीश्वरोंके सामने मनुष्य क्या वस्तु और क्या बल रखता है।
जैसे मनुष्योंके समीप कीड़े मकोड़े ऐसेही उनके समक्ष मनुष्य क्या वस्तु हैं। बरन् इससे भी तुच्छ है इन सभोंका अन्त है, अनन्त कैसे जाना जावे ?
वेदके सिवा दूसरी पुस्तकोंकी सामर्थ्य नहीं कि, इन सूक्ष्म बातोंको प्रगट करें सूक्ष्म बातोंकी उनको तनिकभी सुध नहीं। साधुओंमेंभी कदाचितही कोई ऐसा होगा जो इन बातोंको समझे और सोचे, ये बातें बड़ी सूक्ष्म हैं। इन बातोंके समझनेवाले केवल हंस कबीर हैं, दूसरेकी ऐसी बुद्धि नहीं कि, भली प्रकार इसको जान सके। इन अहंकारी और नौ कोषोंमें सब कौतुक क्रीड़ा होरही है।
मनुष्यके सोचने समझने तथा कार्य करनेके लिये यह सब सूक्ष्म बातें दिखाई गई हैं। जो मनुष्य हो वो इन बातोंपर ध्यान देकर विचार करे। जिस किसीकी समझमें ये बातें ठीक मालूम होंगी अपनेको अन्धकारमें फँसा देखेगा वह अवश्यही प्रकाशमय पथको ढूँढ़ेगा। इन पांचों अहंकारों तथा नौ कोषोंसे बाहर निकालनेवालेका उपदेश जब पावेगा तब यह सब बातें जो लोक और वेदमें प्रबलित हैं सभी यथार्थ रूपसे जैसीकी तैसी दिखाई देंगी।
उनपर अत्यन्त खेद है जिनके कि, विचारमें इन पांचों अहंकारों और नौ कोषकी बातें नहीं आईं। फिरभी वो आपको पण्डित तथा ज्ञानी समझते हैं। अपने बन्धनपर तनिक भी ध्यान नहीं करते और दूसरेके छुटकारेके लिये उद्योग किया करते हैं। जिसका गुरु स्वयम् राह भूला हो तो उसका शिष्य किधर जायगा ? ऐसा कौन भाग्यवान् है जो पारख गुरुको ढूँढ़कर उसके चरणकी धूल हो जावे ? संसारकी गन्दगियोंसे विशुद्ध हो जावे ? धन्य वह मनुष्य है जिसने पारख गुरुको शीघ्रातिशीघ्र पा लिया।
वासनाओंकी बाढ़से कोई विशुद्ध तथा स्वच्छ हो नहीं सकता। सब गुरु पुकारते हैं कि, विषय वासना नरककी राह है, इनसे दूर भागो। परन्तु तो भी गुरु तथा शिष्य विषय वासनाके बन्धनमेंही फँसे हुए हैं बिना पारखगुरुके किसीमें छुडानेका सामर्थ्य नहीं। वैद्य तो रोगीसे कहता है कि, तुम संयमसे रहो नहीं तो मर जाओगे। वैद्यका कहना सुनते तो हैं पर उसपर कोई स्थिर नहीं है। इसपर मैं एक दृष्टांत लिखता हूँ।
एक राजाने आम खाया वो उस आमके खानेसे बीमार हो गया तब वैद्यने बहुत औषधि की अत्यन्त कठिनाईसे आरोग्य हुआ वैद्यने राजासे कह दिया कि, अब आप भविष्यमें फिर कभी आम न खाना, यदि आम खाओगे तो मर जाओगे। आपका यह रोग ऐसाही है। राजाने यह जान ली। एक दिवस राजा अपने बागमें सैरके लिये गया बगीचेका माली अच्छे अच्छे भीठे आम राजाके सामने लाया।
मंत्रियों तथा निकटवर्तियोंने मना किया कि, महाराज ! आप इसको मत खाओ क्योंकि, वैद्यने मना किया है पर राजाने कहा कि, मैं खाता नहीं देखता हूँ जब देखा और बास लिया तब राजाके मनमें इच्छा हुई और आमको खागया अमीरों का कहना न माना । दो चार आम जो मनमें आया खालिया और बीमार हो गया । फिर बहुत कुछ औषध की गई पर आरोग्य न हुआ अन्तमें मर करही पीछा छूटा ।
इसी प्रकार सब गुरु मना करते हैं पर विषय वासनाओंसे कोई बच नहीं सकता, इसने सबको मार लिया है । हृदयसे लेकर ये सब बन्धनके कारण हैं, बिना इन सब पर विजय पाये बन्धन नहीं कट सकता ।
अध्याय १८
पुनर्जन्म
भवसागरमें चारों खानके जीव चौरासी लाख योनिमें आवागमन किया करते हैं । इस कारण अब मैं पुनर्जन्मका वर्णन करता हूँ । यह सत्यगुरु कबीर साहब का कथन है कि, सब जीवोंको आवागमन हुआ करता है । समस्त भारतवासी इस बातको स्वीकार करते हैं । कदाचित्ही कोई इस बातको स्वीकार न करे पर मूसई, ईसाई तथा मुसलमान इस बातको नहीं मानते । कोई कोई उनमेंसे भी मान लेते हैं । इस कारण मैं पुनर्जन्मको उनकी पुस्तकोंसे प्रमाणित किया चाहता हूँ जिसमें उनकी अज्ञानता नष्ट हो वे इस बातको मानें । विशेषतः जिस बातको स्वसंवेद स्पष्ट कहता है उस बातके ऊपर शंका करनेवाला सच्चा कैसे ठहर सकता है ?
नज्रम-तनासुख कहें सत्य साहब कबीर ।
मिहर जिसके इनसां हो रोशन ज़मीर ॥
मुकद्दस स्वसंवेद उसका कलाम ।
बर्रा नस्त नामे अलेहुस्ललाम ॥
तीनों धम्मोंके महाशयगण और सिद्ध साधु तथा समस्त पृथिवीके विद्वानों और समस्त पुनर्जन्म न माननेवालों को विदित हो कि, बिना पुनर्जन्मके माने एवं आवागमनके अस्वीकार किये पापोंकी अधिकता और वासनाओं पर कभी भी विजय नहीं पासकते । जीवोंपर दया दृष्टि न होगी, विवेक विचार तथा सोचनेकी बुद्धि न होगी तो बन्ध और कण्ठही रहेगा ।
गज़ल-बकौले सतगुरु सच है तनासुख ।
कि चौरासी करे जीव तँ तनासुख ॥
करे परवाज जब इस कालबुदसे ।
हो सदहा बार पै दरपै तनासुख ॥
कभी छूटे न इस खुमकी खुमारी ।
जो फिर फिर नोश करता मैं तनासुख ॥
जो बदखसमी अमलकी हो रही है ।
तो करता बारहा यह कैं तनासुख ॥
न सूझे और न यह रह रास्त बूझे ।
रही है घेर हर रुख दिये तनासुख ॥
जो खींच और धुवाँ दिलसे उठावे ।
कि पीता शौकसे यह नय तनासुख ॥
बहर सिमतो बहर सूरत बहर हाल ।
बहर जानिव नगर हर शय तनासुख ॥
कि वरकत मिहवां मुरशि इसे आजिज ।
हुआ लारेव तू निर्भय तनासुख ॥
पश्चिमके देशवासी जिनका कि, कामही मांसाहार तथा निर्दयताका है, वे जीवके पुनर्जन्मको अस्वीकार करते हैं। इसका कारण यह है कि, उस देशके पैगम्बरोंमें से किसीको आवागमनका ज्ञान मालूम नहीं था। यद्यपि प्रकाशकी हलकी झलक कभी कभी उनके मनपर भी आजाती थी परंतु उस प्रकाशकी स्थित नहीं होती थी। बिजलीके समान प्रकाशका प्रागटच हुआ और फिर अतर्धनि हो गया। सभी नबियोंमें हजरत आदम सबसे बड़े थे। अब पहले में उनके ज्ञानका वृत्तान्त लिखता हूँ। इसके साथही पश्चिम देशके पैगम्बरोंके आवागमनका हाल न जाननेके कारण सभी बात सप्रमाण लिखूंगा।
हजरत आदम—परमेश्वरके पुत्र थे। उनकी कांति तथा तेज सारे पैगम्बरोंसे बढ़ चढ़कर था कबीर साहबने कहा है कि, आदम ब्रह्माके औतार थे। इस खुदाके प्यारे पुत्रके साथ स्वयम् खुदा तथा फिरिश्ते वार्तालाप किया करते थे। हजरतको अनेक बार खुदाका दर्शन हुआ था। आपको लड़नी विद्या नहीं थी, न आपको खुदाकी पहचान थी। खुदासे जो आज्ञा पाते उसको व्यवहारमें लाते थे आपको खुदाका दर्शन तो मिलताही था परन्तु खुदाकी पहचान नहीं थी, क्योंकि, अन्तर प्रकाश बिना खुदाकी पहचान असम्भव है। आपको केवल शारीरिक दर्शन प्राप्त था, मानसिक दर्शन नहीं था। क्योंकि जिसको मानसिक दर्शन होता है वह वार्तालापके अधीन नहीं होता ऐसे प्रकाशित हृदयवालेको कोई धोखा भी नहीं दे