कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
ऋषीश्वरोंका वचन
विचार नहीं करते। सुदर्शनजीने द्रौपदीके हृदयकी बातोंको जानकर अपने हाथको भोजनसे खींच लिया। केवल तीन ग्रास खाये अधिक भोजन नहीं किया हाथ धोकर चले, सुदर्शनजीने जो तीन ग्रास खाये थे इस कारण वह आकाश घण्ट तीनही बार बजकर रह गया, अधिक नहीं बजा। उस समय राजा युधिष्ठिरको फिर संदेह हुआ, कृष्णचन्द्रके पास जाकर कहने लगे कि, महाराज ! अब क्या करें ? सुदर्शनजीने भोजन किया तो भी घण्ट तीनही बेर बजा। किस अपराधसे पूरे सात बार नहीं बजा ? महाराज ! कृपा कर इसका कारण बतलाइये। कृष्णचन्द्रने कहा हे युधिष्ठिर ! रानी द्रौपदीने अपने मनके भीतर सुदर्शनजीकी खानेके समय निन्दा की कि, सुदर्शन अज्ञानीहै। भोजनके स्वादको नहीं जानता। इस कारण सुदर्शनजीने उसके अन्तःकरणकी बात जानकर खानेसे हाथ खींच लिया। तुम्हारी यज्ञ पूरी नहीं हुई इसलिये घण्ट नहीं बजा। अब तुम दौड़कर जाओ सुदर्शनजीके चरणोंपर गिरकर अपना अपराध क्षमा कराओ। प्रार्थना तथा निवेदन करके उनको फेर लेआओ। बड़ी मान भक्ति तथा नम्रतापूर्वक भोजन कराओगे, तब सात बार घण्ट बजेगा। सावधान, किसी प्रकारकी विभिन्नता न करना। इतनी बात सुनकर राजा युधिष्ठिर दौड़े गये और सुदर्शनजीके चरणोंपर गिरकर अत्यंत नम्रतासे कहने लगे कि, महाराज ! हमारा अपराध क्षमा करो, हम अज्ञानसे अंधे हैं, आपके भेदको नहीं जानते, अब चलकर हमारे घरमें फिर भोजन करो। जब राजाने बड़ी नम्रता की तब सुदर्शनजी पुनः दयालु हुए राजाके घर आकर पुनः भोजन किया। तब घण्ट सात बार आकाशमें आपसे आप बजा। चारों ओरसे जय जयकार ध्वनि होने लगी।
यह सब कबीर साहब धर्मदासजीसे कहते हैं कि:—
साखी-श्वपचभक्त^१^ भोजन कियो, घण्ट बजेउ अकाश^२^ ।
गण गंधर्व मुनि देवमें, जैजै होत^३^ प्रकाश^४^ ॥
चौ०-भोजन श्वपच कीन्ह जिउनारा^५^ । सात बार घण्टा झनकारा^६^ ॥
राय युधिष्ठिर चरनन परचो । पातक^७^ सकल^८^ भक्त^९^ मम^१०^ हरचो^११^ ॥
हम तो महा अधम अपराधी । कुटिल^१२^ कठोर^१३^ भक्ति नहीं राधी^१४^ ॥
अहो भगत हम बडे अभागी । कृपा कीन्ह मोहि कीन्ह सुभागी ॥
पांचों पाण्डव विनवैं^१५^ शूरा । भक्त प्रताप यज्ञ भा पूरा^१६^ ॥
१ सुदर्शन, २ अपने आप, ३ होती थी, ४ प्रत्यक्षमें ५ परोसी हुई वस्तुका, ६ बज गया, ७ पाप ८ सब, ९ हे सुदर्शन, १० मेरे, ११ दूरकर दिये, १२ कपटी, १३ कड़े स्वभावके, १४ सिद्ध की, १५ प्रणाम करे, १६ हो गया।
गण गंधर्व देव सब आये । श्वपच भक्तको मस्तक' नाये' ॥
सब शट दर्शन और अचारी' । अस्तुति करै चरण शिर धारी' ॥
सा०—कल' वन्त बहुतेक जुरे', पण्डित कोटि पचीस ।
श्वपच भक्तकी पनही', तुलै' न काहुको' शीस ॥
चौ०—नाम सुमिरले अमृत बानी । क्या चतुराई ठानि रे प्रानी ॥
पढ़े रे भरथरी' चारों वेदा । बिन सद्गुरु नहिं पायो भेदा" ॥
गोरखको भी जन्म सरानी" । कायाकी गति" उनहुँ न जानी॥
जबहुँ जुरे कोटिन ऋषि राजा । तबहुँ न घण्ट अघर" बिच बाजा॥
जबही श्वपच" मन्दिरपगुधारा । बाजेउ घण्ट भये झनकारा ॥
कह कबीर चारों बरण हैनीचा । सबते श्वपचहु भगत है ऊंचा ॥
जब सुदर्शनजीने दूसरी बार भोजन किया तब सात बार स्वयम् आकाशी घण्ट बजा, चारों ओरसे धन्य धन्य और जयजयकार शब्द होने लगा, सम्भस्त राजा प्रजा आकर श्वपच सुदर्शनके चरणोंपर गिरे षट् दर्शनके ऋषि मुनिगण आकर दण्डवत प्रणाम करने लगे पाँचों पाण्डव अत्यंत नम्रतापूर्वक उनके चरणोंपर गिर, स्तुति करने लगे । सुदर्शन महाराजकी महिमा सब संसारमें प्रकट हो गई ।
पाण्डवोंको सुदर्शनकी श्रेष्ठता दिखाना ।
भीमसेनसे कहा था, कि, जबतक हम श्वपच सुदर्शनकी श्रेष्ठता अपनी आँखोंसे न देखलें तबतक कभी भी विश्वास न करेंगे क्योंकि, कृष्णजीने प्रतिज्ञाकी थी कि, मैं तुमको सुदर्शनकी श्रेष्ठता तुम्हारी आँखोंसे दिखला दूंगा, तुम देख लेना, तब विश्वास करना । इस कारण कृष्णजीने आज्ञा दी कि, अब यह सब समाज जो इस समय उपस्थित हैं पुष्करजी चलें । आज्ञानुसार सब पुष्करजी को चल दिये ।
भगवान् कृष्णने भी जो कुछ कहा था उसको पद्यबद्ध ग्रन्थोंमें दिखाये देते हैं—
ततक्षण' कृष्ण वचन अस" भाखी" । सुनहु न राय युधिष्ठिर साखी" ॥
सबही लैचलु" पुष्कर तीरा" । देखहु दृष्टि" सकल" मतिधीरा" ॥
पुष्कर क्षेत्र आहि" अघहारी" । बेगिहि" चलहु" तहाँ पग धारी ॥
१ शिर, २ झुकाया ३ जोगे जंगम, सेवडा, संन्यासी, दर्बेश, ब्राह्मण, ४ रखकर, ५ सिद्धिवाले, ६ हुए, ७ जूती, ८ बराबर, ९ किसीको, १० भर्तृहरि, ११ हाल, १२ बीता, १३ हाल, १४ आसमानी, १५ श्वपच भी, १६ उसी समय, १७ ऐसे १८ कहे, १९ किसीके कहे हुए, २० लेचलो, २१ किनारे, २२ आँखोंसे, २३ सब २४ बुद्धिमान्, २५ है, २६ पापनाशक, २७ जलदी २८ चल दिये ।
तब सब जिलि मिलि दीन रेगाई^१^। पुष्कर छेत्र पहुँचे^२^ जाई^३^ ॥
सवालाख दीपक उँजियारा^४^। सब परछाही^५^ आप^६^ निहारा^७^ ॥
बैठे देख सकल सरदारा। सुर नर भूपति ठाढ़े पारा^८^ ॥
सकल मेष^९^को देखहु देवा। जलमट्ट^१०^ रूप^११^ कहहु कस^१२^ भेवा^१३^ ॥
साखी-सब परछाई निरखह^१४^, सुनहु युधिष्ठिर राय।
कहहु^१५^ सुपच कस^१६^ आगरे^१७^, जलमह^१८^ निरखहु जाय^१९^ ॥
युधिष्ठिर बचन।
चौ०- निरखे^२०^ राय युधिष्ठिर छाहि^२१^। पशुकी छाया सबकी आहि^२२^ ॥
खर^२३^ शूकर^२४^ लीन्हें औतारा^२५^। श्वानजन्म^२६^ भरमें^२७^ मनियारा^२८^ ॥
सा०- मीन^२९^ माँस जो खात^३०^ है, ते तो जाति चँडाल।
गीध^३१^ कागकी^३२^ देह धरि^३३^, भरमें जग^३४^ जञ्जाल^३५^ ॥
जब समस्त समाजको समेटि कर राजा युधिष्ठिर तथा कृष्णजी पुष्कर तीर्थ गये। कृष्णजीने सवालाख प्रदीप जलवाये, युधिष्ठिरजीसे कहा कि, अब तुम लोग आदिमियोंको परछाई इस जलमें देखो, उन्होंने देखा तो सर्व मनुष्योंका प्राकृतिक स्वरूप उस जलमें दिखाई दिया अर्थात् गदहा, सूबर कुत्ता, बैल, हाथी घोड़े पशु, पक्षी हंसक जीव कीड़े मकोड़े आदि देख पड़े, एक भी उनमें मनुष्य नहीं था केवल श्वपच सुदर्शनजी महाराजही इनमें मनुष्य थे, श्रीकृष्ण का सत्य पुरुषका रूप था। जब पाण्डवोंने स्वचक्षुसे देख लिया कि सुदर्शनजीके अतिरिक्त दूसरा कोई मनुष्य नहीं है तो उनको सुदर्शनजीकी श्रेष्ठताका परिचय भली प्रकार मिल गया। पुष्करजीमें सबका प्राकृतिक स्वरूप दिखाई दिया। क्योंकि, पुष्करजी सब तीर्थोंमें श्रेष्ठ हैं, पृथ्वीकी आँख हैं। इस कारण कृष्णचन्द्रने यह समस्त कौतुक धरतीकी आँखद्वारा दिखलाया। सब लोगोंने हंस कबीरकी श्रेष्ठताको भली प्रकार जान लिया। इसी प्रकार हंस कबीरकी सबकालोंमें प्रकट हो जाती है, किसीसे छिपी नहीं रह सकती। उन्हींकी श्रेष्ठतापर यह गजल है इसमें उनकी श्रेष्ठताका कुछ नमूना दिखा देते हैं —
गजल-संद^३६^ मह खुर छिप जायेंगे इस नूरके^३७^ आगे।
तुझ बंदः सुदर्शन कदम^३८^ धूरके आगे ॥
१ चल दिये, २ पहुँच गये, ३ प्रकाशमें, ४ अपनी परछाई को, ५ स्वयम, ६ देखा।
७ किनारेपर ८ दशनोंके, ९ जलमें, १० आकार, ११ कँसा, १२ रहस्य है, १३ देखो, १४ बताओ,
१५ कँसे, १६ आकार, १७ पानीमें, १८ देखो, १९ देखे, २० परछाई, २१ है, २२ गदहा,
२३ सूअर, २४ जन्म लिए हुए हैं, २५ कुत्तेकी योनि, २६ डोलें, २७ चूड़ीवेचा, २८ मछली
२९ खाते हैं, ३० गूढ़, ३१ कऊआ, ३२ शरीर, ३३ संसार, ३४ बखेडेमें, ३५ सूर्य चाँद आदि
३६ आत्मीय प्रकाश, ३७ चरण, ३८ रज।
है, हेच' नमक' हुस्नोदमक' हूँ' रो गिलमा' ।
पापोश' चमक' इन्द्रमती हूरके आगे ॥
जेते हैं सलातीन जमी' और 'फलकके !
खिदमंतममें' हैं सारे मेरे फगफूरके आगे ॥
दिलदार है बाजारमें कोपर्दः नशीं' है ।
हाजिर 'बदिले बेदिल 'रञ्जुरके आगे ॥
मूसा 'सदहा गुजरे न देखा कभी सो औज' ॥
गाफिल हुए सब हिसोहवा' ढङ्ग लगाये ॥
कुछ जोर नहीं जालिम' जंवूरके आगे ॥
फिरता बतवाफे तो यह गरदूँ जो कमरकोज ।
सिजदे' झुका है तेरे मनशूरके आगे ॥
कह भेद उसीसे जो कि हो महूरमें' इसरार
कर फाश' न तू हरगिज 'गयूरके आगे ॥
नथुनेमें 'बनी जजान है जबतक तेरे आजिज ॥
कर उसकी बुजर्गी खडे जम्हूरके आगे ।
यथा ।
भारतो 'स्वसमवेदकी तहरीर' में देखो ।
उलमाय' फकीरनकी' तकरीर' में देखो ॥
जिनके सदहा लख हैं सुदर्शनसे गुलामों ।
सो साहब के कलमए 'तासीर में देखो ॥
मखलूक' जहाँ मजमअ' हुआ केते करोडों ।
इस सत्यगुरु की 'खादिम तौकरिमें' देखो ॥
बन्दे हैं पडे कैद हसीनान' हजारो ।
बबदल' बुते जुल्फकी' जञ्जीर में देखो ॥
जिस नामसे वाकिफ' न जमी' और न जमाँ' है ।
सो नाम है उस खादिमे जागीर में देखो ॥
१ तुच्छ, २ खार, ३ सौन्दर्य, लावण्य, ४ परी, ५ सुंदर सुंदर लडके, ६ जूती, ७ लावण्य,
८ भू, ९ आसमान, १० सेवा, ११ पदमें छिप हुआ, १२ हृदयके व्याकुल, १३ अत्यन्त रंजीदा,
१४ रातदिन, १५ तपिश, १६ जिस पर्वतपर मूसाको परमात्माके दर्शन हुए थे, १७ अत्यन्त-
जुल्मी, १८ वन्दना, १९ ढकना, २० जाहिर, २१ गमार, २२ कविकी कविताका नाम है ।
२३ आत्म बोधक शास्त्र या कबीर साहबका बीजक, २४ लिखावट, २५ उलमा, २६ फकीरों
२७ वचन, २८ स्वभाव, २९ पैदा, किया, ३० समूह, ३१ खिदमत करनेवाला, ३२ सत्कार ।
३३ प्रसन्न चेता, ३४ न फिरनेवाले, ३५ शरीर, ३६ जानकर, ३७ भू, ३८ जमाना,
जो कर न सके फतह' कोई मर्द सिपाई ।
सो आशकके नालए' शबगीर में देखो ॥
जिस इल्मसे महरूम' रहे खादिमोख्वाजः ।
सोई कदमें बरकत्' गुरु पीर में देखा ॥
बुल बुल है फुगा में जिसे कुमरी करे कूकू ।
हर' गुलशनो हर गुलवने तसवीर में देखा ॥
जिसके लिए जाबाज' है परवानए' बे खौफ' ।
सो महरुख' हर शमः व मुलगीर में देखो ॥
सदरञ्ज' उठा न गञ्ज' सो हाथमें आवे ।
आसान है सो उसकी तदवीरमें देखो ।
यह हरदो' जहाँ और जहाँदार तमासा ॥
सब खेल खुला' कैल की तजबीर में देखो ।
सोहाजिरो' नाजिर' है बहों जाहिरो वातिन' ॥
वेदारी और खाबकी ताबीर में देखो ।
जिसके लिये महाह' समीह्मद' सरायों ॥
यह सारा जहाँ उसकी तस्वीर में देखो ।
जो मजहब जारी न हुआ तीन जमाना ॥
घर घर है सो दौर इनकी अखीर में देखो ।
यों और वहाँ परदः दुई, इठगया' आजिज ।
सत् पुरुषको साहबे कबीर' वें देखो ॥
*यथा- ताजीम तेरे बन्देको गुलजार झुका ।
तकरीमको शम्शो महे अनवार झुका ॥
जब आपही से आप बजा घण्ट समावी ॥
पाबोसको गेती शहे दरबार झुका ॥
रक्कास झुका तबलः झुका तार व तम्बूर ।
बं बादए पैमानः व सरशार झुका ॥
१ जीव २ प्रेमी, ३ आहंकीलैन, ४ अलग, ५ हल्का, ६ प्रत्येक, ७ जीव, ८ पतंग, ९ निडर,
१० चन्द्रमुखी, ११ सदाके दुख, १२ ताला, १३ इसलोक और परलोक, १४ एक अनागत वक्ता,
१५ उपस्थित, १६ द्रष्टा, १७ हृदय, १८ सराहक, १९ स्तुति, २० द्वैत, २१ कबीर साहब ।
- यज्ञमें घंटाके अपने आप बज जानेसे सभीने सुदर्शन श्वपचको भगवान्का अनन्य भक्त जानकर शिर झुकाया था इसी शिर झुकानेकी बातको नाम निर्देशके साथ इस गजलमें भी कहा गया है ।
सूफ़ी भि झुंका रिन्द झुका जाजिबे मजबूत ।
मयः पीर मुर्गा खानए खुम्मार झुका ॥
मखलूक हुआ आगाह उस अकबर इसरार ।
आली अमलो इल्म अमलदार झुका ॥
जब पहिन अजर जामा चले हंस तुम्हारे ।
तसलीमको तब आगे हो ओंकार झुका ॥
हाज़िर थे इल्म और फ़नून फ़ाखिरे कसूबी ।
वा तजरबए तसबीहो जुन्नार झुका ॥
सदहा जमा जङ्गलको जलावे तजो पलकमें ।
ता विन्दए नाविक शररबार झुका ॥
है कौन बद अन्देशः जो आ पेश तुम्हारे ।
हैबत से तेरी चर्ख यह दौवार झुका ॥
सब वेष भगे देख तेरा तीर ज़िगर सोज़ ।
रुस्तम भी झुका शेवः सितमगार झुका ॥
ताज़ीस्त सनाख्वाँ हो तु इस कातिल अपने ।
सिजदेको पहले निरङ्कार झुका ॥
बोले न हँसे यार तलबगार फिर आजिज़ ।
जब तुझ हदफ़े सीनः पै सोफ़ार झुका ॥
गरुड़जी महाराज ।
कबीरसागरान्तर्गत बोधसागरमें एक 'गरुड़ बोध' भी है । उसमें सबसे पहिले धर्मदासजी कबीर साहिबसे गरुड़बोधका भेद पूछते हैं, एवं कबीर साहिब कहते हैं कि, पुरुषने कहा कि, ए सुकृत ! आप संसारमें जाओ जीवोंका उद्धार करो । ज्ञानीजीने पृथ्वीपर आकर, जिसने उनके वचन माना उसीका उद्धार कर दिया । सबसे पहले गरुड़जी मिले, मैंने उन्हें सत्यनामका उपदेश दिया, कैसे दिया । सो मैं तुझे सुनाये देता हूँ । गरुड़को जब मैं मिला तो गरुड़ने मुझे पूछा कि, आप कौन एवं कहाँसे आये हैं मैंने कहा कि, ज्ञानी मेरा नाम है संसामें दीक्षा देनेके लिये सत्य लोकसे आया हूँ । गरुड़ने यह सुनकर बड़ा आश्चर्य माना कि, कृष्णसे भिन्न दूसरा सत्य पुरुष कौन है । वे ही दसों अवतार धारण करते हैं । कुछ बातोंके पीछे कबीर साहिबने गरुड़जीको कृष्ण महाराज की आज्ञा लेने को भेजा था ।
कृष्ण वचन ।
चौ०— सुनके कृष्ण उत्तर तब दीन्हा । भले गरुड़ तुम उनको चीन्हा ॥
सरगुण कई बार अवतारा । निज साहब है अगम अपारा ॥
सो साहब हमको निरमाया । आज्ञा कीन्हीं हमहिं उपाया ॥
जो कबीर भाषे अरथाई । सोई वचन सत्य है भाई ॥
गरुड़ वचन ।
गरुड़ कहे तुम काहे न भाखी । कैसे मोहिं छिपायके राखी ॥
सरगुण प्रभु दीन्हा फैलाई । निरगुन कैसे नहिं प्रगटाई ॥
कृष्ण वचन ।
सुनहु गरुड़ एक वचन प्रमाना । निरगुन कोई बिरलै जाना ॥
हम देही धरि क्रीडा कीन्हा । यही मान सब काहू लीन्हा ॥
हम गीतामहैं सन्धि जनाई । ताको कोई न चीन्है भाई ॥
निरगुन भेद कहूँ परमाना । मनकर भेद न कोई जाना ॥
पढ़ गीता पण्डित बौराई । अर्थ भेद को गम नहिं पाई ॥
पढ़ गीता औरन समझावें । आप भरममें जन्म गवावें ॥
कथ गीता हम सकल बताई । पण्डित अर्थ न समझा जाई ॥
ब्रह्मा विष्णू शिव कह भाई । इन तीनों मिल बाजी लाई ॥
ता बाजी अटका सब कोई । निरगुणकी गम कैसे होई ॥
बाजी लायके जग भरमाई । निर्गुणकी गति कोइ नहिं पाई ॥
मैं सब जानूँ भेद अवगाहा । और देव नहिं पावैं थाहा ॥
गीताको हम कथ समझाई । सा अर्जुन नहिं मानी भाई ॥
रहन गहन उनहैं नहिं पाई । अरथ सुनै सब जन अरुझाई ॥
पण्डित पढ़ गीता अरथावै । गीता केर अर्थ नहिं पावै ॥
फिर फिर हमहींको ठहरावै । निर्गुणकी गम नाहीं पावै ॥
हम कबीरको नीके जाना । उनहीं कीन्ह सकल मण्डाना ॥
सकल जीव उन अण्ड मुँदाई । इनहीं सबहीं अर्थ दूढ़ाई ॥
जहैं लगि तीरथ देखहु जाई । इनहीं सब थापना थपाई ॥
और सकलको रचना कीन्हा । यहि विधि थाप सबनको दीन्हा ॥
हम तीनों पुरुष बिसराई । आप आपको कीन्ह बड़ाई ॥
साखी—कह कृष्णजी गरुड़से, तुम गुरु करो कबीर ॥
हंस लोक पहुँचावई, खेड़ लगावै तीर ॥
इस प्रकार श्रीकृष्णने जब गरुड़को आज्ञा दी कि, तुम कबीर सहाबको गुरु करो, तब गरुड़जी तुरन्त सत्यगुरुके पास गये । कबीर साहबकी आज्ञानुसार दीक्षा लेनेका सब प्रबंध किया । जैसा कि, अब वर्तमान कालमें कबीर पंथियोंमें दीक्षा लेनेकी प्रथा है । इसी नियमके अनुसार गरुड़जीने चारों ओर पत्र भेजकर बहुत साधुओंको एकत्रित कर भण्डारेका बड़ा प्रबंध किया । समस्त साधुमंडलिका प्रेम पूर्वक सेवा सत्कार किया ।
चौपाई—जितने साधु द्वारिका चीन्हू । तिनिहिं गरुड़ सबको दल दीन्हू ॥
जहैं लगि मुनिवर सहस अठासी । आए ऋषि मुनि सिद्ध चौरासी ॥
आए ऋषि जो सहस अठासी । नागलोकके भोग विलासी ॥
वासुदेव जहैं आप रहाये । और नाग बहुतेक चलि आये ॥
ब्रह्मा विष्णु जहैं आये भाई । शिव आये बहुतेक चलि लुगाई ॥
महादेव वचन ।
कह शिव कोपके वचन अपारा । तीन छोड़ कस और विचारा ॥
सब पर तेज महादेव कीन्हू । सब मिलिआय गरुड़को चीन्हू ॥
तब शिव ऐसे वचन सुनाई । हमें तीनों पर और न भाई ॥
गरुड़ वचन ।
सुनु ब्रह्मा सुनु विष्णु महेशा । मो को कीन्ही कृष्ण उपदेशा ॥
जो कछु कृष्ण बताई भेखा । सो तुम्हरो मत आखिन देखा ॥
महादेव वचन ।
यह सुनि महादेव रिसियाना । हमरी गति तुम कैसे जाना ॥
हम तीनों हैं त्रिभुवन राई । हमें छोड़ कस और दूढ़ाई ॥
शिवजी बहुत कुछ कह अत्यंत क्रुद्ध हुए बड़ा भय दिखलाया ।
पर गरुड़जीने कुछ भी परवाह नहीं की, ब्रह्मा विष्णु आदि सब देवता उपस्थित थे । जब गरुड़जीने कबीर साहबसे दीक्षा ली, सत्यगुरुका ज्ञान पाकर भली प्रकार सन्तुष्ट हुए, गरुड़जीके सामने बहुतसे लोग ब्रह्मा विष्णु तथा शिव सहित एकत्रित हुए, पर किसकी ताकत थी कि, ज्ञानमें गरुड़जीका सामना कर सके ।
जिस समय गरुड़जी दीक्षालेने लगे उस समयका वृत्तान्त सुनो कि, उनपर कैसी आकाशी दया हुई थी ।
चौ०—ऐसी भाँति भगति उन साजा । बाजे सकल अनाहद बाजा ॥
बाजे शंख बीन शहनाई । गैवको बाजा बाजै भाई ॥
ताल मृदङ्ग गैवसे वाजी । ऐसी भांति भक्त भल साजी ॥
सत्य लोकसे उतरे दासा । करें भक्ति वो भोग विलासा ॥
सखा समेत साज जो आई । जगमगज्योतिवरणि नहिं जाई ॥
निर्गुण भक्त कीन्ह सञ्जोई । केते भूल रहे सब कोई ॥
नागलोककी कन्या आई । मोहि रहे सब देखी भुलाई ॥
मोहे ब्रह्मा विष्णु महेशा । नारद शारद औ सुख देशा ॥
गण गंधर्व मोहे आचारी । निर्गुन भेद न परे विचारी ॥
मोहे कृष्ण द्वारिका वासी । मोहे सकल सिद्ध चौरासी ॥
यहि विधि भक्ति कीन्ह चितलाई । देहको सुधि सर्वाहि विसराई ॥
धन्य धन्य सब करें पुकारी । धन्य कबीर है भक्ति तुम्हारी ॥
धन्य गरुण है ज्ञानि जो पाया । ऐसे सब कमाल बचन सुनायी ॥
जब गरुड़जीने दीक्षा ली उस समय बड़ा सभाज हुआ । सत्यलोकसे हंस, उत्तर पड़े, सब सिद्ध साधु तथा देवता इकट्ठे थे, अंतरिक्षसे, अनगिनती बाजे बजने लगे, नागलोकसे एक स्त्री आई, उसको देख सब देवता तथा सिद्ध आदि मोहितसे हो गये, गरुड़जी ऐसे भाग्यवान् थे कि, उनके निमित्त कबीर साहबने सर्व सामग्री सत्यलोकसे मँगवाई थी, दीक्षा देनेके समय अनहद बाजा बजने लगा, ऐसा आनन्द हुआ । जो कभी देखा सुना नहीं गया था । गरुड़ने अत्यंत नम्रता पूर्वक सब ऋषि, मुनि तथा सब मनुष्योंका सत्कार किया जिससे बड़ा आनन्द हुआ । गरुड़जी सत्यगुरुका ज्ञान पाकर योग्य हो गए । पीछे सत्यगुरुकी आज्ञा लेकर तीनों देवताओंके निकट गये, पहले ब्रह्मासे मिले । ब्रह्माने देखा कि, गरुड़जी आते हैं तब प्रतिष्ठा सहित उठ खड़े हुए । यह बात उस समयकी हैं जब सभा विसर्जन हो चुकी थी, सब लोग अपने अपने घरको चले गये थे । जब ब्रह्माने देखा कि, गरुड़जी आते हैं, तब ब्रह्मा स्वागतके निमित्त उठे और बड़ी प्रतिष्ठा तथा मर्यादा की । जब गरुड़जी आसनपर बैठ गये तब वार्तालाप होने लगी । गरुड़जीने कहा कि, हे ब्रह्मा ! सत्यगुरुकी भक्ति मिले बिना कदापि मुक्ति न मिलेगी । करोड़ों बार सब उत्पन्न होते और मरते हैं उनकी मुक्ति कदापि नहीं होती । हे ब्रह्मा ! सत्यगुरुकी दया बिना आवा-गमनके दुःखसे कदापि कोई नहीं छूट सकता ।
चौ०—अस्थिर योग न काहू पाई । कोटि ऋषीश रहे भरमाई ॥
कोटि रुद्र औतार जो लीन्हा । अविगत पुरुष न काहू चीन्हा ॥
गण गंधर्वकी कौन चलावे । सनकादिक शुक्रदेव भुलावे ॥