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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

ईसाई धर्म

दौलत जहाँ पर जावे, अन्धा उसे बनावे ।
दुख दन्दः कर दिया है, यह दौलत और दुनिया ॥
इसको जा छोड़ भागे, तब राम रंग लागे ।
दिल गन्द कर दिया है, मह दौलत और दुनिया ॥
दौलत करे जो घेरा, वहाँ होवे तेरा मेरा ।
जम बन्द कर दिया है, मह दौलत और दुनिया ॥
इससे है देहका सुख, जाय तो हो दिगर दुख ।
दह चन्द्र कर दिया है, यह दौलत और दुनिया ॥
यह भगतीको नसावे, फिर नरकमें बसावे ।
बुद्धि मन्द कर दिया है, यह दौलत और दुनिया ॥
दुनियासे कार दुनियाङ्क आज़िज और न गहना ॥
फर फन्द कर दिया है, यह दौलतो दुनिया ॥

तरजीअ बन्द ।

सब जाय खुद खुदाय, और नहीं है ।
नहीं ढूँढ़े उसे पाय, हर पूर नहीं है ॥
तदबीर करो लाख, वहाँ दौर नहीं है ।
वह दौरमें शीशः बिल्लौर नहीं है ॥
साधुके निन्दकको, कहीं ठौर नहीं है ॥ १ ॥
अन्धे बचार चश्म, साधु निन्दक चेत ।
सो दोज़खमें जाय, खाँय गीते केते ॥
जब्बार धरमराय, पकड़ लेखा लेते ॥
हैबान बशकल नर, जो फ़िक्र गौर नहीं कीते ॥
साधुके निन्दकको, कहीं ठौर नहीं है ॥ २ ॥
साहबको देख बेशक, है वह साधु जंगलमें ।
इस अस्लको ढूँढ़, देख जाय नकलमें ॥
पहचानता तू नहिं, न आवे तेरी अकलमें ।
न इल्म है इनसानकी, यह तौर नहीं है ॥
साधुके निन्दकको, कहीं ठौर नहीं है ॥ ३ ॥
साधु साहब हैं एक फ़र्क नहीं है ।
हर जा में वही गर्ब और शर्क नहीं है ॥
इस वृक्षमें फल फूल, कोई नूर नहीं है ।
बिन साधु गुरु ज्ञानी, ध्यान गर्क नहीं है ॥

साधुके निन्दकको कहीं ठौर नहीं है ॥ ४ ॥
साधुकी निन्दासे धरम करम नाश हो ।
साधुकी निन्दा से घोर नरक बास हो ॥
साधुकी निन्दा न मिहर रब्ब की आस हो ॥
साधुकी मिहर, आजिज, जम जौर नहीं है ॥
साधुके निन्दक को कहीं ठौर नहीं है ॥ ५ ॥

मुरब्बा भौरा ।

पिया परदेस क्या भौरा भयोरी ।
तु गाफिल होके सोई क्यों है बारी ॥
तु हरदम ताक बैठी अपनी पूरी ।
तु सतगुरुसे न क्यों करती चिरौरी ॥ १ ॥
कोई पायक पिया की खबर दे ।
विरहिनि जिसके बदले अपना सिरदे ॥
मेरी प्रीतमकी पाती आन धरदे ॥
तु सतगुरुसे क्यों न करती चिरौरी ॥ २ ॥
कोई मोहि प्राण प्यारेसे मिला दो ।
कि मुझ मुर्दा विरिहिनीको जिला दो ॥
जो गुल कुम्हालाया है सो फिर खिला दो ।
तु सतगुरुसे न करती क्यों चिरौरी ॥ ३ ॥
उसी सतगुरुकी सब कुदरत जहाँमें ।
वही हाजिरो दंरपरदः निहॉयें ॥
वही देखते जमीन् और आस्मोंमें ।
तु सतगुरुसे न क्यों करती चिरौरी ॥ ४ ॥
मेरे साहब, मैं तेरे पायलागी ।
तेरी कृपासे मेरी भाग जागी ॥
तेरेही मिहर आजिज हो सुभागी ।
तु सतगुरुसे क्यों न करती चिरौरी ॥ ५ ॥

तरजीयबन्द खम्सः कौआ ।

होके नाकारा तो पड़ते भूलौआ । दवें आराम हाड़ और चाम चौआ ॥
बनावे बात क्या वक़्ते चलौआ । अमरफल छोड़कर क्यों हो कोह कौआ ॥
तुझे हरिनामसे क्या काम कौआ ॥

पढ़ाकर वेद और काँकौ किया कर । खोरिशे नापाक खा करके जिया कर॥
कुतुब ख्वानीसे अपना दिलदिया कर । किधर आदम गया है और हौआ॥ तुझे
कि जिसने तुझको यह पोशिश दिया । न उस फर्माबरी कोशिश किया है ॥
तेरी खोरिश और आदत सब छिया है । कहेगा क्या जब आवे बुलौआ ॥ तुझे
सीखा तूने जो हुशियारी जहाँकी । खबर तुझको न इसरारे निहाँकी ॥
न परवाह तुझको आजिजके ब्यौकी । पड़े सिरके ऊपर तेरे ो पौआ॥ तुझे०

तरजिअ बन्द खम्साः (गुरुसेवा) ।

बना आदमका पुतला आवे वतीसे । खबर क्या इसको है नफते आपसीसे ॥
यह घेरा चार सू शैताने लयोसे । निगहकर अपनी इल्ममें दूरबीसे ॥

हैं सब नेअमत गुरु । खिदमत यकीसे ॥

पयम्बरपीर सदहा जो गुजरते । ऋषि मुनि ओलिया सब कहते मरते ॥
न गलती अपनी पर जो ध्यान धरते । खबर जिनको न बिलकुल कालकी से ॥

हैं सब नेअमत गुरु । खिदमत यकीसे ॥

हरीसे मप्स हैं बे इल्मानी । न इनको कुछ खबर घर जावेदानी ॥
हुई उनपर न मुशिद मिहरबानी । उठाले हाथ तू दुनिया वदीसे ॥

हैं सब ने अमत गुरु खिदमत यकीसे ॥

खबर नहीं जो खबर दारान आलिम । कहाँसे है नुमाँया नफत जालिम ॥
जो पैदा जग बचा कोई न सालिम । खबर तू पूछ अज्ज गोशेः गुजीसे ॥

हैं सब नेअमत गुरु खिदमत यकीसे ॥

कोई दिलगीर दिलबरकी खबर दे । कि जिसके बदले आशिक अपना सिरदे ॥
हैं जिनसे बात होती है न परदे । खबरको पूछले खातिर हजीसे ॥

हैं सब नेअमत गुरु खिदमत यकीसे ॥

न जाने भेद जो बातें बनाते । न भूले साधु लुच्चोंके भुलाते ॥
न आशिक कान उनके रख लगाते । तुझे क्या काम कोई नुकतः चीसे ॥

हैं सब नेअमत गुरु खिदमत यकीसे ॥

तू अपने रङ्गमें रंगा सदा रह । जगतसे पीठरु खुदबा खुदा रह ॥
फिराके यारके गमसे लदारह । तुझे क्या काम आजिजई व आँसे ॥

हैं सब नेअमत गुरु खिदमत यकीसे ॥

गञ्जल (चींटी) ।

ज्वलीरा क्या जमा करती है चिउँटी । तु किसके वासते धरती है चिउँटी ॥
नहीं जब तू ज्वलीरा यह कहाँ है । बिला गाहकमें क्यों मरती है चिउँटी ॥