सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

" ईसा

नवचक्रं प्रकीर्तितम् ॥ द्वादश ब्रह्मगुह्यस्थानं शिरस्थानेति वर्णनम् । सूर्य्यकोटि-प्रतीकाशम् । तेजस्विनी दीप्तप्रभा, शिवदेवता, मूलमाया शक्तिः, परमात्मा ऋषिः, अध्वनि स्थितिः, नादात्मकान्यक्षराणि, अघोर मुद्रा, सूक्ष्मा प्रकृतिः, देहात्मनो गोचरध्वनिरपंचविस्मेशानरस्तरात्मा निलेप १ लय २ लक्ष ३ ध्यान समाधिः ४ ॥

अर्थ-पहिले ब्रह्मा सहज है उससे शून्य है । शून्यसे ईश्वर है । ईश्वरसे जगत् बल तथा सामर्थ्य है । इसीसे प्रकृति है । प्रकृति और पुरुषके बीच कारण रहता है । इस कारणके आगे महान् रहता है । उसके आगे अहङ्कार है । उससे पाँच तन्मात्रा प्रकट हुई पाँच तन्मात्राओंसे पंचमहाभूत, पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, आकाश उत्पन्न हुए । इनसे समस्त संसार हुवा । परमात्माको नमस्कार करके नौ चक्रोंका वृत्तान्त करता हूँ- बारह महासिद्ध चक्र हैं जिसमें करोड़ों सूर्य्यके समान प्रकाश है उसका विवरण करता हूँ-शिव देवता है । मूल मायाशक्ति है । परमात्मा ऋषि है । अध्वमें स्थिर है । नादात्मक शब्द है । अघोर मुद्रा है । सूक्ष्मा प्रकृति है । देहमें जो आत्मा है उससे सम्बन्ध रखनेवाली आवाज है, लय, लक्ष्य, ध्यान, समाधि इन पाँच आवाजोंका ईश्वर है । वह आत्मा निलेप है ।

ॐ ब्रह्मरंध्र देहसुषुम्णा मार्गसुषुम्णा अवस्था ऊर्ध्वप्रयोगात्माहं ब्रह्मरंध्रेति अग्निचक्रे सकारो भवति । ब्रह्म रन्ध्र जो देहमें सुषुम्णा है, सुषुम्णा राह है । अवस्था, ऊपरको है कामना जिसकी ऐसी अहम् परहम है । तेज चक्रमेंसे बीज प्रकट होता है । इसे सहस्रदल मानते हैं । यह सबकी हृद है इसके बाद बस अखण्डानन्दकाही समुद्र है । दूसरा कुछ न होनेके कारण उसे शून्य कहा है

ॐ एकादशसहस्रदलचक्रं मूर्ध्न स्थानं, गुरु देवता, चैतन्या शक्तिः विराट्, ऋषिः, सर्वोत्कृष्टः साक्षीभूतः तुरीयातीतो गुणातीतः चैतन्यात्मकः सर्ववर्णः सर्वमात्रा सर्वदा विराट् देहस्थित्यवस्था प्रज्ञा वाचा सह वेद अनुपमम् अस्थानम् अजपाजापं एकसहस्रं १००० घटिका २ पल ४ अक्षर ४ सोहं संख्या ३२१६०० एकविंशतिसहस्राणि षट्शतानि तथैव च । शशाहे वहते प्राणा सर्वकाले विनश्यति । सकारेण बहिर्याति हकारेण विशेष्युतः । सोऽहं सोऽहं ततो मंत्रं जीवो जपति सर्वदा ॥ ॐ आधारलिगनाभौ हृदयसरसिजे जालमूले ललाटे द्वे पत्रे षोडशारे द्विदशदशदले द्वादशारे चतुष्के ॥ वासांते नालमध्ये इह कंठसहिते कंठदेशे सुराणां हंसं तत्त्वार्थयुक्ते सकलदलयुतं वर्णरूपं नमामि ॥

ग्यारहवें सहस्र पत्तोंका कमल जो ऊपरके स्थानोंमें ही है गुरु देवता है । चैतन्या शक्ति है । विराट् ऋषि समस्त श्रेष्ठोंका श्रेष्ठ सबका साक्षी है । तुरी

यातीत अवस्था तथा तीनों गुणोंसे पार है चैतन्य स्वरूप है समस्त अक्षरों तथा मात्रोंसे संयुक्त सदैव विराट् स्वरूप है । बडे ज्ञान तथा बुद्धिके साथ है । प्रशंसासे परे स्थानवाला अजपा जाप एक सहस्र दो घडी दो पल तथा चार अक्षर । सोहम् काश्मा इक्कीस सहस्र छः सौ, एक दिवसमें इतने प्राण चलते हैं । सकार करके प्राण भीतर जाता है । हकार करके बाहर आता है । मैं वह हंस हूँ उसके बीच मंत्रको जीव सदैव जपता है और कमलके मध्यमें लिंग नाभिका स्थान है और फिर बाईस पत्तोंका कमल है कण्ठपर सोलह पत्तोंका कमल है । इसमें उसका स्थान है जिसको जपना है, देवताओंके स्थानोंमें ठीक तात्पर्यसहित और समस्त वर्ण तथा स्वरूपको मैं नमस्कार करता हूँ । यह सहस्र पत्तोंका कमल है और इसकी नालऊपरको है । कमलका शिर नीचेको है । योगी लोग छः चक्रोंको भेदकर उसी चक्रपर जाके अधिकृत होते हैं । यह आदि शक्ति तथा निरंजनके रहनेका स्थान है और उत्पत्ति स्थित तथा विनाशका मुख्य कारण है । इसीपर समस्त रचना निर्भर है । यहाँ सिद्ध पुरुषका स्थान तथा इसे सौ दलकाही दूसरे योगी मानते हैं ।

ॐ दशमें पूर्ण गिरि पीठ ललाटमंडले चन्द्रो देवता अमृता शक्तिः परमात्मा ऋषिः
द्वारविशदलानि अमृता वासिनि कला सुरति अमृतकल्लोला नदीमहाकाल अंबिका
१ लंबिका २ घंटिका ३ तालिका ४ । देहस्वरूपं काकमुखं १ नरनेत्रम् २ गोभृंगम्
३ ललाट ब्रह्मपुरम् ४ हयग्रीवं ५ मयूरपुच्छं ६ हंसवत् पादाः ७ स्थानचारी ८ ॥

ओम्—दशवें पूर्ण गिरिपीठ और ललाटमण्डलमें चन्द्र उसका देवता है । अमृता शक्ति है । परमात्मा ऋषि है । बाईसपत्तोंका कमल है । अमृतके बीच रहनेवाली कला है । धाररूपरसमें नदी है । महाकाल १—अम्बिका २—लम्बिका ३—घण्टिका ४—तालिका । देहका स्वरूपकाग जैसा मुंह है आदमी जैसी आँखें हैं गाय जैसी सींग है माथा ब्रह्मपुर, घोडेकीसी ग्रीवा, मयूरकीसी पुच्छ हंसकैसे पाँव, एवं अपनी जगहमें फिरानेवाला है इसे अमृत पूर्ण चक्र भी कहते हैं । शि० इसके चौसठ दल मानते हैं । ॐ नवमे आज्ञाचक्रं भ्रुवोः स्थानं पीतवर्णं अग्निर्देवता सुषुम्णा शक्तिः हंस ऋषिः चैतन्यवाहन ज्ञानदेही विज्ञान अवस्था अनपूमा वाक् सुषुम्णा चैतन्यं शून्यं निरांभ द्वैदल अंतर मात्रा हहं वहिर्मात्रा २ स्थितिः १ प्रभाली २ अजपाजाप एक सहस्र १००० घटिका २ पल ४ अक्षर ६ प्रसाद लिंग ४ द्वै मात्रे आकारो तत्त्वं जीवहंसः ४ पूजामानसिक सोहंभावेन पूजयेत् अत्रगंधादिसमर्पयामि नमः ॥ नवमा आज्ञा चक्र—भौके बीचका स्थान, पीला रङ्ग, अग्नि देवता, सुषुम्णा शक्ति, हंस ऋषि, अनूपम

वाक् चैतन्य वाहन, ज्ञान देह, विज्ञान अवस्था, सुषुम्णादेव, चैतन्य शून्य, निरारंभ द्वैदली यानी अनारम्भ द्वितीय, भीतरी मात्रा दो। बाहरली मात्रा दो, स्थित तथा प्रकाश, अजपा जाप एक सहस्र। घडी दो, पल छियालिस हर्ष चिन्ह, द्विमात्रा अकार, तत्त्व जीवहंस, पूजा मानसी, सोहम् भाव करके पूजे सुगंधि इतर इत्यादिसे मैं पूजा करता हूँ। ॐ अष्टमे बलवान् चक्रं नासिकास्थानं ओंकारो देवता पुसुषुम्णा शक्तिः विराट् ऋषिः त्रिवर्णीद्विदल त्रिमात्रा अकार उकार मकार सत्त्वगुण रजोगुण तमोगुण ब्रह्माविष्णुरुद्राः पृथ्वी अप तेज वायु आकाश प्राण अपान समान ध्यान उदान ५ शब्द स्पर्श रूप रस गंध ५ नाग कूर्म कुकल देवदत्त धनंजय ५ मन बुद्धि चित्त अंतःकरण अहंकार ५ इडा पिगला सुषुम्णा ॥ ओम् आठवें बलवान् चक्र नाकके स्थानमें है। ओंकार देवता, शुम्णा शक्ति, विराट् ऋषि, तीन अक्षर, दो पत्ते, तीन मात्रा, अकार, उकार, मकार, सत्त्वगुण, रजोगुण, तमोगुण, ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु आकाश, प्राण, अपान, समान, उदान, ध्यान, शब्द, रूप स्पर्श, रस, गंध, नाग, कूर्म, कुकल, देवदत्त, धनञ्जय, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, अन्तःकरण, इडा पिगला सुषुम्णा ॥

ॐ सप्तमम् विशुद्धचक्रं कण्ठस्थानं ध्रुववर्णं जीवो देवता आद्या शक्ति विराट् ऋषिः वायुवाहन उदान वायु ज्वाला काला ज्वालाग्निवेदः महाकारण देह तुरीया अवस्था परा बाचा अथर्वण वेद जंघ पलङ्ग समता भूमिका सालोक्यता मोक्ष षोडशदलानि १६ षोडश मात्रा १६ अ आ इ ई उ ऊ ऋ ॠ लृ ॠ ए ऐ ओ औ अं अः अंतर मात्रा १६ बहिर्मात्रा १६ विद्या १ अविद्या २ इच्छा ३ क्रिया ४ ज्ञानशक्तिः ५ भूतल ६ महाविद्या ७ महामाया ८ बुद्धि ९ तामस १० मन्त्र ११ मात्रायणी १२ कुमारी १३ रौद्री १४ पुस्ता १५ सिंहिनी १६ अजपाजापमेक सहस्र १००० घटिका २ पल ४ अक्षर ४० पूजा मानसिका सोहंभावेन पूजयेत अत्र गंधादिसमर्पयामि नमः ॥ ओम् सातवें विशुद्धचक्र है, यह ध्रुवेके रङ्गका है। जीव देवता है आदि शक्ति है विराट् ऋषि है वायु वाहन है उदानवायु है ज्वालाकला है। ज्वाला अग्निवेद है महाकारण देह, तुरीया, अवस्था, परा, बाचा, अथर्वणवेद, जंघ, पलंग, समता भूमिका, सालोक्यता मोक्ष, सोलह पत्ती, सोलह मात्रा इत्यादि ॥ अ आ इ ई उ ऊ ऋ ॠ लृ ॠ ए ऐ ओ औ अं अः ये सोलह बीज हैं। भीतरी मात्रा सोलह। बाहरी मात्रा सोलह। विद्या, अविद्या, इच्छा, क्रिया, ज्ञान, शक्ति, भूतल, महाविद्या, महामाया, विधि, तामस, यज्ञ मंत्र, मात्रायणी, कुमारी, रुद्र, पुष्टता, सिंहिनी। अजपा-

जाप एक सहस्त्र, घड़ियाँ दो, पल चार, अक्षर चालीस, पूजा मानसी, सोहम् भावकरके पूजना और सुगंधि इत्यादिसे मैं पूजता हूँ यह कहना ॥ ॐ षष्ठम् अनाहदचक्रं हृदयस्थानंश्वेतवर्णं तमोगुणं मकार गुरु देवता तमाशक्तिः हिरण्यगर्भ ऋषिः नन्दी वाहन प्राणवायु ज्योतिः कला कारण देह सुषुम्णा अवस्था वसन्ती वाचा सामवेद गाहृपत्याग्नि शिवलिङ्गंप्राप्ता भूमिका सायुज्यता मुक्ति द्वादशदल १२ द्वादश मात्रा १२ क ख ग घ ङ च छ ज झ ञ ट ठ बहिर्मात्रा २१ रुद्राणी १ तेजसा २ तापिनी ३ सुखदा ४ चैतन्या ५ शिवा ६ शान्ती ७ तमा ८ गौरी ९ मातरः १० ज्वाला ११ प्रज्वालिनी १२ देवता अजपाजापषट् सहस्त्र ६००० घटिका १६ पल ३७ अक्षर ४ पूजा मानसिका सोहं भावेन पूजयेत् अत्र गन्धादिसमर्पयामि नमः ॥ ॐ छवा अनाहद चक्र है इसका रङ्ग श्वेत है । तमोगुण मकार है । गुरु देवता, तमा शक्ति, हिरण्यगर्भऋषि, नन्दी वाहन प्राणवायु, ज्योतिःकला, कारणदेह सुषुम्णा, अवस्था वसन्ती, वाचा सामवेद, गाहृपत्यअग्नि, शिवलिङ्ग, प्राप्ता भूमिका, सायुज्यता मोक्ष, बारह यती, बारह मात्रा १-रुद्राणी २-तेज ३-तापिनी ४-सुखदा ५ चैतन्या ६-शिवा ७-शान्ति ८-तमा ९-गौरी-१० मात्रा ११-ज्वाला १२-प्रज्वालिनी देवता अजपा जाप-छः सहस्त्र सोलह घड़ी, सत्तीस पल । अक्षर चार । पूजा मानसी है । इसे सोहम् भावनासे पूजे, तथा यों कहे कि, गन्ध इतर आदिसे मैं पूजता हूँ । ॐ पञ्चमं मनो चक्रं मनो देवता बुद्धिशक्तिः आत्मा ऋषिः नाभिमध्ये स्थितं पद्मनालं तस्य दशांगुलम् ॥ १ ॥ कोमलं तस्य तन्त्रालं निर्मलं चाप्यधोमुखम् । कदलीपुष्पसंकाशं तन्मध्ये चाप्यधिष्ठितम् ॥ पूर्व दलं श्वेतवर्णं यदा विश्रमते मनः ॥ तदा धर्मणिकीर्त्ता च पुरुषस्य मतिर्भवेत् । अग्रं दलं रक्तवर्णं यदा विश्रमते मनः । तदा निद्रालस्येच पुरुषस्य मतिर्भवेत् ॥ २ ॥ दक्षिणं दलं कृष्णवर्णं यदा विश्रमते मनः । तदा क्रोधमात्मनिमतिर्भवेत् ॥ ३ ॥ नैऋत्यां दले नीलवर्णं यदा विश्रमते मनः । तदामतिर्भवेत्तस्य धनदारादिपुत्रके ॥ ४ ॥ पश्चिमे दले कपिलवर्णं यदा विश्रमते मना । तदा वै तस्यपुरुषस्य नन्दोत्साहमतिर्भवेत् ॥ ५ ॥ वायव्यं दलं श्यामवर्णं यदा विश्रमते मनः ॥ तदा वै तस्य पुरुषस्य उच्चाटनमतिर्भवेत् ॥ ६ ॥ उत्तरे दले पीतवर्णं यदा विश्रमते मनः ॥ तदा वै तस्य पुरुषस्य कामहास्यमतिर्भवेत् ॥ ७ ॥ ईशाने दले गौरवर्णं यदा विश्रमते मनः ॥ तदा वै तस्य पुरुषस्य क्षमा ज्ञानं मतिर्भवेत् ॥ सन्धि सन्धिविदोषवात पितादयः अत्रगन्धादि समर्पयामि नमः ॥ ॐ पाँचवा मनोचक्र है, मन देवता, बुद्धि शक्ति, आत्मा ऋषि है, नाभिके मध्य रहता है । पद्मनाल दश अंगुल है । बहुत नरम तथा स्वच्छ है ।