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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

इक्कीसवां हिदायत नामा

तुम्ही मसजिद-व बुत खानः में बैठा । तुही सब जीवके अन्दर है पैठा ॥
तु नफसानी हवा आलम में छोड़े । तुम्ही फिर आप अपनी बाग मोड़े ॥
अमल के दामको तूने बनाया । नहीं और अमरमें सबको फँसाया ॥
फसे जिस हालमें सब रुहे मुरगा । न पहचाने कोई कौले बजुरगों ॥
रजा और बीमकी दो मेख मारा । मुसल्लम दामको उस पर पसारा ॥
बहर किस्मे हवस लज्जात दाना । फँसे आ जिस ऊपर मुर्गं जमाना ॥
कहीं भगवा तिलक कण्ठी है माला । कहीं खुद भेष घर बैठे निराला ॥
कहीं यह दिल हुआ हिन्दू मुसलमां । कहीं जिन्नो परी और हूरोगिलमा ॥
कहीं औतार धर अल्ला कहावे । कहीं हरि भगत हो हरिगुणको गावे ॥
कहीं फासिक मुहब्बत यार खाली । कहीं आशक हुया रोडा जलाली ॥
बहरसू देखिये दिलका तमासा । जहाँ कौनेन पानीका बतासा ॥

इस गजलमें चित्तकी सर्वोत्कृष्ट महत्ता वर्णन की है कि, खुदा आदि सब कुछ तू है ।

इस चित्तके इतने नाम हैं—मन, चित्त, अहंकार, स्वातः; जब मनुष्यका मन राग द्वेषमें फँसता है तब नसोंमें विभिन्नता आजाती है । जो नसें रक्त तथा वीर्य स्थान स्थानपर पहुँचाती हैं, उनमें दोष आजाता है । जैसे बादशाहके दुःख अथवा क्रोधसे समस्त सैन्य क्रोधाग्निवत होती हैं अथवा दुःखी होती है, उसी प्रकार मनमें विभिन्नता आनेसे समस्त नसोंमें विभिन्नता आजाती है । तब दोनों प्रकारके रोग होते हैं क्योंकि, नाडियोंमें विभिन्नता पड़नेसे अन्न नहीं पचता, कच्छा रह जाता है तब शारीरिक रोग और मानसिक चिन्ता घेरती है ।

जीव, मन, चित्त, बुद्धि, अहंकार यह सब अशुद्ध चित्तका नाम है । जितना दृश्य दिखाई देता है वो सब मनका रूप है । मन तथा कर्म दोनों समान स्वरूपके हैं । जब मन वशमें आता है तब समस्त कर्म भरम मिट जाते हैं । यह मन ब्रह्म शक्तिका बल है, इस कारण ब्रह्म और मनमें कुछ विभिन्नता नहीं । इस मनहीकी गतिसे देवता राक्षस हो जाते हैं और राक्षस देवता बन जाते हैं । मनुष्य नाग, नाग मनुष्य, पुरुष स्त्री, स्त्री पुरुष, पुत्र पिता और पिता पुत्र हो जाते हैं । जैसे तमाशा करनेवाला शीघ्रतापूर्वक भांति भांतिके रूप दिखाता है फिर पलट लेता है । कबूतर जिस प्रकार गिरह मारता जाता है, उसी तरह आवागमन भी होता जाता है । जब मन विषय वासनासे विरक्त होता है तब मनहीसे मन मुरदा हो जाता है जैसे ठण्डा लोहा गरम लोहेको काट डालता है ।

यह मन कालपुरुष है, समस्त संसारको इसने भटकाकर खा लिया है। पर जब यह भक्तिकी ओर ध्यान देता है तब परमपदको पहुँचा देता है, अपने यथार्थसे संयुक्त कर देता है। सुतरां दत्त, दिगम्बर, दुर्वासा, नारद, गोरखनाथ, मीराबाई इत्यादिको सत्यगुरु मिल गये जिससे उनका कार्य सिद्ध हो गया। जब मनुष्यका सुकर्म पूर्णताको पहुँचता है तब सत्यगुरु प्राप्त हो मनुष्योंको यथेष्ट स्थानपर पहुँचा देता है। ग्रन्थ कबीर वाणी तथा अन्यान्य ग्रन्थोंमें लिखा है कि, जब कबीर साहब झांझरी द्वीपको गये, तब उस समय कालपुरुषने कबीर साहबसे कहा कि, आप अपनी देह मुझको दे। कबीर साहबने कृपा करके अपनी देह उसको देदी। इस कारण कालपुरुषके पास दोनों देह हैं। जब चाहे तब अपनी देह दिखावे और जब चाहे तब सत्यगुरुकी देह धारण करे। बे शिरकी देह कालकी है और माथा सहित देह कबीर साहबकी है जो उसको प्रदानकी गयी है। परिणाम यह है कि, जो कोई भजन और तपस्याको उच्चश्रेणीपर पहुँचाता है और उसका प्रेम सच्चा होता है तो उसी कालकी मूर्तिमेंसे दयालु सत्यगुरु निकलकर जीवका कार्य सम्पूर्ण कर देते हैं। इस कलियुगमें मनुष्यसे सुकृति और भजन भक्ति पूर्ण नहीं हो सकते; इस कारण उसे सत्यगुरुकी शरण ग्रहण करना आवश्यक है। शरणका कर्तव्य पूर्ण करनाही शुभकर्मकी अवधि है। अपने शरीरकी आशा पूर्णतया छोड़ दे। दिनरात भजन तथा ध्यानमें निमग्न हो जावे, अपने शरीरको तुच्छ समझकर अपने प्यारे के मिलनेके अनुरागमें विह्वल होकर प्रार्थना करे। जब पूर्ण विरहमें निमग्न हो जावेगा तो एक न एक दिन उसे अवश्य दर्शन होगा।

शब्द- गुलतान मता जब आवेगा तब जिवड़ा सुख पावेगा,।
आचार विचार छुटे या जिवका दुर्भति दूर नसावेगा ॥
मायामोह भरमका बादल परदा खोल बहावेगा।
पाँचपचीस करो सब अपने सद्गुरु शब्द लखावेगा ॥
रहनि गहिनकी नाव सँवारो तब भव पार सिधावेगा।
हंस सुजन जन बहुरि मिलैंगे साहबके गुण गावेगा ॥
अमरलोक अमृतकी काया तहाँ बड़ा सुख पावेगा ॥
कहैं कबीर सुनो भाई साधो यह तत् बिरला पावेगा ॥

इस प्रकार प्रेममें मग्न होनेसे सत्यगुरुका दर्शन होता है यदि कोई कहे कि, जब इस प्रकारकी निमग्नता हुई तब आपसे आप काम हो जावेगा फिर सत्यगुरुका क्या काम है। उसे जानना चाहिये कि, कितनाही भजन क्यों न करे,

पर सत्यगुरुकी कृतज्ञता न हो तो छुटकारेका ढंग न होगा, क्योंकि, सहस्रोंने बहुत प्रेम किया, सत्यगुरु उनको मिले भी पर उनके मनमें घमण्ड रहा । वे सत्य-गुरुके चरणके धूल न हुये इस कारण संसारमें ही फँसे रहे ।

शब्द—मनरे तू मनही उलट समाना ।

गुरु परताप अल्क भइ तोको नातो था अज्ञाना ॥

नियरेतं दूर दूरते नियरे जो जैसे अनुमाना ।

आलूते कोचढोमिलवेड़ा जिन रहे पियातन जाना ॥

उलटि कमल षट्चक्रहि वेधै सहज शून्य अनुरागी ॥

आवेन जाय मरे नहिं जमने ताही को कहो जो बैरागी ॥

बंकनालकी सुधिकर वौरे मेरुदण्ड कर छाजा ।

गरजे गगन मन शून्य समाना बाजे अनहृद बाजा ॥

या मनले केते अरुझाने शिव सनकादिक ब्रह्मा ।

खोजत खोजत पार न पायो अगम अपार याकी महिमा ॥

यह मन मस्त बसे बन कुञ्जर शून्य सकल बन खाया ।

जब वश पन्यो महावत केरे अङ्कुकुश दे मुरकाया ॥

जो मन कहो जो तू काहे को संशय जिन खोजा तिन पाया ।

रहे समाय अभय सागरमें बहुरि न भवजल आया ॥

अनुभव कथा कौनसे कहिये है कोई सन्त विवेकी ॥

कहैं कबीर गुरुदया है पलीता सूझल विरले देखी ॥

यथा—मन तू थकत थकत थकि जाई ।

बिन थाके तेरो काज न सरि है फिर पीछे पछताई ॥

जबलग तू सजीव रहत है तब लग परदा भाई ।

टूट जाय ओट तिनकाकी जो मन शिखर ढहाई ॥

सकल तेज तज होय नपुंसक या मत सुन तू मेरी ।

जीयत मृतक दशा विचारे पावे वस्तु घनेरी ॥

याके परे और कछु नाहीं या मत सबसे पूरा ।

कहैं कबीर मार मन मैगल होय रहो जैसे धूरा ॥

जिस मनुष्यको अपनी कामनाओंको छोड़ना कठिन है वह वासनाओंका कीड़ा है । कामनाओंके पूर्ण करनेसे मन मोटा हो जाता है स्थूल होकर ऐसा बलवान् हो जाता है कि, फिर बशमें नहीं आता । जब मनुष्य कामनाओंको छोड़ देता है जिस पदार्थ पर मन जाय उसको स्वीकार नहीं करता तब यह मन मुरदाके समान होजाता है ।

इस मनको यों मारना चाहिये कि, वाँछित पदार्थकी ओर गति न करने पावे। अन्तरही अन्तरगति करके रह जाय, बहिर्गत न होने पावे। जो इच्छा मनमें उठे उसको रोके तब मन शान्त हो जाता है, यह मन शून्य स्वरूप है। संकल्प विकल्पहीका नाम मन है और चिन्तन करनेसे यह चित्त कहलाता है। जब प्राण स्फुरता है तब मन प्रगट होते हैं उसीसे संसारकी उत्पत्ति होती है। इस चित्तके दो बीज हैं—एक तो प्राणोंकी गति और दूसरे वासनाका चलायमान होना। कुण्डलिनीके शब्दसे जो शब्द उत्पन्न होता है, वही मन है वो हृदय आकाशसे निकलता है और बाहर जाता है। बाहरसे भीतर आता है वही प्राण है जिसमें मन विराजमान है और कामनाओंके कारण देश देशमें फिरा करता है।

पाँच वृत्ति

इस मनकी पाँच वृत्ति अर्थात् अवस्थाएँ हैं—प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा, स्मृति इनका लक्षण योग शास्त्रमें किया है। अब उन पाँचोंका विवरण सुनो—

१ प्रमाण—प्रमाके साधनको प्रमाण कहते हैं। इसमें यथार्थ ज्ञानका नाम प्रमा है, इसके जो प्रत्यक्षादि साधन हैं वे सब प्रमाण कहलाते हैं।

२ विपर्यय—मिथ्या ज्ञानका नाम है यानी जो जिस रूपका हुआ हो वो वास्तवमें उस रूपमें प्रतिष्ठत न हो किन्तु भ्रमसे हो रहा हो।

३ विकल्प—जो पदार्थ शशशृंगकी तरह वास्तवमें न होकर भी शब्दकी शक्तिकी महिमासे प्रतीत हो रहा हो।

४ निद्रा—सब इन्द्रियोंके विषयोंके अनुभवके अभावके कारण तमका अवलंब करनेवाली वृत्तिका नाम नीन्द है क्योंकि, जब मनुष्य उठता है तो उसे सुषुप्तिकालके तमका अनुभव होता है।

५ स्मृति—अनुभव किये हुए विषयको उद्घोधकके व्यापारसे फिर हृदयमें उपस्थित हो जानेको कहते हैं।

ये पाँचों वृत्तियाँ किलष्ट और अकिलष्ट भेदसे दो दो प्रकारकी हैं। जब ये परमात्माकी तरफ दौड़ने लगती हैं तो ये अकिलष्ट कहलाने लगती हैं। निम्नलिखित शब्दमें कबीर साहिबने मनका सर्प तथा उनकी पाँचों वृत्तियोंको पाँच फन कहा है यह नीचेके दो टुकड़ोंसे झलकता है।

शब्द—बिछुवा कैसे रहे बन ठनके

बिछुवा वीर विषय रस बोरी शुद्ध हरी हरिजनके ॥

द्विज कन्या गुरु कीन्ह अरब सुत लै चौबीस मत मनके ॥