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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

अन्तर्धान होनेकी कथा

मूसा और अलियास उससे बातें करते उन्हें दिखाई दिए । (४) ए परमेश्वर ! हमारे निमित्त यहाँ रहना अच्छा है । यदि इच्छा हो तो हम यहाँ तीन डेरे बनावें । एक तेरे और एक मूसा और एक अलियासके निमित्त । (५) वह यह कहताही था कि एक प्रकाशमय बादलने उनपर साया कर दी, इस बादलसे एक आवाज इस विषयकी आई कि, यह मेरा प्यारा बेटा है जिससे मैं प्रसन्न हूँ । तुम उसकी सुनो (६) शिष्य यह सुनकर मुहँके बल गिरे अत्यन्त भयभीत हुए । (७) तब मसीहने इन्हें छूकर कहा कि, उठो भयभीत मत हो । (८) पीछे उन्होंने अपनी आँख उठाकर मसीहके अतिरिक्त और कुछ नहीं देखा ।

वह तो हजरत ईसाने अपना प्राकृतिक स्वरूप अपने शिष्योंको दिखल-लाया था ।

प्रगट हो कि, सब वह अवतार इसी निरञ्जनके हैं । जो उसके मुख्यपुत्र कहलाते हैं । इन ऋषीश्वरों सिद्ध साधुओं पीर पैगम्बरोंको बड़ा बल होता है परन्तु इनको न तो अपने प्राकृतिक स्वरूपकी सुध रहती है । न अपना आवागमन बन्द करनेकी युक्ति मालूम है । ये सब अवतार निरञ्जनके पुत्रोंके हैं और अपने पिता विराटके स्वरूपमें हैं ।

यह विष्णु सबमें बादशाह है । इस बादशाहके पास युद्धका समस्त समान है । इसके पास पाञ्चजन्य शंख है । जब वह समरके निमित्त चढ़ता है तब पाञ्च जन्य शंख फूंक डंका बजाकर चढ़कर युद्ध करता है । वास्तवमें इसे कोई कामना नहीं । भक्तोंके उद्धार तथा संसारी जनोंके बोधके लिये ऐसा किया करता है ।

भगवान् विष्णुके विषयमें कबीर साहिबजी कहते, चले आ रहे हैं कि सत्य पुरुष विष्णु भगवान्को पकड़ो उसके सच्चे भक्तोंका मान करो झूठे गुरुआ लोगोंके फन्देसे बचो । ये किसी बिरले पुरुषको मिलते हैं, जिसे मिलते हैं वो इनकी ही कृपासे सत्य पुरुषके लोकको चला जाता है । फिर भी जीवोंकी बुद्धि अन्धी हो रही है जो इस ओर ध्यान नहीं देते ।

देखो भगवान् विष्णुके विषयके कबीर साहिबके शब्द—

शब्द ३७—हरिठग ठगत सकल जग डोला ।

गवन करत तोसों मुखहु न बोला ॥

बालापनके मीत हमारे । हमें छाड़िकस चले सकारे ।

तुम अस पुरुष हों नारि तुम्हारी ।

तुम्हरी चाल पाहनहुते भारी ।

वाटिकि देह पवनको शरीरा, हरिठग ठगतसो उरल कवीरा ॥

कबीर दासजी उन गुरुओंके लिये कहते हैं जो भगवान् के तत्त्वको न जान उनकी निन्दा स्तुतिसे अपना कार्य चलाते हैं कि, भगवान् विष्णुके नामपर नकली गुरु बिना विष्णुके सत्यरूपको जनाये ज्ञानी होनेके ठगरी करते फिरते हैं । जब यमराज आकर घेर लेता है तो भी वे वह नहीं कहते कि, हमने सत्यपुरुष विष्णुके नामपर तुमें धोखा दिया था ।

हम तुम बालापन के मित्र हैं । हमें छोड़कर पहिले ही कहाँ चल दिये । आप बिना मंत्र सिद्ध कियेही लोगोंको चेला करने चल दिये जैसे गुरु वैसेही चेला हैं आजकलके गुरु लोगोंकी चाल पत्थरसेभी ज्यादा जड़ है क्योंकि, पत्थर तो जड़ होनेके कारण सत्यपुरुष विष्णुभगवान्का चिन्तन नहीं कर सकता किन्तु ये गुरु लोग चैतन्य होकर भी विष्णुको भी नहीं पहिचानते । पृथ्वी आदिका स्थलदेह तथा प्राणादि वायु आदिका सूक्ष्म है । कबीर साहेब कहते हैं कि, ऐसे पाखण्डियोंसे डरकर जीव भगवान् विष्णुके चरणोंमें पुकार मचावे हैं कि, मेरी रक्षा हो ।

शब्द ३८—हरि विनु मर्म बिगुर विन गन्दा ।

जहूँ जहूँ गयो अपन पाँ खोये, तेहि फन्दे बहु फन्दा ॥ १ ॥

योगी कहे योग है नीको, द्वितिया और न भाई ।

चुण्डित मुण्डित मौन जटा धरि, तिनहुँ कहाँ सिधि पाई ॥ २ ॥

ज्ञानी गुणी शूर कवि दाता, ये जो कहहिं बड हमहीं ।

जहूँ ते उपजे तहूँहि समाने, छूटि गये सब तबहीं ॥ ३ ॥

बाँये दहिने तजो विकारै, निजुकै हरिपद गहिया ।

कह कबीर गूगे गुर खाया पूछेसो का कहिया ॥ ४ ॥

गन्दा—मलिन बुद्धिवाला, विन—पक्षीजीव—हरि—विष्णुभगवान्के, बिहु—बिना, बिगुर—बिगड़ गया । अपनेपे-अपने आत्मतत्वको, खोये-खोकर, जहूँ जहूँ—जिस जिस जगह गयो—पहुँचा, बहूँही, तेहि—उसे, बहुत—बहुतसे, फन्दा—झगड़े पड़े । अथवा जहाँ जहाँ गया अपने भजन ध्यान ही खोये और बिना विष्णुकी कृपाके संसारी बन्धनोंमेंही बँधा । योगी कहते हैं कि, योगही अच्छा है । योगके मुकाबिलेमें दूसरा कुछ नहीं है । उन्होंने तप किये शिर मुड़ाये मौन रहे जटाएँ राखीं पर क्या सिद्धि प्राप्त की, येही क्यों, ज्ञानी शूर कवि और दाता ये भी कहते हैं कि, हमही बड़े हैं जिस गर्भसे उपजे थे फिर उसी गर्भमें जन्म लेने चले गये । उनके सब मत रखेही रह गये । वाम और दक्षिण दोनों विकारोंको छोड़ दो, भगवान् विष्णुकी शरणको अपनी मानकर ग्रहण करो । जिससे कल्याण हो

कबीर साहिब कहते हैं कि, गुडखाया हुआ गूंगा स्वाद नहीं बता सकता, खाली इसारेसे ही कह सकता है।

शब्द ३९—ऐसो हरिसों जगत लरतु है, पंडुर कतहूँ गरुड धरतु है ॥ १ ॥

मूस बिलासी कँसे हेतू, जम्बुक करके हरिसों खेतू ॥ २ ॥

अचरज यक देखा संसारा, सोनहा खेद कुंजर असवारा ॥ ३ ॥

कह कबीर सुनों सन्तो भाई, यह सन्धि कोई विरले पाइ ॥ ४ ॥

ऐसे भगवान् दयालु जो अनायासही मुमुक्षु जीवोंके रक्षक हैं। पाप जीव इनसेभी विरोध किये बिना नहीं मानते। व्यर्थकी निन्दा करते हैं। क्या पीला सोंप गरुडको खालेना चाहता है ? जो विष्णुकी निन्दा करके अपना महत्त्व प्रकट करते हैं, वे सीधे सीधे पुरुषोंको बहकाकर ऐसे हजम करना चाहते हैं जैसे बिल्ली मूसेको खालेना चाहे। पर ये सब बातें इसी तरह हैं जैसे कि, श्यार शेरसे लड़नेका इरादा करे। श्रीविष्णु रहित जीवोंको वे क्या उमराह कर सकते हैं। हमने एक बड़ा आश्चर्य देखा कि, कुत्ते हाथीपर चढ़कर उसे चलाना चाहते हैं। यानी ऐसी बँसी गप्योंसे विष्णु भक्तोंको भक्तिसे डिगाना चाहते हैं। कबीर साहिब कहे हैं कि, किसी विरलेको विष्णुका साक्षात्कार हुआ है जिससे सत्य लोककी प्राप्ति हो जाती है ॥

भगवान् रामचन्द्रजी महाराज ।

मनु और शतरूपाका विवरण रामायणमें कहा है। कि, इन दोनोंने बड़ी तपस्याकी है। अस्सी सहस्र वर्षपर्यन्त प्रार्थना करते रहे, इसके उपरान्त ब्रह्मा इनके सामने गए। परन्तु मनुके पीछे खड़े होकर कहने लगे कि ए, राजा वर माँग। तब मनुने कहा कि, तुम मेरे सामने आओ। तब ब्रह्माने कहा कि, ए राजा ? तेरे प्रतापके कारण मैं तेरे सामने नहीं आ सकता हूँ। तब राजाने कहा कि, यदि तुमसे मेरे सामने आया नहीं जाता तो मैं तुमसे क्या माँगूँ ? फिर शिवजी आए वे भी ब्रह्माहीके सद्गुण पलट गए। पीछे विष्णु आए और कहा कि, राजा तू माँग क्या चाहता है। तब मनुने अपने नेत्र खोलकर देखा तो विष्णु महाराज शंख चक्र गदा पद्म इत्यादि लिए सामने खड़े हैं। तब राजाने कहा कि, तुम्हारे सद्गुण मेरा पुत्र उत्पन्न हो। तब विष्णुने कहा कि, मेरे सद्गुण दूसरा कौन है मैं स्वयम् तेरा पुत्र होऊँगा और कुछ माँग। तब राजाने कहा कि, दूसरा वरदान यह दो कि, मैं आपसे जुदा होकर जीवित न रहूँ, भगवान् विष्णुने 'एव मस्तु' कह दिया। वेही मनु और शतरूपा राजा दशरथ और महारानी कौशलया हुए। भगवान्ने जो वरदान दिया था उसके अनुसार उनके घरमें भगवान् रामका