देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
About this granth
The Shrimad Devi Bhagavata Mahapurana (श्रीमद्देवीभागवतमहापुराण) is the central Purana of the Shakta tradition and is traditionally ascribed to Veda Vyasa. In eighteen thousand verses and twelve books it presents the primordial goddess as the supreme Brahman and the source of creation, preservation and dissolution; Shakta tradition counts it among the Mahapuranas.
This is the first volume of the Gita Press, Gorakhpur edition (book code 1897), giving books 1 to 6 in Sanskrit with a simple Hindi exposition and illustrations. It opens with the Mahatmya, the half-verse summary of the Purana, and instructions for ritual recitation. These books include the slaying of Madhu and Kaitabha, the birth of Shuka, the vision of the goddess in Manidvipa granted to Brahma, Vishnu and Shiva, the Navaratri vow, and the defeat of Mahishasura and of Shumbha and Nishumbha.
The imprint records this as the first edition of Samvat 2067 (2010), printed in 10,000 copies. Prepared with devotees and Navaratri recitation in mind, the volume has 889 pages.
| ८१८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १९ |
|---|
| अनाश्रयं सुतं त्यक्त्वा कथं गन्तुं मनो मम।<br>समर्थं सदयं स्वामिन् भवेदम्बुजलोचन ॥ ४५ | हे कमलनयन! हे स्वामिन्! इस आश्रयहीन पुत्रको छोड़कर मेरा दयालु मन यहाँसे जानेके लिये भला कैसे तैयार हो सकता है ? ॥ ४५ ॥ |
| दिव्यदेहौ ततो जातौ लक्ष्मीनारायणावुभौ।<br>विमानवरसंविष्टौ स्तूयमानौ सुरैर्दिवि ॥ ४६ | तत्पश्चात् लक्ष्मीजी तथा भगवान् विष्णु दोनों दिव्य शरीर धारणकर उत्तम विमानपर विराजमान हुए; देवगण अन्तरिक्षमें उनकी स्तुति करने लगे ॥ ४६ ॥ |
| गन्तुकामं पतिं प्राह कमला कमलापतिम्।<br>गृहाणेमं सुतं नाथ नाहं शक्तास्मि हापितुम् ॥ ४७<br><br>प्राणप्रियोऽस्ति मे पुत्रः कान्त्या त्वत्सदृशः प्रभो।<br>गृहीत्वैनं गमिष्यावो वैकुण्ठं मधुसूदन ॥ ४८ | वैकुण्ठके लिये प्रस्थान करनेके इच्छुक भगवान् विष्णुसे लक्ष्मीजीने कहा—हे नाथ! मैं इस पुत्रका त्याग नहीं कर सकती, अतएव इसे भी साथ ले लीजिये। हे प्रभो! मेरा यह प्राणके समान प्रिय पुत्र कान्तिमें आपके सदृश है। हे मधुसूदन! इसे लेकर हम दोनों वैकुण्ठ चलेंगे ॥ ४७-४८ ॥ |
| हरिरुवाच<br>मा विषादं प्रिये कर्तुं त्वमर्हसि वरानने।<br>तिष्ठत्वयं सुखेनात्र रक्षा मे विहिता त्विह ॥ ४९ | **हरि बोले—**हे प्रिये! हे वरानने! इस पुत्रके विषयमें शोक करना तुम्हारे लिये उचित नहीं है। यह सुखपूर्वक यहीं रहे; मैंने इसकी रक्षाका उपाय कर दिया है ॥ ४९ ॥ |
| कार्यं किमपि वामोरु वर्तते महदद्भुतम्।<br>निबोध कथयाम्यद्य सुतस्यात्र विमोचने ॥ ५० | हे वामोरु! इस पुत्रके यहाँ छोड़नेके पीछे कोई महान् तथा आश्चर्यजनक कारण छिपा है। मैं उसे बता रहा हूँ; तुम जान लो ॥ ५० ॥ |
| तुर्वसुर्नाम विख्यातो ययातितनूजो भुवि।<br>हरिवर्मेति पित्रास्य कृतं नाम सुविश्रुतम् ॥ ५१<br><br>स राजा पुत्रकामोऽद्य तपस्तपति पावने।<br>तीर्थे वर्षशतं जातं तस्य वै कुर्वतस्तपः ॥ ५२<br><br>तस्यार्थे निर्मितः पुत्रो मयायं कमलालये।<br>तत्र गत्वा नृपं सुभ्रु प्रेषयिष्यामि साम्प्रतम् ॥ ५३<br><br>तस्मै दास्याम्यहं पुत्रं पुत्रकामाय कामिनि।<br>गृहीत्वा स्वगृहं राजा प्रापयिष्यति बालकम् ॥ ५४ | इस पृथ्वीपर ययातिके पुत्र तुर्वसु नामक एक प्रसिद्ध राजा हैं। उनके पिताने उनका लोक-प्रसिद्ध हरिवर्मा—यह नाम रखा था। इस समय पुत्रकी कामनावाले वे नरेश एक पवित्र तीर्थमें तपस्या कर रहे हैं। उन्हें तप करते हुए पूरे एक सौ वर्ष बीत चुके हैं। हे कमलालये! उन्हींके लिये मैंने यह पुत्र उत्पन्न किया है। हे सुभ्रु! वहाँ राजाके पास जाकर मैं उन्हें इसी समय भेज दूँगा। हे प्रिये! पुत्रके अभिलाषी उन्हीं राजाको मैं यह पुत्र दे दूँगा और वे इस बालकको लेकर अपने घर चले जायँगे ॥ ५१—५४ ॥ |
| व्यास उवाच<br>इत्याश्वास्य प्रियां पद्मां कृत्वा रक्षां च बालके।<br>विमानवरमारुह्य प्रययौ प्रियया सह ॥ ५५ | **व्यासजी बोले—**इस प्रकार अपनी प्रिय भार्याको आश्वासन देकर तथा बालककी रक्षाका प्रबन्ध करके भगवान् विष्णु उत्तम विमानपर आरूढ़ होकर अपनी प्रियाके साथ चले गये ॥ ५५ ॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे पुत्रजन्मानन्तरं स्वस्वरूपेण वैकुण्ठगमनवर्णनं नामैकोनविंशोऽध्यायः ॥ १९ ॥
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अ० २०] षष्ठ स्कन्ध ८१९
अ० २०] षष्ठ स्कन्ध ८१९
अथ विंशोऽध्यायः
राजा हरिवर्माको भगवान् विष्णुद्वारा अपना हैहयसंज्ञक पुत्र देना, राजाद्वारा उसका 'एकवीर' नाम रखना
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| जनमेजय उवाच<br>संशयोऽयं महानत्र जातमात्रः शिशुस्तथा।<br>मुक्तः केन गृहीतोऽसावेकाकी विजने वने॥ १<br><br>का गतिस्तस्य बालस्य जाता सत्यवतीसुत।<br>व्याघ्रसिंहादिभिर्हिंस्रैर्गृहीतो नातिबालकः॥ २ | जनमेजय बोले—[हे मुनिवर!] मुझे इस विषयमें यह महान् संशय हो रहा है कि भगवान्ने उत्पन्न होते ही उस बालकका त्याग कर दिया। निर्जन वनमें उस असहाय बालककी देखभाल किसने की?॥ १॥<br><br>हे सत्यवतीनन्दन! उस बालककी क्या गति हुई? बाघ, सिंह आदि हिंसक जानवर उस छोटे-से बालकको उठा तो नहीं ले गये॥ २॥ |
| व्यास उवाच<br>लक्ष्मीनारायणौ तस्मात्स्थानाच्च चलितौ यदा।<br>तदैव तत्र चम्पाख्यः प्राप्तो विद्याधरः किल॥ ३<br><br>विमानवरमारूढः कामिन्या सहितो नृप।<br>मदनालसया कामं क्रीडमानो यदृच्छया॥ ४ | **व्यासजी बोले—**हे राजन्! जब भगवान् विष्णु तथा लक्ष्मीजी उस स्थानसे चले गये, उसी समय चम्पक नामक विद्याधर उत्तम विमानपर आरूढ़ होकर अपनी प्रेयसी मदनालसाके साथ इच्छापूर्वक विहार करते हुए संयोगवश वहाँ आ पहुँचा॥ ३-४॥ |
| विलोक्य तं शिशुं भूमावेकाकिनमनुत्तमम्।<br>देवपुत्रप्रतीकाशं रममाणं यथासुखम्॥ ५<br><br>विमानात्तरसोत्तीर्य चम्पकस्तं शिशुं जवात्।<br>जग्राह च मुदं प्राप निधिं प्राप्य यथाधनः॥ ६ | देवपुत्र-तुल्य उस उत्तम शिशुको पृथ्वीपर सुखपूर्वक अकेले खेलते हुए देखकर चम्पकने शीघ्रतापूर्वक विमानसे उतरकर झटसे उस बालकको उठा लिया और वह उसी प्रकार आनन्दित हो गया, जिस प्रकार कोई धनहीन व्यक्ति धनका खजाना पाकर आनन्दित हो जाता है॥ ५-६॥ |
| गृहीत्वा चम्पकः प्रादाद्देव्यै तं मदनोपमम्।<br>मदनालसायै तं बालं जातमात्रं मनोहरम्॥ ७ | कामदेवके समान अत्यन्त सुन्दर उस नवजात शिशुको उठाकर चम्पकने (अपनी पत्नी) मदनालसाको सौंप दिया॥ ७॥ |
| सा गृहीत्वा शिशुं प्रेम्णा सरोमाञ्चा सविस्मया।<br>मुखं चुचुम्ब बालस्य कृत्वा तु हृदये भृशम्॥ ८ | उस बालकको लेते ही प्रेमसे रोमांचित तथा विस्मित मदनालसा हृदयसे लगाकर उस बालकका मुख चूमने लगी॥ ८॥ |
| आलिङ्गितश्चुम्बितश्च तयाऽसौ प्रीतिपूर्वकम्।<br>उत्सङ्गे च कृतस्तन्व्या पुत्रभावेन भारत॥ ९ | हे भारत! प्रीतिपूर्वक हृदयसे लगाने तथा चूमनेके पश्चात् उस तन्वंगी मदनालसाने उसे अपना पुत्र समझकर गोदमें ले लिया॥ ९॥ |
| कृत्वाङ्के तौ समारूढौ विमानं दम्पती मुदा।<br>पतिं पप्रच्छ चार्वङ्गी प्रहस्य मदनालसा॥ १०<br><br>कस्यायं बालकः कान्त त्यक्तः केन च कानने।<br>पुत्रोऽयं मम देवेन दत्तस्त्र्यम्बकपाणिना॥ ११ | उसे गोदमें लेकर पति-पत्नी प्रसन्नतापूर्वक विमानपर आरूढ़ हो गये। तब कमनीय अंगोंवाली मदनालसाने हँसकर अपने पतिसे पूछा—हे कान्त! बालक किसका है तथा किसने इसे निर्जन वनमें छोड़ दिया है? त्रिनेत्रधारी भगवान् शंकरने इसे मुझे पुत्ररूपमें दिया है॥ १०-११॥ |
| ८२० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २० |
|---|
| चम्पक उवाच<br>प्रिये गत्वाद्य पृच्छेयं शक्रं सर्वज्ञमाशु वै।<br>देवो वा दानवो वापि गन्धर्वो वा शिशुः किल॥ १२<br><br>तेनाज्ञप्तः करिष्यामि पुत्रं प्राप्तं वनादमुम्।<br>अपृष्ट्वा नैव कर्तव्यं कार्यं किञ्चिन्मया ध्रुवम्॥ १३ | चम्पक बोला— हे प्रिये ! मैं आज ही सब कुछ जाननेवाले इन्द्रके पास जाकर पूछूँगा कि यह बालक देवता है, दानव है अथवा गन्धर्व है। उनसे आदेश प्राप्त करनेके बाद ही मैं वनमें प्राप्त इस बालकको अपना पुत्र बनाऊँगा; बिना उनसे पूछे मुझे कोई भी कार्य निश्चितरूपसे नहीं करना चाहिये ॥ १२-१३॥ |
| इत्युक्त्वा तां गृहीत्वा तं विमानेनाथ चम्पकः।<br>ययौ शक्रपुरं तूर्णं हर्षेणोत्फुल्ललोचनः॥ १४<br><br>प्रणम्य पादयोः प्रीत्या चम्पकस्तु शचीपतिम्।<br>निवेद्य बालकं प्राह कृताञ्जलिपुटः स्थितः॥ १५ | ऐसा कहकर उस मदनालसा तथा पुत्रको लेकर हर्षातिरेकके कारण उत्फुल्ल नेत्रोंवाले उस चम्पकने तुरंत विमानसे इन्द्रपुरीके लिये प्रस्थान किया। [वहाँ पहुँचकर] प्रेमपूर्वक इन्द्रके चरणोंमें प्रणामकर उस बालकको उन्हें समर्पित करके दोनों हाथ जोड़कर चम्पक खड़ा हो गया और बोला— ॥ १४-१५॥ |
| देवदेव मया लब्धस्तीर्थे परमपावने।<br>कालिन्दीतमसासङ्गे बालकोऽयं स्मरप्रभः॥ १६ | हे देवदेव ! कामदेवके समान प्रभावाला यह बालक मुझे परम पवित्र तीर्थ यमुना तथा तमसा नदीके संगम-स्थलपर प्राप्त हुआ था ॥ १६ ॥ |
| कस्यायं बालकः कान्तः कथं त्यक्तः शचीपते।<br>आज्ञा चेत्तव देवेश कुर्वेऽहं बालकं सुतम्॥ १७ | हे शचीपते ! कान्तिसे सम्पन्न यह बालक किसका है; इसका त्याग क्यों कर दिया गया है ? हे देवेश ! यदि आपका आदेश हो तो मैं इस बालकको अपना पुत्र बना लूँ ॥ १७ ॥ |
| अतीव सुन्दरो बालः प्रियाया वल्लभः सुतः।<br>कृत्रिमस्तु सुतः प्रोक्तो धर्मशास्त्रेषु सर्वथा ॥ १८ | यह अत्यन्त सुन्दर बालक मेरी पत्नीका प्रिय पुत्र बन गया है। धर्मशास्त्रोंमें कृत्रिम पुत्र भी कहा गया है ॥ १८ ॥ |
| इन्द्र उवाच<br>पुत्रोऽयं वासुदेवस्य वाजिरूपधरस्य ह।<br>हैहयोऽयं महाभाग लक्ष्म्यां जातः परन्तपः॥ १९ | इन्द्र बोले— यह अश्वरूपधारी भगवान् विष्णुका पुत्र है। हे महाभाग ! हैहयसंज्ञक यह परम तपस्वी बालक लक्ष्मीजीसे उत्पन्न हुआ है ॥ १९॥ |
| उत्पादितो भगवता कार्यार्थं किल बालकः।<br>दातुं नृपतये नूनं ययातितनयाय च॥ २० | भगवान् विष्णुने ययातिके पुत्र राजा हरिवर्माको अर्पित करनेके उद्देश्यसे इस बालकको उत्पन्न किया है ॥ २० ॥ |
| हरिणा प्रेरितः सोऽद्य राजा परमधार्मिकः।<br>आगमिष्यति पुत्रार्थं तीर्थे तस्मिन्मनोरमे ॥ २१<br><br>तावत् त्वं गच्छ तत्रैव गृहीत्वा बालकं शुभम्।<br>यावन्न याति नृपतिर्ग्रहीतुं हरिणेरितः॥ २२ | परम धार्मिक राजा हरिवर्मा भगवान् विष्णुसे प्रेरणा प्राप्तकर पुत्रके लिये आज ही उस पावन तीर्थमें पहुँचेंगे। अतएव जबतक भगवान् विष्णुके द्वारा प्रेरित होकर वे राजा उसे लेनेहेतु वहाँ पहुँच नहीं जाते, उससे पूर्व तुम इस सुन्दर बालकको लेकर वहींपर पहुँच जाओ ॥ २१-२२ ॥ |
| गत्वा तत्र विमुञ्चैनं विलम्बं मा कृथा वर।<br>अदृष्ट्वा बालकं राजा दुःखितश्च भविष्यति ॥ २३ | हे श्रेष्ठ ! वहाँ जाकर इस बालकको छोड़ दो, विलम्ब मत करो; क्योंकि राजा हरिवर्मा [तुमसे पहले पहुँच गये तो] बालकको वहाँ न देखकर अत्यन्त दुःखी होंगे ॥ २३ ॥ |
| अ० २० ] | षष्ठ स्कन्ध | ८२१ |
|---|
| तस्माच्चम्पक मुञ्चैनं राजा प्राप्नोतु पुत्रकम्।<br>एकवीरेति नाम्नायं ख्यातः स्यात् पृथिवीतले॥ २४ | अतएव हे चम्पक! इस बालकको छोड़ आओ, जिससे राजा पुत्र प्राप्त कर लें। यह पृथ्वीलोकमें 'एकवीर'—इस नामसे प्रसिद्ध होगा॥ २४॥ |
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
| इति तस्य वचः श्रुत्वा चम्पकस्त्वरयान्वितः।<br>जगाम पुत्रमादाय स्थले तस्मिन्महीपते॥ २५<br>मुमोच बालकं तत्र यत्र पूर्वं स्थितो ह्यभूत्।<br>आरुह्य स्वविमानं तु ययौ स्वाश्रममण्डलम्॥ २६ | हे राजन्! इन्द्रकी यह बात सुनकर चम्पक शीघ्रतापूर्वक उस बालकको लेकर उस स्थानपर पहुँच गया। बालक पहले जहाँ पड़ा हुआ था, वहींपर उसने बालकको रख दिया और अपने विमानपर चढ़कर अपने स्थानको लौट गया॥ २५-२६॥ |
| तदैव कमलाकान्तो लक्ष्म्या सह जगद्गुरुः।<br>विमानवरमारूढो जगाम नृपतिं प्रति॥ २७ | इसके तुरंत बाद कमलाकान्त जगद्गुरु भगवान् विष्णु लक्ष्मीजीके साथ श्रेष्ठ विमानपर आरूढ़ होकर राजाके यहाँ पहुँचे॥ २७॥ |
| दृष्टस्तदा तेन नृपेण विष्णुः<br>समुत्तरंस्तत्र विमानमुख्यात्।<br>जहर्ष राजा हरिदर्शनेन<br>पपात भूमौ खलु दण्डवच्च॥ २८ | उस समय राजा हरिवर्माने भगवान् विष्णुको उत्तम विमानसे उतरते हुए देखा। भगवान्के दर्शनसे राजा अत्यन्त हर्षित हुए और दण्डकी भाँति उनके समक्ष पृथ्वीपर गिर पड़े॥ २८॥ |
| उत्तिष्ठ वत्सेति हरिः पतन्त-<br>माश्वासयद्भूमिगतं स्वभक्तम्।<br>सोऽप्युत्सुको वासुदेवं पुरःस्थं<br>तुष्टाव भक्त्या मुखरीकृतोऽथ॥ २९ | 'हे वत्स! उठो'—ऐसा कहकर भगवान् विष्णुने भूमिपर पड़े हुए अपने भक्तको आश्वासन दिया। इसके बाद राजा हरिवर्मा भी उल्लसित होकर अपने सामने खड़े वासुदेवकी भक्तिपूर्वक स्पष्ट वाणीमें स्तुति करने लगे—॥ २९॥ |
| देवाधिदेवाखिललोकनाथ<br>कृपानिधे लोकगुरो रमेश।<br>मन्दस्य मे ते किल दर्शनं य-<br>त्सुदुर्लभं योगिजनैरलभ्यम्॥ ३० | हे देवाधिदेव! हे अखिललोकनाथ! हे कृपानिधे! हे लोकगुरो! हे रमेश! आपका जो दर्शन योगिजनोंके लिये भी अलभ्य है, वह मुझ अज्ञानीके लिये तो अत्यन्त ही दुर्लभ था॥ ३०॥ |
| ये निःस्पृहास्ते विषयैरपेता-<br>स्तेषां त्वदीयं खलु दर्शनं स्यात्।<br>आशापरोऽहं भगवन्ननन्त<br>योग्यो न ते दर्शने देवदेव॥ ३१ | जो लोग कामनारहित तथा विषयोंसे मुक्त हैं, उन्हें ही आपका दर्शन हो सकता है। हे भगवन्! हे अनन्त! हे देवदेव! केवल आशापरायण मैं वास्तवमें आपके दर्शनके योग्य नहीं था॥ ३१॥ |
| इति स्तुतस्तेन नृपेण विष्णु-<br>स्तमाह वाक्येन सुधामयेन।<br>वृणीष्व राजन् मनसेप्सितं ते<br>ददामि तुष्टस्तपसा तवेति॥ ३२ | इस प्रकार उन राजाके स्तुति करनेपर भगवान् विष्णुने अमृतमयी वाणीमें उनसे कहा—हे राजन्! मैं तुम्हारी तपस्यासे प्रसन्न हूँ। अतः मैं तुम्हें मनोवांछित वरदान दूँगा; तुम माँग लो॥ ३२॥ |
| ततो नृपस्तं प्रणिपत्य पादयोः<br>प्रोवाच विष्णुं पुरतः स्थितं च।<br>तपस्तु तप्तं हि मया सुतार्थे<br>पुत्रं ददस्वात्मसमं मुरारे॥ ३३ | तत्पश्चात् राजाने अपने सामने स्थित विष्णुके चरणोंमें सिर झुकाकर उनसे कहा—हे मुरारे! मैंने पुत्रप्राप्तिके लिये तपस्या की है। अतएव आप मुझे अपने ही सदृश पुत्र दीजिये॥ ३३॥ |
८२२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २०
८२२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २०
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| श्रुत्वा नृपप्रार्थितमादिदेव-<br>स्तमाह राजानममोघवाक्यम्।<br>ययातिसूनो व्रज तत्र तीर्थे<br>कलिन्दकन्यातमसाप्रसङ्गे ॥ ३४<br>मयाद्य पुत्रस्तु यथेप्सितस्ते<br>तत्रैव मुक्तोऽस्त्यमितप्रभावः।<br>लक्ष्म्याः प्रसूतो मम वीर्यजश्च<br>कृतस्तवार्थेऽथ गृहाण राजन्॥ ३५ | राजाकी प्रार्थना सुनकर आदिदेव भगवान् विष्णुने राजासे सार्थक वचन कहा—हे ययातिनन्दन! तुम इसी समय यमुना तथा तमसा नदीके उस पावन संगम तीर्थपर चले जाओ। हे राजन्! आप जैसा पुत्र चाहते हैं, वैसा ही पुत्र मैंने वहाँ रख दिया है। मेरे तेजसे प्रादुर्भूत वह पुत्र अमित प्रभाववाला है तथा लक्ष्मीजीने उसे उत्पन्न किया है। तुम्हारे लिये ही उसकी उत्पत्ति की गयी है, अतः तुम उसे ग्रहण करो॥ ३४-३५॥ |
| श्रुत्वा हरेर्वाक्यमतीव मृष्टं<br>सन्तुष्टचित्तः प्रबभूव राजा।<br>हरिस्तु दत्त्वेति वरं जगाम<br>वैकुण्ठलोकं रमया युतश्च॥ ३६ | भगवान् विष्णुकी अत्यन्त मधुर वाणी सुनकर राजाके मनमें प्रसन्नता हुई। राजाको यह वरदान देकर भगवान् विष्णु लक्ष्मीजीके साथ वैकुण्ठ चले गये॥ ३६॥ |
| गते हरौ सोऽथ ययातिसूनु-<br>र्ययावनुद्घातरथेन राजा।<br>प्रेमान्वितस्तत्र सुतोऽस्ति यत्र<br>वचो निशम्येति जनार्दनस्य॥ ३७ | भगवान् विष्णुके चले जानेपर उन जनार्दनकी बात सुनकर आनन्दविभोर ययातिनन्दन राजा हरिवर्मा एक अप्रतिहत गति वाले रथपर आरूढ़ होकर उस स्थानपर गये, जहाँ बालक स्थित था॥ ३७॥ |
| स तत्र गत्वातिमनोहरं तं<br>ददर्श बालं भुवि खेलमानम्।<br>मुखे निवेश्यैककरेण कृत्वा<br>श्लक्ष्णं पदाङ्गुष्ठमनन्यसत्त्वः॥ ३८ | वहाँ पहुँचनेपर परम तेजस्वी राजाने उस अति मनोहर बालकको एक हाथसे पैरका कोमल अँगूठा मुखमें डालकर भूमिपर खेलता हुआ देखा॥ ३८॥ |
| तं वीक्ष्य पुत्रं मदनस्वरूपं<br>नारायणांशं कमलाप्रसूतम्।<br>हरिप्रभावं हरिवर्मनामा<br>हर्षप्रफुल्लाननपङ्कजोऽभूत् ॥ ३९<br>गृह्णन् सुवेगात् करपङ्कजाभ्यां<br>बभूव प्रेमार्णवमग्नदेहः।<br>मूर्ध्न्युपाघ्राय मुदान्वितोऽसौ<br>ननन्द राजा सुतमालिङ्ग ॥ ४० | लक्ष्मीजीसे उत्पन्न भगवान् विष्णुके अंशस्वरूप तथा उन्हींके समान प्रभावशाली एवं कामदेवके सदृश रूपवान् उस पुत्रको देखकर राजा हरिवर्माका मुखारविन्द हर्षसे खिल उठा। उस बालकको अपने करकमलोंसे बड़ी तेजीसे उठाते हुए राजा हरिवर्मा प्रेमसागरमें मग्न हो गये। प्रसन्नतापूर्वक उसका मस्तक सूँघकर उन राजाने पुत्रका आलिंगन किया और अत्यन्त आनन्द प्राप्त किया॥ ३९-४०॥ |
| मुखं समीक्ष्यातिमनोहरं त-<br>मुवाच नेत्राम्बुनिरुद्धकण्ठः।<br>दत्तोऽसि देवेन जनार्दनेन<br>मात्रा हि पुत्रावमदुःखभीतेः॥ ४१<br>तप्तं मया पुत्र तपस्त्वदर्थे<br>सुदुष्करं वर्षशतं च पूर्णम्।<br>तेनैव तुष्टेन रमाप्रियेण<br>दत्तोऽसि संसारसुखोदयाय॥ ४२ | उस बालकका अत्यन्त मनोहर मुख देखकर प्रेमके अश्रुसे रुँधे कण्ठवाले राजाने उससे कहा—हे पुत्र! भगवान् विष्णु तथा माता लक्ष्मीके द्वारा तुम मेरे लिये प्रदान किये गये हो। हे पुत्र! नरकभोगके दुःखसे भयभीत होकर मैंने तुम्हारे लिये पूरे सौ वर्षोंतक अत्यन्त कठोर तपस्या की है। उसी तपसे प्रसन्न होकर रमाकान्त विष्णुने सांसारिक सुख भोगनेके लिये तुम्हें पुत्ररूपमें मुझे प्रदान किया है॥ ४१-४२॥ |
| अ० २० ] | षष्ठ स्कन्ध | ८२३ |
|---|
| माता रमा त्वां तनुजं मदर्थे<br>त्यक्त्वा गता सा हरिणा समेता।<br>धन्या तु सा या प्रहसन्तमाङ्के<br>कृत्वा सुतं त्वां मुदितानना स्यात्॥ ४३<br>त्वमेव संसारसमुद्रनौका-<br>रूपः कृतः पुत्र लक्ष्मीधरेण।<br>इत्येवमुक्त्वा नृपतिः सुतं तं<br>मुदा समादाय ययौ गृहाय॥ ४४ | लक्ष्मीजी तुम्हारी जननी हैं; तुझ पुत्रको मेरे लिये छोड़कर वे भगवान् विष्णुके साथ वैकुण्ठ चली गयी हैं। अब वह माता धन्य होगी, जो तुझ-जैसे हँसते हुए पुत्रको अपनी गोदमें लेकर आनन्द प्राप्त करेगी। हे पुत्र! मेरे लिये संसारसागरको पार करनेके लिये तुम नौकास्वरूप हो, जिसे साक्षात् लक्ष्मीपति भगवान् विष्णुने उत्पन्न किया है। ऐसा कहकर राजा हरिवर्मा प्रसन्नतापूर्वक उस पुत्रको लेकर अपने घरकी ओर चले गये॥ ४३-४४॥ |
| पुरीसमीपे नृपमागतं त-<br>माकर्ण्य सर्वे सचिवास्तु राज्ञः।<br>ययुः समीपं नृपतेश्च लोकाः<br>सोपायनास्ते सपुरोहिताश्च॥ ४५ | राजा नगरके समीप आ गये हैं—ऐसा सुनकर राजाके सभी सचिव तथा उनके प्रजावर्ग पुरोहितोंके साथ समस्त उपहार-सामग्री लेकर उनके पास पहुँच गये॥ ४५॥ |
| बन्दीजना गायनकाश्च सूताः<br>समाययुः सम्मुखमाशु राज्ञः।<br>नृपः पुरं प्राप्य पुरः समागतं<br>जनं समाश्वास्य वाक्यैश्च दृष्ट्या॥ ४६<br>सम्पूजितः पौरजनेन राजा<br>विवेश पुत्रेण युतो नगर्याम्।<br>मार्गेषु लाजैः कुसुमैः समन्ता-<br>द्विकीर्यमाणो नृपतिर्जगाम॥ ४७ | सूत, बंदीजन तथा गायकगण भी राजाके सामने उनका यशोगान करते हुए शीघ्र ही आ गये। नगरमें आकर राजा हरिवर्मा अपने सम्मुख उपस्थित लोगोंको [स्नेहभरी] दृष्टि तथा [मधुर] वचनोंसे आश्वस्त करके नगरवासियोंद्वारा भलीभाँति पूजित होकर पुत्रके साथ नगरीमें प्रविष्ट हुए। नगरमें जाते समय रास्तेभर राजाके ऊपर लाजा तथा फूलोंकी वर्षा की जा रही थी॥ ४६-४७॥ |
| गृहं समृद्धं सचिवैः समेतः<br>सुतं समादाय मुदा कराभ्याम्।<br>राज्ञ्यै ददौ चाथ सुतं मनोज्ञं<br>सद्यःप्रसूतं च मनोभवाभम्॥ ४८ | सचिवोंके साथ अपने समृद्धिशाली महलमें पहुँचनेपर राजाने हर्षपूर्वक कामदेवके तुल्य कान्तिमान् तथा मनोहर नवजात पुत्रको दोनों हाथोंमें लेकर रानीको दे दिया॥ ४८॥ |
| राज्ञी गृहीत्वाभिनवं तनूजं<br>पप्रच्छ राजानमनिन्दिता सा।<br>राजन् कुतश्चैष सुतः सुजन्मा<br>प्राप्तस्त्वया मन्मथतुल्यरूपः॥ ४९<br>केनैष दत्तः कथयाशु कान्त<br>चेतो मदीयं प्रहृतं सुतेन।<br>नृपस्तदोवाच मुदान्वितोऽसौ<br>प्रिये रमेशेन सुतो हि मह्यम्॥ ५०<br>लोलाक्षि दत्तः कमलासमुत्थो<br>जनार्दनांशोऽयमहीनमत्त्वः।<br>सा तं गृहीत्वा मुदमाप राज्ञी<br>राजा चकारोत्सवमद्भुतं च॥ ५१ | उस बालकको गोदमें लेकर पुण्यात्मा रानीने राजासे पूछा—हे राजन्! कामदेवके समान सुन्दर तथा उत्तम कुलमें उत्पन्न इस पुत्रको आपने कहाँसे प्राप्त किया? हे कान्त! आप शीघ्र बताइये कि किसने आपको यह बालक दिया है? इस पुत्रने अपने सौन्दर्यसे मेरे मनको वशीभूत कर लिया है। तब राजाने बड़ी प्रसन्नताके साथ कहा—हे प्रिये! हे चंचल नेत्रोंवाली! लक्ष्मीजीसे उत्पन्न तथा भगवान् जनार्दनका अंशस्वरूप यह महान् शक्तिशाली पुत्र मुझे स्वयं लक्ष्मीपति भगवान् विष्णुने ही दिया है। उस पुत्रको लेकर रानी परम आनन्दित हुई और राजाने अद्भुत उत्सव मनाया॥ ४९-५१॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे एकवीराख्यानवर्णनं नाम विंशोऽध्यायः॥ २०॥
| ८२४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २१ |
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| ददौ च दानं किल याचकेभ्यो गीतानि वाद्यानि बहूनि नेदुः।<br>कृत्वोत्सवं भूपतिरात्मजस्य नामैकवीरेति चकार विश्रुतम्॥ ५२<br>सुखं च सम्प्राप्य मुदान्वितोऽसौ ननन्द देवाधिपतुल्यवीर्यः।<br>पुत्रं हरे रूपगुणानुरूपं सम्प्राप्य वंशस्य ऋणाच्च मुक्तः॥ ५३ | राजाने याचकोंको दान दिया। इस अवसरपर गीत गाये गये तथा अनेक वाद्य बजाये गये। सम्यक् उत्सव करके राजाने अपने पुत्रका 'एकवीर'—यह प्रसिद्ध नाम रखा। वे सुख पाकर बहुत प्रसन्न हुए तथा आनन्दित हुए। इन्द्रके समान पराक्रमशाली राजा हरिवर्मा भगवान् विष्णुके सदृश रूपवान् तथा गुणी पुत्र पाकर वंशऋण (पितृऋण)-से मुक्त हो गये॥ ५२-५३॥ |
| इति सकलसुराणामीश्वरेणार्पितं तं सकलगुणगणाढ्यं पुत्रमासाद्य राजा।<br>विविधसुखविनोदैर्भार्यया सेव्यमानो व्यहरत निजगेहे शक्रतुल्यप्रतापः॥ ५४ | इस प्रकार समस्त देवताओंके अधिपति भगवान् विष्णुके द्वारा अर्पित किये गये उस सर्वगुणसम्पन्न पुत्रको प्राप्त करके इन्द्रके समान प्रतापी राजा हरिवर्मा अपनी भार्याके साथ नानाविध सुख भोगते हुए तथा विनोद करते हुए अपने महलमें रहने लगे॥ ५४॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे एकवीराख्यानवर्णनं नाम विंशोऽध्यायः॥ २०॥
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अथैकविंशोऽध्यायः
आखेटके लिये वनमें गये राजासे एकावलीकी सखी यशोवतीकी भेंट, एकावलीके जन्मकी कथा
| व्यास उवाच<br>जातकर्मादिसंस्कारांश्चकार नृपतिस्तदा।<br>दिने दिने जगामाशु वृद्धिं बालः सुलालितः॥ १ | व्यासजी बोले—हे राजन्! तत्पश्चात् राजा हरिवर्माने बालकके जातकर्म आदि संस्कार किये। भलीभाँति पालित-पोषित होनेके कारण वह बालक दिनोदिन शीघ्रतासे बढ़ने लगा॥ १॥ |
|---|---|
| नृपः संसारजं प्राप्य सुखं पुत्रसमुद्भवम्।<br>ऋणत्रयविमोक्षं च मेने तेन महात्मना॥ २ | इस प्रकार पुत्रजनित सांसारिक सुख प्राप्त करके उन महात्मा नरेशने अपनेको अब तीनों ऋणोंसे मुक्त मान लिया॥ २॥ |
| षष्ठेऽन्नप्राशनं तस्य कृत्वा मासि यथाविधि।<br>तृतीयेऽथ तथा वर्षे चूडाकरणमुत्तमम्॥ ३<br>चकार ब्राह्मणान् द्रव्यैः सम्पूज्य विविधैर्धनैः।<br>गोभिश्च विविधैर्दानैर्योचकानितरानपि॥ ४ | राजा हरिवर्माने छठें महीनेमें बालकका अन्नप्राशन-संस्कार करके तीसरे वर्षमें शुभ मुण्डन-संस्कार विधि-विधानके साथ सम्पन्न किया। इनमें ब्राह्मणोंकी सम्यक् पूजा करके उन्हें विविध धन-द्रव्यों तथा गौओंका दान किया गया और अन्य याचकोंको भी नानाविध दान दिये॥ ३-४॥ |
| वर्षे चैकादशे तस्य मौञ्जीबन्धनकर्म वै।<br>कारयित्वा धनुर्वेदमध्यापयत पार्थिवः॥ ५ | ग्यारहवें वर्षमें उस बालकका यज्ञोपवीत-संस्कार कराकर राजाने उसको धनुर्वेद पढ़वाया॥ ५॥ |
| अधीतवेदं पुत्रं तं राजधर्मविशारदम्।<br>दृष्ट्वा तस्याभिषेकाय मतिं चक्रे जनाधिपः॥ ६ | राजा हरिवर्माने उस पुत्रको धनुर्वेद तथा राजधर्ममें पूर्ण निष्णात हुआ देखकर उसका राज्याभिषेक करनेका निश्चय किया॥ ६॥ |
| अ० २१ ] | षष्ठ स्कन्ध | ८२५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पुष्यार्कयोगसंयुक्ते दिवसे नृपसत्तमः ।<br>कारयामास सम्भारानभिषेकार्थमादरात् ॥ ७ | तत्पश्चात् श्रेष्ठ राजाने पुष्यार्क-योगसे युक्त शुभ दिनमें बड़े आदरके साथ अभिषेकहेतु सभी सामग्रियाँ एकत्र करवायीं ॥ ७ ॥ |
| द्विजानाहूय वेदज्ञान् सर्वशास्त्रविचक्षणान् ।<br>अभिषेकं चकारासौ विधिवत् स्वात्मजस्य ह ॥ ८<br><br>जलमानीय तीर्थेभ्यः सागरेभ्यश्च पार्थिवः ।<br>स्वयं चकार विधिवदभिषेकं शुभे दिने ॥ ९ | सभी शास्त्रोंमें पूर्ण पारंगत तथा वेदवेत्ता ब्राह्मणोंको बुलाकर उन्होंने विधिवत् अपने पुत्रका अभिषेक सम्पन्न किया। सभी तीर्थों तथा समुद्रोंसे जल मँगाकर राजाने शुभ दिनमें पुत्रका स्वयं अभिषेक किया ॥ ८-९ ॥ |
| धनं दत्त्वाथ विप्रेभ्यो राज्यं पुत्रे निवेश्य सः ।<br>जगाम वनमेवाशु स्वर्गकामः स भूपतिः ॥ १० | तत्पश्चात् ब्राह्मणोंको धन देकर तथा पुत्रको राज्य सौंपकर उन राजा हरिवर्माने स्वर्गप्राप्तिकी कामनासे वनके लिये शीघ्र ही प्रस्थान किया ॥ १० ॥ |
| एकवीरं नृपं कृत्वा सम्मान्य सचिवानथ ।<br>भार्यया सह भूपालः प्रविवेश वनं वशी ॥ ११ | इस प्रकार एकवीरको राजा बनाकर तथा योग्य मन्त्रियोंको नियुक्तकर इन्द्रियजित् राजा हरिवर्माने अपनी भार्याके साथ वनमें प्रवेश किया ॥ ११ ॥ |
| मैनाकशिखरे राजा कृत्वा तार्तीयमाश्रमम् ।<br>नित्यं पत्रफलाहारश्चिन्तयामास पार्वतीम् ॥ १२ | मैनाकपर्वतके शिखरपर तृतीय आश्रम (वानप्रस्थ)-का आश्रय लेकर वे राजा प्रतिदिन वनके पत्तों तथा फलोंका आहार करते हुए भगवती पार्वतीकी आराधना करने लगे ॥ १२ ॥ |
| एवं स नृपतिः कृत्वा दिष्टान्ते सह भार्यया ।<br>मृतोऽसौ वासवं लोकं गतः पुण्येन कर्मणा ॥ १३ | इस प्रकार अपनी भार्याके साथ वानप्रस्थ-आश्रमका पालन करके वे राजा प्रारब्ध कर्मके समाप्त हो जानेपर मृत्युको प्राप्त हुए और अपने पुण्यकर्मके प्रभावसे इन्द्रलोक चले गये ॥ १३ ॥ |
| इन्द्रलोकं पिता प्राप्त इति श्रुत्वाथ हैहयः ।<br>चकार वेदनिर्दिष्टं कर्म चैवौर्ध्वदैहिकम् ॥ १४ | पिता इन्द्रलोक चले गये—ऐसा सुनकर हैहय एकवीरने वैदिक विधानके अनुसार उनका और्ध्वदैहिक संस्कार सम्पन्न किया ॥ १४ ॥ |
| कृत्वोत्तराः क्रियाः सर्वाः पितुः पार्थिवनन्दनः ।<br>राज्यं चकार मेधावी पित्रा दत्तं सुसम्मतम् ॥ १५ | पिताकी सभी श्राद्ध आदि क्रियाएँ सम्पन्न करके सबकी सहमतिसे पिताद्वारा दिये गये राज्यपर वह मेधावी राजकुमार एकवीर शासन करने लगा ॥ १५ ॥ |
| एकवीरोऽथ धर्मज्ञः प्राप्य राज्यमनुत्तमम् ।<br>बुभुजे विविधान् भोगान् सचिवैश्च समानितः ॥ १६ | उत्कृष्ट राज्य प्राप्त करके धर्मपरायण एकवीर सभी मन्त्रियोंसे सम्मानित रहते हुए अनेकविध सुखोंका उपभोग करने लगे ॥ १६ ॥ |
| एकस्मिन् दिवसे राजा मन्त्रिपुत्रैः समन्वितः ।<br>जगाम जाह्नवतीरे हयारूढः प्रतापवान् ॥ १७ | एक दिन प्रतापी राजा एकवीर मन्त्रियोंके पुत्रोंके साथ घोड़ेपर आरूढ़ होकर गंगाके तटपर गये। वहाँ |
| सम्पश्यन् पादपान् रम्यान् कोकिलालापसंयुतान् ।<br>पुष्पितान् फलसंयुक्तान् षट्पदालिविराजितान् ॥ १८ | उन्होंने कोकिलोंकी कूजसे गुंजित, भ्रमरोंकी पंक्तियोंसे सुशोभित तथा फलों-फूलोंसे लदे मनोहर वृक्षों; वेदपाठकी ध्वनिसे निनादित, हवनके धुएँसे आच्छादित आकाश-मण्डलवाले, मृगोंके छोटे शिशुओंसे आवृत |
| ८२६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २१ |
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| मुनीनामाश्रमान् दिव्यान् वेदध्वनिनिनादितान्।<br>होमधूमावृताकाशान् मृगशावसमावृतान्॥ १९<br><br>केदाराञ्छालिसम्पक्वान् गोपिकाभिः सुरक्षितान्।<br>प्रफुल्लपङ्कजारामान्निनुकुञ्जांश्च मनोरमान्॥ २०<br><br>प्रेक्षमाणः प्रियालांस्तु चम्पकान् पनसद्रुमान्।<br>बकुलांस्तिलकान्नीपान् मन्दारांश्च प्रफुल्लितान्॥ २१<br><br>शालांस्तालांस्तमालांश्च जम्बूचूतकदम्वकान्।<br>स गच्छञ्जाह्नवीतोये प्रफुल्लं शतपत्रकम्॥ २२<br><br>पङ्कजं चातिगन्धाढ्यमपश्यदवनीपतिः।<br>दक्षिणे जलजस्याथ पार्श्वे कमललोचनाम्॥ २३<br><br>कनकाभां सुकेशीं च कम्बुग्रीवां कृशोदरीम्।<br>बिम्बोष्ठीं सुन्दरीं किञ्चित्समुद्गतसुपयोधराम्॥ २४<br><br>सुनासां चारुसर्वाङ्गीमपश्यत् कन्यकां नृपः।<br>रुदतीं तां सखीं त्यक्त्वा विह्वलां दुःखपीडिताम्॥ २५<br><br>साश्रुनेत्रां क्रन्दमानां विजने कुररीमिव।<br>संवीक्ष्य राजा पप्रच्छ कन्यकां शोककारणम्॥ २६ | दिव्य मुनि-आश्रमों; गोपिकाओंके द्वारा सुरक्षित तथा पके हुए शालिधान्यसे युक्त खेतों; विकसित कमलोंसे सुशोभित अनेक सरोवरों तथा मनको आकर्षित करनेवाले निकुंजोंको देखा। उन राजा एकवीरने प्रियाल, चम्पक, कटहल, बकुल, तिलक, नीप, पुष्पित मन्दार, शाल, ताल, तमाल, जामुन, आम और कदम्बके आदि वृक्षोंको देखते हुए कुछ दूर आगे जानेपर गंगाके जलमें उत्कृष्ट गन्धयुक्त एक खिला हुआ शतदल कमल देखा। राजाने उस कमलके दक्षिण भागमें कमलसदृश नेत्रोंवाली, स्वर्णके समान कान्तिवाली, सुन्दर केश-पाशवाली, शंखतुल्य गर्दनवाली, कृश कटिप्रदेशवाली, बिम्बाफलके समान ओष्ठवाली, किंचित् स्फुट पयोधरवाली, मनोहर नासिकावाली तथा समस्त सुन्दर अंगोंवाली एक सुन्दरी कन्याको देखा। अपनी सखीसे बिछुड़ जानेसे व्याकुल होकर दुःखपूर्वक विलाप करती हुई, निर्जन वनमें आँखोंमें आँसू भरकर कुररी पक्षीकी भाँति क्रन्दन करती हुई उस कन्याको देखकर राजा एकवीरने उससे शोकका कारण पूछा॥ १७—२६॥ |
| सुनसे ब्रूहि कासि त्वं कस्य पुत्री शुभानने।<br>गन्धर्वी देवकन्याथ कथं रोदिषि सुन्दरि॥ २७ | हे सुन्दर नासिकावाली! तुम कौन हो? हे सुमुखि! तुम किसकी पुत्री हो? तुम गन्धर्वकन्या हो अथवा देवकन्या? हे सुन्दरि! तुम क्यों रो रही हो? यह मुझे बताओ॥ २७॥ |
| कथमेकाकिनी बाले त्यक्ता केन पिकस्वरे।<br>पतिस्ते क्व गतः कान्ते पिता वा ब्रूहि साम्प्रतम्॥ २८ | हे बाले! तुम यहाँ अकेली क्यों हो? हे पिकस्वरे! तुम्हें यहाँ किसने छोड़ दिया है? हे प्रिये! तुम्हारे पति अथवा पिता इस समय कहाँ चले गये हैं? मुझे बताओ॥ २८॥ |
| किं ते दुःखमरालभ्रु कथयाद्य ममान्तिके।<br>करोमि दुःखनाशं ते सर्वथैव कृशोदरि॥ २९ | हे वक्र भौंहोंवाली! तुम्हें क्या दुःख है? उसे मेरे सामने अभी व्यक्त करो। हे कृशोदरि! मैं सब प्रकारसे तुम्हारा दुःख दूर करूँगा॥ २९॥ |
| न राज्ये मम तन्वङ्गि पीडां कोऽपि करोत्यलम्।<br>न भयं चौरजं कान्ते न राक्षसभयं तथा॥ ३० | हे तन्वंगि! मेरे राज्यमें कोई भी प्राणी किसीको पीड़ा नहीं पहुँचा सकता और हे कान्ते! कहीं न तो चोरोंका भय है और न राक्षसोंका ही भय है॥ ३०॥ |
| मयि शासति भूपाले नोत्पाता दारुणा भुवि।<br>भयं न व्याघ्रसिंहेभ्यो न भयं कस्यचिद्द्भवेत्॥ ३१ | मुझ नरेशके शासन करते हुए इस पृथ्वीपर भीषण उत्पात नहीं हो सकते; बाघ अथवा सिंहसे किसीको भय नहीं हो सकता और किसीको कोई भी भय नहीं रहता॥ ३१॥ |
| वद वामोरु कस्मात्त्वं विलापं जाह्नवीतटे।<br>करोषि त्राणहीनात्र किं ते दुःखं वदस्व मे॥ ३२ | हे वामोरु! असहाय होकर तुम गंगातटपर क्यों विलाप कर रही हो, तुम्हें क्या दुःख है? मुझे बताओ॥ ३२॥ |
अ० २१] षष्ठ स्कन्ध ८२७
अ० २१] षष्ठ स्कन्ध ८२७
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| हन्त्यहं दुःखमत्युग्रं प्राणिनां पृथिवीतले।<br>दैवं च मानुषं कान्ते व्रतमेतन्ममाद्भुतम्॥ ३३<br>विशाललोचने ब्रूहि करोमि तव चिन्तितम्। | हे कान्ते! मैं जगत्के प्राणियोंके अत्यन्त भीषण दैविक तथा मानुषिक कष्टको भी दूर करता हूँ; यह मेरा अद्भुत व्रत है। हे विशालनयने! बताओ, मैं तुम्हारा वांछित कार्य करूँगा॥ ३३ ½ ॥ |
| इत्युक्ते वचने राज्ञा श्रुत्वोवाच मृदुस्वना॥ ३४<br>शृणु राजेन्द्र वक्ष्यामि मम शोकस्य कारणम्।<br>विपत्तिरहितः प्राणी कथं रोदिति भूपते॥ ३५<br>प्रब्रवीमि महाबाहो यदर्थं रुदती त्वहम्।<br>तव राज्यादन्यदेशे राजा परमधार्मिकः॥ ३६<br>रैभ्यो नाम महाराजः सन्तानरहितो भृशम्।<br>तस्य भार्या सुविख्याता रुक्मरेखेति नामतः॥ ३७<br>सुरूपा चतुरा साध्वी सर्वलक्षणसंयुता।<br>अपुत्रा दुःखिता कान्तमित्युवाच पुनः पुनः॥ ३८<br>किं जीवितेन मे नाथ धिग्वृथा जीवितं मम।<br>वन्ध्यायाः सुखहीनाया ह्यपुत्राया धरातले॥ ३९ | राजाके ऐसा कहनेपर उसे सुनकर मधुरभाषिणी कन्याने कहा—हे राजेन्द्र! सुनिये, मैं आपको अपने शोकका कारण बता रही हूँ। हे राजन्! विपदारहित प्राणी भला क्यों रोयेगा? हे महाबाहो! मैं जिसलिये रो रही हूँ, वह आपको बता रही हूँ। आपके राज्यसे भिन्न दूसरे देशमें रैभ्य नामक एक महान् धार्मिक राजा हैं, वे महाराज सन्तानहीन हैं, उनकी पत्नी रुक्मरेखा—इस नामसे प्रसिद्ध हैं। वे परम रूपवती, बुद्धिमती, पतिव्रता तथा समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न हैं। पुत्रहीन होनेसे दुःखित रहनेके कारण वे अपने पतिसे बार-बार कहा करती थीं—हे नाथ! मेरे इस जीवनसे क्या लाभ? इस जगत्में मुझ वन्ध्या, पुत्रहीन तथा सुखरहित नारीके इस व्यर्थ जीवनको धिक्कार है॥ ३४—३९॥ |
| इत्येवं भार्यया भूपः प्रेरितो मखमुत्तमम्।<br>चकार ब्राह्मणांस्तज्ज्ञानाहूय विधिवत्तदा॥ ४० | इस प्रकार अपनी भार्यासे प्रेरणा पाकर राजा रैभ्यने यज्ञके ज्ञाता ब्राह्मणोंको बुलाकर विधिवत् उत्तम यज्ञ सम्पन्न किया॥ ४०॥ |
| पुत्रकामो धनं भूरि ददावथ यथोदितम्।<br>हूयमाने घृतेऽत्यर्थं पावकादतिसुप्रभात्॥ ४१<br>आविर्बभूव चार्वङ्गी कन्यका शुभलक्षणा।<br>बिम्बोष्ठी सुदती सुभ्रूः पूर्णचन्द्रनिभानना॥ ४२<br>कनकाभा सुकेशान्ता रक्तपाणितला मृदुः।<br>सुरक्तनयना तन्वी रक्तपादतला भृशम्॥ ४३ | पुत्राभिलाषी राजा रैभ्यने शास्त्रोक्त रीतिसे प्रचुर धन दान दिया। घृतकी आहुति अधिक पड़ते रहनेसे तीव्र प्रभायुक्त अग्निसे सुन्दर अंगोंवाली, शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न, बिम्बाफलके समान ओष्ठवाली, सुन्दर दाँतों तथा भौंहोंवाली, पूर्ण चन्द्रमाके समान मुखवाली, स्वर्णके समान आभावाली, सुन्दर केशोंवाली, रक्त हथेलियोंवाली, कोमल, सुन्दर लाल नेत्रोंवाली, कृश शरीरवाली तथा रक्त पादतल [तलवे]-वाली एक कन्या प्रकट हुई॥ ४१—४३॥ |
| हुताशनात्समुद्भूता होत्रा सा स्वीकृता तदा।<br>होता प्रोवाच राजानं गृहीत्वा तां सुमध्यमाम्॥ ४४<br>राजन् पुत्रीं गृहाणेमां सर्वलक्षणसंयुताम्।<br>एकावलीव सम्भूता हूयमानाद्धुताशनात्॥ ४५ | तब होताने अग्निसे उत्पन्न हुई उस कन्याको स्वीकार कर लिया। इसके बाद उस सुन्दर कन्याको लेकर होताने राजा रैभ्यसे कहा—हे राजन्! समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न इस पुत्रीको ग्रहण कीजिये। हवन करते समय अग्निसे उत्पन्न यह कन्या मोतियोंकी मालाके समान प्रतीत होती है। अतः हे राजन्! यह |
| ८२८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २१ |
|---|
| नाम्ना चैकावली लोके ख्याता पुत्री भविष्यति।<br>सुखितो भव भूपाल पुत्र्या पुत्रसमानया॥ ४६<br><br>सन्तोषं कुरु राजेन्द्र दत्ता देवेन विष्णुना।<br>होतुर्वाक्यं नृपः श्रुत्वा दृष्ट्वा तां कन्यकां शुभाम्॥ ४७<br><br>जग्राह परमप्रीतो होत्रा दत्तां सुसम्मताम्।<br>गृहीत्वा नृपतिस्तां तु ददौ पत्न्यै वराननाम्॥ ४८<br><br>आभाष्य रुक्मरेखायै गृहाण सुभगे सुताम्।<br>सा तां कमलपत्राक्षीं प्राप्य कन्यां मनोरमाम्॥ ४९<br><br>जहर्ष मुदिता राज्ञी पुत्रं प्राप्य यथासुखम्।<br>चकार मङ्गलं कर्म जातकर्मादिकं शुभम्॥ ५०<br><br>पुत्रजन्मसमुत्थं यत्तत्सर्वं विधिवत्ततः।<br>समाप्य च मखं राजा द्विजेभ्यो दक्षिणां शुभाम्॥ ५१<br><br>दत्त्वा विसृज्य विप्रेन्द्रान् मुदं प्राप महीपतिः।<br>दिने दिनेऽसितापाङ्गी पुत्रवृद्ध्या भृशं बभौ॥ ५२<br><br>मुदं च परमां प्राप नृपभार्या सुतान्विता।<br>उत्सवस्तद्दिने तस्य प्रवृत्तः सुतजन्मजः॥ ५३<br><br>पुत्री पुत्रसमात्यर्थं बभूव वल्लभा किल।<br>राज्ञो मन्त्रिसुता चाहं सुबुद्धे मन्मथाकृते॥ ५४<br><br>यशोवती च मे नाम समानं वय आवयोः।<br>वयस्याहं कृता राज्ञा क्रीडनाय तया सह॥ ५५<br><br>सदा सहचरी जाता प्रेमयुक्ता दिवानिशम्।<br>एकावली गन्धवन्ति यत्र पद्मानि पश्यति॥ ५६<br><br>तत्र सा रमते बाला नान्यत्र सुखमाप्नुयात्।<br>सुदूरे जाह्नवतीरे भवन्ति कमलान्यपि॥ ५७ | पुत्री जगत्में 'एकावली' नामसे प्रसिद्ध होगी। पुत्रतुल्य इस कन्याको प्राप्तकर आप सुखी हो जायें। हे राजेन्द्र! सन्तोष कीजिये; भगवान् विष्णुने आपको यह कन्या दी है॥ ४४–४६ १/२॥<br><br>होताकी बात सुनकर राजाने उस सुन्दर कन्याकी ओर देखकर होताके द्वारा प्रदत्त उस कन्याको अति प्रसन्न होकर ले लिया। राजाने सुन्दर मुखवाली उस कन्याको ले करके अपनी पत्नी रुक्मरेखाको यह कहकर दे दिया कि हे सुभगे! इस कन्याको स्वीकार करो। कमलपत्रके समान नेत्रोंवाली उस मनोहर कन्याको पाकर रानी बहुत हर्षित हुईं; वे ऐसी सुखी हो गयीं मानो उन्हें पुत्र प्राप्त हो गया हो॥ ४७–४९ १/२॥<br><br>तत्पश्चात् राजाने उसके जातकर्म आदि सभी शुभ मंगल कार्य सम्पन्न किये तथा पुत्रजन्मके अवसरपर होनेवाले जो कुछ भी कार्य थे, वे सब उन्होंने विधिपूर्वक सम्पन्न कराये। यज्ञ सम्पन्न करके राजा रैभ्य ब्राह्मणोंको विपुल दक्षिणा देकर तथा सभी विप्रेन्द्रोंको विदाकर अत्यन्त आनन्दित हुए॥ ५०–५१ १/२॥<br><br>श्याम नेत्रोंवाली वह कन्या पुत्रवृद्धिके समान दिनोंदिन बढ़ने लगी। उसे देखकर उस समय रानी अपनेको पुत्रवती समझकर परम आनन्दित हुई। उस दिन महलमें ऐसा उत्सव मनाया गया, जैसा पुत्रजन्मके अवसरपर मनाया जाता है। वह पुत्री उन दोनोंके लिये पुत्रके ही सदृश प्रिय हो गयी॥ ५२–५३ १/२॥<br><br>हे सुबुद्धे! हे कामदेवसदृश रूपवाले! मैं उन्हीं राजा रैभ्यके मन्त्रीकी पुत्री हूँ। मेरा नाम यशोवती है। मेरी तथा एकावलीकी अवस्था समान है। उसके साथ खेलनेके लिये राजाने मुझे उसकी सखी बना दिया। इस प्रकार मैं उसकी सहचरी बनकर प्रेमपूर्वक दिन-रात उसके साथ रहने लगी॥ ५४–५५ १/२॥<br><br>एकावली जहाँ भी सुगन्धित कमल देखती थी, वह बाला वहीं खेलने लग जाती थी; अन्यत्र कहीं भी उसे सुख नहीं मिलता था। [एक बार] गंगाके तटपर बहुत दूर कमल खिले हुए थे। राजकुमारी एकावली सखियोंसहित मेरे साथ घूमती हुई वहाँ |
| अ० २२ ] | षष्ठ स्कन्ध | ८२९ |
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| रममाणा तत्र याता मत्समेता सखीयुता।<br>मया निवेदितं राजन् पुत्री ते कमलाकरान् ॥ ५८<br><br>प्रेक्षमाणातिदूरे सा प्रयाति निर्जने वने।<br>निषेधिताथ पित्रासौ गृहे कृत्वा जलाशयान् ॥ ५९<br><br>कमलान् वापयित्वाथ पुष्पितान् भ्रमरावृतान्।<br>तथापि निर्ययौ बाला कमलासक्तचेतना ॥ ६०<br><br>तदा राज्ञा रक्षपालाः प्रेरिताः शस्त्रपाणयः।<br>एवं रक्षायुता तन्वी मत्समेता सखीयुता।<br>क्रीडार्थं जाह्नवीतोये नित्यमायाति याति च ॥ ६१ | चली गयी। [इससे चिन्तित होकर] मैंने महाराज रैभ्यसे कहा—हे राजन्! आपकी पुत्री एकावली कमलोंको देखती हुई बहुत दूर निर्जन वनमें चली जाती है। तब उसके पिताने घरपर ही अनेक जलाशयोंका निर्माण कराकर उनमें पुष्पित तथा भौंरोंसे आवृत्त कमल लगवाकर उसे दूर जानेसे मना कर दिया। इसपर भी मनमें कमलोंके प्रति आसक्ति रखनेवाली वह कन्या बाहर निकल जाती थी। तब राजाने उसके साथ हाथोंमें शस्त्र धारण किये हुए रक्षक नियुक्त कर दिये। इस प्रकार रक्षित होकर वह सुन्दरी मेरे तथा सखियोंसहित क्रीडाके लिये गङ्गातटपर प्रतिदिन आया-जाया करती थी॥ ५६—६१॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे राजपुत्र्या एकावल्या वर्णनं नामैकविंशोऽध्यायः॥ २१॥
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अथ द्वाविंशोऽध्यायः
यशोवतीका एकवीरसे कालकेतुद्वारा एकावलीके अपहृत होनेकी बात बताना
| यशोवत्युवाच | यशोवती बोली— |
|---|---|
| प्रातरुत्थाय तन्वङ्गी चलिता च सखीयुता।<br>चामरैर्वीज्यमाना सा रक्षिता बहुरक्षिभिः॥ १<br><br>सायुधैश्चातिसन्नद्धैः सहिता वरवर्णिनी।<br>क्रीडार्थमत्र राजेन्द्र सम्प्राप्ता नलिनीं शुभाम्॥ २ | एक बार वह सुन्दरी एकावली प्रातःकाल उठकर अपनी सखियोंके साथ बाहर निकल पड़ी। वह बहुत-से रक्षकोंसे रक्षित थी तथा उसके ऊपर चँवर डुलाये जा रहे थे। हे राजेन्द्र! वह सुन्दरी यहाँ सुन्दर कमलोंके पास क्रीड़ा करनेके लिये आयी थी॥ १-२॥ |
| अहमप्यनया सार्धं गङ्गातीरे समागता।<br>अप्सरोभिः समेता च कमलैः क्रीडमानया॥ ३ | कमलोंसे खेलनेकी रुचिवाली इस कन्याके साथ मैं भी अप्सराओंसहित गङ्गाके तटपर आयी थी॥ ३॥ |
| एकावली तथा चाहं जाते क्रीडापरे यदा।<br>सहसैव तदायातो दानवो बलसंयुतः॥ ४<br><br>कालकेतुरिति ख्यातो राक्षसैर्बहुभिर्वृतः।<br>परिघासिगदाचापबाणतोमरपाणिभिः ॥ ५ | जब मैं तथा एकावली दोनों खेलनेमें व्यस्त हो गयीं, उसी समय हाथोंमें परिघ, तलवार, गदा, धनुष, बाण तथा तोमर धारण किये हुए बहुत-से राक्षसोंके साथ कालकेतु नामक बलवान् दानव वहाँ अकस्मात् आ पहुँचा॥ ४-५॥ |
| दृष्टा चैकावली तेन रूपयौवनशालिनी।<br>द्वितीया कामपत्नीव क्रीडमाना सुपङ्कजैः॥ ६ | उसने कमलोंके साथ क्रीडा करती हुई उस रूप-यौवनसम्पन्न तथा दूसरी कामपत्नी रतिकी भाँति प्रतीत हो रही एकावलीको देख लिया॥ ६॥ |
| मयोक्तैकावली राजन् कोऽयं दैत्यः समागतः।<br>गच्छावो रक्षपालानां मध्ये पङ्कजलोचने॥ ७ | हे राजन्! मैंने एकावलीसे कहा—हे कमलनयने! यह कौन-सा दैत्य आ गया है! अब हम दोनों रक्षकोंके पास भाग चलें॥ ७॥ |
| ८३० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २२ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| विमृश्यैवं सखी चाहं त्वरयैव गते भयात्।<br>मध्ये वै सैनिकानां तु सायुधानां नृपात्मज॥ ८ | हे राजकुमार! इस प्रकार विचारविमर्श करके सखी एकावली तथा मैं भयभीत होनेके कारण शस्त्रधारी सैनिकोंके बीच तुरंत चली गयी॥ ८॥ |
| कालकेतुस्तु तां दृष्ट्वा मोहिनीं मदनातुरः।<br>गदां गुर्वीं गृहीत्वा तु धावमानः समागतः॥ ९<br><br>रक्षकान्दूरतः कृत्वा जग्राहाम्बुजलोचनाम्।<br>त्रस्तां वेपथुसंयुक्तां क्रन्दमानां कृशोदरीम्॥ १० | वह कामातुर कालकेतु उस मोहिनी एकावलीको देखकर अपनी विशाल गदा लेकर दौड़ता हुआ पासमें आ गया और उसने रक्षकोंको हटाकर डरके मारे काँपती तथा रोती हुई कृश कटिप्रदेशवाली तथा कमलके समान नेत्रोंवाली एकावलीको पकड़ लिया॥ ९-१०॥ |
| त्यजैनां मां गृहाणेति मया चोक्तोऽपि दानवः।<br>न मां जग्राह कामार्तस्तां गृहीत्वा विनिःसृतः॥ ११ | ‘इस राजकुमारीको छोड़ दो और मुझे ग्रहण कर लो’—ऐसा मेरे कहनेपर भी उसने मुझे स्वीकार नहीं किया और कामके वशीभूत वह दानव एकावलीको लेकर वहाँसे निकल गया॥ ११॥ |
| तिष्ठ तिष्ठेति भाषन्तो रक्षकास्तं महाबलम्।<br>प्रतिषिध्य तु संग्रामं चक्रुर्विस्मयकारकम्॥ १२ | रक्षकोंने ‘ठहरो-ठहरो’—ऐसा कहते हुए उस महाबलीको रोककर उसके साथ विस्मयकारक युद्ध किया॥ १२॥ |
| तस्यापि राक्षसाः क्रूराः सर्वतः शस्त्रपाणयः।<br>युयुधु रक्षकैः सार्धं स्वामिकार्ये कृतोद्यमाः॥ १३<br><br>संग्रामस्तु तदा जातः कालकेतोस्तथा रणे।<br>निहत्य रक्षकान्सर्वान्गृहीत्वैनां महाबलः॥ १४<br><br>युक्तो राक्षससैन्येन निर्जगाम पुरं प्रति।<br>वीक्ष्य तां रुदतीं बालां गृहीतां दानवेन तु॥ १५<br><br>पृष्ठतोऽहं गता तत्र यत्र नीता सखी मम।<br>विक्रोशन्ती यथा सा मां पश्येदिति पदानुगा॥ १६ | अपने स्वामीके कार्यमें पूर्ण तत्पर तथा हाथोंमें शस्त्र धारण किये उसके सभी क्रूर राक्षसों ने भी रक्षकोंके साथ भीषण युद्ध किया। तब उन रक्षकोंके साथ कालकेतुका संग्राम होने लगा। वह महाबली युद्धमें सभी रक्षकोंको मारकर तथा एकावलीको लेकर राक्षसी सेनाके साथ अपने नगरके लिये चल दिया। दानव कालकेतुके द्वारा अधिकारमें की गयी उस राजकुमारीको रोती हुई देखकर मैं उसके पीछे-पीछे वहीं पहुँच जाती थी, जहाँ कालकेतु मेरी सखीको लेकर जाता था जिससे कि रोती हुई वह मुझे अपने पीछे आते हुए देख ले॥ १३—१६॥ |
| सापि मामागतां वीक्ष्य किञ्चित्स्वस्थाभवत्तदा।<br>गताहं तत्समीपे तु तामाभाष्य पुनः पुनः॥ १७ | मुझे आयी हुई देखकर वह भी कुछ स्वस्थचित्त हुई तब मैं उसके पास जाकर उससे बार-बार बातें करने लगी॥ १७॥ |
| सा मां प्राप्यातिदुःखार्ता स्तम्भस्वेदसमाकुला।<br>कण्ठे गृहीत्वा मां भूप रुरोद भृशदुःखिता॥ १८ | हे राजन्! दुःखसे व्याकुल तथा पसीनेसे संसिक्त उस एकावलीने मुझे पकड़कर गलेसे लगा लिया और वह अत्यन्त दुःखित होकर रोने लगी॥ १८॥ |
| स मामाह कालकेतुः प्रीतिपूर्वमिदं वचः।<br>समाश्वासय भीतां त्वं सखीं चञ्चललोचनाम्॥ १९ | तत्पश्चात् उस कालकेतुने प्रेम प्रदर्शित करते हुए मुझसे यह बात कही कि चंचल नेत्रोंवाली अपनी इस भयग्रस्त सखीको धीरज बँधाओ और अपनी इस सखीसे [मेरी बात] कहो—‘हे प्रिये! देवलोकके समान अत्यन्त |
अ० २२ ] षष्ठ स्कन्ध ८३१
अ० २२ ] षष्ठ स्कन्ध ८३१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| प्राप्तं ममाद्य नगरं देवलोकसमं प्रिये।<br>दासोऽस्मि तव रत्या हि कस्मात्क्रन्दसि कातरा ॥ २०<br><br>कथयैनां सखीं तेऽद्य स्वस्था भव सुलोचने।<br>इत्युक्त्वा मां सखीपार्श्वे समारोप्य रथोत्तमे ॥ २१<br><br>जगाम तरसा दुष्टः पुरे स्वस्य मनोहरे।<br>सैन्येन महता युक्तः प्रफुल्लवदनाम्बुजः ॥ २२ | सुन्दर मेरा नगर अब आ ही गया है। तुम्हारे प्रेमके कारण मैं तुम्हारा दास हो चुका हूँ। तुम भयभीत होकर क्यों विलाप कर रही हो? हे सुलोचने! अब शान्त हो जाओ'—ऐसा कहकर उसी उत्तम रथमें सखीके पास मुझे भी बैठाकर प्रसन्नताके कारण खिले हुए कमलके समान मुखवाला दुष्ट कालकेतु अपनी भारी सेनाके साथ अपने सुन्दर नगरके लिये शीघ्र ही चल दिया ॥ १९–२२ ॥ |
| एकावलीं तथा मां च संस्थाप्य धवले गृहे।<br>राक्षसान् गृहरक्षार्थं कल्पयामास कोटिशः ॥ २३ | वहाँ उस दानवने मुझे तथा एकावलीको एक दिव्य महलमें ठहराकर उस महलकी रक्षाके लिये करोड़ों राक्षस नियुक्त कर दिये ॥ २३ ॥ |
| द्वितीये दिवसे सोऽथ मामुवाच रहो नृप।<br>प्रबोधय सखीं बालां शोचन्तीं विरहातुराम् ॥ २४<br><br>पत्नी मे भव सुश्रोणि सुखं भुङ्क्ष्व यथेप्सितम्।<br>राज्यं त्वदीयं चन्द्रास्ये सेवकोऽहं सदा तव ॥ २५ | हे राजन्! दूसरे दिन उस कालकेतुने एकान्तमें मुझसे कहा—विरहसे दुःखित तथा शोक करती हुई अपनी सुन्दर सखीको [मेरे शब्दोंमें] समझाओ—'हे सुश्रोणि! तुम मेरी पत्नी हो जाओ और फिर यथेच्छ सुखोपभोग करो। हे चन्द्रमुखि! अब यह राज्य तुम्हारा है और मैं सदाके लिये तुम्हारा सेवक बन गया हूँ' ॥ २४-२५ ॥ |
| पुनरुक्तं मया वाक्यं श्रुत्वा तद्भाषितं खरम्।<br>नाहं क्षमाप्रियं वक्तुं त्वमेनां कथय प्रभो ॥ २६ | उसका ऐसा दुर्वचन सुनकर मैंने उससे यह बात कही कि हे प्रभो! मैं ऐसा अप्रिय वाक्य नहीं कह सकती, अतः आप ही इससे कहिये ॥ २६ ॥ |
| इत्युक्ते वचने दुष्टो मदनक्षतमानसः।<br>उवाच विनयादेनां सखीं क्षामोदरीं प्रियाम् ॥ २७ | मेरे ऐसा कहनेपर कामसे आहत चित्तवाले उस दुष्ट दानवने कृश उदरवाली मेरी उस प्रिय सखीसे विनयपूर्वक कहा— ॥ २७ ॥ |
| कृशोदरि त्वया मन्त्रो निक्षिप्तोऽस्ति ममोपरि।<br>तेन मे हृदयं कान्ते हृतं ते वशतां गतम् ॥ २८<br><br>तेनाहं तव दासोऽद्य कृतोऽस्मीति विनिश्चयः।<br>भज मां कामबाणेन पीडितं विवशं भृशम् ॥ २९<br><br>यौवनं याति रम्भोरु चञ्चलं दुर्लभं तदा।<br>सफलं कुरु कल्याणि पतिं मां परिरभ्य च ॥ ३० | हे कृशोदरि! तुमने मेरे ऊपर कोई मन्त्र-प्रयोग कर दिया है। हे कान्ते! उसीसे मोहित होकर मेरा मन तुम्हारे वशमें हो चुका है। उसी मन्त्रने मुझे अब तुम्हारा दास बना दिया है, इसमें कोई सन्देह नहीं है। इसलिये कामबाणसे आहत मुझ अत्यन्त विवशको अब तुम स्वीकार कर लो। हे रम्भोरु! तुम्हारा दुर्लभ तथा चंचल यौवन व्यर्थ जा रहा है। इसलिये हे कल्याणि! पतिभावसे मेरा आलिंगन करके इसे सफल कर लो ॥ २८–३० ॥ |
| एकावल्युवाच<br>पित्राहं कल्पिता पूर्वं दातुं राजसुताय वै।<br>हैहयस्तु महाभाग स मया मनसा वृतः ॥ ३१ | एकावली बोली—मेरे पिता राजकुमार हैहयको मुझे देनेका पहले ही निश्चय कर चुके हैं। मैंने भी उन महाभागका मनसे वरण कर लिया है ॥ ३१ ॥ |
| ८३२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २२ |
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| कथमन्यं भजे कान्तं त्यक्त्वा धर्मं सनातनम्।<br>कन्याधर्मं विहायाद्य वेत्सि शास्त्रविनिश्चयम् ॥ ३२<br><br>यस्मै दद्यात्पिता कामं कन्या तं पतिमाप्नुयात्।<br>परतन्त्रा सदा कन्या न स्वातन्त्र्यं कदाचन ॥ ३३ | सनातनधर्मका त्याग करके तथा कन्याधर्म छोड़कर मैं दूसरेको पतिरूपमें कैसे स्वीकार करूँ ? आप भी तो शास्त्रीय नियमको जानते ही हैं। पिता कन्याको जिसे सौंप दे, कन्या उसीको पति बना ले। कन्या इस विषयमें सदा पराधीन रहती है, उसे स्वतन्त्रता कभी नहीं रहती ॥ ३२-३३ ॥ |
| इत्युक्तोऽपि तया पापी विरराम न मोहितः।<br>न मुमोच विशालाक्षीं मां च पार्श्वस्थितां तथा ॥ ३४ | [हे राजकुमार !] उस एकावलीके ऐसा कहनेपर भी वह पापात्मा कालकेतु राजकुमारीपर मोहित रहनेके कारण अपने निश्चयसे विचलित नहीं हुआ और उसने विशाल नेत्रोंवाली एकावलीको तथा उसके पासमें स्थित मुझको नहीं छोड़ा ॥ ३४ ॥ |
| पातालविवरे तस्य पुरं परमसङ्कटे।<br>राक्षसै रक्षितं दुर्गं मण्डितं परिखावृतम् ॥ ३५<br><br>तत्र तिष्ठति दुःखार्ता सखी मे प्राणवल्लभा।<br>तेनाहं विरहेणात्र ररटीमि सुदुःखिता ॥ ३६ | उस कालकेतुका नगर अनेक प्रकारके संकटोंसे युक्त एक पाताल-विवरमें विद्यमान है। वहींपर चारों ओर खाइयोंसे घिरा हुआ तथा राक्षसोंसे पूर्णतया रक्षित उसका सुन्दर दुर्ग है। मेरी प्राणप्यारी सखी एकावली वहींपर दुःखके साथ पड़ी हुई है। इसलिये उसके विरहसे अत्यन्त व्यथित होकर मैं यहाँ विलाप कर रही हूँ ॥ ३५-३६ ॥ |
| एकवीर उवाच<br>कथं त्वमत्र सम्प्राप्ता पुरातत्तस्य दुरात्मनः।<br>विस्मयो मे महानत्र तत्त्वं ब्रूहि वरानने ॥ ३७ | एकवीरने कहा—हे वरानने! उस दुष्टात्मा कालकेतुके नगरसे तुम यहाँ कैसे आ गयी ? इस बातसे मैं बहुत ही आश्चर्यचकित हूँ; तुम मुझसे इस विषयमें बताओ ॥ ३७ ॥ |
| त्वया च कथितं वाक्यं सन्दिग्धं भाति भामिनि।<br>हैहयार्थे कल्पिता सा पित्रेति मम साम्प्रतम् ॥ ३८<br><br>हैहयो नाम राजाहं नान्योऽस्ति पृथिवीपतिः।<br>मदर्थे कथिता सा किं सखी तव सुलोचना ॥ ३९ | हे भामिनि! अभी तुमने जो कहा है कि एकावलीके पिताने उसका विवाह हैहयके साथ करनेका निश्चय किया है, वह बात मुझे अत्यन्त सन्देहास्पद प्रतीत हो रही है। हैहय नामका राजा मैं ही हूँ; अन्य कोई राजा नहीं है। सुन्दर नेत्रोंवाली वह तुम्हारी सखी अपने पिताके द्वारा कहीं मेरे लिये ही तो कल्पित नहीं की गयी है ? ॥ ३८-३९ ॥ |
| एतन्मे संशयं सुभ्रु छेत्तुमर्हसि भामिनि।<br>अहं तामानयिष्यामि तं हत्वा राक्षसाधमम् ॥ ४०<br><br>स्थानं दर्शय मे तस्य यदि जानासि सुव्रते।<br>राज्ञे निवेदितं किं वा तत्पित्रे चातिदुःखिता ॥ ४१ | हे सुभ्रु! हे भामिनि! तुम मेरे इस सन्देहको दूर करो। मैं उस अधम राक्षसका वध करके उस एकावलीको ले आऊँगा। हे सुव्रते! यदि तुम उस राक्षसका स्थान जानती हो तो वह स्थान मुझे दिखा दो। उसके पिता राजा रैभ्यको तुमने यह बताया अथवा नहीं कि वह अत्यन्त दुःखित है ॥ ४०-४१ ॥ |
| अ० २२ ] | षष्ठ स्कन्ध | ८३३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| यस्यैषा वल्लभा पुत्री न किं जानाति तां हृताम्।<br>नोद्यमः किं कृतस्तेन ततो मोचनहेतवे॥ ४२ | जिसकी ऐसी प्रिय पुत्री हो, क्या वह उसके हरणको नहीं जानता? और फिर उसने एकावलीकी मुक्तिके लिये क्या कोई प्रयास नहीं किया? ॥ ४२॥ |
| बन्दीकृतां सुतां ज्ञात्वा कथं तिष्ठति सुस्थिरः।<br>असमर्थो नृपः किं वा कारणं ब्रूहि सत्वरम्॥ ४३ | अपनी पुत्रीको बन्दी बनाया गया जाननेके बाद भी राजा स्थिरचित्त होकर कैसे चुप बैठे हैं? अथवा राजा कुछ कर पानेमें असमर्थ तो नहीं हैं? मुझे इसका कारण शीघ्र बताओ॥ ४३॥ |
| त्वया मेऽपहृतं चेतो गुणानुक्त्वा ह्यमानुषान्।<br>सख्याः पङ्कजपत्राक्षि कृतः कामवशो भृशम्॥ ४४ | हे कमलनयने! तुमने अपनी सखीके अलौकिक गुणोंको बताकर मेरे चित्तको हर लिया है तथा मैं पूर्ण-रूपसे कामके वशीभूत कर दिया गया हूँ॥ ४४॥ |
| कदा पश्यामि तां कान्तां मोचयित्वातिसङ्कटात्।<br>इति मे हृदयं चाद्य करोत्यतिमनोरथम्॥ ४५ | अब तो मेरे मनकी यही अभिलाषा है कि उस प्रियाको इस महान् संकटसे मुक्त करके मैं उसे कब देख लूँ॥ ४५॥ |
| ब्रूहि मे गमनोपायं पुरे तस्यातिदुर्गमे।<br>कथं त्वमागता तस्मात्सङ्कटादत्र तद्वद॥ ४६ | अब उस दानवके अत्यन्त दुर्गम नगरमें जानेका उपाय मुझे बताओ और यह भी बताओ कि उस महान् संकटसे छूटकर तुम यहाँ कैसे आयी? ॥ ४६॥ |
| यशोवत्युवाच<br>बालभावान्मया मन्त्रो भगवत्या विशांपते।<br>प्राप्तोऽस्ति ब्राह्मणात्सिद्धात्सबीजध्यानपूर्वकः॥ ४७ | यशोवती बोली—हे राजन्! मैंने बाल्यावस्थासे ही एक सिद्ध ब्राह्मणसे बीज तथा ध्यानसहित भगवतीका मन्त्र प्राप्त किया है॥ ४७॥ |
| तत्रावस्थितया राजन् मया चित्ते विचारितम्।<br>आराधयामि सततं चण्डिकां चण्डविक्रमाम्॥ ४८<br><br>सा देवी सेविता कामं बन्धमोक्षं करिष्यति।<br>भक्तानुकम्पिनी शक्तिः समर्था सर्वसाधने॥ ४९<br><br>या विश्वं सृजते शक्त्या पालयत्येव सा पुनः।<br>कल्पान्ते संहरत्येव निराकारा निराश्रया॥ ५०<br><br>इति सञ्चिन्त्य मनसा देवीं विश्वेश्वरीं शिवाम्।<br>ध्यात्वा रक्ताम्बरां सौम्यां सुरक्तनयनां हृदि॥ ५१<br><br>संस्मृत्य मनसा रूपं मन्त्रजाप्यपराभवम्।<br>उपासिता मया देवी मासमेकं समाधिना॥ ५२ | हे राजन्! जब मैं कालकेतुके यहाँ थी तभी मैंने अपने मनमें सोचा कि अब मैं प्रचण्ड पराक्रमवाली भगवती चण्डिकाकी निरन्तर आराधना करूँ। वे भगवती पूर्णरूपसे आराधित होनेपर निश्चितरूपसे मुझे इस बन्धनसे मुक्त करेंगी; क्योंकि भक्तोंपर अनुकम्पा करनेवाली वे शक्तिस्वरूपा चण्डिका सब कुछ करनेमें समर्थ हैं। जो निराकार तथा निरालम्ब भगवती अपनी शक्तिसे जगत्का सृजन करती हैं तथा पालन करती हैं, वे ही कल्पके अन्तमें उसका संहार भी कर देती हैं। मनमें ऐसा सोचकर मैं विश्वकी अधिष्ठात्री, कल्याणकारिणी, लाल वस्त्र धारण करनेवाली, सौम्य विग्रहवाली तथा सुन्दर रक्त नयनोंवाली भगवतीका ध्यान करके मन-ही-मन उनके रूपका स्मरण करके मन्त्रका जप करनेमें तत्पर हो गयी। इस प्रकार मैं समाधि लगाकर एक माहतक भगवती जगदम्बाकी उपासना करती रही॥ ४८–५२॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—27 A
| ८३४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २२ |
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| स्वप्ने मम समायाता भक्तिभावेन तोषिता।<br>मामाहामृतया वाचा किं सुप्तासीति चण्डिका॥ ५३<br><br>उत्तिष्ठ याहि तरसा गङ्गातीरं मनोहरम्।<br>आगमिष्यति तत्रासौ हैहयो नृपपुङ्गवः॥ ५४<br><br>एकवीरो महाबाहुः सर्वशत्रुविमर्दनः।<br>दत्तात्रेयेण मन्मन्त्रो महाविद्याभिधः परः॥ ५५<br><br>दत्तोऽस्मै सोऽपि सततं मामुपास्तेऽतिभक्तितः।<br>मय्यासक्तमतिर्नित्यं मम पूजापरायणः॥ ५६<br><br>मामेव सर्वभूतेषु ध्यायन्नास्ते च मत्परः।<br>स ते दुःखविनाशं वै करिष्यति महामतिः॥ ५७<br><br>मासुतो विहरंस्तत्र तव त्राता भविष्यति।<br>हत्वा तं राक्षसं घोरं मोचयिष्यति मानिनीम्॥ ५८<br><br>एकावलीमेकवीरः सर्वशास्त्रविशारदः।<br>पश्चात्सैव पतिः कार्यस्त्वया राजसुतः शुभः॥ ५९ | तत्पश्चात् मेरे भक्तिभावसे प्रसन्न होकर देवी चण्डिकाने मुझे स्वप्नमें दर्शन दिया और अमृतमयी वाणीमें मुझसे कहा—‘तुम सोयी क्यों हो? उठो और तत्काल गङ्गाजीके मनोहर तटपर चली जाओ; वहींपर विशाल भुजाओंवाले तथा सभी शत्रुओंका दमन करनेवाले नृपश्रेष्ठ हैहय एकवीर आयेंगे। दत्तात्रेयजीने महाविद्या नामक मेरा श्रेष्ठ मन्त्र उन्हें प्रदान किया है। वे भी भक्तिपूर्वक निरन्तर मेरी उपासना करते रहते हैं। उनका मन सदा मुझमें लगा रहता है तथा वे सदा मेरी पूजामें रत रहते हैं। मेरे प्रति आसक्तिभाव रखनेवाले वे सभी प्राणियोंमें एकमात्र मुझे ही देखते हुए सदा मेरे ही परायण रहते हैं। वे महामति एकवीर ही तुम्हारा दुःख दूर करेंगे। वे लक्ष्मीपुत्र एकवीर घूमते हुए गङ्गातटपर आकर तुम्हारी रक्षा करेंगे और उस भयानक राक्षस कालकेतुका वध करके मानिनी एकावलीको मुक्त करेंगे। इसके बाद तुम समस्त शास्त्रोंमें निष्णात उन्हीं सुन्दर राजकुमार एकवीरके साथ एकावलीका विवाह करवा देना’॥ ५३-५९॥ |
| इत्युक्त्वान्तर्दधे देवी प्रबुद्धाहं तदैव हि।<br>कथितं स्वप्नवृत्तान्तं देव्याश्चाराधनं तथा॥ ६० | ऐसा कहकर देवी अन्तर्धान हो गयीं और मैं उसी समय जग गयी। तत्पश्चात् मैंने स्वप्नका वृत्तान्त तथा देवीकी आराधनाकी बात एकावलीको बतायी॥ ६०॥ |
| प्रसन्नवदना जाता श्रुत्वा सा कमलेक्षणा।<br>विशेषेण च सन्तुष्टा मामुवाच शुचिस्मिता॥ ६१<br><br>गच्छ तत्र त्वरायुक्ता कुरु कार्यं मम प्रिये।<br>सत्यवाक्या भगवती सावां मोक्षं विधास्यति॥ ६२ | सारी बातें सुनकर उस कमलनयनीके मुख-मण्डलपर प्रसन्नता छा गयी। अत्यन्त सन्तुष्ट होकर पवित्र मुसकानवाली एकावलीने मुझसे कहा—हे प्रिये! तुम वहाँ शीघ्रतापूर्वक जाओ और मेरा कार्य सिद्ध करो। जो भगवती सत्य वाणीवाली हैं, वे हम दोनोंको मुक्त करेंगी॥ ६१-६२॥ |
| इत्याज्ञप्ता तया चाहं सख्या वै प्रेमयुक्तया।<br>मत्वोपसरणं युक्तं तस्मात्स्थानात्तदा नृप॥ ६३<br><br>चालिताहं ततः शीघ्रं महादेवीप्रसादतः।<br>मार्गज्ञानं शीघ्रगतिर्मया प्राप्ता नृपात्मज॥ ६४ | हे राजन्! सखी एकावलीके इस प्रकार प्रेमपूर्वक आदेश देनेपर उस समय प्रस्थान कर देना उचित समझकर मैं उस स्थानसे तुरंत चल पड़ी। हे राजकुमार! भगवती जगदम्बाकी कृपासे मार्गकी जानकारी तथा द्रुतगतिसे चलनेकी क्षमता मुझे प्राप्त हो गयी थी॥ ६३-६४॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—27 B
| अ० २३ ] | षष्ठ स्कन्ध | ८३५ |
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| इत्येतत्कथितं सर्वं कारणं मम दुःखजम्।<br><br>कस्त्वं कस्य सुतश्चेति वद वीर यथा तथा॥ ६५ | हे वीर ! इस प्रकार मैंने अपने दुःखी होनेका समस्त कारण आपको बता दिया। अब जिस प्रकार मैंने आपको अपने विषयमें बताया, उसी प्रकार आप भी बताइये कि आप कौन हैं तथा किसके पुत्र हैं ? ॥ ६५ ॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे हैहयैकवीराय यशोवत्यैकावलीमोचनाय देवीस्वप्नवर्णनं नाम द्वाविंशोऽध्यायः ॥ २२ ॥
अथ त्रयोविंशोऽध्यायः
भगवतीके सिद्धिप्रदायक मन्त्रसे दीक्षित एकवीरद्वारा कालकेतुका वध, एकवीर और एकावलीका विवाह तथा हैहयवंशकी परम्परा
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| व्यास उवाच<br>तस्यास्तु वचनं श्रुत्वा रमापुत्रः प्रतापवान्।<br>प्रफुल्लवदनाम्भोजस्तामुवाच विशांपते॥ १ | व्यासजी बोले— हे राजन्! उस यशोवतीकी बात सुनकर लक्ष्मीपुत्र प्रतापी एकवीरका मुखारविन्द प्रसन्नतासे खिल उठा और वे उससे कहने लगे— ॥ १ ॥ |
| राजोवाच<br>रम्भोरु यस्त्वया पृष्टो वृत्तान्तो विशदाक्षरः।<br>हैहयोऽहं चैकवीरनाम्ना सिन्धुसुतासुतः॥ २ | राजा बोले— हे रम्भोरु! जो तुमने सुन्दर वाणीमें मेरा वृत्तान्त पूछा है, वह सुनो। एकवीर नामसे प्रसिद्ध लक्ष्मीपुत्र हैहय मैं ही हूँ॥ २ ॥ |
| मनो मे यत्त्वया नूनं परतन्त्रं कृतं किल।<br>किं करोमि क्व गच्छामि विरहेणातिपीडितः॥ ३ | [एकावलीके विषयमें वर्णन करके] तुमने मेरे मनको परतन्त्र बना दिया है। विरहसे अत्यन्त पीडित मैं अब क्या करूँ, कहाँ जाऊँ? ॥ ३ ॥ |
| प्रथमं रूपमाख्यातं सर्वलोकातिगं त्वया।<br>तेन मे विह्वलं जातं कामबाणहतं मनः॥ ४ | तुमने सर्वप्रथम एकावलीके सम्पूर्ण लोकको तिरस्कृत कर देनेवाले रूपका जो वर्णन किया है, उससे मेरा मन कामबाणसे आहत होकर व्याकुल हो उठा है॥ ४॥ |
| ततस्तस्या गुणाः प्रोक्तास्तैस्तु चित्तं हृतं पुनः।<br>यत्त्वयोक्तं पुनर्वाक्यं तेन मे विस्मयोऽभवत्॥ ५ | तत्पश्चात् तुमने उसके जिन गुणोंका मुझसे वर्णन किया है, उनके द्वारा मेरा चित्त हर लिया गया है। पुनः तुमने जो बात कही, इससे मुझे बहुत विस्मय हो गया है। दानव कालकेतुके सामने एकावलीने यह बात कही थी कि मैं हैहयका वरण कर चुकी हूँ, उसके अतिरिक्त मैं किसी अन्यका वरण नहीं कर सकती; यह मेरा निश्चय है। हे तन्वंगि! एकावलीके इस कथनके द्वारा तुमने मुझे उसका दास बना दिया है। हे सुन्दर केशोंवाली! तुम्हीं बताओ, अब मैं तुम दोनोंके लिये क्या करूँ ? ॥ ५—७ ॥ |
| एकावल्या वचः प्रोक्तं दानवाग्रे मया वृतः।<br>हैहयस्तं विना नान्यं वृणोमीति विनिश्चयः॥ ६ | |
| तेन वाक्येन तन्वङ्गि भृत्योऽहमधुना कृतः।<br>त्वया तस्याः सुकेशान्ते ब्रूहि किं करवाणि वाम्॥ ७ |
| ८३६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २३ |
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| स्थानं तस्य न जानामि राक्षसस्य दुरात्मनः।<br>गतिर्मे नास्ति गमने पुरे तस्मिन्सुलोचने॥ ८<br><br>वद मां त्वं विशालाक्षि तत्र प्रापयितुं क्षमा।<br>प्रापयाशु सखी ते सा यत्र तिष्ठति सुन्दरी॥ ९ | हे सुलोचने! मैं उस दुष्टात्मा राक्षस कालकेतुके स्थानको नहीं जानता। और फिर उस नगरतक पहुँच सकनेकी मेरी सामर्थ्य भी नहीं है। हे विशाल नयनोंवाली! अब तुम्हीं उपाय बताओ। मुझे वहाँ पहुँचानेमें तुम्हीं समर्थ हो। अतएव जहाँ तुम्हारी सुन्दर सखी एकावली विराजमान है, वहाँ मुझे शीघ्र पहुँचाओ॥ ८-९॥ |
| हत्वा तं राक्षसं क्रूरं मोचयिष्यामि साम्प्रतम्।<br>विवशां शोकसन्तप्तां राजपुत्रीं तव प्रियाम्॥ १० | उस क्रूर राक्षसका वध करके मैं इसी समय विवश तथा शोक-सन्तप्त तुम्हारी प्रिय सखी राजकुमारी एकावलीको मुक्त करा लूँगा॥ १०॥ |
| विमुक्तदुःखां कृत्वाशु प्रापयिष्यामि ते पुरम्।<br>पित्रे चास्याः प्रदास्यामि कन्यामेकावलीमहम्॥ ११ | राजकुमारी एकावलीको संकटसे मुक्ति दिलाकर शीघ्र ही उसे तुम्हारे पुरमें पहुँचा दूँगा और उसके पिताको सौंप दूँगा॥ ११॥ |
| पश्चाद्विवाहं कर्तासौ राजा पुत्र्याः परन्तपः।<br>एवं ते मनसः कामो मम चापि प्रियंवदे॥ १२<br><br>भविष्यति स सम्पूर्णः साधनेन तवाधुना।<br>दर्शयाशु पुरं तस्य पश्य मे त्वं पराक्रमम्॥ १३<br><br>यथा हन्मि दुराचारं परदारापहारकम्।<br>तथा कुरु प्रियं कर्तुं शक्तासि वरवर्णिनि॥ १४<br><br>मार्गं दर्शय तस्याद्य पुरस्य दुर्गमस्य च। | तत्पश्चात् शत्रुतापक राजा रैभ्य अपनी पुत्रीका विवाह कर सकेंगे। हे प्रियंवदे! इस प्रकार तुम्हारे सहयोगसे मेरे तथा तुम्हारे मनकी कामना अब पूरी हो जायगी। तुम मुझे उस कालकेतुका नगर शीघ्र दिखा दो, फिर मेरा पराक्रम देखो। हे वरवर्णिनि! मैं जिस प्रकार उस दुराचारी तथा परस्त्रीका हरण करनेवाले कालकेतुका वध कर सकूँ, तुम वैसा ही उपाय करो; क्योंकि तुम हित-साधन करनेमें पूर्ण सक्षम हो। उस दानवके दुर्गम नगरका मार्ग तुम मुझे आज ही दिखाओ॥ १२-१४॥ |
| व्यास उवाच<br><br>तन्निशम्य प्रियं वाक्यं मुदिता च यशोवती॥ १५<br><br>तमुवाच रमापुत्रं गमनोपायमादरात्।<br>मन्त्रं गृहाण राजेन्द्र भगवत्यास्तु सिद्धिदम्॥ १६<br><br>दर्शयिष्यामि तस्याद्य पुरं राक्षसपालितम्।<br>सज्जो भव महाभाग गमनाय मया सह॥ १७<br><br>सैन्येन महता युक्तस्तत्र युद्धं भविष्यति।<br>कालकेतुर्महावीरो राक्षसैर्बलिभिर्वृतः॥ १८<br><br>तस्मान्मन्त्रं गृहीत्वा त्वं व्रज तत्र मया सह।<br>दर्शयिष्यामि ते मार्गं पुरस्यास्य दुरात्मनः॥ १९<br><br>हत्वा तं पापकर्माणं मोचयाशु च मे सखीम्। | **व्यासजी बोले—**एकवीरकी यह प्रिय वाणी सुनकर यशोवती प्रसन्न हो गयी और वह लक्ष्मीपुत्र एकवीरसे नगर पहुँचनेका उपाय आदरपूर्वक बताने लगी—हे राजेन्द्र! पहले आप भगवती जगदम्बाके सिद्धिप्रदायक मन्त्रको ग्रहण कीजिये। तत्पश्चात् मैं आपको अनेक राक्षसोंद्वारा रक्षित उस कालकेतुका नगर आज ही दिखाऊँगी। हे महाभाग! एक विशाल सेनासे युक्त होकर आप मेरे साथ वहाँ चलनेके लिये तैयार हो जाइये। वहाँ युद्ध होगा। कालकेतु स्वयं महापराक्रमी है तथा बलवान् राक्षसोंसे युक्त रहता है। अतएव भगवतीका मन्त्र ग्रहण करके ही आप मेरे साथ वहाँ चलिये। मैं उस दुष्टात्माके नगरका मार्ग आपको दिखाऊँगी। अब आप उस पापकर्मपरायण दानवको मारकर मेरी सखीको शीघ्र मुक्त कीजिये॥ १५-१९॥ |
अ० २३] षष्ठ स्कन्ध ८३७
अ० २३] षष्ठ स्कन्ध ८३७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| श्रुत्वा तद्वचनं वीरो मन्त्रं जग्राह सत्वरः॥ २०<br>दत्तात्रेयाद्दैवयोगात्प्राप्ताज्ज्ञानिवराच्छुभात् ।<br>योगेश्वरीमहामन्त्रं त्रिलोकीतिलकाभिधम्॥ २१ | उसका यह वचन सुनकर एकवीरने वहाँपर दैवयोगसे पधारे हुए पुण्यात्मा तथा ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ दत्तात्रेयजीसे त्रिलोकीका तिलक कहे जानेवाले योगेश्वरीके महामन्त्रको उसी क्षण ग्रहण कर लिया॥ २०-२१॥ |
| तेन सर्वज्ञता जाता सर्वान्तश्चारिता तथा।<br>तया सह जगामाशु पुरं तस्य सुदुर्गमम्॥ २२ | उस मन्त्रके प्रभावसे एकवीरको सब कुछ जानने तथा सर्वत्र गमनकी क्षमता प्राप्त हो गयी। इसके बाद वे यशोवतीके साथ कालकेतुके दुर्गम नगरके लिये शीघ्र प्रस्थित हुए॥ २२॥ |
| रक्षितं राक्षसैर्घोरैः पातालमिव पन्नगैः।<br>यशोवत्या च सैन्येन महता संयुतो नृपः॥ २३ | वह नगर राक्षसोंद्वारा इस प्रकार सुरक्षित था, जैसे सर्पोंद्वारा पातालकी निरन्तर सुरक्षा होती रहती है। कालकेतुके ऐसे नगरमें अब यशोवती तथा विशाल सेनाके साथ राजा एकवीर आ गये॥ २३॥ |
| तमायान्तं समालोक्य दूतास्तस्य भयातुराः।<br>क्रोशन्तोऽभिययुः पार्श्वं कालकेतोस्तरस्विनः॥ २४ | एकवीरको आते देखकर कालकेतुके दूत भयसे व्यग्र हो गये और चीखते-चिल्लाते हुए बड़ी तेजीसे भागकर उसके पास पहुँचे॥ २४॥ |
| तमूचुः सहसा मत्वा राक्षसं काममोहितम्।<br>एकावलीसमीपस्थं कुर्वन्तं विनयान्बहून्॥ २५ | उस समय एकावलीके पास बैठकर अनेकविध विनती कर रहे कालकेतुको अत्यन्त काममोहित समझकर दूत एकाएक उससे कहने लगे॥ २५॥ |
| दूता ऊचुः<br>राजन् यशोवती नारी कामिन्याः सहचारिणी।<br>आयाति सह सैन्येन राजपुत्रेण संयुता॥ २६ | **दूतोंने कहा—**हे राजन्! इस कामिनीकी सहचारिणी जो यशोवती नामकी स्त्री है, वह एक राजकुमारके साथ विशाल सेना लेकर आ रही है॥ २६॥ |
| जयन्तो वा महाराज कार्तिकेयोऽथवा नु किम्।<br>आगच्छति बलोन्मत्तो वाहिनीसहितः किल॥ २७ | हे महाराज! पता नहीं, वह जयन्त है अथवा कार्तिकेय। बलके अभिमानसे मत्त वह राजकुमार सेनाके साथ चला आ रहा है॥ २७॥ |
| संयत्तो भव राजेन्द्र संग्रामः समुपस्थितः।<br>देवपुत्रेण युध्यस्व त्यज वा कमलेक्षणाम्॥ २८ | हे राजेन्द्र! अब आप सावधान हो जाइये; क्योंकि युद्धकी स्थिति सामने आ गयी है। अब आप या तो इस देवपुत्रके साथ युद्ध कीजिये अथवा इस कमलनयनीको मुक्त कर दीजिये॥ २८॥ |
| इतो दूरेऽस्ति सैन्यं तद्योजनत्रयमात्रतः।<br>सज्जो भव महीपाल दुन्दुभिं घोषयाशु वै॥ २९ | उसकी सेना यहाँसे मात्र तीन योजनकी दूरीपर है। अतएव हे राजन्! अब आप तैयार हो जाइये और रण-दुंदुभी बजानेकी तुरंत आज्ञा दीजिये॥ २९॥ |
| व्यास उवाच<br>तेषां तद्वचनं श्रुत्वा राक्षसः क्रोधमूर्च्छितः।<br>राक्षसान्प्रेरयामास सायुधान्सबलान्बहून्॥ ३०<br>गच्छध्वं राक्षसाः सर्वे सम्मुखाः शस्त्रपाणयः। | **व्यासजी बोले—**दूतोंके मुखसे वैसी बात सुनकर कालकेतु क्रोधसे मूर्च्छित हो गया। उसने अपने सभी बलवान् तथा शस्त्रधारी राक्षसोंको उत्साहित करते हुए कहा—हे राक्षसो! तुम सब हाथोंमें शस्त्र लेकर शत्रुके सामने जाओ॥ ३० १/२॥ |