देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
अ० १०] तृतीय स्कन्ध २९१
अ० १०] तृतीय स्कन्ध २९१
| श्लोक (संस्कृत) | हिन्दी अनुवाद |
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| भुक्त्वान्नं वेदविद्विप्रो वेदाभ्यासं करोति वै।<br>क्रीडन्ति पूर्वजाः तस्य स्वर्गे प्रमुदिताः किल॥ ४३ | वेदज्ञ ब्राह्मण जिसका अन्न खाकर वेदाभ्यास करता है, उसके पूर्वज परम प्रसन्न होकर स्वर्गमें विहार करते हैं॥ ४३॥ |
| गोभिलातः किमुक्तं वै त्वया वेदविदुत्तम।<br>संसारे मूर्खपुत्रत्वं मरणादतिगर्हितम्॥ ४४ | अतएव हे वेदज्ञोंमें श्रेष्ठ गोभिल मुने! आपने यह क्या कह दिया। इस संसारमें मूर्ख पुत्रका पिता होना तो मृत्युसे भी बढ़कर कष्टप्रद होता है॥ ४४॥ |
| कृपां कुरु महाभाग शापस्यानुग्रहं प्रति।<br>दीनोद्धारणशक्तोऽसि पतामि तव पादयोः॥ ४५ | हे महाभाग! अब आप इस शापसे मेरा उद्धार करनेकी कृपा कीजिये। आप दीनोंका उद्धार करनेमें समर्थ हैं। मैं आपके पैरोंपर पड़ता हूँ॥ ४५॥ |
| लोमश उवाच<br>इत्युक्त्वा देवदत्तस्तु पतितस्तस्य पादयोः।<br>स्तुवन्दीनहृदत्यर्थं कृपणः साश्रुलोचनः॥ ४६ | लोमश बोले— यह कहकर देवदत्त अत्यन्त दीनहृदय तथा असहाय होकर नेत्रोंमें आँसू भरकर स्तुति करता हुआ मुनिके पैरोंपर गिर पड़ा॥ ४६॥ |
| गोभिलस्तु तदा तत्र दृष्ट्वा तं दीनचेतसम्।<br>क्षणकोपा महान्तो वै पापिष्ठाः कल्पकोपनाः॥ ४७<br>जलं स्वभावतः शीतं पावकातपयोगतः।<br>उष्णं भवति तच्छीघ्रं तद्विना शिशिरं भवेत्॥ ४८<br>दयावान्गोभिलस्त्वाह देवदत्तं सुदुःखितम्।<br>मूर्खो भूत्वा सुतस्ते वै विद्वानपि भविष्यति॥ ४९ | तब उस दीनहृदय देवदत्तको देखकर गोभिल-मुनिको दया आ गयी। महात्मालोग क्षणभरके लिये ही कोप करते हैं, किंतु पापियोंका कोप कल्पपर्यन्त बना रहता है। जल स्वभावतः शीतल होता है। वही जल अग्नि तथा धूपके संयोगसे गर्म हो जाता है, किंतु पुनः उनका संयोग हटते ही वह शीघ्र शीतल हो जाता है। तब दयालु गोभिलमुनिने अत्यन्त दुःखित देवदत्तसे कहा—तुम्हारा पुत्र मूर्ख होकर भी बादमें विद्वान् हो जायगा॥ ४७-४९॥ |
| इति दत्तवरः सोऽथ मुदितोऽभूद् द्विजर्षभः।<br>इष्टिं समाप्य विप्रान्वै विससर्ज यथाविधि॥ ५० | इस प्रकार वर पा लेनेपर द्विजवर देवदत्त प्रसन्न हो गये। उन्होंने विधिवत् पुत्रेष्टि यज्ञ समाप्त करके ब्राह्मणोंको विदा किया॥ ५०॥ |
| कालेन कियता तस्य भार्या रूपवती सती।<br>गर्भं दधार काले सा रोहिणी रोहिणीसमा॥ ५१ | कुछ समय बीतनेपर देवदत्तकी पतिव्रता तथा रूपवती भार्या रोहिणी जो रोहिणीके समान शुभ लक्षणोंवाली थी, उसने यथासमय गर्भधारण किया॥ ५१॥ |
| गर्भाधानादिकं कर्म चकार विधिवद् द्विजः।<br>पुंसवनविधानञ्च शृङ्गारकरणं तथा॥ ५२<br>सीमन्तोन्नयनञ्चैव कृतं वेदविधानतः।<br>ददौ दानानि मुदितो मत्वेष्टिं सफलां तथा॥ ५३ | देवदत्तने विधि-विधानके साथ गर्भाधान आदि कर्म किये। तत्पश्चात् पुंसवन, शृंगारकरण तथा सीमन्तोन्नयन-संस्कार वेद-विधिके साथ सम्पन्न किये। उस समय अपने यज्ञको सफल जानकर प्रसन्न मनसे उन्होंने बहुत-से दान दिये॥ ५२-५३॥ |
| शुभेऽह्नि सुषुवे पुत्रं रोहिणी रोहिणीयुते।<br>दिने लग्ने शुभेऽत्यर्थं जातकर्म चकार सः॥ ५४<br>पुत्रदर्शनकं कृत्वा नामकर्म चकार च।<br>उतथ्य इति पुत्रस्य कृतं नाम पुराविदा॥ ५५ | रोहिणी नक्षत्रयुक्त शुभ दिनमें रोहिणीने पुत्रको जन्म दिया। देवदत्तने शुभ दिन और मुहूर्तमें नवजात शिशुका जातकर्म-संस्कार किया और पुत्रदर्शन करके यथासमय उसका नामकरण भी कर दिया। पूर्व बातोंको जाननेवाले देवदत्तने अपने पुत्रका नाम 'उतथ्य' रखा॥ ५४-५५॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—10 C
| २९२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १० |
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| स चाष्टमे तथा वर्षे शुभे वै शुभवासरे।<br>तस्योपनयनं कर्म चकार विधिवत्पिता॥ ५६ | आठवें वर्षमें शुभ योग तथा शुभ दिनमें पिता देवदत्तने अपने उस पुत्रका विधिवत् उपनयन-संस्कार सम्पन्न किया॥ ५६॥ |
| वेदमध्यापयामास गुरुस्तं वै व्रते स्थितम्।<br>नोच्चचार तथोतथ्यः संस्थितो मुग्धवत्तदा॥ ५७ | ब्रह्मचर्यव्रतमें स्थित उतथ्यको आचार्य वेद पढ़ाने लगे, किंतु वह एक शब्दका भी उच्चारण नहीं कर सका, मूढकी भाँति चुपचाप बैठा रहा॥ ५७॥ |
| बहुधा पाठितः पित्रा न दधार मतिं शठः।<br>मूढवत्तिष्ठतेऽत्यर्थं तं शुशोच पिता तदा॥ ५८ | उसके पिताने उसे अनेक प्रकारसे पढ़ानेका प्रयत्न किया, किंतु उस मूर्खकी बुद्धि उस ओर प्रवृत्त नहीं होती थी। वह मूर्खके समान पड़ा रहता था। इससे उसके पिता देवदत्त उसके लिये बहुत चिन्तित हुए॥ ५८॥ |
| एवं कुर्वन्सदाभ्यासं जातो द्वादशवार्षिकः।<br>न वेद विधिवत्कर्तुं सन्ध्यावन्दनकं विधिम्॥ ५९ | इस प्रकार निरन्तर वेदाभ्यास करते हुए वह बालक बारह वर्षका हो गया, किंतु भलीभाँति सन्ध्यावन्दन करनेतककी विधि भी न जान पाया॥ ५९॥ |
| मूर्खोऽभूदिति लोकेषु गता वार्तातिविस्तरा।<br>ब्राह्मणेषु च सर्वेषु तापसेष्वितरेषु च॥ ६० | सभी ब्राह्मणों, तपस्वियों तथा अन्यान्य लोगोंमें यह बात विस्तृतरूपसे फैल गयी कि देवदत्तका पुत्र महामूर्ख निकल गया॥ ६०॥ |
| जहास लोकस्तं विप्रं यत्र तत्र गतं वने।<br>पिता माता निनिन्दाथ मूर्खं तमतिभर्त्सयन्॥ ६१ | हे मुने! वह जहाँ कहीं जाता, लोग उसकी हँसी उड़ाते थे। यहाँतक कि उसके माता-पिता भी उस मूर्खको कोसते हुए उसकी निन्दा किया करते थे॥ ६१॥ |
| निन्दितोऽथ जनैः कामं पितृभ्यामथ बान्धवैः।<br>वैराग्यमगमद्विप्रो जगाम वनमप्यसौ॥ ६२ | इस प्रकार जब सभी लोग, माता-पिता तथा बन्धु-बान्धव उसकी निन्दा करने लगे, तब उस ब्राह्मणबालकके मनमें वैराग्य उत्पन्न हो गया और वह वनमें चला गया॥ ६२॥ |
| अन्धो वरस्तथा पङ्गुर्न मूर्खस्तु वरः सुतः।<br>इत्युक्तोऽसौ पितृभ्यां वै विवेश काननं प्रति॥ ६३ | अन्धा या पंगु पुत्र ठीक है, किंतु मूर्ख पुत्र ठीक नहीं है—माता-पिताके ऐसा कहनेपर वह वनमें चला गया॥ ६३॥ |
| गङ्गातीरे शुभे स्थाने कृत्वोटजमनुत्तमम्।<br>वन्यां वृत्तिं च संकल्प्य स्थितस्तत्र समाहितः॥ ६४ | गंगाके किनारे एक उत्तम स्थानपर सुन्दर पर्णकुटी बनाकर वह वनवासीका जीवन व्यतीत करते हुए एकनिष्ठ होकर वहीं रहने लगा॥ ६४॥ |
| नियमं च परं कृत्वा नासत्यं प्रब्रवीम्यहम्।<br>स्थितस्तत्राश्रमे रम्ये ब्रह्मचर्यव्रतो हि सः॥ ६५ | 'मैं असत्य नहीं बोलूँगा'—ऐसी दृढ़ प्रतिज्ञा करके ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करते हुए वह उसी सुन्दर आश्रममें रहने लगा॥ ६५॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे सत्यव्रताख्यानवर्णनं नाम दशमोऽध्यायः॥ १०॥
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ] — 10 D