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देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

अ० ६ ] चतुर्थ स्कन्ध ४२५

अ० ६ ] चतुर्थ स्कन्ध ४२५


Sanskrit ShlokaHindi Translation
प्रलोभितौ मयात्यर्थं वरदानैस्तपस्विनौ।<br>स्थानान्न चलितौ शान्तौ वृथायं मे गतः श्रमः ॥ ४४<br><br>तथा वै मायया कृत्वा भीषितौ तापसौ भृशम्।<br>तथापि नोत्थितौ स्थानाद्देहरक्षापरौ न तौ ॥ ४५मैंने उन दोनों तपस्वियोंको वरदानोंके द्वारा बहुत प्रलोभन दिया, किंतु वे अपने स्थानसे विचलित नहीं हुए, बल्कि शान्त बैठे रहे। मेरा यह परिश्रम व्यर्थ चला गया। मैंने माया रचकर उन तपस्वियोंको बहुत डराया, फिर भी वे अपने आसनसे नहीं उठे। वे दोनों शरीररक्षाके लिये जरा भी चिन्तित नहीं हैं ॥ ४४-४५ ॥
व्यास उवाच<br>इति तस्य वचः श्रुत्वा शक्रं प्राह मनोभवः।<br>वासवाद्य करिष्यामि कार्यं ते मनसेप्सितम् ॥ ४६<br><br>यदि विष्णुं महेशं वा ब्रह्माणं वा दिवाकरम्।<br>ध्यायन्तौ तौ तदास्माकं भवितारौ वशौ मुनी ॥ ४७<br><br>देवीभक्तं वशीकर्तुं नाहं शक्तः कथञ्चन।<br>कामराजं महाबीजं चिन्तयन्तं मनस्यलम् ॥ ४८<br><br>तां देवीं चेन्महाशक्तिं संश्रितौ भक्तिभावतः।<br>न तदा मम बाणानां गोचरौ तापसौ किल ॥ ४९व्यासजी बोले—इन्द्रका यह वचन सुनकर कामदेवने उनसे कहा—हे इन्द्र! मैं अभी आपका मनोवांछित कार्य करूँगा। यदि वे दोनों मुनि विष्णु, शिव, ब्रह्मा अथवा सूर्य किसीका ध्यान करते होंगे, तो वे हमारे वशमें हो जायेंगे। मैं केवल कामराज महाबीज 'क्लीं' का अपने मनमें चिन्तन करनेवाले देवीभक्तको वशमें करनेमें किसी प्रकार भी समर्थ नहीं हूँ। यदि वे भक्ति-भावसे महाशक्तिस्वरूपा देवीकी उपासनामें लगे होंगे, तो मेरे बाणोंका प्रभाव उन तपस्वियोंपर नहीं पड़ेगा ॥ ४६–४९ ॥
इन्द्र उवाच<br>गच्छ त्वं च महाभाग सर्वैस्तत्र समुद्यतैः।<br>कार्यं ममातिदुःसाध्यं कर्ता हितमनुत्तमम् ॥ ५०इन्द्र बोले—हे महाभाग! जानेके लिये उद्यत इन सभीके साथ तुम वहाँ जाओ। यद्यपि मेरा यह कार्य अत्यन्त दुःसाध्य है, फिर भी तुम इस हितकर तथा उत्तम कार्यको पूर्ण कर ही लोगे ॥ ५० ॥
व्यास उवाच<br>इति तेन समादिष्टा ययुः सर्वे समुद्यताः।<br>यत्र तौ धर्मपुत्रौ द्वौ तेपाते दुष्करं तपः ॥ ५१व्यासजी बोले—इस प्रकार इन्द्रका आदेश पाकर वे लोग पूरी तैयारीके साथ उस स्थानपर गये, जहाँ वे धर्मपुत्र नर-नारायण कठोर तपस्या कर रहे थे ॥ ५१ ॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे
नरनारायणकथावर्णनं नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥


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अथ षष्ठोऽध्यायः

कामदेवद्वारा नर-नारायणके समीप वसन्त ऋतुकी सृष्टि, नारायणद्वारा उर्वशीकी उत्पत्ति, अप्सराओं Child / द्वारा नारायणसे स्वयंको अंगीकार करनेकी प्रार्थना

Sanskrit ShlokaHindi Translation
व्यास उवाच<br>प्रथमं तत्र सम्प्राप्तो वसन्तः पर्वतोत्तमे।<br>पुष्पिताः पादपाः सर्वे द्विरेफालिविराजिताः ॥ १<br><br>आम्राश्च बकुला रम्यास्तिलकाः किंशुकाः शुभाः।<br>सालास्तालास्तमालाश्च मधूकाः पुष्पिता बभुः ॥ २व्यासजी बोले—सर्वप्रथम उस पर्वतश्रेष्ठ गन्धमादनपर वसन्त पहुँचा। उस पर्वतपर स्थित सभी वृक्ष पुष्पित हो गये और उनपर भ्रमरोंके समूह मँडराने लगे ॥ १ ॥<br><br>आम, मौलसिरी, रम्य, तिलक, सुन्दर किंशुक, साल, ताल, तमाल तथा महुए—ये सब-के-सब फूलोंसे सुशोभित हो गये ॥ २ ॥

| ४२६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ६ |
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संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
बभूवुः कोकिलालापा वृक्षाग्रेषु मनोहराः।<br>वल्ल्योऽपि पुष्पिताः सर्वा आलिङ्गिर्नगोत्तमान्॥ ३वृक्षोंकी डालियोंपर कोयलोंकी मनोहारिणी कूक आरम्भ हो गयी। पुष्पोंसे लदी हुई सभी लताएँ ऊँचे पर्वतोंपर चढ़ने लगीं॥ ३॥
प्राणिनः स्वासु भार्यासु प्रेमयुक्ताः स्मरातुराः।<br>बभूवुश्चातिमत्ताश्च क्रीडासक्ताः परस्परम्॥ ४सभी प्राणी अपनी-अपनी भार्याओंमें प्रेमासक्त हो गये तथा मत्त होकर परस्पर क्रीड़ा करने लगे॥ ४॥
ववुर्मन्दाः सुगन्धाश्च सुस्पर्शा दक्षिणानिलाः।<br>इन्द्रियाणि प्रमाथीनि मुनीनामपि चाभवन्॥ ५मन्द, सुगन्धयुक्त तथा सुखद स्पर्शवाली दक्षिणी हवाएँ चलने लगीं। उस समय मुनियोंकी भी वृत्तियाँ अतीव चंचल हो उठीं॥ ५॥
रतियुक्तस्ततः कामः पूरयन्पञ्चमार्गणाम्।<br>चकार त्वरितस्तत्र वासं बदरिकाश्रमे॥ ६तत्पश्चात् अपनी भार्या रतिके साथ कामदेव भी अपने पंचबाणोंको छोड़ता हुआ तत्काल बदरिकाश्रम पहुँचकर वहाँ रहने लगा॥ ६॥
रम्भा तिलोत्तमाद्याश्च गत्वा तत्र वराश्रमे।<br>गानं चक्रुः सुगीतज्ञाः स्वरतानसमन्वितम्॥ ७संगीतकलामें अत्यन्त प्रवीण रम्भा और तिलोत्तमा आदि अप्सराएँ भी उस रमणीक बदरिकाश्रममें पहुँचकर स्वर तथा तानमें आबद्ध गीत गाने लगीं॥ ७॥
तच्छ्रुत्वा मधुरोद्गीतं कोकिलानाञ्च कूजितम्।<br>भ्रमरालिविरावञ्च प्रबुद्धौ तौ मुनीश्वरौ॥ ८उस मधुर गायन, कोयलोंकी कूक तथा भ्रमर-समूहोंका गुंजार सुनकर उन दोनों मुनिवरोंका ध्यान भंग हो गया॥ ८॥
ऋतुराजमकाले तु दृष्ट्वा तौ पुष्पितं वनम्।<br>जातौ चिन्तापरौ तत्र नरनारायणावृषी॥ ९<br><br>किमद्य शिशिरापायः संवृतः समयं विना।<br>प्राणिनो विह्वलाः सर्वे लक्ष्यन्तेऽतिस्मरातुराः॥ १०<br><br>कालधर्मविपर्यायः कथमद्य दुरासदः।<br>नरं नारायणः प्राह विस्मयोत्फुल्ललोचनः॥ ११असमयमें ही वसन्तका आगमन तथा सम्पूर्ण वनको पुष्पोंसे सुशोभित देखकर वे दोनों नर तथा नारायणऋषि चिन्तित हो उठे [वे सोचने लगे कि] क्या आज समय पूरा हुए बिना ही शिशिर ऋतु बीत गयी? इस समय तो समस्त प्राणी कामसे पीड़ित होनेके कारण अत्यन्त विह्वल दिखायी पड़ रहे हैं। कालके स्वभाव तथा नियममें यह अद्भुत परिवर्तन आज कैसे हो गया? विस्मयके कारण विस्फारित नेत्रोंवाले मुनि नारायण नरसे कहने लगे॥ ९-११॥
नारायण उवाच<br>पश्य भ्रातरिमे वृक्षाः पुष्पिताः प्रतिभान्ति वै।<br>कोकिलालापसङ्घुष्टा भ्रमरालिProcess: भ्रमरालिविराजिताः॥ १२नारायण बोले— हे भाई! देखो, ये सभी वृक्ष पुष्पोंसे लदे हुए सुशोभित हो रहे हैं। इन वृक्षोंपर कोयलोंकी मधुर ध्वनि हो रही है तथा भ्रमरोंकी पंक्तियाँ विराजमान हैं॥ १२॥
शिशिरं भीममातङ्गं दारयन्स्वखरैर्नखैः।<br>वसन्तकेसरी प्राप्तः पलाशकुसुमैर्मुने॥ १३हे मुने! यह वसन्तरूपी सिंह अपने पलाशपुष्परूपी तीखे नाखूनोंसे शिशिररूपी भयानक हाथीको विदीर्ण करता हुआ यहाँ आ पहुँचा है॥ १३॥
रक्ताशोककरा तन्वी देवर्षे किंशुकाङ्घ्रिका।<br>नीलाशोककचा श्यामा विकासिकमलानना॥ १४हे देवर्षे! लाल अशोक जिसके हाथ हैं, किंशुकके पुष्प जिसके पैर हैं, नील अशोक जिसके केश हैं, विकसित श्याम कमल जिसका मुख है,
अ० ६ ]चतुर्थ स्कन्ध४२७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
नीलेन्दीवरनेत्रा सा बिल्ववृक्षफलस्तनी।<br>प्रोत्फुल्लकुन्दरदना मञ्जरीकर्णशोभिता॥ १५<br>बन्धुजीवाधरा शुभ्रा सिन्धुवारनखोद्भवा।<br>पुंस्कोकिलस्वरा पुण्या कदम्बवसना शुभा॥ १६<br>बर्हिवृन्दकलापा च सारसस्वननूपुरा।<br>वासन्ती बद्धरशना मत्तहंसगतिस्तथा॥ १७<br>पुत्रजीवांशुकन्यस्तरोमराजिविराजिता ।<br>वसन्तलक्ष्मीः सम्प्राप्ता ब्रह्मन् बदरिकाश्रमे॥ १८नीले कमल जिसके नेत्र हैं, बिल्व-वृक्षके फल जिसके स्तन हैं, खिले हुए कुन्दके फूल जिसके दाँत हैं, आमके बौर जिसके कान हैं, बन्धुजीव (गुलदुपहरिया)-के पुष्प जिसके शुभ्र अधर हैं, सिन्धुवारके पुष्प जिसके नख हैं, कोयलके समान जिसका स्वर है, कदम्बके पुष्प जिस सुन्दरीके पावन वस्त्र हैं, मयूरपंखोंके समूह जिसके आभूषण हैं, सारसोंका स्वर जिसका नूपुर है, माधवी लता जिसकी करधनी है—ऐसी मत्त हंसके समान गतिवाली तथा इंगुदीके पत्तोंको रोमस्वरूप धारण की हुई वसन्तश्री इस बदरिकाश्रममें छायी हुई है॥ १४—१८॥
अकाले किमियं प्राप्ता विस्मयोऽयं ममाधुना।<br>तपोविघ्नकरा नूनं देवर्षे परिचिन्तय॥ १९मुझे तो यह महान् आश्चर्य हो रहा है कि असमयमें यह यहाँ क्यों आ गयी? हे देवर्षे! आप यह निश्चित समझिये कि इस समय यह हमलोगोंकी तपस्यामें विघ्न डालनेवाली है॥ १९॥
श्रूयते सुरनारीणां गानं ध्यानविनाशनम्।<br>आवयोस्तपिभङ्गाय कृतं मघवता किल॥ २०<br>ऋतुराडन्यथाकाले प्रीतिं सञ्जनयेत्कथम्।<br>विघ्नोऽयं विहितो भाति भीतेनासुरशत्रुणा॥ २१<br>वाताः सुगन्धाः शीताश्च समायान्ति मनोहराः।<br>नान्यत्कारणमस्तीह शतक्रतुकृतिं विना॥ २२ध्यान भंग कर देनेवाला यह देवांगनाओंका गीत सुनायी दे रहा है। ऐसा प्रतीत होता है कि हम दोनोंका तप नष्ट करनेके लिये इन्द्रने ही यह उपक्रम रचा है। अन्यथा ऋतुराज वसन्त अकालमें कैसे प्रीति प्रकट कर सकता है? जान पड़ता है कि भयभीत होकर असुरोंके शत्रु इन्द्रके द्वारा ही यह विघ्न उपस्थित किया गया है। सुरभित, शीतल एवं मनोहर हवाएँ चल रही हैं; इसमें इन्द्रकी चालके अतिरिक्त अन्य कोई कारण नहीं है॥ २०—२२॥
इति ब्रुवति विप्राग्र्ये देवे नारायणे विभौ।<br>सर्वे दृष्टिपथं प्राप्ता मन्मथप्रमुखास्तदा॥ २३<br>ददर्श भगवान्सर्वान्नरो नारायणस्तथा।<br>विस्मयाविष्टमनसौ बभूवतुरुभावपि॥ २४विप्रवर विभु भगवान् नारायण ऐसा कह ही रहे थे कि कामदेव आदि सभी दिखायी पड़ गये। भगवान् नर तथा नारायणने उन सबको प्रत्यक्ष देखा और इससे उन दोनोंके मनमें महान् आश्चर्य हुआ॥ २३-२४॥
मन्मथं मेनकां चैव रम्भां चैव तिलोत्तमाम्।<br>पुष्पगन्धां सुकेशीं च महाश्वेतां मनोरमाम्॥ २५<br>प्रमद्वरां घृताचीञ्च गीतज्ञां चारुहासिनीम्।<br>चन्द्रप्रभां च सोमां च कोकिलालापमण्डिताम्॥ २६<br>विद्युन्मालामम्बुजाक्ष्यौ च तथा काञ्चनमालिनीम्।<br>एताश्चान्या वरारोहा दृष्टास्ताभ्यां तदन्तिके॥ २७<br>तासां द्व्यष्टसहस्राणि पञ्चाशदधिकानि च।<br>वीक्ष्य तौ विस्मितौ जातौ कामसैन्यं सुविस्तरम्॥ २८कामदेव, मेनका, रम्भा, तिलोत्तमा, पुष्पगन्धा, सुकेशी, महाश्वेता, मनोरमा, प्रमद्वरा, गीतज्ञ और सुन्दर हास्य करनेवाली घृताची, चन्द्रप्रभा, कोकिलके समान आलाप करनेवाली सोमा, विद्युन्माला, अम्बुजाक्षी और कांचनमालिनी—इन्हें तथा अन्य भी बहुत-सी सुन्दर अप्सराओंको नर-नारायणने अपने पास उपस्थित देखा। उनकी संख्या सोलह हजार पचास थी, कामदेवकी उस विशाल सेनाको देखकर वे दोनों मुनि चकित हो गये॥ २५—२८॥
४२८श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ६
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
प्रणम्याग्रे स्थिताः सर्वा देववाराङ्गनास्तदा ।<br>दिव्याभरणभूषाढ्या दिव्यमालोपशोभिताः ॥ २९उस समय दिव्य वस्त्र तथा आभूषणोंसे विभूषित और दिव्य मालाओंसे सुशोभित देवलोककी वे अप्सराएँ प्रणाम करके सामने खड़ी हो गयीं॥ २९॥
जगुश्छलेन ताः सर्वाः पृथिव्यामतिदुर्लभम् ।<br>तत्तथावस्थितं दिव्यं मन्मथादिविवर्धनम् ॥ ३०तत्पश्चात् वे अनेक प्रकारके हाव-भाव प्रदर्शित करती हुई छलपूर्वक पृथ्वीतलपर अत्यन्त दुर्लभ एवं कामवासनावर्धक गीत गाने लगीं।
शुश्राव भगवान्विष्णुर्नरो नारायणस्तदा ।<br>श्रुत्वा प्रोवाच तास्तत्र प्रीत्या नारायणो मुनिः ॥ ३१भगवान् नर-नारायणने उस गीतको सुना। तदनन्तर उसे सुनकर नारायणमुनिने प्रेमपूर्वक उनसे कहा—तुमलोग आनन्दसे बैठो, मैं तुम्हारा अद्भुत आतिथ्य-सत्कार करूँगा।
आस्यतां सुखमत्रैव करोम्यातिथ्यमद्भुतम् ।<br>भवत्योऽतिथिधर्मेण प्राप्ताः स्वर्गात्सुमध्यमाः ॥ ३२हे सुन्दरियो! तुमलोग स्वर्गसे यहाँ आयी हो, अतएव हमारी अतिथिरूपा हो॥ ३०—३२॥
व्यास उवाच<br>साभिमानस्तु सञ्जातस्तदा नारायणो मुनिः ।<br>इन्द्रेण प्रेषिता नूनं तथा विघ्नचिकीर्षया ॥ ३३व्यासजी बोले— हे राजन्! उस समय मुनि नारायण अभिमानमें आकर सोचने लगे कि निश्चितरूपसे इन्द्रने हमारे तपमें बाधा डालनेकी इच्छासे इन्हें भेजा है। ये सब बेचारी क्या चीज हैं, मैं अभी अपना तपोबल दिखाता हूँ और इनसे भी अधिक दिव्य रूपवाली नवीन अप्सराएँ उत्पन्न करता हूँ॥ ३३-३४॥
वराक्यः का इमाः सर्वाः सृजाम्यद्य नवाः किल ।<br>एताभ्यो दिव्यरूपाश्च दर्शयामि तपोबलम् ॥ ३४
इति सञ्चिन्त्य मनसा करेणोरुं प्रताड्य वै ।<br>तरसोत्पादयामास नारीं सर्वाङ्गसुन्दरीम् ॥ ३५मनमें ऐसा विचार करके उन्होंने हाथसे अपनी जंघापर आघातकर तत्काल एक सर्वाङ्गसुन्दरी स्त्री उत्पन्न कर दी॥ ३५॥
नारायणोरुसम्भूता ह्युर्वशीति ततः शुभा ।<br>ददृशुस्ताः स्थितास्तत्र विस्मयं परमं ययुः ॥ ३६वह सुन्दरी भगवान् नारायणके ऊरुदेश (जंघा)-से उत्पन्न हुई थी, अतः उसका नाम उर्वशी पड़ा। वहाँ उपस्थित वे अप्सराएँ उर्वशीको देखकर अत्यन्त आश्चर्यचकित हो गयीं॥ ३६॥
तासां च परिचर्यार्थं तावतीश्चातिसुन्दरीः ।<br>प्रादुश्चकार तरसा तदा मुनिरसम्भ्रमः ॥ ३७तदनन्तर उन अप्सराओंकी सेवाके लिये मुनिने तत्काल उतनी ही अन्य अत्यन्त सुन्दर अप्सराएँ उत्पन्न कर दीं। हाथमें विविध प्रकारके उपहार लिये हँसती हुई तथा मधुर गीत गाती हुई उन सब अप्सराओंने उन मुनियोंको प्रणाम किया और वे हाथ जोड़कर उनके समक्ष खड़ी हो गयीं॥ ३७-३८॥
गायन्त्यश्च हसन्त्यश्च नानोपायनपाणयः ।<br>प्रणेमुस्ता मुनी सर्वाः स्थिताः कृत्वाञ्जलिं पुरः ॥ ३८
तां वीक्ष्य विभ्रमकरीं तपसो विभूतिं<br>देवाङ्गना हि मुमुहुः प्रविमोहयन्त्यः ।<br>ऊचुश्च तौ प्रमुदिताननपद्मशोभा<br>रोमोद्गमोल्लसितचारुनिजाङ्गवल्ल्यः ॥ ३९लोगोंको मोहमें डाल देनेवाली वे [इन्द्रप्रेषित] अप्सराएँ तपस्याकी विभूति उस विस्मयकारिणी उर्वशीको देखकर अपनी सुध-बुध खो बैठीं। उन अप्सराओंके मुखकमल आनन्दातिरेकसे खिल उठे तथा उनके मनोहर शरीररूपी वल्लरियोंपर रोमांचरूपी अंकुर निकल आये। वे अप्सराएँ उन दोनों मुनियोंसे कहने लगीं—॥ ३९॥

| अ० ६ ] | चतुर्थ स्कन्ध | ४२९ |
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संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
कुर्युः कथं स्तुतिमहो तपसो महत्त्वं<br> धैर्यं तथैव भवतामभिवीक्ष्य बालाः।<br>अस्मत्कटाक्षविषदिग्धशरेण दग्धः<br> को वा न तत्र भवतां मनसो व्यथा न॥ ४०अहो! हम मूर्ख अप्सराएँ आपकी स्तुति कैसे करें? हम तो आपके धैर्य तथा तपके प्रभावको देखकर परम विस्मयमें पड़ गयी हैं। ऐसा कौन है जो हमलोगोंके कटाक्षरूपी विषसे बुझे बाणोंसे दग्ध न हो गया हो, फिर भी आपके मनको थोड़ी भी व्यथा नहीं हुई॥ ४०॥
ज्ञातौ युवां नरहरेः परमांशभूतौ<br> देवौ मुनी शमदमादिनिधी सदैव।<br>सेवानिमित्तमिह नो गमनं न कामं<br> कार्यं हरेः शतमखस्य विधातुमेव॥ ४१अब हमलोगोंको ज्ञात हो गया कि आप दोनों देवस्वरूप मुनि साक्षात् भगवान् विष्णुके परम अंश हैं और सदा ही शम, दम आदि गुणोंके निधान हैं। आप दोनोंकी सेवाके लिये यहाँ हमारा आगमन नहीं हुआ है, अपितु देवराज इन्द्रका कार्य सिद्ध करनेके लिये ही हम सब यहाँ आयी हुई हैं॥ ४१॥
भाग्येन केन युवयोः किल दर्शनं नः<br> सम्पादितं न विदितं खलु सञ्चितं तत्।<br>चित्तं क्षमं निजजने विहितं युवाभ्या-<br> मस्मद्विधे किल कृतागसि तापमुक्तम्॥ ४२<br><br>कुर्वन्ति नैव विबुधास्तपसो व्ययं वै<br> शापेन तुच्छफलदेन महानुभावाः।न जाने हमारे किस भाग्यसे आप दोनों मुनिवरोंके दर्शन हुए। हम यह नहीं जान पा रही हैं कि हमारे द्वारा सम्पादित किस संचित पुण्यकर्मका यह फल है। [शाप देनेमें समर्थ होते हुए भी] आप दोनों मुनियोंने हम-जैसे अपराधीजनोंको स्वजन समझकर अपने चित्तको क्षमाशील बनाया और हमें सन्तापरहित कर दिया। विवेकशील महानुभाव तुच्छ फल देनेवाले शापको उपयोगमें लाकर अपने तपका अपव्यय नहीं करते॥ ४२ १/२ ॥
व्यास उवाच<br>इत्थं निशम्य वचनं सुरकामिनीनां<br> तावूचतुर्मुनिवरौ विनयानतानाम्॥ ४३<br><br>प्रीतौ प्रसन्नवदनौ जितकामलोभौ<br> धर्मात्मजौ निजतपोरुचिशोभिताङ्गौ।व्यासजी बोले—उन अति विनम्र देवसुन्दरियोंका वचन सुनकर प्रसन्न मुखमण्डलवाले, काम तथा लोभको जीत लेनेवाले तथा अपनी तपस्याके प्रभावसे देदीप्यमान अंगोंवाले वे धर्मपुत्र मुनिवर नर-नारायण प्रेमपूर्वक कहने लगे॥ ४३ १/२॥
नरनारायणावूचतुः<br>ब्रुवन्तु वाञ्छितान् कामान्दावावस्तुष्टमानसौ॥ ४४<br><br>यान्तु स्वर्गं गृहीत्वेमामुर्वशीं चारुलोचनाम्।<br>उपायनमियं बाला गच्छत्वद्य मनोहरा॥ ४५नर-नारायण बोले—हम दोनों तुम सभीपर अत्यन्त प्रसन्न हैं। तुमलोग अपने वांछित मनोरथ बताओ, हम उसे देंगे। इस सुन्दर नयनोंवाली उर्वशीको भी अपने साथ लेकर तुम सब स्वर्गके लिये प्रस्थान करो। उपहारस्वरूप यह मनोहर युवती अब यहाँसे तुमलोगोंके साथ जाय॥ ४४-४५॥
दत्तावाभ्यां मघवतः प्रीणनायोरुसम्भवा।<br>स्वस्त्यस्तु सर्वदेवेभ्यो यथेष्टं प्रव्रजन्तु च॥ ४६<br>( न कस्यापि तपोविघ्नं प्रकर्तव्यमतः परम्।)ऊरुसे प्रादुर्भूत इस उर्वशीको इन्द्रके प्रसन्नार्थ हमने उनको दे दिया है। सभी देवताओंका कल्याण हो और अब सभी लोग इच्छानुसार यहाँसे प्रस्थान करें॥ ४६॥ (अब इसके बाद तुमलोग किसीकी तपस्यामें विघ्न मत उत्पन्न करना।)