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देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

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DevanagariHindipublished889 pages

Page 833 of 889

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Page 833
८२४श्रीमद्देवीभागवत[ अ० २१

| ददौ च दानं किल याचकेभ्यो गीतानि वाद्यानि बहूनि नेदुः।<br>कृत्वोत्सवं भूपतिरात्मजस्य नामैकवीरेति चकार विश्रुतम्॥ ५२<br>सुखं च सम्प्राप्य मुदान्वितोऽसौ ननन्द देवाधिपतुल्यवीर्यः।<br>पुत्रं हरे रूपगुणानुरूपं सम्प्राप्य वंशस्य ऋणाच्च मुक्तः॥ ५३ | राजाने याचकोंको दान दिया। इस अवसरपर गीत गाये गये तथा अनेक वाद्य बजाये गये। सम्यक् उत्सव करके राजाने अपने पुत्रका 'एकवीर'—यह प्रसिद्ध नाम रखा। वे सुख पाकर बहुत प्रसन्न हुए तथा आनन्दित हुए। इन्द्रके समान पराक्रमशाली राजा हरिवर्मा भगवान् विष्णुके सदृश रूपवान् तथा गुणी पुत्र पाकर वंशऋण (पितृऋण)-से मुक्त हो गये॥ ५२-५३॥ |
| इति सकलसुराणामीश्वरेणार्पितं तं सकलगुणगणाढ्यं पुत्रमासाद्य राजा।<br>विविधसुखविनोदैर्भार्यया सेव्यमानो व्यहरत निजगेहे शक्रतुल्यप्रतापः॥ ५४ | इस प्रकार समस्त देवताओंके अधिपति भगवान् विष्णुके द्वारा अर्पित किये गये उस सर्वगुणसम्पन्न पुत्रको प्राप्त करके इन्द्रके समान प्रतापी राजा हरिवर्मा अपनी भार्याके साथ नानाविध सुख भोगते हुए तथा विनोद करते हुए अपने महलमें रहने लगे॥ ५४॥ |

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे एकवीराख्यानवर्णनं नाम विंशोऽध्यायः॥ २०॥

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अथैकविंशोऽध्यायः

आखेटके लिये वनमें गये राजासे एकावलीकी सखी यशोवतीकी भेंट, एकावलीके जन्मकी कथा

व्यास उवाच<br>जातकर्मादिसंस्कारांश्चकार नृपतिस्तदा।<br>दिने दिने जगामाशु वृद्धिं बालः सुलालितः॥ १व्यासजी बोले—हे राजन्! तत्पश्चात् राजा हरिवर्माने बालकके जातकर्म आदि संस्कार किये। भलीभाँति पालित-पोषित होनेके कारण वह बालक दिनोदिन शीघ्रतासे बढ़ने लगा॥ १॥
नृपः संसारजं प्राप्य सुखं पुत्रसमुद्भवम्।<br>ऋणत्रयविमोक्षं च मेने तेन महात्मना॥ २इस प्रकार पुत्रजनित सांसारिक सुख प्राप्त करके उन महात्मा नरेशने अपनेको अब तीनों ऋणोंसे मुक्त मान लिया॥ २॥
षष्ठेऽन्नप्राशनं तस्य कृत्वा मासि यथाविधि।<br>तृतीयेऽथ तथा वर्षे चूडाकरणमुत्तमम्॥ ३<br>चकार ब्राह्मणान् द्रव्यैः सम्पूज्य विविधैर्धनैः।<br>गोभिश्च विविधैर्दानैर्योचकानितरानपि॥ ४राजा हरिवर्माने छठें महीनेमें बालकका अन्नप्राशन-संस्कार करके तीसरे वर्षमें शुभ मुण्डन-संस्कार विधि-विधानके साथ सम्पन्न किया। इनमें ब्राह्मणोंकी सम्यक् पूजा करके उन्हें विविध धन-द्रव्यों तथा गौओंका दान किया गया और अन्य याचकोंको भी नानाविध दान दिये॥ ३-४॥
वर्षे चैकादशे तस्य मौञ्जीबन्धनकर्म वै।<br>कारयित्वा धनुर्वेदमध्यापयत पार्थिवः॥ ५ग्यारहवें वर्षमें उस बालकका यज्ञोपवीत-संस्कार कराकर राजाने उसको धनुर्वेद पढ़वाया॥ ५॥
अधीतवेदं पुत्रं तं राजधर्मविशारदम्।<br>दृष्ट्वा तस्याभिषेकाय मतिं चक्रे जनाधिपः॥ ६राजा हरिवर्माने उस पुत्रको धनुर्वेद तथा राजधर्ममें पूर्ण निष्णात हुआ देखकर उसका राज्याभिषेक करनेका निश्चय किया॥ ६॥