सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां द्वितीयस्कन्धे रुरुचरित्रवर्णनं नामाष्टमोऽध्यायः॥ ८॥

२१८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ९

संस्कृतहिन्दी
दृष्ट्वानाथां तदा कन्यां जग्राह मुनिसत्तमः।<br>पुपोष स्थूलकेशस्तु नाम्ना चक्रे प्रमद्वराम्॥ ४८कन्याको अनाथ जानकर मुनिवर स्थूलकेश अपने आश्रममें ले गये और उसका पालन-पोषण करने लगे। उन्होंने उसका नाम प्रमद्वरा रखा॥ ४७-४८॥
सा काले यौवनं प्राप्ता सर्वलक्षणसंयुता।<br>रुरुर्दृष्ट्वाथ तां बालां कामबाणार्दितो ह्यभूत्॥ ४९वह सर्वलक्षणसम्पन्न कन्या यथासमय यौवनको प्राप्त हुई। उस सुन्दरीको देखकर रुरु काममोहित हो गये॥ ४९॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां द्वितीयस्कन्धे रुरुचरित्रवर्णनं नामाष्टमोऽध्यायः॥ ८॥


अथ नवमोऽध्यायः

सर्पके काटनेसे प्रमद्वराकी मृत्यु, रुरुद्वारा अपनी आधी आयु देकर उसे जीवित कराना, मणि-मन्त्र-औषधिद्वारा सुरक्षित राजा परीक्षित्का सात तलवाले भवनमें निवास करना

संस्कृतहिन्दी
परीक्षिदुवाच<br>कामार्तः स मुनिर्गत्वा रुरुः सुप्तो निजाश्रमे।<br>पिता पप्रच्छ दीनं तं किं रुरो विमना असि॥ १परीक्षित् बोले—[हे सचिववृन्द!] इस प्रकार कामासक्त होकर रुरुमुनि अपने आश्रममें सो गये, तब उनके पिताने उन्हें दुःखी देखकर पूछा—हे रुरु! तुम इतने उदास क्यों हो?॥ १॥
स तमाहातिकामार्तः स्थूलकेशस्य चाश्रमे।<br>कन्या प्रमद्वरा नाम सा मे भार्या भवेदिति॥ २कामातुर रुरुने अपने पितासे कहा—महर्षि स्थूलकेशके आश्रममें प्रमद्वरा नामकी एक कन्या है; मैं चाहता हूँ कि वह मेरी पत्नी बन जाय॥ २॥
स गत्वा प्रमतिस्तूर्णं स्थूलकेशं महामुनिम्।<br>प्रमुह्य सुमुखं कृत्वा ययाचे तां वराननाम्॥ ३उन प्रमतिने महामुनि स्थूलकेशके पास शीघ्र जाकर उन्हें प्रसन्न तथा अपने अनुकूल करके उस सुन्दर कन्याकी याचना की॥ ३॥
ददौ वाचं स्थूलकेशः प्रदास्यामि शुभेऽहनि।<br>विवाहार्थं च सम्भारं रचयामासतुर्वने॥ ४<br><br>प्रमतिः स्थूलकेशश्च विवाहार्थं समुद्यतौ।<br>बभूवतुर्महात्मानौ समीपस्थौ तपोवने॥ ५महामुनि स्थूलकेशने यह वचन दे दिया कि किसी अच्छे मुहूर्तमें कन्यादान दूँगा। अब उस वनमें वे दोनों विवाहकी सामग्रीका प्रबन्ध करने लगे। इस प्रकार उस तपोवनमें समीपमें ही रहकर प्रमति और स्थूलकेश दोनों महात्मा विवाहोत्सवकी तैयारी करने लगे॥ ४-५॥
तस्मिन्नवसरे कन्या रममाणा गृहाङ्गणे।<br>प्रसुप्तं पन्नगं पादेनास्पृशच्चारुलोचना॥ ६<br><br>दष्टा तु पन्नगेनाथ सा ममार वराङ्गना।<br>कोलाहलस्तदा जातो मृतां दृष्ट्वा प्रमद्वराम्॥ ७उसी अवसरपर वह कन्या अपने घरके आँगनमें खेल रही थी, तभी एक सोये हुए सर्पसे उस सुनयनीका पैर छू गया। [स्पर्श होते ही] सर्पने उसे डँस लिया और वह सुन्दरी कन्या मर गयी। तब मृत्युको प्राप्त हुई प्रमद्वराको देखकर वहाँ कोलाहल मच गया॥ ६-७॥
मिलिता मुनयः सर्वे चुक्रुशुः शोकसंयुताः।<br>भूमौ तां पतितां दृष्ट्वा पिता तस्यातिदुःखितः॥ ८सभी मुनि जुट गये और शोकसे ग्रस्त होकर रोने लगे। पृथ्वीपर प्राणहीन होकर पड़ी हुई अत्यन्त तेजसे देदीप्यमान उस कन्याको देखकर उसके पिता

अ० ९] द्वितीय स्कन्ध २१९

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
रुरोद विगतप्राणां दीप्यमानां सुतेजसा।<br>रुरुः श्रुत्वा तदाक्रन्दं दर्शनार्थं समागतः॥ ९<br><br>ददर्श पतितां तत्र सजीवामिव कामिनीम्।<br>रुदन्तं स्थूलकेशं च दृष्ट्वान्यानृषिसत्तमान्॥ १०<br><br>रुरुः स्थानाद् बहिर्गत्वा रुरोद विरहाकुलः।स्थूलकेश अत्यन्त दुःखित होकर रुदन करने लगे। उस समय करुण क्रन्दन सुनकर रुरु भी उसे देखनेके लिये आये। उन्होंने उस मृत पड़ी सुन्दरीको सजीव-जैसी देखा। स्थूलकेश तथा अन्य श्रेष्ठ मुनियोंको रुदन करते देखकर रुरुमुनि उस स्थानसे बाहर आ करके विरहाकुल होकर रोने लगे॥ ८—१० १/२॥
अहो दैवेन सर्पोऽयं प्रेषितः परमाद्भूतः॥ ११<br><br>मम शर्मविघाताय दुःखहेतुरयं किल।<br>किं करोमि क्व गच्छामि मृता मे प्राणवल्लभा॥ १२<br><br>न वै जीवितुमिच्छामि वियुक्तः प्रिययानया।<br>नालिङ्गिता वरारोहा न मया चुम्बिता मुखे॥ १३<br><br>न पाणिग्रहणं प्राप्तं मन्दभाग्येन सर्वथा।<br>लाजाहोमस्तथा चाग्नौ न कृतस्त्वनया सह॥ १४<br><br>मानुष्यं धिगिदं कामं गच्छन्त्वद्य ममासवः।<br>दुःखितस्य न वा मृत्युर्वाञ्छितः समुपैति हि॥ १५<br><br>सुखं तर्हि कथं दिव्यमाप्यते भुवि वाञ्छितम्।<br>प्रपतामि ह्रदे घोरे पावके प्रपताम्यहम्॥ १६<br><br>विषमद्य गले पाशं कृत्वा प्राणांस्त्यजाम्यहम्।[वे कहने लगे—] अहो! प्रारब्धने ही मेरे सुखके विनाशके लिये ही यह अत्यन्त विचित्र सर्प भेजा था। यह निश्चित ही मेरे दुःखका कारण है। अब मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊँ? मेरी प्राणप्रिया तो मर गयी। अब मैं अपनी इस प्रियासे विलग होकर जीना नहीं चाहता। अभीतक मैंने उस सुन्दरीका आलिंगन आदि कोई सांसारिक सुख भी नहीं प्राप्त किया था। मैं ऐसा अभागा हूँ कि उसका पाणिग्रहण नहीं कर सका और न तो उसके साथ अग्निमें लाजाहोम ही कर पाया। मेरे इस मनुष्य-जीवनको धिक्कार है। अब तो मेरे प्राण निकल जायँ तो अच्छा है, जब दुःखित मनुष्यको चाहनेपर भी मृत्यु नहीं मिलती, तब इस संसारमें वांछित उत्तम सुख कैसे मिल सकता है? अब मैं या तो कहीं किसी भयानक तालाबमें डूब जाऊँ, अग्निमें कूद पडूँ, विष खा लूँ अथवा गलेमें फाँसी लगाकर प्राण त्याग दूँ॥ ११—१६ १/२॥
विलप्यैवं रुरुस्तत्र विचार्य मनसा पुनः॥ १७<br><br>उपायं चिन्तयामास स्थितस्तस्मिन्नदीतटे।<br>मरणात्किं फलं मे स्यादात्महत्या दुरत्यया॥ १८<br><br>दुःखितश्च पिता मे स्याज्जननी चातिदुःखिता।<br>दैवस्तुष्टो भवेत्कामं दृष्ट्वा मां त्यक्तजीवितम्॥ १९<br><br>सर्वः प्रमुदितश्च स्यान्मत्क्षये नात्र संशयः।<br>उपकारः प्रियायाः कः परलोके भवेदपि॥ २०<br><br>मृते मय्यात्मघातेन विरहात्पीडितेऽपि च।<br>परलोके प्रिया सापि न मे स्यादात्मघातिनः॥ २१<br><br>एतदर्थं मृते दोषा मयि नैवामृते पुनः।इस प्रकार विलाप करके रुरु अपने मनमें विचारकर उस नदीके तटपर स्थित रहते हुए उपाय सोचने लगे। प्राण त्यागनेसे मुझे क्या लाभ होगा? आत्महत्याका फल तो अत्यन्त दुर्निवार्य होता है। [मेरी मृत्यु सुनकर] पिताजी दुःखी होंगे, माताजीको भी महान् कष्ट होगा। हाँ, हो सकता है कि मुझे मरा हुआ देखकर प्रारब्ध सन्तुष्ट हो जाय? मेरे मर जानेपर मेरे सभी शत्रु भी प्रसन्न होंगे, इसमें सन्देह नहीं है, किंतु इससे परलोकमें मेरी प्रियाका क्या उपकार होगा? इस प्रकार विरहसे सन्तप्त होकर आत्महत्या करके मेरे मर जानेपर भी परलोकमें मुझ आत्मघातीको मेरी वह प्रिया नहीं मिलेगी। इसलिये मेरे मरनेमें बहुत दोष हैं और न मरनेपर मुझे कोई दोष नहीं होगा॥ १७—२१ १/२॥
२२०श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ९

| विमृश्यैवं रुरुस्तत्र स्नात्वाचम्य शुचिः स्थितः॥ २२<br>अब्रवीद्वचनं कृत्वा जलं पाणावसौ मुनिः।<br>यन्मया सुकृतं किञ्चित्कृतं देवार्चनादिकम्॥ २३<br>गुरवः पूजिता भक्त्या हुतं जप्तं तपः कृतम्।<br>अधीतास्त्वखिला वेदा गायत्री संस्कृता यदि॥ २४<br>रविराराधितस्तेन सञ्जीवतु मम प्रिया।<br>यदि जीवेन्न मे कान्ता त्यजे प्राणानहं ततः॥ २५<br>इत्युक्त्वा तज्जलं भूमौ चिक्षेपाराध्य देवताः। | ऐसा सोचकर रुरु स्नान तथा आचमन करके पवित्र होकर वहींपर बैठ गये। इसके बाद उन मुनिने हाथमें जल लेकर यह वचन कहा—यदि मेरे द्वारा देवाराधन आदि कुछ भी पुण्य कर्म सम्पादित किया गया हो, यदि मैंने श्रद्धापूर्वक गुरुओंकी पूजा की हो; हवन, जप एवं तप किया हो, समस्त वेदोंका अध्ययन किया हो, गायत्रीकी उपासना की हो और सूर्यकी आराधना की हो तो उस पुण्यके प्रभावसे मेरी प्रिया जीवित हो जाय। यदि मेरी प्रिया जीवित नहीं होगी तो मैं प्राण त्याग दूँगा। ऐसा कहकर देवताओंका ध्यान करके उन्होंने वह जल जमीनपर छोड़ दिया॥ २२—२५ १/२॥ |
| राजोवाच<br>एवं विलपतस्तस्य भार्यया दुःखितस्य च॥ २६<br>देवदूतस्तदाभ्येत्य वाक्यमाह रुरुं ततः। | राजा बोले—तदनन्तर इस प्रकार अपनी भार्याके लिये विलाप कर रहे उन दुःखित रुरुके पास एक देवदूत आकर यह वाक्य बोला॥ २६ १/२॥ |
| देवदूत उवाच<br>माकार्षीः साहसं ब्रह्मन्कथं जीवेन्मृता प्रिया॥ २७<br>गतायुरेशा सुश्रोणी गन्धर्वाप्सरसोः सुता।<br>अन्यां कामय चार्वङ्गीं मृतेयं चाविवाहिता॥ २८<br>किं रोदिषि सुदुर्बुद्धे का प्रीतिस्तेऽनया सह। | देवदूत बोला—हे ब्रह्मन्! ऐसा साहस मत कीजिये। आपकी मरी हुई प्रियतमा भला कैसे जीवित हो सकेगी? गन्धर्व और अप्सराकी इस सुन्दर कन्याकी आयु समाप्त हो चुकी थी, जिससे यह अविवाहिता ही मर गयी; अतः अब आप किसी अन्य शुभ अंगोंवाली कन्याका वरण कर लीजिये। हे हतबुद्धि! आप क्यों रो रहे हैं? इसके साथ आपका कैसा प्रेम है?॥ २७-२८ १/२॥ |
| रुरुरुवाच<br>देवदूत न चान्यां वै वरिष्याम्यहमङ्गनाम्॥ २९<br>यदि जीवेन्न जीवेद्वा मर्तव्यं चाधुना मया। | रुरु बोले—हे देवदूत! मैं किसी अन्य सुन्दरीका वरण नहीं करूँगा। यदि यह जीवित हो जाती है तो ठीक है, अन्यथा मैं इसी समय अपने प्राण त्याग दूँगा॥ २९ १/२॥ |
| राजोवाच<br>विदित्वेति हठं तस्य देवदूतो मुदान्वितः॥ ३०<br>उवाच वचनं तथ्यं सत्यं चातिमनोहरम्।<br>उपायं शृणु विप्रेन्द्र विहितं यत्सुरैः पुरा॥ ३१<br>आयुषोऽर्धप्रदानेन जीवयाशु प्रमद्वराम्। | राजा बोले—उन मुनिका यह हठ देखकर देवदूतने प्रसन्न होकर तथ्यपूर्ण, सत्य तथा मनोहर वचन कहा—हे विप्रेन्द्र! देवताओंके द्वारा इसका पूर्वविहित उपाय मुझसे सुनिये। आप अपनी आयुका आधा भाग देकर अपनी प्रमद्वराको शीघ्र ही जीवित कर लीजिये॥ ३०-३१ १/२॥ |
| रुरुरुवाच<br>आयुषोऽर्धं प्रयच्छामि कन्यायै नात्र संशयः॥ ३२<br>अद्य प्रत्यावृतप्राणा प्रोत्तिष्ठतु मम प्रिया।<br>विश्वावसुस्तदा तत्र विमानेन समागतः॥ ३३ | रुरु बोले—मैं निःसन्देह अपनी आयुका आधा भाग इस कन्याको दे रहा हूँ। अब मेरी प्रियतमाके प्राण वापस आ जायें और यह उठकर बैठ जाय। उसी समय विश्वावसु अपनी पुत्री प्रमद्वराकी मृत्यु |

| अ० ९ ] | द्वितीय स्कन्ध | २२१ |
| :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ज्ञात्वा पुत्रीं मृतां चाशु स्वर्गलोकात्प्रमद्वराम्।<br>ततो गन्धर्वराजश्च देवदूतश्च सत्तमः॥ ३४<br><br>धर्मराजमुपेत्येदं वचनं प्रत्यभाषताम्।<br>धर्मराज रुरोः पत्नी सुता विश्वावसोस्तथा॥ ३५<br><br>मृता प्रमद्वरा कन्या दष्टा सर्पेण चाधुना।<br>सा रुरोरायुषोऽर्धेन मर्तुकामस्य सूर्यज॥ ३६<br><br>समुत्तिष्ठतु तन्वङ्गी व्रतचर्याप्रभावतः।जान करके स्वर्गलोकसे विमानद्वारा शीघ्र ही वहाँ आ गये। तत्पश्चात् गन्धर्वराज विश्वावसु तथा उस श्रेष्ठ देवदूतने धर्मराजके पास पहुँचकर यह वचन कहा— हे धर्मराज! रुरुकी पत्नी तथा विश्वावसुकी पुत्री इस प्रमद्वरा नामक कन्याकी सर्पदंशके कारण इस समय मृत्यु हो गयी है। हे सूर्यतनय! इसके वियोगमें मरणके लिये उद्यत मुनि रुरुकी आधी आयु तथा उनकी तपस्याके प्रभावसे यह कोमलांगी जीवित हो जाय॥ ३२—३६ १/२॥
धर्म उवाच<br>विश्वावसुसुतां कन्यां देवदूत यदीच्छसि॥ ३७<br><br>उत्तिष्ठत्वायुषोऽर्धेन रुरुं गत्वा त्वमर्पय।धर्मराजने कहा— हे देवदूत! यदि तुम ऐसा चाहते हो तो उसकी आधी आयुसे विश्वावसुकी यह कन्या जीवित होकर उठ जाय और तुम जाकर इसे रुरुको समर्पित कर दो॥ ३७ १/२॥
राजोवाच<br>एवमुक्तस्ततो गत्वा जीवयित्वा प्रमद्वराम्॥ ३८<br><br>रुरोः समर्पयामास देवदूतस्त्वरान्वितः।<br>ततः शुभेऽह्नि विधिना रुरुणापि विवाहिता॥ ३९राजा बोले— धर्मराजके ऐसा कहनेपर देवदूतने जाकर प्रमद्वराको जीवित करके शीघ्र ही रुरुको समर्पित कर दिया और तत्पश्चात् रुरुने किसी शुभ दिन उसके साथ विधानपूर्वक विवाह कर लिया॥ ३८-३९॥
इत्थं चोपाययोगेन मृताप्युज्जीविता तदा।<br>उपायस्तु प्रकर्तव्यः सर्वथा शास्त्रसम्मतः॥ ४०इस प्रकार उपायका आश्रय लेकर मृत प्रमद्वराको भी जीवित कर लिया गया था। अतः मणि, मन्त्र तथा औषधियोंके विधिवत् प्रयोगद्वारा प्राणरक्षाके लिये शास्त्र-सम्मत उपाय अवश्य किया जाना चाहिये॥ ४० १/२॥
मणिमन्त्रौषधीभिश्च विधिवत्प्राणरक्षणे।<br>इत्युक्त्वा सचिवान् राजा कल्पयित्वा सुरक्षकान्॥ ४१<br><br>कार्यित्वाथ प्रासादं सप्तभूमिकमुत्तमम्।<br>आरुरोहोत्तरासूनुः सचिवैः सह तत्क्षणम्॥ ४२मन्त्रियोंसे यह कहकर उत्तम रक्षकोंकी व्यवस्था करके एक सात तलवाला उत्तम राजभवन बनवाकर उसी क्षण उत्तरापुत्र परीक्षित् अपने मन्त्रियोंके साथ उसपर चढ़ गये॥ ४१-४२॥
मणिमन्त्रधराः शूराः स्थापितास्तत्र रक्षणे।<br>प्रेषयामास भूपालो मुनिं गौरमुखं ततः॥ ४३<br><br>प्रसादार्थं सेवकस्य क्षमस्वेति पुनः पुनः।<br>ब्राह्मणान्सिद्धमन्त्रज्ञान् रक्षणार्थमितस्ततः॥ ४४उस भवनकी सम्यक् सुरक्षाके लिये मणि-मन्त्र-धारी वीरोंको नियुक्त किया गया और इसके बाद राजाने गौरमुखमुनिको [गविजातके पास उन्हें] प्रसन्न करनेके उद्देश्यसे भेजा और कहलाया कि मुझ सेवकका अपराध वे बार-बार क्षमा करें। तत्पश्चात् राजाने मन्त्र-प्रयोगमें निपुण ब्राह्मणोंको रक्षा-कार्यके निमित्त चारों ओर नियुक्त कर दिया॥ ४३-४४॥
मन्त्रिपुत्रः स्थितस्तत्र स्थापयामास दन्तिनः।<br>न कश्चिदारुहेत्तत्र प्रासादे चातिरक्षिते॥ ४५एक मन्त्रिपुत्र वहाँ नियुक्त किया गया, जिसने महलके चारों ओर हाथियोंका घेरा स्थापित कराया ताकि विशेषरूपसे रक्षित उस महलपर कोई चढ़ न सके॥ ४५॥