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देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां द्वितीयस्कन्धे परीक्षिन्मरणं नाम दशमोऽध्यायः॥ १०॥

२२८श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ११

| वेष्टितो भोगिभोगेन विनष्टबहुपौरुषः।<br>नोवाच नृपतिः किञ्चिन्न चचालोत्तरासुतः॥ ६५ | उस सर्पके शरीरसे बद्ध हो जानेके कारण राजाका महान् बल प्रभावहीन हो गया, जिससे वे उत्तरापुत्र परीक्षित् कुछ भी बोल पाने तथा हिल-डुल सकनेमें असमर्थ हो गये॥ ६५॥ |
| उत्थिताग्निशिखा घोरा विषजा तक्षकाननात्।<br>प्रजज्वाल नृपं त्वाशु गतप्राणं चकार ह॥ ६६ | तक्षकके मुखसे विषजनित भयंकर आगकी ज्वालाएँ उठने लगीं। उस भीषण ज्वालाने क्षणभरमें राजाको जला दिया और शीघ्र ही उन्हें निष्प्राण कर दिया॥ ६६॥ |
| हत्वाशु जीवितं राज्ञस्तक्षको गगने गतः।<br>जगद्दग्धं तु कुर्वाणं ददृशुस्तं जना इह॥ ६७ | इस प्रकार क्षणमात्रमें ही राजाका प्राण हरकर वह तक्षकनाग आकाशमें चला गया। वहाँ लोगोंने संसारको भस्मसात् कर देनेकी सामर्थ्यवाले उस तक्षकको देखा॥ ६७॥ |
| स पपात गतप्राणो राजा दग्ध इव द्रुमः।<br>चुक्रुशुश्च जनाः सर्वे मृतं दृष्ट्वा नराधिपम्॥ ६८ | वे राजा परीक्षित् प्राणहीन होकर जले हुए वृक्षकी भाँति गिर पड़े और राजाको मृत देखकर सभी लोग विलाप करने लगे॥ ६८॥ |

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां द्वितीयस्कन्धे परीक्षिन्मरणं नाम दशमोऽध्यायः॥ १०॥


अथैकादशोऽध्यायः

जनमेजयका राजा बनना और उत्तंककी प्रेरणासे सर्प-सत्र करना, आस्तीकके कहनेसे राजाद्वारा सर्प-सत्र रोकना

सूत उवाचसूतजी बोले—
गतप्राणं तु राजानं बालं पुत्रं समीक्ष्य च।<br>चक्रुश्च मन्त्रिणः सर्वे परलोकस्य सत्क्रियाः॥ १सभी मन्त्रियोंने राजा परीक्षित्‌को मृतक तथा उनके पुत्र जनमेजयको अबोध जानकर उनकी परलोक-सम्बन्धी क्रियाएँ सम्यक् प्रकारसे सम्पन्न कीं॥ १॥
गङ्गातीरे दग्धदेहं भस्मप्रायं महीपतिम्।<br>अगरुभिश्चाभियुक्तायां चितायामध्यरोपयन्॥ २शरीर दग्ध हो जानेसे भस्मीभूत हुए राजाको उन मन्त्रियोंने गंगाके किनारे अगरुसे बनायी गयी चितापर रखा॥ २॥
दुर्मरणे मृतस्यास्य चक्रुश्चैवोर्ध्वदैहिकीम्।<br>क्रियां पुरोहितास्तस्य वेदमन्त्रैर्विधानतः॥ ३अकालमृत्युको प्राप्त राजा परीक्षित्‌की और्ध्वदैहिक क्रिया राजाके पुरोहितोंद्वारा वैदिक मन्त्रोंके साथ विधिवत् सम्पन्न की गयी॥ ३॥
ददुर्दानानि विप्रेभ्यो गाः सुवर्णं यथोचितम्।<br>अन्नं बहुविधं तत्र वस्त्राणि विविधानि च॥ ४मन्त्रियोंने ब्राह्मणोंको गायें, सुवर्ण, अनेक प्रकारके अन्न तथा नाना प्रकारके वस्त्र यथोचित रूपसे दानमें दिये॥ ४॥
सुमुहूर्ते सुतं बालं प्रजानां प्रीतिवर्धनम्।<br>सिंहासने शुभे तत्र मन्त्रिणः संन्यवेशयन्॥ ५तत्पश्चात् मन्त्रियोंने प्रजाओंके प्रति प्रीति-सम्वर्धन करनेवाले राजपुत्र जनमेजयको शुभ मुहूर्तमें सुन्दर राजसिंहासनपर आसीन किया॥ ५॥

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—8 D

अ० ११]द्वितीय स्कन्ध२२९
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
पौरा जानपदा लोकाश्चक्रुस्तं नृपतिं शिशुम्।<br>जनमेजयनामानं राजलक्षणसंयुतम्॥ ६पुरवासी तथा जनपदवासी प्रजाओंने राजलक्षणोंसे सम्पन्न जनमेजय नामक उस बालकको अपने राजाके रूपमें स्वीकार किया॥ ६॥
धात्रेयी शिक्षयामास राजचिह्नानि सर्वशः।<br>दिने दिने वर्धमानः स बभूव महामतिः॥ ७राजकुमारकी धात्रीने उन्हें सब प्रकारके राजोचित गुणोंकी शिक्षा दी। इस प्रकार दिन-प्रतिदिन वृद्धिको प्राप्त होते हुए वे महान् बुद्धिमान् हो गये॥ ७॥
प्राप्ते चैकादशे वर्षे तस्मै कुलपुरोहितः।<br>यथोचितां ददौ विद्यां जग्राह स यथोचिताम्॥ ८उनकी ग्यारह वर्षकी अवस्था होनेपर कुल-पुरोहितने उन्हें यथोचित शिक्षा प्रदान की और उन्होंने उसे सम्यक् रूपसे ग्रहण किया॥ ८॥
धनुर्वेदं कृपः पूर्णं ददावस्मै सुसंस्कृतम्।<br>अर्जुनाय यथा द्रोणः कर्णाय भार्गवो यथा॥ ९जिस प्रकार द्रोणाचार्यने अर्जुनको तथा भार्गव परशुरामने कर्णको धनुर्विद्यामें प्रशिक्षित किया, उसी प्रकार कृपाचार्यने जनमेजयको भलीभाँति परिष्कृत धनुर्विद्या प्रदान की॥ ९॥
सम्प्राप्तविद्यो बलवान्बभूव दुरतिक्रमः।<br>धनुर्वेदे तथा वेदे पारगः परमार्थवित्॥ १०इस प्रकार सम्पूर्ण विद्या प्राप्त करके वे जनमेजय वेद तथा धनुर्वेदमें पूर्ण पारंगत, बलशाली, अपराजेय तथा परमार्थवेत्ता हो गये॥ १०॥
धर्मशास्त्रार्थकुशलः सत्यवादी जितेन्द्रियः।<br>चकार राज्यं धर्मात्मा पुरा धर्मसुतो यथा॥ ११वे धर्मशास्त्रके अर्थोंका विवेचन करनेमें कुशल, सत्यनिष्ठ, इन्द्रियजित् और धर्मात्मा थे। उन्होंने पूर्वमें धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिरकी भाँति राज्य-शासन किया॥ ११॥
ततः सुवर्णवर्माख्यो राजा काशिपतिः किल।<br>वपुष्टमां शुभां कन्यां ददौ पारीक्षिताय च॥ १२इसके बाद सुवर्णवर्मा नामवाले काशिपति राजाने शुभ गुणोंवाली अपनी कन्या वपुष्टमाका पाणिग्रहण जनमेजयके साथ सम्पन्न कर दिया॥ १२॥
स तां प्राप्यासितापाङ्गीं मुमुदे जनमेजयः।<br>काशिराजसुतां कान्तां प्राप्य राजा यथा पुरा॥ १३<br><br>विचित्रवीर्यो मुमुदे सुभद्रां च यथार्जुनः।<br>विजहार महीपालो वनेषूपवनेषु च॥ १४<br><br>तया कमलपत्राक्ष्या शच्या शतक्रतुर्यथा।<br>प्रजास्तस्य सुसन्तुष्टा बभूवुः सुखलालिताः॥ १५<br><br>मन्त्रिणः कर्मकुशलाश्चक्रुः कार्याणि सर्वशः।जिस प्रकार प्राचीन कालमें काशिराजकी पुत्रीको पाकर विचित्रवीर्य तथा सुभद्राको पाकर अर्जुन अत्यन्त आह्लादित हुए थे, उसी प्रकार उस श्याम नयनोंवालीको अपनी कान्ताके रूपमें पाकर जनमेजय अति प्रसन्न हुए। कमलपत्रके समान नेत्रोंवाली उस वपुष्टमाके साथ वनों और उपवनोंमें राजा जनमेजय उसी प्रकार विहार करने लगे जिस प्रकार इन्द्राणीके साथ इन्द्र। उनके द्वारा सुखपूर्वक रक्षित प्रजा अति सन्तुष्ट थी। जनमेजयके कार्यकुशल सभी मन्त्री समस्त कार्योंको सम्यक् प्रकारसे करते थे॥ १३-१५ १/२॥
२३०श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ११

| एतस्मिन्नेव काले तु मुनिरुत्तङ्कनामकः ॥ १६<br>तक्षकेण परिक्लिष्टो हस्तिनापुरमभ्यगात्।<br>वैरस्यापचितिं कोऽस्य प्रकुर्यादिति चिन्तयन् ॥ १७<br>परीक्षितसुतं मत्वा तं नृपं समुपागतः।<br>कार्याकार्यं न जानासि समये नृपसत्तम ॥ १८<br>अकर्तव्यं करोष्यद्य कर्तव्यं न करोषि वै।<br>किं त्वां सम्प्रार्थयाम्यद्य गतामर्षं निरुद्यमम् ॥ १९<br>अवैर्ज्ञमतन्त्रज्ञं बालचेष्टासमन्वितम्। | इसी समय तक्षकके द्वारा पीड़ित उतंक नामक मुनिका हस्तिनापुरमें आगमन हुआ। 'इस सर्पकी शत्रुताका बदला कौन ले सकता है'—ऐसा सोचते हुए वे परीक्षित्-पुत्र जनमेजयको यह कार्य कर सकनेवाला समझकर उनके पास आये और बोले—हे भूपवर! आपको यह ज्ञान नहीं है कि इस समय क्या करणीय है और क्या अकरणीय है? आप इस समय न करनेयोग्य कार्य कर रहे हैं और करनेयोग्य कार्य नहीं कर रहे हैं। आपसदृश रोषहीन, पुरुषार्थरहित, वैरभावके ज्ञानसे शून्य, प्रतीकार आदि उपायोंको न जाननेवाले तथा बालकोंके समान स्वभाववाले राजासे अब मैं क्या कहूँ? ॥ १६–१९ १/२ ॥ |
| जनमेजय उवाच<br>किं वैरं न मया ज्ञातं न किं प्रतिकृतं मया ॥ २०<br>तद्वद त्वं महाभाग करोमि यदनन्तरम्। | जनमेजय बोले—मैंने किस शत्रुताको नहीं जाना और उसका प्रतीकार नहीं किया? हे महाभाग! आप मुझे वह बतायें, जिससे मैं उसे सम्पन्न कर सकूँ॥ २० १/२ ॥ |
| उत्तङ्क उवाच<br>पिता ते निहतो भूप तक्षकेण दुरात्मना ॥ २१<br>मन्त्रिणस्त्वं समाहूय पृच्छ स्वपितृनाशनम्। | उत्तंक बोले—हे राजन्! आपके पिता परीक्षित् दुष्टात्मा तक्षकनागद्वारा मार डाले गये थे। आप मन्त्रियोंको बुलाकर अपने पिताकी मृत्युके विषयमें पूछिये॥ २१ १/२ ॥ |
| सूत उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं राजा पप्रच्छ मन्त्रिसत्तमान् ॥ २२<br>ऊचुस्ते द्विजशापेन दष्टः सर्पेण वै मृतः। | सूतजी बोले—उतंकका वचन सुनकर राजाने मन्त्रिप्रवरोंसे पूछा। तब उन्होंने बताया कि ब्राह्मणद्वारा शापित होनेके कारण एक सर्पने उन्हें डँस लिया और वे मर गये॥ २२ १/२ ॥ |
| जनमेजय उवाच<br>शापोऽत्र कारणं राज्ञः शप्तस्य मुनिना किल ॥ २३<br>तक्षकस्य तु को दोषो ब्रूहि मे मुनिसत्तम। | जनमेजय बोले—मेरे पिता राजा परीक्षित्की मृत्युका कारण तो मुनिद्वारा प्रदत्त शाप था। हे मुनिश्रेष्ठ! मुझे यह बताइये कि इसमें तक्षकका क्या दोष था?॥ २३ १/२ ॥ |
| उत्तङ्क उवाच<br>तक्षकेण धनं दत्त्वा कश्यपः सन्निवारितः ॥ २४<br>न स किं तक्षको वैरी पितृहा तव भूपते।<br>भार्या रुरोः पुरा भूप दष्टा सर्पेण सा मृता ॥ २५<br>अविवाहिता तु मुनिना जीविता च पुनः प्रिया।<br>रुरुणापि कृता तत्र प्रतिज्ञा चातिदारुणा ॥ २६ | उत्तंक बोले—तक्षकने कश्यप नामक ब्राह्मणको धन देकर आपके पितातक पहुँचनेसे रोक दिया था। हे राजन्! आपके पिताका हन्ता वह तक्षक क्या आपका शत्रु नहीं है? हे भूप! प्राचीन कालमें मुनि रुरुकी भार्याको सर्पने डँस लिया था और वह मर गयी थी। वह अविवाहिता थी। मुनि रुरुने अपनी उस प्रियाको पुनः जीवित कर दिया और उन्होंने वहींपर |