देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
DevanagariHindipublished889 pages
Page 839 of 889
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| ८३० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २२ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| विमृश्यैवं सखी चाहं त्वरयैव गते भयात्।<br>मध्ये वै सैनिकानां तु सायुधानां नृपात्मज॥ ८ | हे राजकुमार! इस प्रकार विचारविमर्श करके सखी एकावली तथा मैं भयभीत होनेके कारण शस्त्रधारी सैनिकोंके बीच तुरंत चली गयी॥ ८॥ |
| कालकेतुस्तु तां दृष्ट्वा मोहिनीं मदनातुरः।<br>गदां गुर्वीं गृहीत्वा तु धावमानः समागतः॥ ९<br><br>रक्षकान्दूरतः कृत्वा जग्राहाम्बुजलोचनाम्।<br>त्रस्तां वेपथुसंयुक्तां क्रन्दमानां कृशोदरीम्॥ १० | वह कामातुर कालकेतु उस मोहिनी एकावलीको देखकर अपनी विशाल गदा लेकर दौड़ता हुआ पासमें आ गया और उसने रक्षकोंको हटाकर डरके मारे काँपती तथा रोती हुई कृश कटिप्रदेशवाली तथा कमलके समान नेत्रोंवाली एकावलीको पकड़ लिया॥ ९-१०॥ |
| त्यजैनां मां गृहाणेति मया चोक्तोऽपि दानवः।<br>न मां जग्राह कामार्तस्तां गृहीत्वा विनिःसृतः॥ ११ | ‘इस राजकुमारीको छोड़ दो और मुझे ग्रहण कर लो’—ऐसा मेरे कहनेपर भी उसने मुझे स्वीकार नहीं किया और कामके वशीभूत वह दानव एकावलीको लेकर वहाँसे निकल गया॥ ११॥ |
| तिष्ठ तिष्ठेति भाषन्तो रक्षकास्तं महाबलम्।<br>प्रतिषिध्य तु संग्रामं चक्रुर्विस्मयकारकम्॥ १२ | रक्षकोंने ‘ठहरो-ठहरो’—ऐसा कहते हुए उस महाबलीको रोककर उसके साथ विस्मयकारक युद्ध किया॥ १२॥ |
| तस्यापि राक्षसाः क्रूराः सर्वतः शस्त्रपाणयः।<br>युयुधु रक्षकैः सार्धं स्वामिकार्ये कृतोद्यमाः॥ १३<br><br>संग्रामस्तु तदा जातः कालकेतोस्तथा रणे।<br>निहत्य रक्षकान्सर्वान्गृहीत्वैनां महाबलः॥ १४<br><br>युक्तो राक्षससैन्येन निर्जगाम पुरं प्रति।<br>वीक्ष्य तां रुदतीं बालां गृहीतां दानवेन तु॥ १५<br><br>पृष्ठतोऽहं गता तत्र यत्र नीता सखी मम।<br>विक्रोशन्ती यथा सा मां पश्येदिति पदानुगा॥ १६ | अपने स्वामीके कार्यमें पूर्ण तत्पर तथा हाथोंमें शस्त्र धारण किये उसके सभी क्रूर राक्षसों ने भी रक्षकोंके साथ भीषण युद्ध किया। तब उन रक्षकोंके साथ कालकेतुका संग्राम होने लगा। वह महाबली युद्धमें सभी रक्षकोंको मारकर तथा एकावलीको लेकर राक्षसी सेनाके साथ अपने नगरके लिये चल दिया। दानव कालकेतुके द्वारा अधिकारमें की गयी उस राजकुमारीको रोती हुई देखकर मैं उसके पीछे-पीछे वहीं पहुँच जाती थी, जहाँ कालकेतु मेरी सखीको लेकर जाता था जिससे कि रोती हुई वह मुझे अपने पीछे आते हुए देख ले॥ १३—१६॥ |
| सापि मामागतां वीक्ष्य किञ्चित्स्वस्थाभवत्तदा।<br>गताहं तत्समीपे तु तामाभाष्य पुनः पुनः॥ १७ | मुझे आयी हुई देखकर वह भी कुछ स्वस्थचित्त हुई तब मैं उसके पास जाकर उससे बार-बार बातें करने लगी॥ १७॥ |
| सा मां प्राप्यातिदुःखार्ता स्तम्भस्वेदसमाकुला।<br>कण्ठे गृहीत्वा मां भूप रुरोद भृशदुःखिता॥ १८ | हे राजन्! दुःखसे व्याकुल तथा पसीनेसे संसिक्त उस एकावलीने मुझे पकड़कर गलेसे लगा लिया और वह अत्यन्त दुःखित होकर रोने लगी॥ १८॥ |
| स मामाह कालकेतुः प्रीतिपूर्वमिदं वचः।<br>समाश्वासय भीतां त्वं सखीं चञ्चललोचनाम्॥ १९ | तत्पश्चात् उस कालकेतुने प्रेम प्रदर्शित करते हुए मुझसे यह बात कही कि चंचल नेत्रोंवाली अपनी इस भयग्रस्त सखीको धीरज बँधाओ और अपनी इस सखीसे [मेरी बात] कहो—‘हे प्रिये! देवलोकके समान अत्यन्त |