संग्रह पर लौटें






देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
अ० ९] चतुर्थ स्कन्ध ४४३
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अ० ९] चतुर्थ स्कन्ध ४४३
| मूल संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| बभूव युद्धं तुमुलं तयोस्तु<br>जयैषिणोः पार्थिव देवदैत्ययोः।<br>ववर्षुराकाशपथे स्थितास्ते<br>पुष्पाणि दिव्यानि प्रहृष्टचित्ताः॥ २७ | हे राजन्! इस प्रकार एक-दूसरेको जीतनेके इच्छुक उन ऋषि नर तथा दैत्यराज प्रह्लादके बीच भीषण युद्ध होने लगा। आकाशमार्गमें स्थित वे [देवतागण] प्रसन्नचित्त होकर उनके ऊपर दिव्य पुष्पोंकी वर्षा कर रहे थे॥ २७॥ |
| चुकोप दैत्याधिपतिर्हरौ स<br>मुमोच बाणानतितीव्रवेगान्।<br>चिच्छेद तान्धर्मसुतः सुतीक्ष्णै-<br>र्धनुर्विमुक्तैर्विशिखैस्तदाशु ॥ २८ | अचानक प्रह्लाद कुपित हो उठे और उन्होंने अति तीव्रगामी बाण ऋषि नारायणपर छोड़े। धर्मपुत्र नारायणने शीघ्र ही उन बाणोंको अपने धनुषसे छोड़े गये अत्यन्त तीक्ष्ण बाणोंसे खण्ड-खण्ड कर डाला॥ २८॥ |
| ततो नारायणं बाणैः प्रह्लादश्चातिकर्षितैः।<br>ववर्ष सुस्थितं वीरं धर्मपुत्रं सनातनम्।<br>नारायणोऽपि तं वेगोन्मुक्तैर्बाणैः शिलाशितैः॥ २९<br>तुतोदातीव पुरतो दैत्यानामधिपं स्थितम्।<br>सन्निपातोऽम्बरे तत्र दिदृक्षूणां बभूव ह॥ ३० | दैत्यराज प्रह्लाद समरांगणमें डटकर खड़े अतीव पराक्रमी तथा सनातन धर्मपुत्र नारायणपर अपने अति तीक्ष्ण बाण बरसाने लगे। नारायणने भी सानपर चढ़ाकर तेज किये गये अपने वेगपूर्वक छोड़े गये बाणोंके द्वारा सम्मुख खड़े दैत्यपति प्रह्लादको अत्यन्त भीषण चोट पहुँचायी। उस युद्धका अवलोकन करनेके इच्छुक देवताओं तथा दैत्योंका एक विशाल समूह अपने-अपने पक्षका जयघोष करते हुए आकाशमें एकत्र हो गया॥ २९-३० १/२॥ |
| देवानां दानवानाञ्च कुर्वतां जयघोषणाम्।<br>उभयोः शरवर्षेण छादिते गगने तदा॥ ३१<br>दिवापि रात्रिसदृशं बभूव तिमिरं महत्।<br>ऊचुः परस्परं देवा दैत्याश्चातीव विस्मिताः॥ ३२<br>अदृष्टपूर्वं युद्धं वै वर्ततेऽद्य सुदारुणम्।<br>देवर्षयोऽथ गन्धर्वा यक्षकिन्नरपन्नगाः॥ ३३ | दोनों पक्षोंकी बाणवर्षासे आकाशके आच्छादित हो जानेपर उस समय इतना घना अन्धकार हो गया कि दिन भी रातके समान प्रतीत होने लगा। इससे अति आश्चर्यचकित होकर देवता तथा दैत्य परस्पर कहने लगे कि यह अत्यन्त भयावह संग्राम हो रहा है। ऐसा भीषण युद्ध तो पहले कभी नहीं देखा गया। बड़े-बड़े देवर्षि, गन्धर्व, यक्ष, किन्नर, नाग, विद्याधर तथा चारणगण इस युद्धको देखकर अत्यन्त विस्मयमें पड़ गये॥ ३१-३३ १/२॥ |
| विद्याधराश्चारणाश्च विस्मयं परमं ययुः।<br>नारदः पर्वतश्चैव प्रेक्षणार्थं स्थितौ मुनी॥ ३४<br>नारदः पर्वतं प्राह नेदृशं चाभवत्पुरा।<br>तारकासुरयुद्धञ्च तथा वृत्रासुरस्य च॥ ३५<br>मधुकैटभयोर्युद्धं हरिणा चेदृशं कृतम्।<br>प्रह्लादः प्रबलः शूरो यस्मान्नारायणेन च॥ ३६<br>करोति सदृशं युद्धं सिद्धेनाद्भुतकर्मणा। | उस युद्धका अवलोकन करनेके लिये मुनि नारद तथा पर्वत भी आये हुए थे। नारदमुनिने पर्वतसे कहा—ऐसा घोर संग्राम पहले नहीं हुआ था; तारकासुरयुद्ध, वृत्रासुरका युद्ध यहाँतक कि मधु-कैटभका युद्ध भी वैसा नहीं हुआ था, जैसा कि इस समय नारायणके द्वारा किया गया। प्रह्लाद अत्यन्त वीर हैं जो कि वे अद्भुत कर्मवाले सिद्धिसम्पन्न नारायणके साथ यह बराबरीका युद्ध कर रहे हैं॥ ३४-३६ १/२॥ |
| व्यास उवाच<br>दिने दिने तथा रात्रौ कृत्वा कृत्वा पुनः पुनः॥ ३७ | व्यासजी बोले— इस प्रकार प्रतिदिन तथा प्रतिरात्रि बार-बार युद्ध करते हुए वे दोनों दैत्य तथा |
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| ४४४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ९ |
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| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| चक्रतुः परमं युद्धं तौ तदा दैत्यतापसौ।<br>नारायणस्तु चिच्छेद प्रह्लादस्य शरासनम्॥ ३८<br>तरसैकेन बाणेन स चान्यद्धनुराददे।<br>नारायणस्तु तरसा मुक्त्वाऽन्यञ्च शिलीमुखम्॥ ३९<br>तदैव मध्यतश्चापं चिच्छेद लघुहस्तकः।<br>छिन्नं छिन्नं पुनर्देत्यो धनुरन्यत्समाददे॥ ४०<br>नारायणस्तु चिच्छेद विशिखैराशु कोपितः।<br>छिन्ने धनुषि दैत्येन्द्रः परिघं तु समाददे॥ ४१<br>जघान धर्मजं तूर्णं बाह्वोर्मध्येऽतिकोपनः। | तपस्वी घोर संग्राममें तत्पर रहे। नारायणने एक बाणसे प्रह्लादका धनुष काट दिया। तब प्रह्लादने तत्काल दूसरा धनुष ले लिया। नारायणने हस्तकौशल दिखाते हुए पुनः बड़ी शीघ्रतासे दूसरा बाण चलाकर उस धनुषको भी बीचोबीचसे काट डाला। इस प्रकार नारायण बार-बार धनुष काटते जाते थे और प्रह्लाद दूसरा धनुष लेते जाते थे। अन्तमें नारायणने कुपित होकर अपने बाणोंसे उसके धनुषको शीघ्रतासे पुनः काट दिया। उस धनुषके भी कट जानेपर दैत्यराज प्रह्लादने अपना परिघ उठा लिया और अत्यन्त क्रोधित होकर बड़ी फुर्तीसे धर्मपुत्र नारायणकी भुजाओंपर प्रहार किया॥ ३७—४१ १/२ ॥ |
| तमायान्तं स बलवान्मार्गणैर्नवभिर्मुनिः॥ ४२<br>चिच्छेद परिघं घोरं दशभिस्तमताडयत्। | प्रतापी नारायणने अपनी ओर आते हुए उस परिघको नौ बाणोंसे काट दिया और दस बाणोंसे प्रह्लादपर चोट की॥ ४२ १/२ ॥ |
| गदामादाय दैत्येन्द्रः सर्वायसमयीं दृढाम्॥ ४३<br>जानुदेशे जघानाशु देवं नारायणं रुषा। | तत्पश्चात् दैत्येन्द्र प्रह्लादने पूर्णतः लोहमयी सुदृढ़ गदा उठाकर क्रोधपूर्वक नारायणमुनिकी जाँघपर शीघ्रतापूर्वक प्रहार किया॥ ४३ १/२ ॥ |
| गदया चापि गिरिवत्संस्थितः स्थिरमानसः॥ ४४<br>धर्मपुत्रोऽतिबलवान्मुमोचाशु शिलीमुखान्।<br>गदां चिच्छेद भगवांस्तदा दैत्यपतेर्दृढाम्॥ ४५<br>विस्मयं परमं जग्मुः प्रेक्षका गगने स्थिताः। | उस गदा-प्रहारसे भी धर्मपुत्र नारायण पर्वतकी भाँति अविचल भावसे स्थिरचित्त होकर खड़े रहे। तदनन्तर परम पराक्रमी भगवान् नारायणने बड़ी तेजीसे अनेक बाण छोड़े और दैत्यपति प्रह्लादकी सुदृढ़ गदाको खण्ड-खण्ड कर दिया। आकाशमें स्थित होकर युद्ध देखनेवाले बड़े आश्चर्यमें पड़ गये॥ ४४-४५ १/२ ॥ |
| स तु शक्तिं समादाय प्रह्लादः परवीरहा॥ ४६<br>चिक्षेप तरसा क्रुद्धो बलान्नारायणोरसि।<br>तामापतन्तीं संवीक्ष्य बाणेनैकेन लीलया॥ ४७<br>सप्तधा कृतवानाशु सप्तभिस्तं जघान ह। | तत्पश्चात् शत्रुओंका दमन करनेवाले प्रह्लादने शक्ति उठाकर कुपित हो बलपूर्वक बड़ी तेजीसे नारायणके वक्षःस्थलपर प्रहार किया। तब सामने आती हुई उस शक्तिको देखकर नारायणने एक ही बाणसे बड़ी आसानीसे उसके सात खण्ड कर दिये और साथ ही सात बाणोंसे प्रह्लादपर प्रहार किया॥ ४६—४७ १/२ ॥ |
| दिव्यवर्षशतं चैव तद्युद्धं परमं तयोः॥ ४८<br>जातं विस्मयदं राजन् सर्वेषां तत्र चाश्रमे।<br>तदाजगाम तरसा पीतवासाश्चतुर्भुजः॥ ४९<br>प्रह्लादस्याश्रमं तत्र जगाम च गदाधरः।<br>चतुर्भुजो रमाकान्तो रथाङ्गदरपद्मभृत्॥ ५० | हे राजन्! इस प्रकार सबको विस्मित कर देनेवाला वह युद्ध एक सौ दिव्य वर्षतक चलता रहा। तदनन्तर चार भुजाओंसे शोभा पानेवाले पीताम्बरधारी भगवान् विष्णु शीघ्रतापूर्वक उस आश्रममें आ गये। तत्पश्चात् हाथोंमें शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण करनेवाले वे चतुर्भुज लक्ष्मीपति विष्णु प्रह्लादके आश्रमपर पहुँचे॥ ४८—५० ॥ |
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| अ० १० ] | चतुर्थ स्कन्ध | ४४५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी टीका |
|---|---|
| दृष्ट्वा तमागतं तत्र हिरण्यकशिपोः सुतः।<br>प्रणम्य परया भक्त्या प्राञ्जलिः प्रत्युवाच ह॥ ५१ | वहाँ उन्हें आये हुए देखकर हिरण्यकशिपुपुत्र प्रह्लाद बड़ी श्रद्धाके साथ उन्हें प्रणाम करके हाथ जोड़कर कहने लगे॥ ५१॥ |
| प्रह्लाद उवाच<br>देवदेव जगन्नाथ भक्तवत्सल माधव।<br>कथं न जितवानाजावहमेतौ तपस्विनौ।<br>संग्रामस्तु मया देव कृतः पूर्णं शतं समाः॥ ५२<br>सुराणां न जितौ कस्मादिति मे विस्मयो महान्। | प्रह्लाद बोले— हे देवदेव! हे जगन्नाथ! हे भक्तवत्सल! हे माधव! मैं इन दोनों तपस्वियोंको युद्धमें क्यों नहीं जीत सका? हे देव! मैंने देवताओंके पूरे सौ वर्षतक इनके साथ युद्ध किया, फिर भी ये जीते न जा सके—मुझे यह महान् आश्चर्य है!॥ ५२ १/२ ॥ |
| विष्णुरुवाच<br>सिद्धाविमौ मदंशौ च विस्मयः कोऽत्र मारिष॥ ५३<br>तापसौ न जितात्मानौ नरनारायणौ जितौ।<br>गच्छ त्वं वितलं राजन् कुरु भक्तिं ममाचलाम्॥ ५४<br>नाभ्यां कुरु विरोधं त्वं तापसाभ्यां महामते। | विष्णु बोले— हे आर्य! ये दोनों सिद्ध पुरुष हैं और मेरे अंशसे आविर्भूत हैं; अतः [इन्हें न जीत पानेमें] आश्चर्य क्या! नर-नारायण नामसे प्रसिद्ध इन जितात्मा तपस्वियोंको तुम नहीं जीत सकते। अतः हे राजन्! तुम अपने वितललोकको चले जाओ और वहाँ मेरी अविचल भक्ति करो। हे महामते! तुम इन दोनों तपस्वियोंसे विरोध मत करो॥ ५३-५४ १/२ ॥ |
| व्यास उवाच<br>इत्याज्ञप्तो दैत्यराजो निर्ययावसुरैः सह॥ ५५<br>नरनारायणौ भूयस्तपोयुक्तौ बभूवतुः॥ ५६ | व्यासजी बोले— भगवान् विष्णुसे ऐसी आज्ञा पाकर दैत्यपति प्रह्लाद असुरोंके साथ वहाँसे प्रस्थित हो गये। तदनन्तर नर-नारायण पुनः तपस्यामें संलग्न हो गये॥ ५५-५६॥ |
iti श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे प्रह्लादनारायणयोर्युद्धे विष्णोरागमनवर्णनं नाम नवमोऽध्यायः॥ ९॥
अथ दशमोऽध्यायः
राजा जनमेजयद्वारा प्रह्लादके साथ नर-नारायणके युद्धका कारण पूछना, व्यासजीद्वारा उत्तरमें संसारके मूल कारण अहंकारका निरूपण करना तथा महर्षि भृगुद्वारा भगवान् विष्णुको शाप देनेकी कथा
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी टीका |
|---|---|
| जनमेजय उवाच<br>सन्देहोऽयं महानत्र पाराशर्य कथानके।<br>नरनारायणौ शान्तौ वैष्णवांशौ तपोधनौ॥ १<br><br>तीर्थाश्रयौ सत्त्वयुक्तौ वन्याशनपरौ सदा।<br>धर्मपुत्रौ महात्मानौ तापसौ सत्यसंस्थितौ॥ २<br><br>कथं रागसमायुक्तौ जातौ युद्धे परस्परम्।<br>संग्रामं चक्रतुः कस्मात्त्यक्त्वा तपमनुत्तमम्॥ ३ | जनमेजय बोले— हे व्यासजी! इस कथानकमें मुझे यह महान् संशय हो रहा है कि जब वे नर-नारायण शान्तस्वभाव, भगवान् विष्णुके अंशस्वरूप, तपको ही अपना सर्वस्व माननेवाले, तीर्थमें निवास करनेवाले, सत्त्वगुणसम्पन्न, वनके फल-मूलका सदा आहार करनेवाले, धर्मपुत्र, महात्मा, तपस्वी तथा सत्यनिष्ठ थे; तब वे युद्धमें परस्पर राग-द्वेषसे ग्रस्त कैसे हो गये और उन्होंने उत्कृष्ट तपस्याका त्याग करके संग्राम क्यों किया?॥ १-३॥ |
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| ४४६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १० |
|---|
| मूल संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| प्रह्लादेन समं पूर्णं दिव्यवर्षशतं किल।<br>हित्वा शान्तिसुखं युद्धं कृतवन्तौ कथं मुनी॥ ४ | उन दोनों मुनियोंने शान्ति-सुखका त्याग करके प्रह्लादके साथ पूरे सौ दिव्य वर्षोंतक युद्ध किसलिये किया?॥ ४॥ |
| कथं तौ चक्रतुर्युद्धं प्रह्लादेन समं मुनी।<br>कथयस्व महाभाग कारणं विग्रहस्य वै॥ ५ | उन दोनों मुनियोंने प्रह्लादके साथ वह संग्राम क्यों किया? हे महाभाग! आप मुझे उस युद्धका कारण बताइये॥ ५॥ |
| (कामिनी कनकं कार्यं कारणं विग्रहस्य वै)<br>युद्धबुद्धिः कथं जाता तयोश्च तद्विरक्तयोः।<br>तथाविधं तपस्तप्तं ताभ्याञ्च केन हेतुना॥ ६<br><br>मोहार्थं सुखभोगार्थं स्वर्गार्थं वा परन्तप।<br>कृतमत्युत्कटं ताभ्यां तपः सर्वफलप्रदम्॥ ७<br><br>मुनिभ्यां शान्तचित्ताभ्यां प्राप्तं किं फलमद्भुतम्।<br>तपसा पीडितो देहः संग्रामेण पुनः पुनः॥ ८<br><br>दिव्यवर्षशतं पूर्णं श्रमेण परिपीडितौ।<br>न राज्यार्थे धने वापि न दारेषु गृहेषु च॥ ९<br><br>किमर्थं तु कृतं युद्धं ताभ्यां तेन महात्मना। | (स्त्री, धन तथा कोई कार्यविशेष ही प्रायः युद्धके कारण होते हैं।) उन विरक्त मुनियोंको युद्धका विचार क्यों उत्पन्न हुआ? हे परन्तप! उन्होंने उस प्रकारका तप किसीको प्रसन्न करनेके लिये, सुखभोगके लिये अथवा स्वर्गके लिये—किस उद्देश्यसे किया था? शान्त चित्तवाले उन मुनियोंने समस्त फल प्रदान करनेवाला कठोर तप तो किया था, किंतु उन्होंने कौन-सा अद्भुत फल प्राप्त किया? उन्होंने तपस्यासे शरीरको कष्ट दिया और पूरे सौ दिव्य वर्षोंतक बार-बार संग्राम करके परिश्रमके द्वारा अपनेको संतप्त किया। उन मुनियोंने न राज्यके लिये, न धनके लिये, न स्त्रीके लिये और न तो गृहके लिये ही यह युद्ध किया तो फिर उन्होंने महात्मा प्रह्लादके साथ किसलिये युद्ध किया?॥ ६–९ १/२॥ |
| निरीहः पुरुषः कस्मात्कुर्याद्युद्धमीदृशम्॥ १०<br><br>दुःखदं सर्वथा देहे जानन्धर्मं सनातनम्।<br>सुबुद्धिः सुखदानीह कर्माणि कुरुते सदा॥ ११<br><br>न दुःखदानि धर्मज्ञ स्थितिरेषा सनातनी।<br>धर्मपुत्रौ हरेरंशौ सर्वज्ञौ सर्वभूषितौ॥ १२<br><br>कृतवन्तौ कथं युद्धं दुःखं धर्मविनाशकम्।<br>त्यक्त्वा तपः समाधीतं सुखारामं महत्फलम्॥ १३<br><br>संयुगं दारुणं कृष्ण नैव मूर्खोऽपि वाञ्छति। | युद्ध शरीरके लिये कष्टदायक होता है—इस सनातन बातको जानते हुए कोई तृणारहित पुरुष आखिर ऐसा युद्ध किसलिये करेगा? हे धर्मज्ञ! उत्तम बुद्धिवाला मनुष्य इस लोकमें सदा सुखदायी कर्म ही करता है, दुःखप्रद कर्म नहीं—यह सनातन सिद्धान्त है। तब धर्मपुत्र, भगवान् विष्णुके अंशस्वरूप, सर्वज्ञ तथा सभी गुणोंसे विभूषित उन मुनियोंने वह दुःखदायक तथा धर्मविनाशक युद्ध क्यों किया? हे व्यासजी! कोई मूर्ख भी अच्छी प्रकार आचरित, सुख तथा आनन्द देनेवाले और महाफलदायी तपका त्याग करके दारुण युद्ध करना नहीं चाहता॥ १०–१३ १/२॥ |
| श्रुतो मया ययातिस्तु च्युतः स्वर्गान्महीपतिः॥ १४<br><br>अहङ्कारभवात्पापात्पातितः पृथिवीतले।<br>यज्ञकृद्दानकर्ता च धार्मिकः पृथिवीपतिः॥ १५ | मैंने सुना है कि राजा ययाति स्वर्गसे च्युत हो गये थे। अहंकारजन्य पापके कारण वे पृथवीतलपर गिरा दिये गये थे। वे यज्ञकर्ता, दानी और धर्मनिष्ठ थे; किंतु केवल थोड़ेसे अहंकारभरे शब्दोंका उच्चारण करनेके कारण वज्रपाणि इन्द्रने उन्हें [स्वर्गसे पृथ्वीपर] गिरा दिया था। यह निश्चित है कि बिना अहंकारके |
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| अ० १० ] | चतुर्थ स्कन्ध | ४४७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| शब्दोच्चारणमात्रेण पातितो वज्रपाणिना।<br>अहङ्कारमृते युद्धं न भवत्येव निश्चयः॥ १६ | युद्ध हो ही नहीं सकता। अन्ततः मुनिको उस युद्धका क्या फल मिला, उससे तो केवल उनका पुण्य ही नष्ट हुआ॥ १४—१६ १/२ ॥ |
| किं फलं तस्य युद्धस्य मुनेः पुण्यविनाशनम्।<br><br>व्यास उवाच<br>राजन् संसारमूलं हि त्रिविधः परिकीर्तितः॥ १७<br><br>अहङ्कारस्तु सर्वज्ञैर्मुनिभिर्धर्मनिश्चये।<br>स कथं मुनिना त्यक्तुं योग्यो देहभृता किल॥ १८<br><br>कारणेन विना कार्यं न भवत्येव निश्चयः। | **व्यासजी बोले—**हे राजन्! धर्मका निर्णय करते समय सर्वज्ञ मुनियोंने अहंकारको ही संसारका मूल कारण कहा है और इसे [सत्त्वादि भेदसे] तीन प्रकारका बतलाया है। [ऐसी स्थितिमें] शरीरधारी होकर मुनि नारायण उस अहंकारका त्याग करनेमें कैसे समर्थ हो सकते थे? यह निश्चित है कि बिना कारणके कार्य नहीं होता॥ १७–१८ १/२ ॥ |
| तपो दानं तथा यज्ञाः सात्त्विकात्प्रभवन्ति ते॥ १९<br><br>राजसाद्वा महाभाग तामसात्कलहस्तथा।<br>क्रिया स्वल्पापि राजेन्द्र नाहङ्कारं विना क्वचित्॥ २०<br><br>शुभा वाप्यशुभा वापि प्रभवत्यपि निश्चयः।<br>अहङ्काराद् बन्धकारी नान्योऽस्ति जगतीतले॥ २१<br><br>येनेदं रचितं विश्वं कथं तद्रहितं भवेत्। | तप, दान तथा यज्ञ सात्त्विक अहंकारसे होते हैं। हे महाभाग! राजस और तामस अहंकारसे कलह उत्पन्न होता है। हे राजेन्द्र! यह निश्चय है कि छोटी-सी भी क्रिया चाहे वह शुभ हो अथवा अशुभ—बिना अहंकारके कभी नहीं हो सकती। जगत्में अहंकारसे बढ़कर बन्धनमें डालनेवाला दूसरा कोई पदार्थ नहीं है। अतः जिस अहंकारसे ही यह विश्व निर्मित है, उसके बिना यह संसार कैसे रह सकता है?॥ १९—२१ १/२ ॥ |
| ब्रह्मा रुद्रस्तथा विष्णुरहङ्कारयुतास्त्वमी॥ २२<br><br>अन्येषां चैव का वार्ता मुनीनां वसुधाधिप।<br>अहङ्कारावृतं विश्वं भ्रमतीदं चराचरम्॥ २३<br><br>पुनर्जन्म पुनर्मृत्युः सर्वं कर्मवशानुगम्।<br>देवतिर्यङ्मनुष्याणां संसारेऽस्मिन्महीपते॥ २४<br><br>रथाङ्गवदसर्वार्थं भ्रमणं सर्वदा स्मृतम्। | हे पृथिवीपते! जब ब्रह्मा, विष्णु और शिव भी अहंकारयुक्त रहते हैं, तब अन्य प्राणियों और मुनियोंकी बात ही क्या? यह चराचर जगत् अहंकारके वशीभूत होकर भ्रमण करता रहता है। सभी जीव कर्मके अधीन हैं और उसीके अनुसार बार-बार उनका जन्म तथा मरण होता रहता है। हे महीपते! देवता, मनुष्य और पशु-पक्षियोंका इस संसारमें बराबर चक्कर काटना रथके पहियेके भ्रमणके समान बताया गया है॥ २२—२४ १/२ ॥ |
| विष्णोरप्यवताराणां संख्यां जानाति कः पुमान्॥ २५<br><br>विततेऽस्मिंस्तु संसारे उत्तमाधमयोनिषु।<br>नारायणो हरिः साक्षान्मात्स्यं वपुराश्रितः॥ २६<br><br>कामठं सौकरं चैव नारसिंहञ्च वामनम्।<br>युगे युगे जगन्नाथो वासुदेवो जनार्दनः॥ २७<br><br>अवतारानासंख्यातान्करोति विधियन्त्रितः। | इस विस्तृत संसारमें उत्तम–अधम सभी योनियोंमें भगवान् विष्णुके अवतारोंकी संख्या कौन मनुष्य जान सकता है? साक्षात् नारायण श्रीहरिको मत्स्य, कच्छप, वराह, नरसिंह और वामनतकका शरीर धारण करना पड़ा। वे जगत्प्रभु, वासुदेव, भगवान् जनार्दन भी विधिके अधीन होकर विभिन्न युगोंमें असंख्य अवतार धारण करते रहते हैं॥ २५—२७ १/२ ॥ |
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| ४४८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १० |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| वैवस्वते महाराज सप्तमे भगवान्हरिः ॥ २८<br>मन्वन्तरेऽवताराग्वै चक्रे ताञ्छृणु तत्त्वतः।<br>भृगुशापान्महाराज विष्णुर्देववरः प्रभुः ॥ २९<br>अवताराननेकांस्तु कृतवानखिलेश्वरः। | हे महाराज! सातवें वैवस्वत मन्वन्तरमें भगवान् श्रीहरिने जो-जो अवतार लिये थे, उन्हें आप ध्यानपूर्वक सुनें। हे महाराज! देवश्रेष्ठ और सबके स्वामी भगवान् विष्णुको महर्षि भृगुके शापके कारण अनेक अवतार धारण करने पड़े थे॥ २८-२९ १/२॥ |
| राजोवाच<br>सन्देहोऽयं महाभाग हृदये मम जायते ॥ ३०<br>भृगुणा भगवान्विष्णुः कथं शप्तः पितामह।<br>हरिणा च मुनेस्तस्य विप्रियं किं कृतं मुने ॥ ३१<br>यद्रोषाद् भृगुणा शप्तो विष्णुर्देवनमस्कृतः। | राजा बोले—हे महाभाग! हे पितामह! मेरे मनमें यह संदेह हो रहा है कि भृगुने भगवान्को शाप क्यों दे दिया? हे मुने! भगवान् विष्णुने उन भृगुमुनिका कौन-सा अप्रिय कार्य कर दिया था, जिससे रुष्ट होकर महर्षि भृगुने सभी देवताओंद्वारा नमस्कार किये जानेवाले भगवान् विष्णुको शाप दे दिया॥ ३०-३१ १/२॥ |
| व्यास उवाच<br>शृणु राजनप्रवक्ष्यामि भृगोः शापस्य कारणम् ॥ ३२<br>पुरा कश्यपदायादो हिरण्यकशिपुर्नृपः।<br>यदा तदा सुरैः सार्धं कृतं संख्यं परस्परम् ॥ ३३ | व्यासजी बोले—हे राजन्! सुनिये, मैं आपको भृगुके शापका कारण बताता हूँ। पूर्वकालमें कश्यपतनय हिरण्यकशिपु नामक एक राजा था। उस समय जब भी वह देवताओंके साथ परस्पर संघर्ष करने लगता था, तब युद्ध आरम्भ हो जानेपर सारा संसार व्याकुल हो उठता था॥ ३२-३३ १/२॥ |
| कृते संख्ये जगत्सर्वं व्याकुलं समजायत।<br>हते तस्मिन्नृपे राजा प्रह्लादः समजायत ॥ ३४<br>देवान्स पीडयामास प्रह्लादः शत्रुकर्षणः।<br>संग्रामो ह्यभवद् घोरः शक्रप्रह्लादयोस्तदा ॥ ३५<br>पूर्णं वर्षशतं राजँल्लोकविस्मयकारकम्।<br>देवैर्युद्धं कृतं चोग्रं प्रह्लादस्तु पराजितः ॥ ३६<br>निर्वेदं परमं प्राप्तो ज्ञात्वा धर्मं सनातनम्।<br>विरोचनसुतं राज्ये प्रतिष्ठाप्य बलिं नृप ॥ ३७ | बादमें हिरण्यकशिपुका वध हो जानेपर प्रह्लाद राजा बने। शत्रुओंको कष्ट पहुँचानेवाले वे प्रह्लाद भी देवताओंको पीड़ित करने लगे। अतः इन्द्र और प्रह्लादमें भयानक संग्राम आरम्भ हो गया। हे राजन्! पूरे सौ वर्षतक देवताओंने लोगोंको अचम्भेमें डाल देनेवाला भीषण युद्ध किया और प्रह्लादको पराजित कर दिया। हे राजन्! तब शाश्वत धर्मको समझकर वे महान् विरक्तिको प्राप्त हुए और विरोचनपुत्र बलिको राज्यपर प्रतिष्ठित करके तप करनेके लिये गन्धमादनपर्वतपर चले गये॥ ३४-३७ १/२॥ |
| जगाम स तपस्तप्तुं पर्वते गन्धमादने।<br>प्राप्य राज्यं बलिः श्रीमान्सुरैर्वैरं चकार ह ॥ ३८<br>यतः परस्परं युद्धं जातं परमदारुणम्।<br>ततः सुरैर्जिता दैत्या इन्द्रेणामिततेजसा ॥ ३९<br>विष्णुना च सहायेन राज्यभ्रष्टाः कृता नृप। | राज्य प्राप्त करके ऐश्वर्यशाली राजा बलिने देवताओंसे शत्रुता कर ली, जिससे [देवताओं और दैत्योंमें] पुनः परस्पर अत्यन्त भीषण युद्ध होने लगा। उसमें देवताओं तथा अमित तेजस्वी इन्द्रने दैत्योंको जीत लिया। हे राजन्! उस समय इन्द्रके सहायक बनकर भगवान् विष्णुने दैत्योंको राज्यसे च्युत कर दिया॥ ३८-३९ १/२॥ |