देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
५१० श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २२
५१० श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २२
| विस्रंसितश्च गर्भोऽसौ योगेन योगमायया।<br>नीतश्च रोहिणीगर्भे कृत्वा संकर्षणं बलात् ॥ २४ | तत्पश्चात् योगमायाने अपने योगबलसे उस गर्भको च्युत कर दिया और हठात् खींचकर उसे रोहिणीके गर्भमें स्थापित कर दिया॥ २४॥ |
| पतितः पञ्चमे मासि लोकख्यातिं गतस्तदा।<br>कंसोऽपि ज्ञातवांस्तत्र देवकीगर्भपातनम् ॥ २५ | इसी बीच लोगोंको यह बात मालूम हो गयी कि पाँचवें महीनेमें ही देवकीका गर्भस्राव हो गया। कंस भी देवकीके गर्भपातका समाचार जान गया। अपने लिये यह सुखप्रद समाचार सुनकर वह दुरात्मा कंस बहुत प्रसन्न हुआ॥ २५ १/२ ॥ |
| मुदं प्राप स दुष्टात्मा श्रुत्वा वार्तां सुखावहाम्।<br>अष्टमे देवकीगर्भे भगवान्सात्वतां पतिः ॥ २६<br><br>उवास देवकार्यार्थं भारावतरणाय च। | उधर देवताओंके कार्यको सिद्ध करने तथा पृथ्वीका भार उतारनेके लिये जगत्पति भगवान् विष्णु देवकीके आठवें गर्भमें विराजमान हो गये॥ २६ १/२ ॥ |
| राजोवाच<br>वसुदेवः कश्यपांशः शेषांशश्च तदाभवत् ॥ २७<br><br>हरेरंशस्तथा प्रोक्तो भवता मुनिसत्तम।<br>अन्ये च येऽंशा देवानां तत्र जातास्तु तान्वद ॥ २८<br><br>भारावतरणार्थं वै क्षितेः प्रार्थनयानघ। | राजा बोले—हे मुनिश्रेष्ठ! आपने यह बता दिया कि वसुदेवजी महर्षि कश्यपके अंशावतार थे और उनके यहाँ शेषनाग तथा भगवान् विष्णु अपने-अपने अंशोंसे उत्पन्न हुए। हे अनघ! देवताओंके अन्य जो-जो अंशावतार पृथ्वीकी प्रार्थनापर उसका भार उतारनेके लिये हुए हैं, उन्हें भी बताइये॥ २७-२८ १/२ ॥ |
| व्यास उवाच<br>सुराणामसुराणां च ये येऽंशा भुवि विश्रुताः ॥ २९<br><br>तानहं सम्प्रवक्ष्यामि संक्षेपेण शृणुष्व तान्।<br>वसुदेवः कश्यपांशो देवकी च तथादितिः ॥ ३० | व्यासजी बोले—हे राजन्! देवताओं तथा असुरोंके जो-जो अंश लोकमें विख्यात हुए हैं, उनके विषयमें मैं संक्षिप्तरूपमें बता रहा हूँ; आप उन्हें सुनिये—वसुदेव कश्यपके अंशसे तथा देवकी अदितिके अंशसे उत्पन्न थीं॥ २९-३०॥ |
| बलदेवस्त्वनन्तांशो वर्तमानेषु तेषु च।<br>योऽसौ धर्मसुतः श्रीमान्नारायण इति श्रुतः ॥ ३१<br><br>तस्यांशो वासुदेवस्तु विद्यमाने मुनौ तदा।<br>नरस्तस्यानुजो यस्तु तस्यांशोऽर्जुन एव च॥ ३२ | बलदेवजी शेषनागके अंश थे। इन सभीके अवतरित हो जानेपर जिन धर्मपुत्र श्रीमान् नारायणके विषयमें कहा जा चुका है, उन्हींके अंशसे ही साक्षात् भगवान् श्रीकृष्णने अवतार लिया। मुनिवर नारायणके श्रीकृष्णरूपमें प्रकट हो जानेपर उनके नर नामक जो छोटे भाई हैं, उनके अंशस्वरूप अर्जुनका प्राकट्य हुआ॥ ३१-३२॥ |
| युधिष्ठिरस्तु धर्मांशो वाय्वंशो भीम इत्युत।<br>अश्विन्योंशौ ततः प्रोक्तौ माद्रीपुत्रौ महाबलौ॥ ३३ | महाराज युधिष्ठिर धर्मके अंश, भीमसेन पवनदेवके अंश तथा माद्रीके दोनों महाबली पुत्र नकुल एवं सहदेव दोनों अश्विनीकुमारोंके अंश कहे गये हैं॥ ३३॥ |
| सूर्यांशः कर्ण आख्यातो धर्मांशो विदुरः स्मृतः।<br>द्रोणो बृहस्पतेरंशस्तत्सुतस्तु शिवांशजः ॥ ३४ | कर्ण सूर्यके अंशसे प्रकट हुए और विदुरको धर्मका अंश बताया गया है। द्रोणाचार्य बृहस्पतिके अंशसे तथा उनका पुत्र अश्वत्थामा शिवके अंशसे उत्पन्न थे॥ ३४॥ |
| अ० २२ ] | चतुर्थ स्कन्ध | ५११ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| समुद्रः शन्तनुः प्रोक्तो गङ्गा भार्या मता बुधैः ।<br>देवकस्तु समाख्यातो गन्धर्वपतिरागमे ॥ ३५ | विद्वानोंका मानना है कि समुद्रके अंशसे महाराज शन्तनु तथा गंगाके अंशसे उनकी भार्या उत्पन्न हुई थीं। पुराणप्रसिद्ध गन्धर्वराजके अंशसे महाराज देवक उत्पन्न हुए थे ॥ ३५ ॥ |
| वसुर्भीष्मो विराटस्तु मरुद्गण इति स्मृतः ।<br>अरिष्टस्य सुतो हंसो धृतराष्ट्रः प्रकीर्तितः ॥ ३६ | भीष्मपितामहको वसुका तथा राजा विराटको मरुद्-गणोंका अंशावतार बताया गया है। महाराज धृतराष्ट्र अरिष्टनेमिके पुत्र हंसके अंशसे उत्पन्न कहे गये हैं ॥ ३६ ॥ |
| मरुद्गणः कृपः प्रोक्तः कृतवर्मा तथापरः ।<br>दुर्योधनः कलेरंशः शकुनिं विद्धि द्वापरम् ॥ ३७ | कृपाचार्यको किसी एक मरुद्गणका अंश तथा कृतवर्माको किसी दूसरे मरुद्गणका अंश बताया गया है। [हे राजन्!] दुर्योधनको कलिका अंश तथा शकुनिको द्वापरका अंश समझिये ॥ ३७ ॥ |
| सोमपुत्रः सुवर्चाह्व्यः सोमप्ररुरुदाहृतः ।<br>पावकांशो धृष्टद्युम्नः शिखण्डी राक्षसस्तथा ॥ ३८ | प्रसिद्ध सोमनन्दन सुवर्चा पृथ्वीपर सोमप्ररु नामसे विख्यात हुए। धृष्टद्युम्न अग्नि तथा शिखण्डी राक्षसके अंशसे उत्पन्न हुए ॥ ३८ ॥ |
| सनत्कुमारस्यांशस्तु प्रद्युम्नः परिकीर्तितः ।<br>द्रुपदो वरुणस्यांशो द्रौपदी च रमांशाजा ॥ ३९ | प्रद्युम्न सनत्कुमारके अंश कहे गये हैं। द्रुपद वरुणके अंश थे तथा द्रौपदी साक्षात् लक्ष्मीके अंशसे उत्पन्न थीं ॥ ३९ ॥ |
| द्रौपदीतनयाः पञ्च विश्वेदेवांशजाः स्मृताः ।<br>कुन्तिः सिद्धिर्धृतिर्माद्री मतिर्गान्धारराजजा ॥ ४० | द्रौपदीके पाँचों पुत्र विश्वेदेवके अंशसे उत्पन्न माने गये हैं। कुन्ती सिद्धिके अंशसे, माद्री धृतिके अंशसे तथा गान्धारी मतिके अंशसे उत्पन्न हुई थीं ॥ ४० ॥ |
| कृष्णपत्न्यस्तथा सर्वा देववाराङ्गनाः स्मृताः ।<br>राजानश्च तथा सर्वे असुराः शक्रनोदिताः ॥ ४१ | भगवान् कृष्णकी सभी पत्नियाँ देवताओंकी रमणियोंके अंशसे उत्पन्न कही गयी हैं। इन्द्रके द्वारा भेजे हुए सब दैत्य धरातलपर आकर दुराचारी नरेश बने थे ॥ ४१ ॥ |
| हिरण्यकशिपोरांशः शिशुपाल उदाहृतः ।<br>विप्रचित्तिर्जरासन्धः शल्यः प्रह्लाद इत्यपि ॥ ४२ | शिशुपालको हिरण्यकशिपुका अंश कहा गया है। जरासन्ध विप्रचित्तिका तथा शल्य प्रह्लादका अंशावतार था ॥ ४२ ॥ |
| कालनेमिस्तथा कंसः केशी हयशिरास्तथा ।<br>अरिष्टो बलिपुत्रस्तु ककुद्मी गोकुले हतः ॥ ४३ | कालनेमि कंस हुआ तथा हयशिराको केशीका जन्म प्राप्त हुआ। बलिपुत्र ककुद्मी अरिष्टासुर बना, जो गोकुलमें मारा गया ॥ ४३ ॥ |
| अनुह्लादो धृष्टकेतुर्भगदत्तोऽथ बाष्कलः ।<br>लम्बः प्रलम्बः सञ्जातः खरोऽसौ धेनुकोऽभवत् ॥ ४४ | अनुह्लाद धृष्टकेतु बना और बाष्कल भगदत्तके रूपमें उत्पन्न हुआ। लम्बने प्रलम्बासुरके रूपमें जन्म लिया तथा खर धेनुकासुर हुआ ॥ ४४ ॥ |
| वाराहश्च किशोरश्च दैत्यौ परमदारुणौ ।<br>मल्लौ तावेव सञ्जातौ ख्यातौ चाणूरमुष्टिकौ ॥ ४५ | अत्यन्त भयंकर वाराह और किशोर नामक दोनों दैत्य चाणूर और मुष्टिक नामक पहलवानोंके रूपमें प्रख्यात हुए ॥ ४५ ॥ |
| ५१२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २३ |
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| दितिपुत्रस्तथारिष्टो गजः कुवलयाभिधः।<br>बलिपुत्री बकी ख्याता बकस्तदनुजः स्मृतः॥ ४६ | दितिका पुत्र अरिष्टासुर कुवलयापीड नामक हाथी हुआ। बलिकी पुत्री पूतना (बकी) राक्षसी बनी और उसका छोटा भाई बकासुर कहलाया॥ ४६॥ |
| यमो रुद्रस्तथा कामः क्रोधश्चैव चतुर्थकः।<br>तेषामंशैस्तु सञ्जातो द्रोणपुत्रो महाबलः॥ ४७ | द्रोणपुत्र महाबली अश्वत्थामा यम, रुद्र, काम और क्रोध—इन चारोंके अंशसे उत्पन्न हुआ था॥ ४७॥ |
| अंशावतरणे पूर्वं दैतेया राक्षसास्तथा।<br>जाताः सर्वे सुरांशास्ते क्षितिभारावतारणे॥ ४८ | पूर्वकालमें अंशावतारके समय जो दैत्य तथा राक्षस उत्पन्न हुए थे, पृथ्वीपरसे उनका भार उतारनेके लिये सभी देवता अपने-अपने अंशसे उत्पन्न हुए॥ ४८॥ |
| एतेषां कथितं राजन्नंशावतरणं नृप।<br>सुराणां चासुराणां च पुराणेषु प्रकीर्तितम्॥ ४९ | हे राजन्! पुराणोंमें इन देवताओं तथा असुरोंके अंशावतारोंका जो वर्णन किया गया है, वह सब मैंने आपसे कह दिया॥ ४९॥ |
| यदा ब्रह्मादयो देवाः प्रार्थनार्थं हरिं गताः।<br>हरिणा च तदा दत्तौ केशौ खलु सितासितौ॥ ५० | जब ब्रह्मा आदि देवता प्रार्थना करनेके लिये भगवान् विष्णुके पास गये थे तब विष्णुजीने उन्हें श्वेत तथा श्याम वर्णवाले दो केश प्रदान किये थे॥ ५०॥ |
| श्यामवर्णस्ततः कृष्णः श्वेतः सङ्कर्षणस्तथा।<br>भारावतारणार्थं तौ जातौ देवांशसम्भवौ॥ ५१ | तदनन्तर पृथ्वीका भार उतारनेके लिये भगवान् कृष्ण श्यामवर्ण विष्णुका अंश लेकर तथा बलरामजी श्वेतवर्ण शेषनागका अंश लेकर अवतरित हुए॥ ५१॥ |
| अंशावतरणं चैतच्छृणोति भक्तिभावतः।<br>सर्वपापविनिर्मुक्तो मोदते स्वजनैर्वृतः॥ ५२ | जो प्राणी भक्ति-भावनासे इस अंशावतारकी कथाका श्रवण करता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त होकर अपने बन्धु-बान्धवोंके सहित आनन्दित रहता है॥ ५२॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे देवदानवानामंशावतरणवर्णनं नाम द्वाविंशोऽध्यायः॥ २२॥
अथ त्रयोविंशोऽध्यायः
कंसके कारागारमें भगवान् श्रीकृष्णका अवतार, वसुदेवजीका उन्हें गोकुल पहुँचाना और वहाँसे योगमायास्वरूपा कन्याको लेकर आना, कंसद्वारा कन्याके वधका प्रयास, योगमायाद्वारा आकाशवाणी करनेपर कंसका अपने सेवकोंद्वारा नवजात शिशुओंका वध कराना
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
|---|---|
| हतेषु षट्सु पुत्रेषु देवक्या औग्रसेनिना।<br>सप्तमे पतिते गर्भे वचनान्नारदस्य च॥ १<br><br>अष्टमस्य च गर्भस्य रक्षणार्थमतन्द्रितः।<br>प्रयत्नमकरोद्राजा मरणं स्वं विचिन्तयन्॥ २ | [हे राजन्!] उग्रसेनपुत्र कंसके द्वारा देवकीके छहः पुत्रोंका वध कर दिये जानेपर तथा सातवाँ गर्भ गिर जानेके पश्चात् वह राजा कंस नारदजीके कथनानुसार अपनी मृत्युके सम्बन्धमें भलीभाँति विचार करते हुए सावधानीपूर्वक आठवें गर्भको [गिरनेसे] बचानेका प्रयत्न करने लगा॥ १-२॥ |
| अ० २३ ] | चतुर्थ स्कन्ध | ५१३ |
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| मूल संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| समये देवकीगर्भे प्रवेशमकरोद्धरिः ।<br>अंशेन वसुदेवे तु समागत्य यथाक्रमम् ॥ ३ | उचित समय आनेपर भगवान् श्रीहरि अपने अंशके साथ वसुदेवमें प्रविष्ट होकर देवकीके गर्भमें विराजमान हो गये ॥ ३ ॥ |
| तदेयं योगमाया च यशोदायां यथेच्छया ।<br>प्रवेशमकरोद्देवी देवकार्यार्थसिद्धये ॥ ४ | उसी समय देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके उद्देश्यसे भगवती योगमायाने अपनी इच्छासे यशोदाके गर्भमें प्रवेश किया ॥ ४ ॥ |
| रोहिण्यास्तनयो रामो गोकुले समजायत ।<br>यतः कंसभयोद्विग्ना संस्थिता सा च कामिनी ॥ ५ | कंसके भयसे उद्विग्न होकर गोकुलमें कालक्षेप कर रही वसुदेव-भार्या रोहिणीके गर्भसे पुत्ररूपमें बलरामजी प्रकट हो चुके थे ॥ ५ ॥ |
| कारागारे ततः कंसो देवकीं देवसंस्तुताम् ।<br>स्थापयामास रक्षार्थं सेवकान्समकल्पयत् ॥ ६ | तदनन्तर कंसने देववन्दिता देवकीको कारागारमें बन्द कर दिया और उनकी रखवालीके लिये बहुतसे सेवक नियुक्त कर दिये ॥ ६ ॥ |
| वसुदेवस्तु कामिन्याः प्रेमतन्तुनियन्त्रितः ।<br>पुत्रोत्पत्तिं च सञ्चिन्त्य प्रविष्टः सह भार्यया ॥ ७ | अपनी पत्नी देवकीके पुत्र-प्रसवकी बातको ध्यानमें रखते हुए तथा उनके प्रेमपाशमें आबद्ध रहनेके कारण वसुदेवजी भी उनके साथ कारागारमें ही रहने लगे ॥ ७ ॥ |
| देवकीगर्भगो विष्णुर्देवकार्यार्थसिद्धये ।<br>संस्तुतोऽमरसङ्घैश्च व्यवर्धत यथाक्रमम् ॥ ८ | देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये देवकीके गर्भमें विराजमान भगवान् विष्णु देवसमुदायद्वारा स्तूयमान होते हुए धीरे-धीरे वृद्धिको प्राप्त होने लगे ॥ ८ ॥ |
| सञ्जाते दशमे तत्र मासेऽथ श्रावणे शुभे ।<br>प्राजापत्यर्क्षसंयुक्ते कृष्णपक्षेऽष्टमीदिने ॥ ९<br>कंसस्तु दानवान्सर्वानुवाच भयविह्वलः ।<br>रक्षणीया भवद्भिश्च देवकी गर्भमन्दिरे ॥ १० | श्रावणमासमें दसवाँ महीना पूर्ण हो जानेपर (भाद्रपद-मासके) कृष्णपक्षमें रोहिणी नक्षत्रयुक्त शुभ अष्टमी तिथिके उपस्थित होनेपर भयसे व्याकुल कंसने सभी दानवोंसे कहा कि आपलोग इस समय गर्भकक्षमें विद्यमान देवकीकी रखवाली करें ॥ ९-१० ॥ |
| अष्टमो देवकीगर्भः शत्रुर्मे प्रभविष्यति ।<br>रक्षणीयः प्रयत्नेन मृत्युरूपः स बालकः ॥ ११ | देवकीके आठवें गर्भसे उत्पन्न बालक मेरा शत्रु होगा। अतएव आपलोगोंको मेरे कालरूप उस बालककी यत्नपूर्वक रखवाली करनी चाहिये ॥ ११ ॥ |
| हत्वैनं बालकं दैत्याः सुखं स्वप्स्यामि मन्दिरे ।<br>निवृत्तिवर्जिते दुःखे नाशिते चाष्टमे सुते ॥ १२ | हे दैत्यो ! इस समय मैं अत्यन्त उद्वेगकारी तथा दुःखदायी आठवें गर्भसे उत्पन्न होनेवाले इस बालकका वध कर लेनेके बाद ही अपने महलमें सुखपूर्वक सो सकूँगा ॥ १२ ॥ |
| खड्गप्रासधराः सर्वे तिष्ठन्तु धृतकार्मुकाः ।<br>निद्रातन्द्राविहीनाश्च सर्वत्र निहितेक्षणाः ॥ १३ | आप सभी लोग अपने हाथोंमें तलवार, भाला और धनुष धारण करके निद्रा तथा आलस्यसे रहित होकर चारों ओर दृष्टि रखियेगा ॥ १३ ॥ |
| व्यास उवाच<br>इत्यादिश्यासुरगणान् कृशोऽतिभयविह्वलः ।<br>मन्दिरं स्वं जगामाशु न लेभे दानवः सुखम् ॥ १४ | **व्यासजी बोले—**उन दैत्योंको यह आज्ञा देकर भयाकुल तथा [चिन्ताके कारण] अति दुर्बल दानव कंस तत्काल अपने महलमें चला गया, किंतु वहाँ भी वह सुखकी नींद नहीं सो पा रहा था ॥ १४ ॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—17 A