देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
अ० १९] तृतीय स्कन्ध ३३९
अ० १९] तृतीय स्कन्ध ३३९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| सुदर्शनोऽतिदुर्भाग्यो राज्यभ्रष्टो निराश्रयः।<br>बलकोषविहीनश्च परित्यक्तस्तु बान्धवैः॥ ३<br><br>मात्रा सह वनं प्राप्तः फलमूलाशनः कृशः।<br>न ते योग्यो वरोऽयं वै वनवासी च दुर्भगः॥ ४ | वह सुदर्शन बड़ा ही अभागा, राज्यच्युत, आश्रयहीन और सेना तथा कोशसे विहीन है; बन्धु-बान्धवोंने उसका परित्याग कर दिया है। वह अपनी माताके साथ वनमें रहकर फल-मूल खाता है और अत्यन्त दुर्बल है। इसलिये वह मन्दभाग्य एवं वनवासी बालक सर्वथा तुम्हारे योग्य वर नहीं है॥ ३-४॥ |
| राजपुत्राः कृतप्रज्ञा रूपवन्तः सुसम्मताः।<br>त्वदर्हाः पुत्रि सन्त्यन्ये राजचिह्नैरलङ्कृताः॥ ५<br><br>भ्रातास्य वर्तते कान्तः स राज्यं कोसलेषु वै।<br>करोति रूपसम्पन्नः सर्वलक्षणसंयुतः॥ ६ | हे पुत्रि! तुम्हारे योग्य अनेक राजकुमार यहाँ उपस्थित हैं; जो बुद्धिमान्, रूपवान्, सम्माननीय और राजचिह्नोंसे अलंकृत हैं। इसी सुदर्शनका एक कान्तिमान्, रूपसम्पन्न तथा सभी शुभ लक्षणोंसे युक्त भाई भी है, जो इस समय कोसलदेशमें राज्य करता है॥ ५-६॥ |
| अन्यच्च कारणं सुभ्रु शृणु यच्च मया श्रुतम्।<br>युधाजित्सततं तस्य वधकामोऽस्ति भूमिपः॥ ७ | हे सुभ्रु! इसके अतिरिक्त मैंने एक और जो बात सुनी है, तुम उसे सुनो—राजा युधाजित् उस सुदर्शनका वध करनेके लिये सतत प्रयत्नशील रहता है॥ ७॥ |
| दौहित्रः स्थापितस्तेन राज्ये कृत्वातिसङ्गरम्।<br>वीरसेनं नृपं हत्वा सम्मन्त्र्य सचिवैः सह॥ ८<br><br>भारद्वाजाश्रमं प्राप्तं हन्तुकामः सुदर्शनम्।<br>मुनिना वारितः पश्चाज्जगाम निजमन्दिरम्॥ ९ | उसने घोर संग्राम करके [इसके नाना] राजा वीरसेनको मारकर पुनः मन्त्रियोंके साथ मन्त्रणा करके अपने दौहित्र शत्रुजित्को राज्यपर अभिषिक्त कर दिया है। इसके बाद भारद्वाजमुनिके आश्रममें शरणलिये उस सुदर्शनको मारनेकी इच्छासे वह वहाँ भी पहुँचा, किंतु मुनिके मना करनेपर अपने घर लौट गया॥ ८-९॥ |
| शशिकलोवाच<br>मातर्ममेप्सितः कामं वनस्थोऽपि नृपात्मजः।<br>शर्यातिवचनेनैव सुकन्या च पतिव्रता॥ १०<br><br>च्यवनञ्च यथा प्राप्य पतिशुश्रूषणे रता।<br>पतिशुश्रूषणं स्त्रीणां स्वर्गदं मोक्षदं तथा॥ ११<br><br>अकैतवकृतं नूनं सुखदं भवति स्त्रियाः। | शशिकला बोली— हे माता! मुझे तो वह वनवासी राजकुमार ही अत्यन्त अभीष्ट है। [पूर्वकालमें] शर्यातिकी आज्ञासे ही उनकी पतिव्रता पुत्री सुकन्या च्यवनमुनिके पास जाकर उनकी सेवामें तत्पर हो गयी थी। उसी प्रकार मैं पतिसेवा करूँगी; पतिकी सेवा-शुश्रूषा स्त्रियोंके लिये स्वर्ग तथा मोक्ष प्रदान करनेवाली होती है। अपने पतिके लिये कपटरहित व्यवहार स्त्रियोंके लिये निश्चित रूपसे सुखदायक होता है॥ १०-११ १/२॥ |
| भगवत्या समादिष्टं स्वप्ने वरमनुत्तमम्॥ १२<br><br>तमृतेऽहं कथं चान्यं संश्रयामि नृपात्मजम्।<br>मच्चित्तभित्तौ लिखितो भगवत्या सुदर्शनः॥ १३<br><br>तं विहाय प्रियं कान्तं करिष्येऽहं न चापरम्। | स्वयं भगवती उस सर्वश्रेष्ठ वरका वरण करनेके लिये मुझे स्वप्नमें आज्ञा दे चुकी हैं। अतः उनको छोड़कर मैं किसी अन्य राजकुमारका वरण कैसे करूँ? स्वयं भगवतीने मेरे चित्तकी भित्तिपर सुदर्शनको ही अंकित कर दिया है। अतः उस प्रिय सुदर्शनको छोड़कर मैं किसी अन्य राजकुमारको पति नहीं बनाऊँगी॥ १२-१३ १/२॥ |
| ३४० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १९ |
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| व्यास उवाच<br>प्रत्यादिष्टाथ वैदर्भी तया बहुनिदर्शनैः ॥ १४<br><br>भर्तारं सर्वमाचष्ट पुत्र्योक्तं वचनं भृशम् ।<br>विवाहस्य दिनादर्वागाप्तं श्रुतसमन्वितम् ॥ १५<br><br>द्विजं शशिकला तत्र प्रेषयामास सत्वरम् ।<br>यथा न वेद मे तातस्तथा गच्छ सुदर्शनम् ॥ १६ | व्यासजी बोले—[हे राजन्!] उस समय उस शशिकलाने अनेक प्रमाणोंके द्वारा विदर्भराजकुमारी अपनी माताको समझा दिया। तत्पश्चात् पुत्रीके द्वारा कही गयी सभी बातोंको महारानीने अपने पतिसे बताया॥ १४ १/२॥<br>उधर शशिकलाने विवाहके कुछ दिनों पूर्व ही एक विश्वस्त तथा वेदनिष्ठ ब्राह्मणको शीघ्र ही वहाँ भेज दिया। [जाते समय उसने ब्राह्मणसे कहा कि] आप सुदर्शनके पास इस प्रकार जायें, जिसे मेरे पिता न जान पायें॥ १५-१६॥ |
| भारद्वाजाश्रमे ब्रूहि मद्वाक्यात्त्वरसा विभो ।<br>पित्रा मे सम्भृतः कामं मदर्थेन स्वयंवरः ॥ १७<br><br>आगमिष्यन्ति राजानो बलयुक्ता ह्यनेकंशः ।<br>मया त्वं वै वृतश्चित्ते सर्वथा प्रीतिपूर्वकम् ॥ १८<br><br>भगवत्या समादिष्टः स्वप्ने मम सुरोपम ।<br>विषमद्य हुताशे वा प्रपतामि प्रदीपिते ॥ १९<br><br>वरये त्वदृते नान्यं पितृभ्यां प्रेरितापि वा ।<br>मनसा कर्मणा वाचा संवृतस्त्वं मया वरः ॥ २०<br><br>भगवत्याः प्रसादेन शर्मावाभ्यां भविष्यति ।<br>आगन्तव्यं त्वयात्रैव दैवं कृत्वा परं बलम् ॥ २१<br><br>यदधीनं जगत्सर्वं वर्तते सचराचरम् ।<br>भगवत्या यदादिष्टं न तन्मिथ्या भविष्यति ॥ २२<br><br>यद्वशे देवताः सर्वा वर्तन्ते शङ्करादयः ।<br>वक्तव्योऽसौ त्वया ब्रह्मन्नेकान्ते वै नृपात्मजः ॥ २३ | हे विभो! आप बहुत शीघ्र ही भारद्वाजके आश्रम पहुँचकर सुदर्शनको मेरी ओरसे कहिये कि मेरे पिताने मेरे विवाहार्थ एक स्वयंवर आयोजित किया है; उसमें अनेक बलवान् राजा आयेंगे, किंतु मैं तो मनसे अत्यन्त प्रेमपूर्वक हर तरहसे आपका वरण कर चुकी हूँ। हे देवोपम राजकुमार! मुझे भगवतीने स्वप्नमें आपको वरण करनेका आदेश दिया है। मैं विष खा लूँगी अथवा जलती हुई अग्निमें कूद पडूँगी, किंतु माता-पिताके द्वारा बहुत प्रेरित किये जानेपर भी मैं आपके अतिरिक्त किसी अन्यका वरण नहीं करूँगी; क्योंकि मैं मन, वचन तथा कर्मसे आपको अपना पति मान चुकी हूँ। भगवतीकी कृपासे हम दोनोंका कल्याण होगा। प्रारब्धको प्रबल मानकर आप इस स्वयंवरमें अवश्य आयें। यह सम्पूर्ण चराचर जगत् जिनके अधीन है तथा शंकर आदि सभी देवगण जिनके वशमें रहते हैं, उन भगवतीने जो आदेश दिया है, वह कभी भी असत्य नहीं होगा। हे ब्रह्मन्! आप उस राजकुमारसे यह सब एकान्तमें बताइयेगा। हे निष्पाप! आप वही कीजियेगा, जिससे मेरा काम बन जाय॥ १७—२३ १/२॥ |
| यथा भवति मे कार्यं तत्कर्तव्यं त्वयानघ ।<br>इत्युक्त्वा दक्षिणां दत्त्वा मुनिर्व्यापारितस्तया ॥ २४<br><br>गत्वा सर्वं निवेद्याशु तत्र प्रत्यागतो द्विजः ।<br>सुदर्शनस्तु तज्ज्ञात्वा निश्चयं गमने तदा ॥ २५<br><br>चकार मुनिना तेन प्रेरितः परमादरात् । | ऐसा कहकर और दक्षिणा देकर शशिकलाने उस ब्राह्मणको भेज दिया। वह ब्राह्मण सुदर्शनसे सारी बातें कहकर शीघ्र ही वापस आ गया। उन बातोंको जानकर राजकुमार सुदर्शनने स्वयंवरमें जानेका निश्चय कर लिया; उन भारद्वाजमुनिने भी उसे आदरपूर्वक भेज दिया॥ २४-२५ १/२॥ |
| अ० १९ ] | तृतीय स्कन्ध | ३४१ |
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| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
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| गमनायोद्यतं पुत्रं तमुवाच मनोरमा ॥ २६<br>वेपमानातिदुःखातार् जातत्रासाश्रुलोचना ।<br>कुत्र गच्छसि पुत्राद्य समाजे भूभृतां किल ॥ २७<br>एकाकी कृतवैरश्च किं विचिन्त्य स्वयंवरे ।<br>युधाजिद्धन्तुकामस्त्वां समेष्यति महीपतिः ॥ २८<br>न तेऽन्योऽस्ति सहायश्च तस्मान्मा व्रज पुत्रक ।<br>एकपुत्रातिदीनास्मि तवाधारा निराश्रया ॥ २९<br>नार्हसि त्वं महाभाग निराशां कर्तुमद्य माम् ।<br>पिता मे निहतो येन सोऽपि तत्रागतो नृपः ॥ ३०<br>एकाकिनं गतं तत्र युधाजित्त्वां हनिष्यति । | तब अत्यधिक दुःखसे व्याकुल, काँपती हुई तथा भयभीत मनोरमा गमनके लिये तत्पर अपने पुत्र सुदर्शनसे आँखोंमें आँसू भरकर बोली—पुत्र ! तुम इस समय राजाओंके उस समाजमें कहाँ जा रहे हो ? तुम अकेले हो और तुमसे शत्रुता रखनेवाला राजा युधाजित् तुम्हें मारनेकी इच्छासे उस स्वयंवरमें अवश्य आयेगा, फिर तुम क्या सोचकर वहाँ जा रहे हो ? तुम्हारा कोई सहायक भी नहीं है। इसलिये हे पुत्र ! वहाँ मत जाओ। तुम ही मेरे एकमात्र पुत्र हो और मैं अति दीन हूँ तथा मुझ आश्रयहीनके लिये तुम्हीं एकमात्र आधार हो। हे महाभाग ! इस समय तुम मुझे निराश मत करो। जिसने मेरे पिताका वध कर दिया है, वह राजा युधाजित् भी वहाँ आयेगा और वहाँ तुझ अकेले गये हुएको मार डालेगा॥ २६–३० १/२ ॥ |
| सुदर्शन उवाच | सुदर्शन बोला— |
| भवितव्यं भवत्येव नात्र कार्या विचारणा ॥ ३१<br>आदेशाच्च जगन्मातुर्गच्छाम्यद्य स्वयंवरे ।<br>मा शोकं कुरु कल्याणि क्षत्रियासि वरानने ॥ ३२<br>न बिभेमि प्रसादेन भगवत्या निरन्तरम् । | होनी तो होकर रहती है, इस विषयमें सन्देह नहीं करना चाहिये। हे कल्याणि ! जगज्जननीके आदेशसे मैं आज स्वयंवरमें जा रहा हूँ। हे वरानने ! तुम क्षत्राणी हो, अतः इस विषयमें चिन्ता मत करो। भगवतीकी सदा अपने ऊपर कृपा रहनेके कारण मैं किसीसे भी भयभीत नहीं होता॥ ३१–३२ १/२ ॥ |
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
| इत्युक्त्वा रथमारुह्य गन्तुकामं सुदर्शनम् ॥ ३३<br>दृष्ट्वा मनोरमा पुत्रमाशीर्भिdocश्चान्वमोदयत् ।<br>अग्रतस्तेऽम्बिका पातु पार्वती पातु पृष्ठतः ॥ ३४<br>( पार्वती पार्श्वयोः पातु शिवा सर्वत्र साम्प्रतम् । )<br>वाराही विषमे मार्गे दुर्गा दुर्गेषु कर्हिचित् ।<br>कालिका कलहे घोरे पातु त्वां परमेश्वरी ॥ ३५<br>मण्डपे तत्र मातङ्गी तथा सौम्या स्वयंवरे ।<br>भवानी भूपमध्ये तु पातु वां भवमोचनी ॥ ३६<br>गिरिजा गिरिदुर्गेषु चामुण्डा चत्वरेषु च ।<br>कामगा काननेष्वेवं रक्षतु त्वां सनातनी ॥ ३७<br>विवादे वैष्णवी शक्तिरक्षतात्त्वां रघूद्वह ।<br>भैरवी च रणे सौम्य शत्रूणां वै समागमे ॥ ३८<br>सर्वदा सर्वदेशेषु पातु त्वां भुवनेश्वरी ।<br>महामाया जगद्धात्री सच्चिदानन्दरूपिणी ॥ ३९ | ऐसा कहकर रथपर आरूढ़ होकर स्वयंवरमें जानेके लिये उद्यत पुत्र सुदर्शनको देखकर मनोरमाने इन आशीर्वादोंसे उसका अनुमोदन किया—भगवती अम्बिका आगेसे, पार्वती पीछेसे, (पार्वती दोनों पार्श्वभागमें तथा शिवा सर्वत्र तुम्हारी रक्षा करें।) विषम मार्गमें वाराही, किसी भी प्रकारके दुर्गम स्थानोंमें दुर्गा और भयानक संग्राममें परमेश्वरी कालिका तुम्हारी रक्षा करें। उस मण्डपमें देवी मातंगी, स्वयंवरमें भगवती सौम्या तथा भव-बन्धनसे मुक्त करनेवाली भवानी राजाओंके बीचमें तुम्हारी रक्षा करें। इसी प्रकार पर्वतीय दुर्गम स्थानोंमें गिरिजा, चौराहोंपर देवी चामुण्डा तथा वनोंमें सनातनी कामगादेवी तुम्हारी रक्षा करें। हे रघूद्वह ! विवादमें भगवती वैष्णवी तुम्हारी रक्षा करें। हे सौम्य ! शत्रुओंके साथ युद्धमें भैरवी तुम्हारी रक्षा करें। जगत्को धारण करनेवाली सच्चिदानन्दस्वरूपिणी महामाया भुवनेश्वरी सभी स्थानोंपर सर्वदा तुम्हारी रक्षा करें॥ ३३—३९॥ |