देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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Read in context| ८२० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २० |
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| चम्पक उवाच<br>प्रिये गत्वाद्य पृच्छेयं शक्रं सर्वज्ञमाशु वै।<br>देवो वा दानवो वापि गन्धर्वो वा शिशुः किल॥ १२<br><br>तेनाज्ञप्तः करिष्यामि पुत्रं प्राप्तं वनादमुम्।<br>अपृष्ट्वा नैव कर्तव्यं कार्यं किञ्चिन्मया ध्रुवम्॥ १३ | चम्पक बोला— हे प्रिये ! मैं आज ही सब कुछ जाननेवाले इन्द्रके पास जाकर पूछूँगा कि यह बालक देवता है, दानव है अथवा गन्धर्व है। उनसे आदेश प्राप्त करनेके बाद ही मैं वनमें प्राप्त इस बालकको अपना पुत्र बनाऊँगा; बिना उनसे पूछे मुझे कोई भी कार्य निश्चितरूपसे नहीं करना चाहिये ॥ १२-१३॥ |
| इत्युक्त्वा तां गृहीत्वा तं विमानेनाथ चम्पकः।<br>ययौ शक्रपुरं तूर्णं हर्षेणोत्फुल्ललोचनः॥ १४<br><br>प्रणम्य पादयोः प्रीत्या चम्पकस्तु शचीपतिम्।<br>निवेद्य बालकं प्राह कृताञ्जलिपुटः स्थितः॥ १५ | ऐसा कहकर उस मदनालसा तथा पुत्रको लेकर हर्षातिरेकके कारण उत्फुल्ल नेत्रोंवाले उस चम्पकने तुरंत विमानसे इन्द्रपुरीके लिये प्रस्थान किया। [वहाँ पहुँचकर] प्रेमपूर्वक इन्द्रके चरणोंमें प्रणामकर उस बालकको उन्हें समर्पित करके दोनों हाथ जोड़कर चम्पक खड़ा हो गया और बोला— ॥ १४-१५॥ |
| देवदेव मया लब्धस्तीर्थे परमपावने।<br>कालिन्दीतमसासङ्गे बालकोऽयं स्मरप्रभः॥ १६ | हे देवदेव ! कामदेवके समान प्रभावाला यह बालक मुझे परम पवित्र तीर्थ यमुना तथा तमसा नदीके संगम-स्थलपर प्राप्त हुआ था ॥ १६ ॥ |
| कस्यायं बालकः कान्तः कथं त्यक्तः शचीपते।<br>आज्ञा चेत्तव देवेश कुर्वेऽहं बालकं सुतम्॥ १७ | हे शचीपते ! कान्तिसे सम्पन्न यह बालक किसका है; इसका त्याग क्यों कर दिया गया है ? हे देवेश ! यदि आपका आदेश हो तो मैं इस बालकको अपना पुत्र बना लूँ ॥ १७ ॥ |
| अतीव सुन्दरो बालः प्रियाया वल्लभः सुतः।<br>कृत्रिमस्तु सुतः प्रोक्तो धर्मशास्त्रेषु सर्वथा ॥ १८ | यह अत्यन्त सुन्दर बालक मेरी पत्नीका प्रिय पुत्र बन गया है। धर्मशास्त्रोंमें कृत्रिम पुत्र भी कहा गया है ॥ १८ ॥ |
| इन्द्र उवाच<br>पुत्रोऽयं वासुदेवस्य वाजिरूपधरस्य ह।<br>हैहयोऽयं महाभाग लक्ष्म्यां जातः परन्तपः॥ १९ | इन्द्र बोले— यह अश्वरूपधारी भगवान् विष्णुका पुत्र है। हे महाभाग ! हैहयसंज्ञक यह परम तपस्वी बालक लक्ष्मीजीसे उत्पन्न हुआ है ॥ १९॥ |
| उत्पादितो भगवता कार्यार्थं किल बालकः।<br>दातुं नृपतये नूनं ययातितनयाय च॥ २० | भगवान् विष्णुने ययातिके पुत्र राजा हरिवर्माको अर्पित करनेके उद्देश्यसे इस बालकको उत्पन्न किया है ॥ २० ॥ |
| हरिणा प्रेरितः सोऽद्य राजा परमधार्मिकः।<br>आगमिष्यति पुत्रार्थं तीर्थे तस्मिन्मनोरमे ॥ २१<br><br>तावत् त्वं गच्छ तत्रैव गृहीत्वा बालकं शुभम्।<br>यावन्न याति नृपतिर्ग्रहीतुं हरिणेरितः॥ २२ | परम धार्मिक राजा हरिवर्मा भगवान् विष्णुसे प्रेरणा प्राप्तकर पुत्रके लिये आज ही उस पावन तीर्थमें पहुँचेंगे। अतएव जबतक भगवान् विष्णुके द्वारा प्रेरित होकर वे राजा उसे लेनेहेतु वहाँ पहुँच नहीं जाते, उससे पूर्व तुम इस सुन्दर बालकको लेकर वहींपर पहुँच जाओ ॥ २१-२२ ॥ |
| गत्वा तत्र विमुञ्चैनं विलम्बं मा कृथा वर।<br>अदृष्ट्वा बालकं राजा दुःखितश्च भविष्यति ॥ २३ | हे श्रेष्ठ ! वहाँ जाकर इस बालकको छोड़ दो, विलम्ब मत करो; क्योंकि राजा हरिवर्मा [तुमसे पहले पहुँच गये तो] बालकको वहाँ न देखकर अत्यन्त दुःखी होंगे ॥ २३ ॥ |