देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
५६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० ४
५६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० ४
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| तदादत्स्व मया दत्तामिमां कन्यां महीपते।<br>प्रियेत्यामन्त्रिता पूर्वं मा विचारं कुरुष्व भोः॥ ५७ | हे महीपते! अतः मेरे द्वारा प्रदत्त इस कन्याको आप स्वीकार कीजिये। आप इसे 'प्रिये' ऐसा सम्बोधित भी कर चुके हैं। अतएव अब शंकारहित होकर किसी अन्य विचारमें न पड़ें॥ ५७॥ |
| श्रुत्वैतत् सोऽभवत् तूष्णीं चिन्तयन् मुनिभाषितम्।<br>वैवाहिकं विधिं तस्य मुनिः कर्तुं समुद्यतः॥ ५८ | मुनिका यह वचन सुनकर राजा दुर्दम चिन्तन करते हुए चुप हो गये और मुनि उनके वैवाहिक अनुष्ठानकी तैयारीमें जुट गये॥ ५८॥ |
| अथोद्यतं विवाहाय दृष्ट्वा कन्याब्रवीन्मुनिम्।<br>रेवत्यृक्षे विवाहो मे तात कर्तुं त्वमर्हसि॥ ५९ | इसके बाद विवाह-कार्यके लिये मुनिको तत्पर देखकर रेवतीने कहा—हे तात! आप मेरा विवाह रेवती नक्षत्रमें ही सम्पन्न करायें॥ ५९॥ |
| ऋषिरुवाच<br>वत्से विवाहयोग्यानि सन्त्यन्यर्क्षाणि भूरिशः।<br>रेवत्यां कथमुद्वाहः पौष्णभं न दिवि स्थितम्॥ ६० | ऋषि बोले—वत्से! विवाहके योग्य अन्य बहुत-से नक्षत्र हैं। रेवती नक्षत्रमें विवाह कैसे होगा; क्योंकि रेवती तो आकाशमें स्थित है ही नहीं॥ ६०॥ |
| कन्योवाच<br>रेवत्यृक्षं विना कालो ममोद्वाहोचितो न हि।<br>अतः संप्रार्थयाम्येतद्विवाहं पौष्णभे कुरु॥ ६१ | कन्या बोली—रेवती नक्षत्रके अतिरिक्त अन्य कोई भी नक्षत्र मेरे विवाहके लिये उचित नहीं है। अतः मैं प्रार्थना करती हूँ कि आप मेरा विवाह रेवती नक्षत्रमें ही करें॥ ६१॥ |
| ऋषिरुवाच<br>ऋतवाङ्मुनिना पूर्वं रेवतीभं निपातितम्।<br>भान्तरे चेन्न ते प्रीतिर्विवाहः स्यात् कथं तव॥ ६२ | ऋषि बोले—पूर्वकालमें मुनि ऋतवाक्ने रेवती नक्षत्रको पृथ्वीपर गिरा दिया था। इस प्रकार अन्य नक्षत्रमें यदि तुम्हारी श्रद्धा नहीं है, तब तुम्हारा विवाह कैसे होगा?॥ ६२॥ |
| कन्योवाच<br>तपः किं तप्तवानेक ऋतवागेव केवलम्।<br>भवता किं तपो नेदृक् तप्तं वाक्कायमानसैः॥ ६३ | कन्या बोली—तात! क्या केवल एक ऋतवाक्ने ही तपश्चर्या की है? क्या आपने मन-वचन-कर्मसे ऐसी तपःसाधना नहीं की है?॥ ६३॥ |
| जगत्स्रष्टुं समर्थस्त्वं वेद्यहं ते तपोबलम्।<br>रेवत्यृक्षं दिवि स्थाप्य ममोद्वाहं पितः कुरु॥ ६४ | हे पिताजी! मैं आपके तपोबलको जानती हूँ; आप जगत्की सृष्टि करनेमें समर्थ हैं। अतः आप अपने तपके प्रभावसे रेवतीको पुनः आकाशमें स्थापित करके उसी नक्षत्रमें मेरा विवाह कीजिये॥ ६४॥ |
| ऋषिरुवाच<br>एवं भवतु भद्रं ते यथैव त्वं ब्रवीषि माम्।<br>त्वत्कृते सोममार्गेऽहं स्थापयिष्याद्य पौष्णभम्॥ ६५ | ऋषि बोले—तुम्हारा कल्याण हो। तुम जैसा मुझसे कह रही हो, वैसा ही होगा, तुम्हारे हितार्थ मैं आज ही रेवती नक्षत्रको सोममार्ग (नक्षत्र-मण्डल)-में स्थापित करूँगा॥ ६५॥ |
| स्कन्द उवाच<br>एवमुक्त्वा मुनिस्तूर्णं पौष्णभं स्वतपोबलात्।<br>यथापूर्वं तथा चक्रे सोममार्गे घटोद्भव॥ ६६ | कार्तिकेयजी बोले—हे अगस्त्यजी! ऐसा कहकर मुनिने अपने तपोबलसे शीघ्र ही पूर्वकी भाँति रेवती नक्षत्रको फिरसे नक्षत्र-मण्डलमें स्थापित कर दिया॥ ६६॥ |
| अ० ४ ] | माहात्म्य | ५७ |
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| संस्कृत | हिन्दी |
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| रेवतीनाम्नि नक्षत्रे विवाहविधिना मुनिः।<br>रेवतीं प्रददौ राज्ञे दुर्दाय महात्मने॥ ६७ | तदनन्तर मुनि प्रमुचने रेवती नक्षत्रमें वैवाहिक विधिके अनुसार महात्मा राजा दुर्दमको वह रेवती कन्या सौंप दी॥ ६७॥ |
| कृत्वा विवाहं कन्याया मुनी राजानमब्रवीत्।<br>किं तेऽभिलषितं वीर वद तत्पूरयाम्यहम्॥ ६८ | इस प्रकार कन्याका विवाह कर देनेके उपरान्त मुनिने राजासे कहा—हे वीर! तुम्हारी क्या अभिलाषा है? मुझे बताओ, मैं उसे पूरी करूँगा॥ ६८॥ |
| राजोवाच<br>मनोः स्वायम्भुवस्याहं वंशे जातोऽस्मि हे मुने।<br>मन्वन्तराधिपं पुत्रं त्वत्प्रसादाच्च कामये॥ ६९ | राजा बोले— हे मुने! मैं स्वायम्भुव मनुके वंशमें उत्पन्न हुआ हूँ, अतः मैं यही कामना करता हूँ कि आपकी कृपासे मुझे मन्वन्तराधिपति पुत्रकी प्राप्ति हो॥ ६९॥ |
| मुनिरुवाच<br>यद्येषा कामना तेऽस्ति देव्या आराधनं कुरु।<br>भविष्यत्येव ते पुत्रो मनुर्मन्वन्तराधिपः॥ ७० | मुनि बोले— यदि आपकी यह अभिलाषा है तो आप देवी भगवतीकी आराधना कीजिये। ऐसा करनेपर आपका पुत्र मनु अवश्य ही मन्वन्तराधिपति होगा॥ ७०॥ |
| देवीभागवतं नाम पुराणं यत्तु पञ्चमम्।<br>पञ्चकृत्वस्तु तच्छ्रुत्वा लप्स्यसेऽभिमतं सुतम्॥ ७१ | श्रीमद्देवीभागवत जो पंचम पुराणके रूपमें विख्यात है, उसका पाँच बार श्रवण करनेके उपरान्त आपको मनोवांछित पुत्र प्राप्त होगा॥ ७१॥ |
| रेवत्यां रैवतो नाम पञ्चमो भविता मनुः।<br>वेदविच्छास्त्रतत्त्वज्ञो धर्मवानपराजितः॥ ७२ | रेवतीके गर्भसे उत्पन्न रैवत नामवाला पाँचवाँ मनु वेदवेत्ता, शास्त्रोंके तत्त्वोंको जाननेवाला, धर्मपरायण तथा अपराजेय होगा॥ ७२॥ |
| इत्युक्तो मुनिना राजा प्रणम्य मुदितो मुनिम्।<br>भार्यया सह मेधावी जगाम नगरं निजम्॥ ७३ | मुनि प्रमुचके इस प्रकार कहनेपर प्रसन्न होकर प्रतिभासम्पन्न राजा दुर्दमने मुनिको प्रणाम किया और वे भार्या रेवतीके साथ अपने नगर चले गये॥ ७३॥ |
| पितृपैतामहं राज्यं चकार स महामतिः।<br>पालयामास धर्मात्मा प्रजाः पुत्रानिवौरसान्॥ ७४ | महामति राजा दुर्दमने अपने पिता-पितामहसे प्राप्त राज्यपर शासन किया और उस धर्मात्माने औरस पुत्रोंकी भाँति अपनी प्रजाओंका पालन किया॥ ७४॥ |
| एकदा लोमशो नाम महात्मा मुनिरागतः।<br>प्रणिपत्य तमभ्यर्च्य प्राञ्जलिश्चाब्रवीन्नृपः॥ ७५ | एक बार उनके यहाँ महात्मा लोमशऋषि पधारे। राजा दुर्दमने उन्हें प्रणाम किया और उनका विधिवत् पूजनकर दोनों हाथ जोड़कर कहा॥ ७५॥ |
| राजोवाच<br>भगवंस्त्वत्प्रसादेन श्रोतुमिच्छामि भो मुने।<br>देवीभागवतं नाम पुराणं पुत्रलिप्सया॥ ७६ | राजा बोले— हे भगवन्! हे मुने! यदि आप कृपा करें तो मैं पुत्र-प्राप्तिकी कामनासे आपसे देवीभागवत नामक पुराण सुनना चाहता हूँ॥ ७६॥ |
| श्रुत्वा वाचं प्रजाभर्तुः प्रीतः प्रोवाच लोमशः। | राजाका यह वचन सुनकर लोमशमुनि प्रसन्न हो गये और बोले— |
| धन्योऽसि राजंस्ते भक्तिर्जाता त्रैलोक्यमातरि॥ ७७<br>सुरासुरनराराध्या या परा जगदम्बिका।<br>तस्यां चेद्भक्तिरुत्पन्ना कार्यसिद्धिर्भविष्यति॥ ७८ | हे राजन्! आप धन्य हैं; क्योंकि तीनों लोकोंकी जननी देवी भगवतीमें आपकी ऐसी भक्ति हो गयी है। देव, दानव तथा मानवकी आराध्या परा भगवती जगदम्बामें यदि आपकी भक्ति उत्पन्न हुई है तो आपकी कार्य-सिद्धि अवश्य होगी॥ ७७-७८॥ |
| ५८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ४ |
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| अतस्त्वां श्रावयिष्यामि श्रीमद्भागवतं नृप।<br>यस्य श्रवणमात्रेण न किञ्चिदपि दुर्लभम्॥ ७९ | अतएव हे राजन्! मैं आपको श्रीमद्देवीभागवत सुनाऊँगा, जिसके सुननेमात्रसे कुछ भी दुष्प्राप्य नहीं रह जाता॥ ७९॥ |
| इत्युक्त्वा सुदिने ब्रह्मन् कथारम्भमथाकरोत्।<br>पञ्चकृत्वः स शुश्राव विधिवद्भार्यया सह॥ ८० | हे ब्रह्मन्! ऐसा कहकर मुनिने किसी शुभ दिनमें कथाका आरम्भ किया। अपनी पत्नीके साथ राजाने पाँच बार श्रीमद्देवीभागवतपुराणका विधिवत् श्रवण किया॥ ८०॥ |
| समाप्तिदिवसे राजा पुराणञ्च मुनिं तथा।<br>पूजयामास धर्मात्मा मुदा परमया युतः॥ ८१ | कथा-समाप्तिके दिन धर्मनिष्ठ राजा दुर्दमाने अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक श्रीमद्देवीभागवतपुराण तथा लोमशमुनिकी पूजा की॥ ८१॥ |
| हुत्वा नवार्णमन्त्रेण भोजयित्वा कुमारिकाः।<br>वाडवांश्च सपत्नीकान्दक्षिणाभिरतोषयत्॥ ८२ | राजाने नवार्णमन्त्रसे हवन करके कुमारी कन्याओंको भोजन कराया और सपत्नीक ब्राह्मणोंको प्रभूत दक्षिणादानद्वारा संतुष्ट किया॥ ८२॥ |
| अथ कालेन कियता भगवत्याः प्रसादतः।<br>गर्भं दधार सा राज्ञी लोककल्याणकारकम्॥ ८३ | कुछ समय बीत जानेपर भगवतीकी कृपासे उस रानी रेवतीने लोककल्याणकारी गर्भ धारण किया॥ ८३॥ |
| पुण्येऽथ समये प्राप्ते ग्रहैः सुस्थानसङ्गतैः।<br>सर्वमङ्गलसम्पन्ने रेवती सुषुवे सुतम्॥ ८४ | इसके बाद जब समस्त ग्रह-नक्षत्र अपने-अपने अनुकूल स्थानोंपर थे और सभी मांगलिक कृत्य सम्पन्न हो गये थे—ऐसे शुभ समयमें रेवतीने पुत्रको जन्म दिया॥ ८४॥ |
| श्रुत्वा पुत्रस्य जननं स्नात्वा राजा मुदान्वितः।<br>स सुवर्णाम्भसा चक्रे जातकर्मादिकाः क्रियाः॥ ८५ | पुत्रके जन्मका समाचार सुनकर राजा दुर्दाम अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्होंने स्नान करके स्वर्ण-कलशके जलसे पुत्रका जातकर्म आदि संस्कार सम्पन्न किया॥ ८५॥ |
| यथाविधि च दानानि दत्त्वा विप्रानतोषयत्।<br>कृतोपनयनं राजा साङ्गान्वेदानपाठयत्॥ ८६ | तदनन्तर राजाने विधिपूर्वक दान देकर ब्राह्मणोंको संतुष्ट किया। समयपर पुत्रका उपनयन-संस्कार करके राजाने अपने पुत्रको अंगोंसहित वेदोंका अध्ययन कराया॥ ८६॥ |
| सर्वविद्यानिधिर्जातो धर्मिष्ठोऽस्त्रविदां वरः।<br>धर्मस्य वक्ता कर्ता च रैवतो नाम वीर्यवान्॥ ८७ | इस प्रकार राजाका वह रैवत नामक तेजस्वी पुत्र समग्र विद्याओंका निधान, धर्मपरायण, अस्त्र-विशारदोंमें श्रेष्ठ, धर्मका वक्ता तथा धर्मका पालनकर्ता हो गया॥ ८७॥ |
| नियुक्तवानथ ब्रह्मा रैवतं मानवे पदे।<br>मन्वन्तराधिपः श्रीमान् गां शशास स धर्मतः॥ ८८ | इसके बाद ब्रह्माजीने रैवतको मनुके पदपर नियुक्त किया और वे श्रीमान् मन्वन्तराधिपके रूपमें धर्मपूर्वक पृथ्वीपर शासन करने लगे॥ ८८॥ |
| इत्थं देव्याः प्रभावोऽयं संक्षेपेणोपवर्णितः।<br>पुराणस्य च माहात्म्यं को वक्तुं विस्तरात्क्षमः॥ ८९ | इस प्रकार मैंने देवी भगवतीके इस प्रभावका संक्षिप्तरूपसे वर्णन कर दिया। इस श्रीमद्देवीभागवत-पुराणके माहात्म्यका विस्तारपूर्वक वर्णन करनेमें कौन समर्थ है?॥ ८९॥ |