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देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

५५४ श्रीमद्देवीभागवत [अ० ५

५५४ श्रीमद्देवीभागवत [अ० ५

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तद्वज्राभिहतो नागो भग्नः सैन्यं जगाम ह।<br>दृष्ट्वा तं दैत्यराट् क्रुद्धो बिडालाख्यमथाब्रवीत्॥ ३४<br><br>गच्छ वीर महाबाहो जहीन्द्रं मदगर्वितम्।<br>वरुणादीन्यरान्देवान्हत्वागच्छ ममान्तिकम्॥ ३५उस वज्रके आघातसे हाथीकी सूँड कट गयी और वह सेनाके बीच भाग खड़ा हुआ। उसे देखकर दानवराज महिषासुर कुपित हो गया और उसने बिडाल नामक दानवसे कहा—हे महाबाहो! हे वीर! तुम जाओ और बलके अभिमानमें चूर इन्द्रको मार डालो, साथ ही वरुण आदि अन्य देवताओंका भी वध करके शीघ्र ही मेरे पास लौट आओ॥ ३४-३५॥
व्यास उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य बिडालाख्यो महाबलः।<br>आरुह्य वारणं मत्तं जगाम त्रिदशाधिपम्॥ ३६व्यासजी बोले—उसकी बात सुनकर वह महाबली बिडाल एक मतवाले हाथीपर सवार होकर युद्धके लिये इन्द्रकी ओर चल पड़ा॥ ३६॥
वासवस्तं समायान्तं दृष्ट्वा क्रोधसमन्वितः।<br>जघान विशिखैस्तीक्ष्णैराशीविषसमप्रभैः॥ ३७उसे अपनी ओर आते देखकर इन्द्रने कुपित होकर विषधर सर्पतुल्य तीक्ष्ण बाणोंसे बिडालपर प्रहार किया॥ ३७॥
स तु छित्त्वा शरांस्तूर्णं स्वशरैश्चापनिःसृतैः।<br>पञ्चाशद्भिर्जघानाशु वासवञ्च शिलीमुखैः॥ ३८उस बिडालने शीघ्र ही अपने धनुषसे छूटे हुए बाणोंसे इन्द्रके बाण काटकर पुनः तत्काल अपने पचास बाणोंसे इन्द्रपर आघात किया॥ ३८॥
तथेन्द्रोऽपि च तान्बाणांश्छित्त्वा कोपसमन्वितः।<br>जघान विशिखैस्तीक्ष्णैराशीविषसमप्रभैः॥ ३९तब इन्द्रने भी क्रुद्ध होकर उसके उन बाणोंको काटकर अपने सर्पतुल्य तीक्ष्ण बाणोंसे उसपर प्रहार किया॥ ३९॥
स तु छित्त्वा शरांस्तूर्णं स्वशरैश्चापनिःसृतैः।<br>गदया ताडयामास गजं तस्य करोपरि॥ ४०अपने धनुषसे छूटे हुए बाणोंसे उसके बाणोंको काटकर इन्द्रने अपनी गदासे उसके हाथीकी सूँडपर प्रहार किया॥ ४०॥
स्वकरे निहतो नागश्चकारार्तस्वरं मुहुः।<br>परिवृत्य जघानाशु दैत्यसैन्यं भयातुरम्॥ ४१अपनी सूँडपर गदाके आघातसे वह हाथी बार-बार आर्तनाद करने लगा और पीछे घूमकर भागता हुआ वह दैत्य-सेनाको ही कुचलने लगा, जिससे दानवोंकी सेना भयाकुल हो उठी॥ ४१॥
दानवस्तु गजं वीक्ष्य परावृत्य गतं रणात्।<br>समाविश्य रथे रम्ये जगामाशु सुरान् रणे॥ ४२तत्पश्चात् हाथीको युद्धभूमिसे भागा देखकर वह दानव बिडाल लौटकर चला गया और पुनः एक सुन्दर रथपर सवार होकर देवताओंके समक्ष रणमें उपस्थित हो गया॥ ४२॥
तुराषाडपि तं वीक्ष्य रथस्थं पुनरागतम्।<br>अहनद्विशिखैस्तीक्ष्णैराशीविषसमप्रभैः ॥ ४३इन्द्रने बिडालको रथपर सवार होकर पुनः समरांगणमें आया हुआ देखकर अपने सर्पतुल्य तीक्ष्ण बाणोंसे उसपर आघात करना आरम्भ कर दिया॥ ४३॥
सोऽपि क्रुद्धश्चकारोग्रां बाणवृष्टिं महाबलः।<br>बभूव तुमुलं युद्धं तयोस्तत्र जयैषिणोः॥ ४४वह महाबली बिडाल भी अत्यन्त कुपित होकर भयंकर बाण-वृष्टि करने लगा। इस प्रकार विजयके इच्छुक उन दोनोंके बीच भीषण युद्ध होने लगा॥ ४४॥

अ० ५ ] पञ्चम स्कन्ध ५५५

इन्द्रस्तु बलिनं दृष्ट्वा कोपेनाकुलितेन्द्रियः।<br>जयन्तमग्रतः कृत्वा युयुधे तेन संयुतः॥४५क्रोधके प्रभावसे व्याकुल इन्द्रियोंवाले इन्द्रने बिडालको विशेष बलवान् देखकर जयन्तको अपना अग्रणी बना लिया और अब उसके साथ मिलकर वे युद्ध करने लगे॥४५॥
जयन्तस्तु शितैर्बाणैस्तं जघान स्तनान्तरे।<br>पञ्चभिः प्रबलाकृष्टैरसुरं मदगर्वितम्॥४६जयन्तने धनुषपर चढ़ाकर प्रबलतापूर्वक खींचे गये पाँच तीक्ष्ण बाणोंसे मदोन्मत्त उस दानव बिडालके वक्षःस्थलपर आघात किया॥४६॥
स बाणाभिहतस्तावन्निपपात रथोपरि।<br>अतिवाह्य रथं सूतो निर्जगाम रणाजिरात्॥४७उन बाणोंके आघातसे मूर्च्छित होकर बिडाल रथपर गिर पड़ा, तब उसका सारथि तत्काल रथ लेकर रण-भूमिसे बाहर निकल गया॥४७॥
तस्मिन्निर्गते दैत्ये बिडालाख्येऽथ मूर्च्छिते।<br>जयशब्दो महानासीद्दुन्दुभीनां च निःस्वनः॥४८उस बिडालके मूर्च्छित होकर युद्धभूमिसे बाहर चले जानेपर देवसेनामें महान् विजय-घोष तथा दुन्दुभियोंकी ध्वनि होने लगी॥४८॥
सुराः प्रमुदिताः सर्वे तुष्टुवुस्तं शचीपतिम्।<br>जगूर्गन्धर्वपतयो ननृतुश्चाप्सरोगणाः॥४९सभी देवता प्रसन्न होकर इन्द्रकी स्तुति करने लगे, गन्धर्व गाने लगे तथा अप्सराएँ नाचने लगीं॥४९॥
चुकोप महिषः श्रुत्वा जयशब्दं सुरैः कृतम्।<br>प्रेषयामास तत्रैव ताम्रं परमदापहम्॥५०तत्पश्चात् देवताओंके द्वारा किये गये उस विजय-घोषको सुनकर महिषासुर कुपित हो उठा। उसने शत्रुओंके अभिमानको चूर-चूर कर देनेवाले ताम्र नामक दानवको युद्धक्षेत्रमें भेजा॥५०॥
ताम्रस्तु बहुभिः सार्धं समागम्य रणाजिरे।<br>शरवृष्टिं चकाराशु तडित्वानिव सागरे॥५१ताम्र बहुत-से सैनिकोंके साथ समरांगणमें आकर इस प्रकार वेगपूर्वक बाणोंकी वर्षा करने लगा मानो मेघ समुद्रमें जल बरसा रहा हो॥५१॥
वरुणः पाशमुद्यम्य जगाम त्वरितस्तदा।<br>यमश्च महिषारूढो दण्डमादाय निर्ययौ॥५२उस समय वरुणदेव पाश लेकर तथा यमराज हाथमें दण्ड धारण करके महिषपर चढ़कर [युद्धभूमिमें] शीघ्र ही पहुँच गये॥५२॥
तत्र युद्धमभूद् घोरं देवदानवयोरिथः।<br>बाणैः खड्गैश्च मुसलैः शक्तिभिश्च परश्वधैः॥५३अब देवताओं तथा दानवोंमें परस्पर बाणों, तलवारों, मुसलों, बछियों तथा फरसोंसे भीषण संग्राम होने लगा॥५३॥
दण्डेन निहतस्ताम्रो यमहस्तोद्यतेन च।<br>न चचाल महाबाहुः संग्रामाङ्गणतस्तदा॥५४यमराजके द्वारा अपने हाथसे फेंके गये दण्डसे ताम्र आहत हो गया, किंतु वह महाबाहु ताम्र समरांगणसे हिलातक नहीं॥५४॥
चापमाकृष्य वेगेन मुक्त्वा तीव्राञ्छिलीमुखान्।<br>इन्द्रादीनहनत्तूर्णं ताम्रस्तस्मिन् रणाजिरे॥५५ताम्र उस संग्रामभूमिमें वेगपूर्वक धनुषको खींच-खींचकर अति तीक्ष्ण बाण छोड़कर इन्द्र आदि देवताओंपर शीघ्रतासे प्रहार करने लगा॥५५॥
तेऽपि देवाः शरैर्दिव्यैर्निशितैश्च शिलाशितैः।<br>निजघ्नुर्दानवान्क्रुद्धास्तिष्ठ तिष्ठेति चुक्रुशुः॥५६वे देवता कुपित होकर पत्थरपर घिसकर नुकीले बनाये गये तीक्ष्ण दिव्य बाणोंसे दानवोंको मारने लगे और 'ठहरो-ठहरो' कहकर चिल्लाने लगे॥५६॥