संग्रह पर लौटें






देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
३२६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १६
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३२६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १६
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| कस्यचिन्नैव विश्वासः कर्तव्यः सर्वथा बुधैः।<br>कुर्वन्दुःखमवाप्नोति दृष्टान्तस्त्वत्र वै बलिः॥ ४०<br>वैरोचनसुतः श्रीमान्धर्मिष्ठः सत्यसङ्गरः।<br>यज्ञकर्ता च दाता च शरण्यः साधुसम्मतः॥ ४१ | [मनोरमाने कहा—हे स्वामिन्!] अतएव बुद्धिमान् लोगोंको चाहिये कि वे किसीपर भी विश्वास न करें, ऐसा करनेवाला व्यक्ति दुःख प्राप्त करता है। इस विषयमें राजा बलि उदाहरण हैं। विरोचनपुत्र राजा बलि वैभवसम्पन्न, धर्मपरायण, सत्यप्रतिज्ञ, यज्ञकर्ता, दानी, शरणदाता तथा साधुजनोंके सम्मान्य थे॥ ४०-४१॥ |
| नाधर्मे निरतः क्वापि प्रह्लादस्य च पौत्रकः।<br>एकोनशतयज्ञान्वै स चकार सदक्षिणान्॥ ४२<br>सत्त्वमूर्तिः सदा विष्णुः सेव्यः स योगिनामपि।<br>निर्विकारोऽपि भगवान्देवकार्यार्थसिद्धये॥ ४३<br>कश्यपाच्च समुद्भूतो विष्णुः कपटवामनः।<br>राज्यं छलेन हृतवान्महीं चैव ससागराम्॥ ४४ | प्रह्लादके पौत्र वे राजा बलि कभी अधर्मका आचरण नहीं करते थे। उन्होंने दक्षिणायुक्त निन्यानवे यज्ञ किये थे, फिर भी सत्त्वगुणकी साक्षात् मूर्ति, योगियोंद्वारा सदा आराधित तथा विकारोंसे रहित भगवान् विष्णु भी देवताओंका प्रयोजन सिद्ध करनेके लिये कश्यपसे उत्पन्न हुए और उन्होंने वामनका कपटवेष धारण करके छलपूर्वक उनका राज्य तथा सागरसमेत पृथ्वी ले ली॥ ४२—४४॥ |
| सोऽभवत्सत्यवाग्राजा बलिवैरोचनिस्तदा।<br>कपटं कृतवान्विष्णुुरिन्द्रार्थे तु मया श्रुतम्॥ ४५ | विरोचनके पुत्र बलि एक सत्यवादी राजा थे<br>मैंने तो ऐसा सुना है कि भगवान् विष्णुने इन्द्रके लिये ही यह कपट किया था॥ ४५॥ |
| अन्यः किं न करोत्येवं कृतं वै सत्त्वमूर्त्तिना।<br>वामनं रूपमास्थाय यज्ञपातं चिकीर्षता॥ ४६ | जब साक्षात् सत्त्वकी मूर्ति भगवान् विष्णुने बलिका यज्ञ ध्वंस करनेकी कामनासे वामनरूप धारण करके ऐसा किया, तब अन्य लोग क्यों नहीं करेंगे?॥ ४६॥ |
| न च विश्वसितव्यं वै कदाचित्केनचित्तथा।<br>लोभश्चेतसि चेत्स्वामिन्कीदृक्पापकृतं भयम्॥ ४७ | अतएव हे स्वामिन्! किसीपर कभी भी विश्वास नहीं करना चाहिये; क्योंकि यदि चित्तमें लोभ रहता है तो पाप करनेमें किसी भी प्रकारका डर ही क्या?॥ ४७॥ |
| लोभाहताः प्रकुर्वन्ति पापानि प्राणिनः किल।<br>परलोकाद्भयं नास्ति कस्यचित्कर्हिचिन्मुने॥ ४८ | हे मुने! लोभके वशीभूत प्राणी सभी प्रकारके पाप कर बैठते हैं। उस समय किसीको परलोकका किंचिन्मात्र भी भय नहीं रहता॥ ४८॥ |
| मनसा कर्मणा वाचा परस्वादानहेतुतः।<br>प्रपतन्ति नराः सम्यग्लोभोपहतचेतसः॥ ४९ | लोभसे नष्ट हुए चित्तवाले प्राणी दूसरोंका धन हड़पनेके लिये मन, वचन तथा कर्मसे सम्यक् तत्पर रहते हैं॥ ४९॥ |
| देवानाराध्य सततं वाञ्छन्ति च धनं नराः।<br>न देवास्तत्करे कृत्वा समर्था दातुमञ्जसा॥ ५० | देवताओंकी निरन्तर आराधना करके मनुष्य उनसे धनकी कामना करते हैं। यह निश्चित है कि वे देवता अपने हाथोंसे धन उठाकर उन्हें देनेमें पूरी तरहसे समर्थ नहीं हैं॥ ५०॥ |
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अ० १६ ] तृतीय स्कन्ध ३२७
| अन्यस्यानीयते वित्तं प्रयच्छन्ति मनीषितम्।<br>वाणिज्येनाथ दानेन चौर्येणापि बलेन वा॥ ५१ | किंतु व्यवसाय, दान, चोरी अथवा बलपूर्वक लूट आदि किसी भी माध्यमसे मनुष्यका अभिलषित धन [उन देवताओंके द्वारा] दूसरेके पाससे ला करके उन्हें दे दिया जाता है॥ ५१॥ |
| विक्रयार्थं गृहीत्वा च धान्यवस्त्रादिकं बहु।<br>देवानर्चयते वैश्यो महर्द्धिर्मे भवेदिति॥ ५२ | विक्रय करनेके लिये पर्याप्त धान्य तथा वस्त्र आदिका संग्रह करके वैश्य इस भावनासे देवताओंकी पूजा करता है कि ‘मेरे पास विपुल धन हो जाय।’ |
| नात्र किं परवित्तेच्छा वाणिज्येन परन्तप।<br>ग्रहणकाले तु सम्प्राप्ते महर्घञ्चापि काङ्क्षति॥ ५३ | हे परन्तप! क्या इस व्यापारके द्वारा दूसरोंका धन ग्रहण करनेकी उन्हें इच्छा नहीं होती ? वस्तुका संग्रह करनेके बादसे ही वह भाव महँगा होनेकी इच्छा करने लगता है॥ ५२-५३॥ |
| एवं हि प्राणिनः सर्वे परस्वादानतत्पराः।<br>वर्तन्ते सततं ब्रह्मन् विश्वासः कीदृशः पुनः॥ ५४ | हे ब्रह्मन्! इस प्रकार सभी प्राणी दूसरोंका धन ले लेनेके लिये निरन्तर तत्पर रहते हैं तो फिर विश्वास कैसा?॥ ५४॥ |
| वृथा तीर्थं वृथा दानं वृथाध्ययनमेव च।<br>लोभमोहावृतानां वै कृतं तदकृतं भवेत्॥ ५५ | लोभ तथा मोहसे घिरे हुए लोगोंका तीर्थ, दान, अध्ययन—सब व्यर्थ हो जाता है; उनका किया हुआ वह सारा कर्म न करनेके समान हो जाता है॥ ५५॥ |
| तस्मादेनं महाभाग विसर्जय गृहं प्रति।<br>सपुत्राहं वसिष्यामि जानकीवद् द्विजोत्तम॥ ५६ | अतः हे महाभाग! इस युधाजित्को घर लौटा दीजिये। हे द्विजोत्तम! जानकीकी भाँति मैं अपने पुत्रके साथ यहीं निवास करूँगी॥ ५६॥ |
| इत्युक्तोऽसौ मुनिस्तावद् गत्वा युधाजितं नृपम्।<br>उवाच वचनं राज्ञे भारद्वाजः प्रतापवान्॥ ५७ | मनोरमाके ऐसा कहनेपर तेजस्वी भारद्वाजमुनि राजा युधाजित्के पास जाकर उनसे बोले—हे राजन्! |
| गच्छ राजन् यथाकामं स्वपुरं नृपसत्तम।<br>नेयं मनोरमाभ्येति बालपुत्रा सुदुःखिता॥ ५८ | हे नृपश्रेष्ठ! अपने इच्छानुसार आप अपने नगरको चले जायें। छोटे बालकवाली यह मनोरमा बड़ी दुःखी है; वह नहीं आ रही है॥ ५७-५८॥ |
| युधाजिदुवाच<br>मुने मुञ्च हठं सौम्य विसर्जय मनोरमाम्।<br>न च यास्याम्यहं मुक्त्वा नेष्याम्यद्य बलात्पुनः॥ ५९ | युधाजित् बोला— हे सौम्य मुने! आप हठ छोड़ दीजिये और मनोरमाको विदा कीजिये, इसे छोड़कर मैं नहीं जाऊँगा, [यदि आप नहीं मानेंगे तो] मैं इसे अभी बलपूर्वक ले जाऊँगा॥ ५९॥ |
| ऋषिरुवाच<br>नयस्व यदि शक्तिस्ते बलेनाद्य ममाश्रमात्।<br>विश्वामित्रो यथा धेनुं वसिष्ठस्य मुनेः पुरा॥ ६० | ऋषि बोले— जैसे प्राचीन कालमें विश्वामित्र वसिष्ठमुनिकी गौ ले जानेके लिये उद्यत हुए थे, उसी प्रकार यदि आपमें शक्ति हो तो आज मेरे आश्रमसे इसे बलपूर्वक ले जाइये॥ ६०॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे युधाजिद्भारद्वाजयोः संवादवर्णनं नाम षोडशोऽध्यायः॥ १६॥
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| ३२८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १७ |
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अथ सप्तदशोऽध्यायः
युधाजित्का अपने प्रधान अमात्यसे परामर्श करना, प्रधान अमात्यका इस सन्दर्भमें वसिष्ठ-विश्वामित्र-प्रसंग सुनाना और परामर्श मानकर युधाजित्का वापस लौट जाना, बालक सुदर्शनको दैवयोगसे कामराज नामक बीजमन्त्रकी प्राप्ति, भगवतीकी आराधनासे सुदर्शनको उनका प्रत्यक्ष दर्शन होना तथा काशिराजकी कन्या शशिकलाको स्वप्नमें भगवतीद्वारा सुदर्शनका वरण करनेका आदेश देना
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
|---|---|
| इत्याकर्ण्य वचस्तस्य मुनेस्तत्रावनीपतिः।<br>मन्त्रिवृद्धं समाहूय पप्रच्छ तमतन्द्रितः॥ १<br><br>किं कर्तव्यं सुबुद्धेऽत्र मयाद्य वद सुव्रत।<br>बलान्नयामि तां कामं सपुत्राञ्च सुभाषिणीम्॥ २<br><br>रिपुरल्पोऽपि नोपेक्ष्यः सर्वथा शुभमिच्छता।<br>राजयक्ष्मेव संवृद्धो मृत्यवे परिकल्पयेत्॥ ३ | [हे राजन्!] भारद्वाजमुनिका यह वचन सुनकर राजा युधाजित्ने अपने प्रधान अमात्यको बुलाकर बड़ी सावधानीसे उनसे पूछा— हे सुबुद्धे! आप बतायें कि अब मुझे क्या करना चाहिये? हे सुव्रत! क्या मधुर वचन बोलनेवाली मनोरमाको पुत्रसहित बलपूर्वक ले चलूँ? अपना कल्याण चाहनेवाले पुरुषको चाहिये कि वह तुच्छ शत्रुकी भी उपेक्षा न करे; क्योंकि वह राजयक्ष्मा रोगके समान बढ़कर मृत्युका कारण बन जाता है॥ १-३॥ |
| नात्र सैन्यं न योद्धास्ति यो मामत्र निवारयेत्।<br>गृहीत्वा हन्मि तं तत्र दौहित्रस्य रिपुं किल॥ ४<br><br>निष्कण्टकं भवेद्राज्यं यताम्यद्य बलादहम्।<br>हते सुदर्शने नूनं निर्भयोऽसौ भवेदिति॥ ५ | यहाँ न कोई सेना है और न कोई योद्धा ही है जो मुझे रोक सके। अतः मैं अपने दौहित्रके शत्रु उस सुदर्शनको पकड़कर अभी मार डालूँगा। यदि मैं बलपूर्वक इस प्रयत्नमें सफल हो जाता हूँ तो उसका राज्य निष्कंटक हो जायगा। सुदर्शनके मर जानेपर निश्चय ही वह निर्भय हो जायगा॥ ४-५॥ |
| प्रधान उवाच | प्रधान अमात्यने कहा— |
| साहसं न हि कर्तव्यं श्रुतं राजन् मुनेर्वचः।<br>विश्वामित्रस्य दृष्टान्तः कथितस्तेन मारिष॥ ६ | हे राजन्! ऐसा दुःसाहस नहीं करना चाहिये। अभी आपने भारद्वाजमुनिका वचन सुना ही है। हे मान्य! उन्होंने [इस सम्बन्धमें] विश्वामित्रका दृष्टान्त दिया है॥ ६॥ |
| पुरा गाधिसुतः श्रीमान्विश्वामित्रोऽतिविश्रुतः।<br>विचरन्स नृपश्रेष्ठो वसिष्ठाश्रममभ्यगात्॥ ७ | प्राचीन समयमें गाधितनय विश्वामित्र एक समृद्धिशाली तथा प्रसिद्ध राजा थे। एक बार वे महाराज घूमते हुए महर्षि वसिष्ठके आश्रममें जा पहुँचे॥ ७॥ |
| नमस्कृत्य च तं राजा विश्वामित्रः प्रतापवान्।<br>उपविष्टो नृपश्रेष्ठो मुनिना दत्तविष्टरः॥ ८<br><br>निमन्त्रितो वसिष्ठेन भोजनाय महात्मना।<br>ससैन्यश्च स्थितो राजा गाधिपुत्रो महायशाः॥ ९ | प्रतापी राजाओंमें श्रेष्ठ वे महाराज विश्वामित्र उन्हें प्रणाम करके मुनिद्वारा प्रदत्त आसनपर बैठ गये। उसके बाद महात्मा वसिष्ठजीने उन्हें भोजनके लिये निमन्त्रित किया, तब वे महायशस्वी गाधिपुत्र विश्वामित्र अपने सैनिकोंसहित उपस्थित हो गये॥ ८-९॥ |
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| अ० १७ ] | तृतीय स्कन्ध | ३२१ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| नन्दिन्यासादितं सर्वं भक्ष्यभोज्यादिकं च यत्।<br>भुक्त्वा राजा ससैन्यश्च वाञ्छितं तत्र भोजनम्॥ १०<br><br>प्रतापं तञ्च नन्दिन्याः परिज्ञाय स पार्थिवः।<br>ययाचे नन्दिनीं राजा वसिष्ठं मुनिसत्तमम्॥ ११ | उस समय भक्ष्य तथा भोज्य आदि जो भी आवश्यक हुआ, वह सब उनकी नन्दिनी गौने उपस्थित कर दिया। सेनासमेत राजा विश्वामित्र मनोवांछित भोजन करके इसे नन्दिनी गौका प्रभाव समझकर वे राजा उन मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठजीसे नन्दिनी गौ माँगने लगे॥ १०-११॥ |
| विश्वामित्र उवाच<br>मुने धेनुसहस्त्रं ते घटोध्नीनां ददाम्यहम्।<br>नन्दिनीं देहि मे धेनुं प्रार्थयामि परन्तप॥ १२ | विश्वामित्र बोले—हे मुने! मैं आपको पर्याप्त दूध देनेवाली हजारों गौएँ दूँगा; आप मुझे यह अपनी नन्दिनी गौ दे दीजिये। हे परन्तप! मैं यही प्रार्थना कर रहा हूँ॥ १२॥ |
| वसिष्ठ उवाच<br>होमधेनुरियं राजन्न ददामि कथञ्चन।<br>सहस्रञ्चापि धेनूनां तवेदं तव तिष्ठतु॥ १३ | वसिष्ठ बोले—हे राजन्! यह गौ होमके लिये हविष्य प्रदान करती है। अतः मैं इसे किसी प्रकार भी नहीं दे सकता। आपकी हजार गौएँ आपके ही पास रहें॥ १३॥ |
| विश्वामित्र उवाच<br>अयुतं वाथ लक्ष्यं वा ददामि मनसेप्सितम्।<br>देहि मे नन्दिनीं साधो ग्रहीष्यामि बलादथ॥ १४ | विश्वामित्र बोले—हे साधो! मैं आपकी इच्छाके अनुसार दस हजार अथवा एक लाख गौएँ दे रहा हूँ, आप नन्दिनी मुझे दे दीजिये, नहीं तो मैं इसे बलपूर्वक ग्रहण कर लूँगा॥ १४॥ |
| वसिष्ठ उवाच<br>कामं गृहाण नृपते बलादद्य यथारुचि।<br>नाहं ददामि ते राजन्स्वेच्छया नन्दिनीं गृहात्॥ १५ | वसिष्ठ बोले—हे नृपते! जैसी आपकी रुचि हो, आप इसे बलपूर्वक अभी ले लीजिये, किंतु हे राजन्! मैं तो इस नन्दिनीको स्वेच्छासे अपने आश्रमसे आपको नहीं दूँगा॥ १५॥ |
| तच्छ्रुत्वा नृपतिर्भृत्यानादिदेश महाबलान्।<br>नयध्वं नन्दिनीं धेनुं बलदर्पसुसंस्थिताः॥ १६ | यह सुनकर राजा विश्वामित्रने अपने महाबली अनुचरोंको आदेश दिया कि तुमलोग इस नन्दिनी गौको ले चलो। तब बलके अभिमानमें चूर उन अनुचरोंने आक्रमण करके उस धेनुको बलपूर्वक बाँधकर पकड़ लिया॥ १६ ½ ॥ |
| ते भृत्या जगृहुस्तां तु हठादाक्रम्य यन्त्रिताम्।<br>वेपमाना मुनिं प्राह सुरभिः साश्रुलोचना॥ १७ | तब आँखोंमें आँसू भरकर काँपती हुई उस नन्दिनीने मुनिसे कहा—हे मुने! आप मुझे क्यों त्याग रहे हैं? ये सब मुझे बाँधकर खींच रहे हैं॥ १७ ½ ॥ |
| मुने त्यजसि मां कस्मात्कर्षयन्ति सुयन्त्रिताम्।<br>मुनिस्तां प्रत्युवाचेदं त्यजे नाहं सुदुग्धदे॥ १८<br><br>बलान्नयति राजासौ पूजितोऽद्य मया शुभे।<br>किं करोमि न चेच्छामि त्यक्तुं त्वां मनसा किल॥ १९ | वसिष्ठजीने उससे कहा—हे उत्तम दूध देनेवाली नन्दिनी! मैं तुम्हें त्याग नहीं रहा हूँ। ये राजा तुम्हें बलपूर्वक ले जा रहे हैं; जबकि मैंने अभी इनका स्वागत किया है। हे शुभे! मैं क्या करूँ? मैं अपने मनसे तुम्हें छोड़ना नहीं चाहता॥ १८-१९॥ |
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| ३३० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी टीका |
|---|---|
| इत्युक्ता मुनिना धेनुः क्रोधयुक्ता बभूव ह।<br>हम्भारवं चकाराशु क्रूरशब्दं सुदारुणम्॥ २० | मुनिके ऐसा कहनेपर वह धेनु क्रोधित हो गयी और कर्कश शब्दोंवाला अत्यन्त भयंकर हम्भारव करने लगी॥ २०॥ |
| उद्गतास्तत्र देहात्तु दैत्या घोरतरास्तदा।<br>सायुधास्तिष्ठ तिष्ठेति ब्रुवन्तः कवचावृताः॥ २१ | उसी समय उसके शरीरसे महाभयंकर दैत्य 'ठहरो-ठहरो'—ऐसा कहते हुए निकल पड़े। वे शस्त्र धारण किये हुए थे और उनका शरीर कवचसे ढँका हुआ था॥ २१॥ |
| सैन्यं सर्वं हतं तैस्तु नन्दिनी प्रतिमोचिता।<br>एकाकी निर्गतो राजा विश्वामित्रोऽतिदुःखितः॥ २२<br><br>हन्त पापोऽतिदीनात्मा निन्दन् क्षात्रबलं महत्।<br>ब्राह्मं बलं दुराराध्यं मत्वा तपसि संस्थितः॥ २३<br><br>तप्त्वा बहूनि वर्षाणि तपो घोरं महावने।<br>ऋषित्वं प्राप गाधेयस्त्यक्त्वा क्षात्रं विधिं पुनः॥ २४ | उन्होंने सारी सेनाका संहार कर दिया और नन्दिनीको उनसे छुड़ा लिया। तब अत्यन्त व्यथित होकर राजा विश्वामित्र अकेले ही घर लौट गये। [वे अपने मनमें सोचने लगे—] हाय! मैं कितना पापी एवं दीनात्मा हूँ। क्षत्रियबलकी निन्दा करते हुए वे विश्वामित्र ब्राह्मणके बलको महान् तथा दुराराध्य समझकर तप करने लगे। महावनमें अनेक वर्षोंतक कठोर तपस्या करके विश्वामित्रने क्षात्रधर्मका त्याग करके अन्तमें ऋषित्व प्राप्त कर लिया॥ २२—२४॥ |
| तस्मात्त्वमपि राजेन्द्र मा कृथा वैरमद्भुतम्।<br>कुलनाशकरं नूनं तापसैः सह संयुगम्॥ २५ | अतः हे राजेन्द्र! आप भी ऐसा अद्भुत वैर न करें; क्योंकि तपस्वियोंके साथ किया जानेवाला युद्ध निश्चित ही कुलका नाश करनेवाला होता है॥ २५॥ |
| मुनिवर्यं व्रजाद्य त्वं समाश्वास्य तपोनिधिम्।<br>सुदर्शनोऽपि राजेन्द्र तिष्ठत्वत्र यथासुखम्॥ २६ | अतः आप तपोनिधि मुनिवर भारद्वाजके पास अभी जाइये और उन्हें आश्वासन दीजिये। हे राजेन्द्र! सुदर्शनको यहीं छोड़ दीजिये, जिससे वह आनन्दपूर्वक रह सके॥ २६॥ |
| बालोऽयं निर्धनः किं ते करिष्यति नृपाहितम्।<br>वृथा ते वैरभावोऽयमनाथे दुर्बले शिशौ॥ २७ | हे राजन्! यह दीन बालक आपका क्या अहित कर सकेगा? ऐसे दुर्बल एवं अनाथ बालकके प्रति आपका यह वैरभाव व्यर्थ है॥ २७॥ |
| दया सर्वत्र कर्तव्या दैवाधीनमिदं जगत्।<br>ईर्ष्या किं नृपश्रेष्ठ यद्भाव्यं तद्भविष्यति॥ २८ | हे नृपश्रेष्ठ! सर्वत्र दया करनी चाहिये। यह संसार सदा दैवके अधीन रहता है। ईर्ष्या करनेसे क्या लाभ? जो होनी होगी, वह तो होकर ही रहेगी॥ २८॥ |
| वज्रं तृणायते राजन् दैवयोगान्न संशयः।<br>तृणं वज्रायते क्वापि समये दैवयोगतः॥ २९<br><br>शशको हन्ति शार्दूलं मशको वै तथा गजम्।<br>साहसं मुञ्च मेधाविन् कुरु मे वचनं हितम्॥ ३० | हे राजन्! दैवयोगसे कभी वज्र तृण बन जाता है और किसी समय तृण वज्र बन जाता है; इसमें सन्देह नहीं है। दैवयोगसे ही खरगोश सिंहको और मच्छर हाथीको मार देता है। अतः हे मेधाविन्! आप दुःसाहस छोड़िये तथा मेरा हितकर वचन मानिये॥ २९-३०॥ |
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| अ० १७] | तृतीय स्कन्ध | ३३१ |
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| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
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| तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य युधाजिन्नृपसत्तमः।<br>प्रणम्य तं मुनिं मूर्ध्ना जगाम स्वपुरं नृपः ॥ ३१<br><br>मनोरमापि स्वस्थाभूदाश्रमे तत्र संस्थिता।<br>पालयामास पुत्रं तं सुदर्शनमृतव्रतम् ॥ ३२ | [हे जनमेजय!] मन्त्रीकी यह बात सुनकर नृपश्रेष्ठ राजा युधाजित् भारद्वाजमुनिको सिर झुकाकर प्रणाम करके अपने पुरको चले गये। तब रानी मनोरमा भी निश्चिन्त हो गयीं और उस आश्रममें रहती हुई अपने सत्यव्रती पुत्र सुदर्शनका पालन करने लगीं ॥ ३१-३२॥ |
| दिने दिने कुमारोऽसौ जगामोपचयं ततः।<br>मुनिबालगतः क्रीडन्निर्भयः सर्वतः शुभः॥ ३३<br><br>एकस्मिन्समये तत्र विदल्लं समुपागतम्।<br>क्लीबेति मुनिपुत्रस्तमामन्त्रयत्तदन्तिके ॥ ३४ | अब वह सुन्दर कुमार मुनिबालकोंके साथ सर्वत्र निर्भय होकर क्रीड़ा करता हुआ दिनोंदिन बढ़ने लगा। एक दिन सुदर्शनके पास आये हुए विदल्लको किसी मुनिकुमारने ‘क्लीब’ इस नामसे पुकारा ॥ ३३-३४ ॥ |
| सुदर्शनस्तु तच्छ्रुत्वा दधारैकाक्षरं स्फुटम्।<br>अनुस्वारायुतं तच्च प्रोवाचापि पुनः पुनः॥ ३५ | उसे सुनकर सुदर्शनने उसके एकाक्षर ‘क्ली’ शब्दको स्पष्टरूपसे धारण कर लिया और उस अनुस्वारविहीन अक्षरका ही वह बार-बार उच्चारण करने लगा ॥ ३५ ॥ |
| बीजं वै कामराजाख्यं गृहीतं मनसा तदा।<br>जजाप बालकोऽत्यर्थं धृत्वा चेतसि सादरम् ॥ ३६<br><br>भावियोगान्महाराज कामराजाख्यमद्भुतम्।<br>स्वभावेनैव तेनेत्थं गृहीतं बालकेन वै॥ ३७ | बालकने इस कामराज नामक बीजमन्त्रको मनसे ग्रहण कर लिया और उसे हृदयंगम करके आदरपूर्वक जपना प्रारम्भ कर दिया। हे महाराज! दैवयोगसे ही उस बालक सुदर्शनको यह कामराज नामक अद्भुत बीजमन्त्र स्वयमेव प्राप्त हो गया ॥ ३६-३७॥ |
| तदासौ पञ्चमे वर्षे प्राप्य मन्त्रमनुत्तमम्।<br>ऋषिच्छन्दोविहीनञ्च ध्यानन्यासविवर्जितम्॥ ३८<br><br>प्रजपन्मनसा नित्यं क्रीडत्यपि स्वपित्यपि।<br>विसस्मार न तं मन्त्रं ज्ञात्वा सारमिति स्वयम् ॥ ३९ | उस समय केवल पाँच वर्षकी अवस्थामें ही वह ऋषि तथा छन्दसे विहीन और ध्यान तथा न्यासरहित मन्त्र प्राप्तकर मन-ही-मन उसे जपता हुआ खेलता तथा सोता था; उस मन्त्रको स्वयं सबका सार समझकर वह सुदर्शन उसे कभी नहीं भूलता था॥ ३८-३९॥ |
| वर्षे चैकादशे प्राप्ते कुमारोऽसौ नृपात्मजः।<br>मुनिना चोपनीतोऽथ वेदमध्यापितस्तथा ॥ ४०<br><br>धनुर्वेदं तथा साङ्गं नीतिशास्त्रं विधानतः।<br>अभ्यस्ताः सकला विद्यास्तेन मन्त्रबलादिव ॥ ४१ | मुनिने ग्यारहवें वर्षमें उस राजकुमारका उपनयन संस्कार किया और उसे वेद पढ़ाया एवं सांगोपांग धनुर्वेद तथा नीतिशास्त्रकी विधिवत् शिक्षा दी। उस बालकने उसी मन्त्रके प्रभावसे समस्त विद्याओंका सम्यक् अभ्यास कर लिया ॥ ४०-४१॥ |
| कदाचित्सोऽपि प्रत्यक्षं देवीरूपं ददर्श ह।<br>रक्ताम्बरं रक्तवर्णं रक्तसर्वाङ्गभूषणम् ॥ ४२ | एक बार उसने देवीके रूपका प्रत्यक्ष दर्शन भी किया। उस समय वे लाल वस्त्र धारण किये थीं, उनके विग्रहका रंग भी लाल था और उनके सभी अंगोंमें रक्तवर्णके ही आभूषण सुशोभित हो रहे |