देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
DevanagariHindipublished889 pages
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| अ० २२ ] | षष्ठ स्कन्ध | ८२९ |
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| रममाणा तत्र याता मत्समेता सखीयुता।<br>मया निवेदितं राजन् पुत्री ते कमलाकरान् ॥ ५८<br><br>प्रेक्षमाणातिदूरे सा प्रयाति निर्जने वने।<br>निषेधिताथ पित्रासौ गृहे कृत्वा जलाशयान् ॥ ५९<br><br>कमलान् वापयित्वाथ पुष्पितान् भ्रमरावृतान्।<br>तथापि निर्ययौ बाला कमलासक्तचेतना ॥ ६०<br><br>तदा राज्ञा रक्षपालाः प्रेरिताः शस्त्रपाणयः।<br>एवं रक्षायुता तन्वी मत्समेता सखीयुता।<br>क्रीडार्थं जाह्नवीतोये नित्यमायाति याति च ॥ ६१ | चली गयी। [इससे चिन्तित होकर] मैंने महाराज रैभ्यसे कहा—हे राजन्! आपकी पुत्री एकावली कमलोंको देखती हुई बहुत दूर निर्जन वनमें चली जाती है। तब उसके पिताने घरपर ही अनेक जलाशयोंका निर्माण कराकर उनमें पुष्पित तथा भौंरोंसे आवृत्त कमल लगवाकर उसे दूर जानेसे मना कर दिया। इसपर भी मनमें कमलोंके प्रति आसक्ति रखनेवाली वह कन्या बाहर निकल जाती थी। तब राजाने उसके साथ हाथोंमें शस्त्र धारण किये हुए रक्षक नियुक्त कर दिये। इस प्रकार रक्षित होकर वह सुन्दरी मेरे तथा सखियोंसहित क्रीडाके लिये गङ्गातटपर प्रतिदिन आया-जाया करती थी॥ ५६—६१॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे राजपुत्र्या एकावल्या वर्णनं नामैकविंशोऽध्यायः॥ २१॥
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अथ द्वाविंशोऽध्यायः
यशोवतीका एकवीरसे कालकेतुद्वारा एकावलीके अपहृत होनेकी बात बताना
| यशोवत्युवाच | यशोवती बोली— |
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| प्रातरुत्थाय तन्वङ्गी चलिता च सखीयुता।<br>चामरैर्वीज्यमाना सा रक्षिता बहुरक्षिभिः॥ १<br><br>सायुधैश्चातिसन्नद्धैः सहिता वरवर्णिनी।<br>क्रीडार्थमत्र राजेन्द्र सम्प्राप्ता नलिनीं शुभाम्॥ २ | एक बार वह सुन्दरी एकावली प्रातःकाल उठकर अपनी सखियोंके साथ बाहर निकल पड़ी। वह बहुत-से रक्षकोंसे रक्षित थी तथा उसके ऊपर चँवर डुलाये जा रहे थे। हे राजेन्द्र! वह सुन्दरी यहाँ सुन्दर कमलोंके पास क्रीड़ा करनेके लिये आयी थी॥ १-२॥ |
| अहमप्यनया सार्धं गङ्गातीरे समागता।<br>अप्सरोभिः समेता च कमलैः क्रीडमानया॥ ३ | कमलोंसे खेलनेकी रुचिवाली इस कन्याके साथ मैं भी अप्सराओंसहित गङ्गाके तटपर आयी थी॥ ३॥ |
| एकावली तथा चाहं जाते क्रीडापरे यदा।<br>सहसैव तदायातो दानवो बलसंयुतः॥ ४<br><br>कालकेतुरिति ख्यातो राक्षसैर्बहुभिर्वृतः।<br>परिघासिगदाचापबाणतोमरपाणिभिः ॥ ५ | जब मैं तथा एकावली दोनों खेलनेमें व्यस्त हो गयीं, उसी समय हाथोंमें परिघ, तलवार, गदा, धनुष, बाण तथा तोमर धारण किये हुए बहुत-से राक्षसोंके साथ कालकेतु नामक बलवान् दानव वहाँ अकस्मात् आ पहुँचा॥ ४-५॥ |
| दृष्टा चैकावली तेन रूपयौवनशालिनी।<br>द्वितीया कामपत्नीव क्रीडमाना सुपङ्कजैः॥ ६ | उसने कमलोंके साथ क्रीडा करती हुई उस रूप-यौवनसम्पन्न तथा दूसरी कामपत्नी रतिकी भाँति प्रतीत हो रही एकावलीको देख लिया॥ ६॥ |
| मयोक्तैकावली राजन् कोऽयं दैत्यः समागतः।<br>गच्छावो रक्षपालानां मध्ये पङ्कजलोचने॥ ७ | हे राजन्! मैंने एकावलीसे कहा—हे कमलनयने! यह कौन-सा दैत्य आ गया है! अब हम दोनों रक्षकोंके पास भाग चलें॥ ७॥ |