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देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

अ० २४] चतुर्थ स्कन्ध ५१९

अ० २४] चतुर्थ स्कन्ध ५१९

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
श्रुत्वा यवनमायान्तं कृष्णः सर्वान् यदूत्तमान्।<br>आनाय्य च तथा राममुवाच मधुसूदनः॥ २०<br><br>भयं नोऽत्र समुत्पन्नं जरासन्धान्महाबलात्।<br>किं कर्तव्यं महाभाग यवनः समुपैति वै॥ २१कालयवनको आता सुनकर मधुसूदन श्रीकृष्णने सभी प्रसिद्ध यादवों तथा बलरामको बुलाकर कहा— महाबलशाली जरासन्धसे हमलोगोंको यहाँ बराबर भय बना हुआ है। [उसीकी प्रेरणासे] कालयवन यहाँ आ रहा है। हे महाभाग! ऐसी स्थितिमें हमलोगोंको क्या करना चाहिये?॥ २०–२१॥
प्राणत्राणं प्रकर्तव्यं त्यक्त्वा गेहं बलं धनम्।<br>सुखेन स्थीयते यत्र स देशः खलु पैतृकः॥ २२इस समय घर, सेना और धन छोड़कर हमें प्राण बचा लेना चाहिये। जहाँ भी सुखपूर्वक रहनेका प्रबन्ध हो जाय, वही पैतृक देश होता है॥ २२॥
सदोद्वेगकरः कामं किं कर्तव्यः कुलोचितः।<br>शैलसागरसान्निध्ये स्थातव्यं सुखमिच्छता॥ २३इसके विपरीत उत्तम कुलके निवास करनेयोग्य पैतृक भूमिमें भी यदि सदा अशान्ति बनी रहती हो तो ऐसे स्थानपर रहनेसे क्या लाभ? अतः सुखकी कामना करनेवालेको पर्वत या समुद्रके पास निवास कर लेना चाहिये॥ २३॥
यत्र वैरिभयं न स्यात्स्थातव्यं तत्र पण्डितैः।<br>शेषशय्यां समाश्रित्य हरिः स्वपिति सागरे॥ २४<br><br>तथैव च भयाद्धीतः कैलासे त्रिपुरार्दनः।<br>तस्मान्नात्रैव स्थातव्यमस्माभिः शत्रुतापितैः॥ २५<br><br>द्वारवत्यां गमिष्यामः सहिताः सर्व एव वै।<br>कथिता गरुडेनाद्य रम्या द्वारवती पुरी॥ २६<br><br>रैवताचलासान्निध्ये सिन्धुकूले मनोहरा।जिस स्थानपर शत्रुओंका भय नहीं रहता, ऐसे स्थानपर ही विज्ञजनोंको रहना चाहिये। भगवान् विष्णु शेषशय्याका आश्रय लेकर समुद्रमें शयन करते हैं और इसी प्रकार त्रिपुरदमन भगवान् शंकर भी कैलासपर्वतपर निवास करते हैं। अतएव शत्रुओंद्वारा निरन्तर सन्तप्त किये गये हमलोगोंको अब यहाँ नहीं रहना चाहिये। अब हम सभी लोग एक साथ द्वारकापुरी चलेंगे। गरुडने मुझसे बताया है कि द्वारकापुरी अत्यन्त रमणीक तथा मनोहर है, जो समुद्रके तटपर तथा रैवतपर्वतके समीप विराजमान है॥ २४–२६ १/२॥
व्यास उवाच<br><br>तच्छ्रुत्वा वचनं तथ्यं सर्वे यादवपुङ्गवाः॥ २७<br><br>गमनाय मतिं चक्रुः सकुदुम्बाः सवाहनाः।<br>शकटानि तथोष्ट्रांश्च वाम्यश्च महिषास्तथा॥ २८<br><br>धनपूर्णानि कृत्वा ते निर्ययुर्नगराद् बहिः।<br>रामकृष्णौ पुरस्कृत्य सर्वे ते सपरिच्छदाः॥ २९<br><br>अग्रे कृत्वा प्रजाः सर्वाश्चेलुः सर्वे यदूत्तमाः।<br>कतिचिद्दिवसैः प्रापुः पुरीं द्वारवतीं किल॥ ३०व्यासजी बोले— श्रीकृष्णकी यह युक्तिपूर्ण बात सुनकर सभी श्रेष्ठ यादवोंने अपने परिवारजनों तथा वाहनोंके साथ जानेका निश्चय कर लिया। गाड़ियों, ऊँटों, घोड़ियों और भैंसोंपर धन-सामग्री लादकर तथा श्रीकृष्ण और बलरामको आगे करके वे सभी यादवश्रेष्ठ अपने परिजनोंको साथ लेकर नगरसे बाहर हो गये। समस्त प्रजाजनोंको आगे-आगे करके सभी श्रेष्ठ यादव चल पड़े। वे सब कुछ ही दिनोंमें द्वारकापुरी पहुँच गये॥ २७–३०॥
शिल्पिभिः कारयामास जीर्णोद्धारं हि माधवः।<br>संस्थाप्य यादवांस्तत्र तावेतौ बलकेशवौ॥ ३१श्रीकृष्णने कुशल शिल्पकारोंसे द्वारकापुरीका जीर्णोद्धार कराया, सभी यादवोंको वहाँ बसाकर वे श्रीकृष्ण और बलराम तत्काल मथुरा लौटकर उस

५२० श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २४

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तरसा मथुरामेत्य संस्थितौ निर्जनां पुरीम्।<br>तदा तत्रैव सम्प्राप्तो बलवान् यवनाधिपः॥ ३२<br>ज्ञात्वैनमागतं कृष्णो निर्ययौ नगराद् बहिः।<br>पदातिरग्रे तस्याभूद्यवनस्य जनार्दनः॥ ३३<br>पीताम्बरधरः श्रीमान्प्राहसन्मधुसूदनः।निर्जन पुरीमें रहने लगे। उसी समय शक्तिशाली कालयवन भी वहाँ आ गया। कालयवनको आया जानकर वे पीताम्बरधारी तथा ऐश्वर्यसम्पन्न मधुसूदन भगवान् जनार्दन नगरसे बाहर निकल पड़े और जोर-जोर हँसते हुए उसके आगे-आगे पैदल ही चलने लगे॥ ३१-३३ १/२ ॥
तं दृष्ट्वा पुरतो यान्तं कृष्णं कमललोचनम्॥ ३४<br>यवनोऽपि पदातिः सन्पृष्ठतोऽनुगतः खलः।<br>प्रसुप्तो यत्र राजर्षिर्मुचुकुन्दो महाबलः॥ ३५<br>प्रययौ भगवान्स्तत्र सकालयवनो हरिः।<br>तत्रैवान्तर्दधे विष्णुर्मुचुकुन्दं समीक्ष्य च॥ ३६उन कमललोचन श्रीकृष्णको अपने आगे जाता देखकर वह दुष्ट कालयवन उनके पीछे-पीछे पैदल ही चलता रहा। तत्पश्चात् भगवान् श्रीकृष्ण कालयवनसहित वहाँ पहुँच गये, जहाँ महाबली राजर्षि मुचुकुन्द शयन कर रहे थे। मुचुकुन्दको देखकर भगवान् कृष्ण वहीं अन्तर्धान हो गये॥ ३४-३६॥
तत्रैव यवनः प्राप्तः सुप्तभूतमपश्यत्।<br>मत्वा तं वासुदेवं स पादेनाताडयन्नृपम्॥ ३७वह कालयवन भी वहीं पहुँच गया। उसने देखा कि कोई सो रहा है। राजर्षि मुचुकुन्दको कृष्ण समझकर कालयवनने उनके ऊपर पैरसे प्रहार किया॥ ३७॥
प्रबुद्धः क्रोधरक्ताक्षस्तं ददाह महाबलः।<br>तं दग्ध्वा मुचुकुन्दोऽथ ददर्श कमलेक्षणम्॥ ३८<br>वासुदेवं सुदेवेशं प्रणम्य प्रस्थितो वनम्।<br>जगाम द्वारकां कृष्णो बलदेवसमन्वितः॥ ३९[कालयवनद्वारा पाद-प्रहार किये जानेसे] वे जग गये और क्रोधसे आँखें लाल किये हुए महाबली मुचुकुन्दने [उसकी ओर दृष्टिपात करके] उसे भस्म कर दिया। उसे जलानेके बाद मुचुकुन्दने अपने समक्ष कमलनयन भगवान् श्रीकृष्णको उपस्थित देखा। तदनन्तर देवाधिदेव वासुदेवको प्रणाम करके वे वनकी ओर प्रस्थान कर गये। भगवान् श्रीकृष्ण भी बलरामको साथ लेकर द्वारकापुरी चले गये॥ ३८-३९॥
उग्रसेनं नृपं कृत्वा विजहार यथारुचि।<br>अहरद्रुक्मिणीं कामं शिशुपालस्वयंवरात्॥ ४०<br>राक्षसेन विवाहेन चक्रे दारविधिं हरिः।<br>ततो जाम्बवतीं सत्यां मित्रविन्दाञ्च भामिनीम्॥ ४१<br>कालिन्दीं लक्ष्मणां भद्रां तथा नाग्नजितीं शुभाम्।<br>पृथक्पृथक्समानीयोप्युपयेमे जनार्दनः॥ ४२<br>अष्टावेव महीपाल पत्न्यः परमशोभनाः।<br>प्रासूत रुक्मिणी पुत्रं प्रद्युम्नं चारुदर्शनम्॥ ४३इस प्रकार उग्रसेनको पुनः राजा बनाकर वे इच्छापूर्वक विहार करने लगे। इसके बाद शिशुपालके साथ रुक्मिणीके सुनिश्चित किये गये विवाहहेतु आयोजित स्वयंवरसे भगवान् श्रीकृष्णने रुक्मिणीका हरण कर लिया और उसके साथ राक्षसविधिसे विवाह कर लिया। तत्पश्चात् जाम्बवती, सत्यभामा, मित्रविन्दा, कालिन्दी, लक्ष्मणा, भद्रा तथा नाग्नजिती—इन दिव्य सुन्दरियोंको बारी-बारीसे ले आकर श्रीकृष्णने उनके साथ भी पाणिग्रहण किया। हे भूपाल! श्रीकृष्णकी ये ही परम सुन्दर आठ पत्नियाँ थीं। इनमें रुक्मिणीने देखनेमें परम सुन्दर पुत्र प्रद्युम्नको जन्म दिया॥ ४०-४३॥
जातकर्मादिकं तस्य चकार मधुसूदनः।<br>हृतोऽसौ सूतिकागेहाच्छम्बरेण बलीयसा॥ ४४<br>नीतश्च स्वपुरीं बालो मायावत्यै समर्पितः।मधुसूदन भगवान् श्रीकृष्णने उस बालकके जातकर्म आदि संस्कार किये। महाबली शम्बरासुरने प्रसवगृहसे उस बालकका हरण कर लिया और उसे अपनी नगरीमें ले जाकर मायावतीको सौंप दिया॥ ४४ १/२॥

| अ० २४] | चतुर्थ स्कन्ध | ५२१ |
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| वासुदेवो हृतं दृष्ट्वा पुत्रं शोकसमन्वितः ॥ ४५<br><br>जगाम शरणं देवीं भक्तियुक्तेन चेतसा।<br>वृत्रासुरादयो दैत्या लीलयैव यया हताः ॥ ४६ | उधर, अपने पुत्रका हरण देखकर शोक-सन्तप्त वासुदेव श्रीकृष्णने भक्तिभावयुक्त हृदयसे उन भगवती योगमायाकी शरण ली, जिन्होंने वृत्रासुर आदि दैत्योंका लीलामात्रसे वध कर दिया था॥ ४५-४६॥ |
| ततोऽसौ योगमायायाश्चकार परमां स्मृतिम्।<br>वचोभिः परमोदारैरक्षरैः स्तवनैः शुभैः ॥ ४७ | तदनन्तर भगवान् श्रीकृष्ण अत्यन्त सारगर्भित अक्षरों तथा वाक्योंसे युक्त मंगलमय स्तवनोंके द्वारा योगमायाका पुण्य-स्मरण करने लगे॥ ४७॥ |
| श्रीकृष्ण उवाच<br>मातर्मया तितपसा परितोषिता त्वं<br>प्राग्जन्मनि प्रसुमनादिभिरर्चितासि।<br>धर्मात्मजेन बदरीवनखण्डमध्ये<br>किं विस्मृतो जननि ते त्वयि भक्तिभावः ॥ ४८ | श्रीकृष्ण बोले—हे माता! पूर्वकालमें मैंने धर्मपुत्र नारायणके रूपमें बदरिकाश्रममें घोर तपस्या करके तथा पुष्प आदिसे आपकी विधिवत् पूजा करके आपको प्रसन्न किया था। हे जननि! क्या अपने प्रति मेरे उस भक्तिभावको आपने विस्मृत कर दिया ? ॥ ४८॥ |
| सूतीगृहादपहृतः किमु बालको मे<br>केनापि दुष्टमनसाप्यथ कौतुकाद्वा।<br>मानापहारकरणाय ममाद्य नूनं<br>लज्जा तवाम्ब खलु भक्तजनस्य युक्ता ॥ ४९ | किस कुत्सित हृदयवाले दुराचारीने प्रसूतिगृहसे मेरे पुत्रका हरण कर लिया? अथवा किसीने मेरा अभिमान दूर करनेके लिये कौतूहलवश यह प्रपंच रच दिया है। हे अम्ब! चाहे जो हो, किंतु आज अपने भक्तजनकी लाज रखना आपका परमोचित कर्तव्य है॥ ४९॥ |
| दुर्गो महानतितरां नगरी सुगुप्ता<br>तत्रापि मेऽस्ति सदनं किल मध्यभागे।<br>अन्तःपुरे च पिहितं ननु सूतिगेहं<br>बालो हृतः खलु तथापि ममैव दोषात् ॥ ५० | चारों ओर दुस्तर खाइयोंसे अति सुरक्षित मेरी नगरी है, उसमें भी मेरा भवन मध्य भागमें स्थित है और उस भवनके अन्तःपुरमें प्रसूतिगृह स्थित है, जिसके दरवाजे बन्द रहते हैं; फिर भी मेरे पुत्रका हरण हो गया। यह तो मेरे दोषके ही कारण हुआ॥ ५०॥ |
| नाहं गतः परपुरं न च यादवाश्च<br>रक्षावतीव नगरी किल वीरवर्यैः।<br>माया तवैव जननि प्रकटप्रभावा<br>मे बालकः परिहृतः कुहकेन केन ॥ ५१ | मैं द्वारकापुरी छोड़कर किसी अन्य नगरमें नहीं गया और यादवगण भी वहाँसे कहीं नहीं गये थे। महान् वीरोंके द्वारा नगरीकी पूर्ण सुरक्षा की गयी थी। हे माता! इसमें तो मुझे आपकी ही मायाका प्रत्यक्ष प्रभाव परिलक्षित हो रहा है, जिसकी प्रेरणासे किसी मायावीने मेरे पुत्रका हरण कर लिया है॥ ५१॥ |
| नो वेद्यहं जननि ते चरितं सुगुप्तं<br>को वेद मन्दमतिरल्पविदेव देही।<br>क्वासौ गतो मम भटैर्न च वीक्षितो वा<br>हर्त्ताम्बिके जवनिका तव कल्पितेयम् ॥ ५२ | हे माता! जब मैं आपके अत्यन्त गुप्त चरित्रको नहीं जान पाया तो फिर मन्दबुद्धि तथा अल्पज्ञ ऐसा कौन प्राणी होगा, जो आपके चरित्रको जान सकता है। मेरे पुत्रका हरण करनेवाला कहाँ चला गया, जिसे मेरे सैनिक देखतक नहीं पाये, हे अम्बिके! यह आपकी ही रची हुई मायाका प्रभाव है॥ ५२॥ |

५२२श्रीमद्देवीभागवत[अ० २४

| चित्रं न तेऽत्र पुरतो मम मातृगर्भो<br>नीतस्त्वयार्धसमये किल माययासौ।<br>यं रोहिणी हलधरं सुषुवे प्रसिद्धं<br>दूरे स्थिता पतिपरा मिथुनं विनापि॥५३ | आपके लिये यह कोई विचित्र बात नहीं है; क्योंकि मेरे प्रकट होनेके पूर्व आपने अपनी मायाके प्रभावसे माता देवकीके पाँच महीनेके गर्भको खींचकर [माता रोहिणीके गर्भमें] स्थापित कर दिया था। वसुदेवजी कारागारमें निरुद्ध थे; उनसे दूर रहती हुई पतिपरायणा माता रोहिणीने सम्पर्कके बिना ही उसे जन्म दिया, जो हलधर नामसे प्रसिद्ध हुआ॥५३॥ |
| सृष्टिं करोषि जगतामनुपालनं च<br>नाशं तथैव पुनरप्यनिशं गुणैस्त्वम्।<br>को वेद तेऽम्ब चरितं दुरितान्तकारि<br>प्रायेण सर्वमखिलं विहितं त्वयैतत्॥५४ | हे अम्ब! आप सत्त्व, रज तथा तम—इन तीनों गुणोंके द्वारा जगत्का सृजन, पालन तथा संहार निरन्तर करती रहती हैं। हे जननि! आपके पापनाशक चरित्रको कौन जान सकता है? वास्तविकता तो यह है कि यह सम्पूर्ण जगत्प्रपंच आपके ही द्वारा विरचित है॥५४॥ |
| उत्पाद्य पुत्रजननप्रभवं प्रमोदं<br>दत्त्वा पुनर्वरहजं किल दुःखभारम्।<br>त्वं क्रीडसे सुललितैः खलु तैर्विहारै-<br>र्नो चेत्कथं मम सुताप्तिरतिर्वृथा स्यात्॥५५ | आप पहले प्राणियोंके समक्ष पुत्र-जन्मसे होनेवाले असीम आनन्दको उपस्थित करके पुनः पुत्र-वियोगजनित दुःखका भार उनके ऊपर ला देती हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि उन सुललित प्रपंचोंकी रचना करके आप अपना मनोरंजन करती हैं। यदि ऐसा न होता तो पुत्र-प्राप्तिजनित मेरा आनन्द व्यर्थ क्यों होता?॥५५॥ |
| मातास्य रोदिति भृशं कुररीव बाला<br>दुःखं तनोति मम सन्निधिगा सदैव।<br>कष्टं न वेत्सि ललितेऽप्रमितप्रभावे<br>मातस्त्वमेव शरणं भवपीडितानाम्॥५६ | हे अमित प्रभाववाली भगवति! इस बालककी माता कुररी पक्षीकी भाँति रो रही है। वह बेचारी सदा मेरे पास ही रहती है, जिसे देखकर मेरा दुःख और भी बढ़ जाता है। हे माता! आप ही तो भवव्याधिसे पीड़ित प्राणियोंकी एकमात्र शरण हैं; हे ललिते! आप उसका दुःख क्यों नहीं समझ रही हैं?॥५६॥ |
| सीमा सुखस्य सुतजन्म तदीयनाशो<br>दुःखस्य देवि भवने विबुधा वदन्ति।<br>तत्किं करोमि जननि प्रथमे प्रनष्टे<br>पुत्रे ममाद्य हृदयं स्फुटतीव मातः॥५७ | हे देवि! विद्वज्जन कहते हैं कि पुत्र-जन्मके अवसरपर सुखकी कोई सीमा नहीं रहती तथा उसके नष्ट हो जानेपर दुःखकी भी सीमा नहीं रहती। हे जननि! अब मैं क्या करूँ? हे माता! अपने प्रथम पुत्रके विनष्ट हो जानेपर मेरा हृदय अब विदीर्ण होता जा रहा है॥५७॥ |
| यज्ञं करोमि तव तुष्टिकंर व्रतं वा<br>दैवं च पूजनमथाखिलदुःखहा त्वम्।<br>मातः सुतोऽत्र यदि जीवति दर्शयाशु<br>त्वं वै क्षमा सकलशोकविनाशनाय॥५८ | मैं आपको प्रसन्न करनेवाला अम्बायज्ञ करूँगा, नवरात्रव्रत करूँगा और विधि-विधानसे आपका पूजन करूँगा; क्योंकि आप सम्पूर्ण दुःखोंका नाश करनेवाली हैं। हे माता! यदि मेरा पुत्र जीवित हो तो आप मुझे शीघ्र उसे दिखा दीजिये; क्योंकि आप समस्त प्रकारके शोकोंका शमन करनेमें समर्थ हैं॥५८॥ |

अ० २५ ]चतुर्थ स्कन्ध५२३
व्यास उवाच<br>एवं स्तुता तदा देवी कृष्णेनाक्लिष्टकर्मणा।<br>प्रत्यक्षदर्शना भूत्वा तमुवाच जगद्गुरुम्॥ ५९व्यासजी बोले— असाध्य-से-असाध्य कार्योंको भी सहज भावसे कर सकनेमें समर्थ भगवान् श्रीकृष्णके इस प्रकार स्तुति करनेपर भगवती उन जगद्गुरु वासुदेवके सामने प्रत्यक्ष प्रकट होकर बोलीं—॥ ५९॥
श्रीदेव्युवाच<br>शोकं मा कुरु देवेश शापोऽयं ते पुरातनः।<br>तस्य योगेन पुत्रस्ते शम्बरेण हतो बलात्॥ ६०श्रीदेवी बोलीं— हे देवेश! आप शोक न करें। यह आपका पूर्वजन्मका शाप है; उसीके परिणामस्वरूप शम्बरासुरने आपके पुत्रका बलपूर्वक हरण कर लिया है॥ ६०॥
अतस्ते षोडशे वर्षे हत्वा तं शम्बरं बलात्।<br>आगमिष्यति पुत्रस्ते मत्प्रसादान्न संशयः॥ ६१सोलह वर्षका हो जानेपर वह पुत्र मेरी कृपासे उस शम्बरासुरका संहार करके स्वयं ही घर आ जायगा; इसमें सन्देह नहीं है॥ ६१॥
व्यास उवाच<br>इत्युक्त्वान्तर्दधे देवी चण्डिका चण्डविक्रमा।<br>भगवानपि पुत्रस्य शोकं त्यक्त्वाभवत्सुखी॥ ६२व्यासजी बोले— ऐसा कहकर प्रचण्ड पराक्रमसे सम्पन्न भगवती चण्डिका अन्तर्धान हो गयीं और भगवान् श्रीकृष्ण भी पुत्र-शोक त्यागकर प्रसन्न हो गये॥ ६२॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे देव्या कृष्णशोकापनोदनं नाम चतुर्विंशोऽध्यायः॥ २४॥


अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

व्यासजीद्वारा शाम्भवी मायाकी बलवत्ताका वर्णन, श्रीकृष्णद्वारा शिवजीकी प्रसन्नताके लिये तप करना और शिवजीद्वारा उन्हें वरदान देना

राजोवाच<br>सन्देहो मे मुनिश्रेष्ठ जायते वचनात्तव।<br>वैष्णवांशे भगवति दुःखोत्पत्तिं विलोक्य च॥ १राजा बोले— हे मुनिवर! आपकी इस बातसे तथा साक्षात् विष्णुके अंशावतार भगवान् कृष्णके ऊपर कष्टका पड़ना देखकर मुझे सन्देह हो रहा है॥ १॥
नारायणांशसम्भूतो वासुदेवः प्रतापवान्।<br>कथं स सूतिकागाराद्धृतो बालो हरेरपि॥ २भगवान् विष्णुके अंशसे उत्पन्न श्रीकृष्ण [अपरिमित] प्रतापसे सम्पन्न थे, फिर भी भगवान्‌के उस पुत्रका प्रसव-गृहसे हरण कैसे सम्भव हुआ?॥ २॥
सुगुप्तनगरे रम्ये गुप्तेऽथ सूतिकागृहे।<br>प्रविश्य तेन दैत्येन गृहीतोऽसौ कथं शिशुः॥ ३वह दैत्य शम्बरासुर चारों ओरसे भलीभाँति सुरक्षित रमणीय नगरके अत्यन्त गुप्त स्थानमें अवस्थित प्रसव-गृहमें प्रवेश करके उस बालकको कैसे उठा ले गया?॥ ३॥
न ज्ञातो वासुदेवेन चित्रमेतन्ममाद्भुतम्।<br>जायते महदाश्चर्यं चित्ते सत्यवतीसुत॥ ४यह बड़ी विचित्र तथा अद्भुत बात है कि भगवान् श्रीकृष्ण भी इसे नहीं जान पाये। हे सत्यवतीनन्दन! मेरे मनमें [इस बातको लेकर] महान् आश्चर्य उत्पन्न हो रहा है!॥ ४॥