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देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
अ० १४] चतुर्थ स्कन्ध ४६१
पृष्ठ 478स्थायी लिंक
अ० १४] चतुर्थ स्कन्ध ४६१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी टीका |
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| प्रह्लाद उवाच<br>भार्गवाद्य समायातान्याज्यानास्मांस्तथातुरान्।<br>त्यक्तुं नार्हसि सर्वज्ञ त्वद्गतांस्तनयानिव॥ ३२ | प्रह्लाद बोले— हे भार्गव! हे सर्वज्ञ! अत्यन्त दुःखी होकर आज पास आये हुए अपने पुत्रतुल्य तथा हितचिन्तक हम यजमानोंका आप त्याग न करें॥ ३२॥ |
| गते त्वयि तु मन्त्रार्थं शैलूषेण दुरात्मना।<br>त्वद्वेषमधुरालापैर्वयं तेन प्रवञ्चिताः॥ ३३ | मन्त्र-प्राप्तिके लिये आपके चले जानेपर उस कपटी तथा दुष्टात्मा बृहस्पतिने आपकी वेश-भूषा तथा मधुर वाणीके द्वारा हमलोगोंको खूब ठगा॥ ३३॥ |
| अज्ञानकृतदोषेण नैव कुप्यति शान्तिमान्।<br>सर्वज्ञस्त्वं विजानासि चित्तं नः प्रवणं त्वयि॥ ३४ | शान्तिसम्पन्न व्यक्ति किसीके द्वारा अनजानमें किये गये अपराधसे कुपित नहीं होता। आप तो सर्वज्ञ हैं, अतः जानते ही हैं कि हमलोगोंका चित्त सदा आपमें ही अनुरक्त रहता है॥ ३४॥ |
| ज्ञात्वा नस्तपसा भावं त्यज कोपं महामते।<br>ब्रुवन्ति मुनयः सर्वे क्षणकोपा हि साधवः॥ ३५ | अतः हे महामते! अपने तपोबलसे हमलोगोंका भाव जानकर आप क्रोधका त्याग कर दीजिये; क्योंकि सभी मुनिगण कहा करते हैं कि साधुपुरुषोंका क्रोध क्षणभरके लिये ही होता है॥ ३५॥ |
| जलं स्वभावतः शीतं वह्न्यातपसमागमात्।<br>भवत्युष्णं वियोगाच्च शीतत्वमनुगच्छति॥ ३६ | जल स्वभावसे शीतल होता है, किंतु अग्नि और धूपके संपर्कसे वह गर्म हो जाता है। वही जल आग तथा धूपका संयोग दूर होते ही पुनः शीतलता प्राप्त कर लेता है॥ ३६॥ |
| क्रोधश्चाण्डालरूपो वै त्यक्तव्यः सर्वथा बुधैः।<br>तस्माद्रोषं परित्यज्य प्रसादं कुरु सुव्रत॥ ३७ | क्रोध चाण्डालरूप होता है; बुद्धिमान् लोगोंको इसका पूर्णरूपसे त्याग कर देना चाहिये। अतः हे सुव्रत! क्रोध छोड़कर आप हमपर प्रसन्न हो जाइये॥ ३७॥ |
| यदि न त्यजसि क्रोधं त्यजस्यस्मान्सुदुःखितान्।<br>त्वया त्यक्ता महाभाग गमिष्यामो रसातलम्॥ ३८ | हे महाभाग! यदि आप क्रोधका त्याग नहीं करते बल्कि अत्यन्त दुःखित हमलोगोंका ही त्याग कर देते हैं, तो आपसे परित्यक्त होकर हम सब रसातलमें चले जायँगे॥ ३८॥ |
| व्यास उवाच<br>प्रह्लादस्य वचः श्रुत्वा भार्गवो ज्ञानचक्षुषा।<br>विलोक्य सुमना भूत्वा तानुवाच हसन्निव॥ ३९ | व्यासजी बोले— प्रह्लादका वचन सुनकर शुक्राचार्य ज्ञानदृष्टिसे सब कुछ देख करके प्रसन्नचित्त हो उनसे हँसते हुए बोले—॥ ३९॥ |
| न भेतव्यं न गन्तव्यं दानवा वा रसातलम्।<br>रक्षयिष्यामि वो याज्यान्मन्त्रैरवितथैः किल॥ ४० | हे दानवो! तुमलोगोंको अब न तो डरना है और न रसातलमें ही जाना है। मैं अपने अचूक मन्त्रोंसे तुम सब यजमानोंकी निश्चय ही रक्षा करूँगा॥ ४०॥ |
| हितं सत्यं ब्रवीम्यद्य शृणुध्वं तत्तु निश्चयम्।<br>वचनं मम धर्मज्ञाः श्रुतं यद् ब्रह्मणः पुरा॥ ४१ | हे धर्मज्ञो! पूर्वकालमें मैंने ब्रह्माजीसे जो सुना है, वह हितकर, सत्य तथा अटल बात मैं तुमलोगोंको बता रहा हूँ, मेरी वह बात सुनिये—॥ ४१॥ |
| अवश्यम्भाविनो भावाः प्रभवन्ति शुभाशुभाः।<br>दैवं न चान्यथा कर्तुं क्षमः कोऽपि धरातले॥ ४२ | निश्चित रूपसे होनेवाली शुभ या अशुभ घटनाएँ होकर रहती हैं। धरातलपर कोई भी प्राणी प्रारब्धको टाल पानेमें समर्थ नहीं है॥ ४२॥ |
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| ४७० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १४ |
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| अद्य मन्दबला यूयं कालयोगादसंशयम्।<br>देवैर्जिताः सकृच्चापि पातालं प्रतिपत्स्यथ॥ ४३ | इसमें संदेह नहीं कि तुमलोग आज समयके फेरसे क्षीण बलवाले हो गये हो, अतः एक बार देवताओंसे पराजित होकर तुमलोगोंको पातालमें जाना ही पड़ेगा॥ ४३॥ |
| प्राप्तः पर्यायकालो व इति ब्रह्माभ्यभाषत।<br>भुक्तं राज्यं भवद्भिश्च पूर्णं सर्वं समृद्धिमत्॥ ४४<br><br>युगानि दश पूर्णानि देवानावक्रम्य मूर्धनि।<br>दैवयोगाच्च युष्माभिर्भुक्तं त्रैलोक्यमूर्जितम्॥ ४५ | अब तुमलोगोंका समय-परिवर्तन उपस्थित हुआ है, ऐसा ब्रह्माजीने कहा था। कुछ दिनों पूर्व तुमलोगोंने सब प्रकारसे समृद्ध राज्यसुखका भोग किया था। उस समय देवताओंपर आक्रमण करके उनके मस्तकपर चरण रखकर तुमलोगोंने दैवयोगसे पूरे दस युगोंतक इस दिव्य त्रिलोकीपर शासन किया था॥ ४४-४५॥ |
| सावर्णिके मनौ राज्यं पुनस्तत्तु भविष्यति।<br>पौत्रस्त्रैलोक्यविजयी राज्यं प्राप्स्यति ते बलिः॥ ४६ | [अब आगे आनेवाले] सावर्णि मन्वन्तरमें तुम्हें वह राज्य पुनः प्राप्त होगा। तुम्हारा पौत्र बलि तीनों लोकोंमें विजयी होकर राज्यको पुनः प्राप्त कर लेगा॥ ४६॥ |
| यदा वामनरूपेण हृतं देवेन विष्णुना।<br>तदैव च भवत्पौत्रः प्रोक्तो देवेन जिष्णुना॥ ४७<br><br>हृतं येन बले राज्यं देववाञ्छार्थसिद्धये।<br>त्वमिन्द्रो भविता चाग्रे स्थिते सावर्णिके मनौ॥ ४८ | जिस समय वामनरूप धारण करके भगवान् विष्णुने [राजा बलिका राज्य] छीन लिया था, उस समय भगवान् विष्णुने आपके पौत्र बलिसे कहा था—हे बले! मैंने तुम्हारा यह राज्य देवताओंकी अभिलाषा पूरी करनेके लिये छीना है, किंतु आगे सावर्णि मन्वन्तरके उपस्थित होनेपर तुम इन्द्र होओगे॥ ४७-४८॥ |
| भार्गव उवाच<br>इत्युक्तो हरिणा पौत्रस्तव प्रह्लाद साम्प्रतम्।<br>अदृश्यः सर्वभूतानां गुप्तश्चरति भीतवत्॥ ४९ | शुक्राचार्य बोले—हे प्रह्लाद! भगवान् विष्णुके द्वारा ऐसा कहा गया तुम्हारा पौत्र बलि इस समय सभी प्राणियोंसे अदृश्य रहकर डरे हुएकी भाँति गुप्तरूपसे विचरण कर रहा है॥ ४९॥ |
| एकदा वासवेनासौ बलिर्गर्दभरूपभाक्।<br>शून्ये गृहे स्थितः कामं भयभीतः शतक्रतोः॥ ५०<br><br>पृष्टश्च बहुधा तेन वासवेन बलिस्तदा।<br>किमर्थं गार्दभं रूपं कृतवान्दैत्यपुङ्गव॥ ५१<br><br>भोक्ता त्वं सर्वलोकस्य दैत्यानां च प्रशासिता।<br>(न लज्जा खररूपेण तव राक्षससत्तम।)<br>तस्य तद्वचनं श्रुत्वा दैत्यराजो बलिस्तदा॥ ५२ | एक समयकी बात है—इन्द्रसे भयभीत बलि गर्दभका रूप धारण करके एक सूने घरमें स्थित थे, तभी [वहाँ पहुँचकर] इन्द्र उन बलिसे बार-बार पूछने लगे—हे दैत्यश्रेष्ठ! आपने गर्दभका रूप क्यों धारण किया है? आप तो समस्त लोकोंका भोग करनेवाले और दैत्योंके शासक हैं। (हे राक्षसश्रेष्ठ! क्या गर्दभका रूप धारण करनेमें आपको लज्जा नहीं लगती?) ॥ ५०-५१ १/२॥ |
| प्रोवाच वचनं शक्रं कोऽत्र शोकः शतक्रतो।<br>यथा विष्णुर्महातेजा मत्स्यकच्छपतां गतः॥ ५३ | तब इन्द्रकी वह बात सुनकर बलिने इन्द्रसे यह वचन कहा—हे शतक्रतो! इसमें शोक कैसा? जैसे महान् तेजस्वी भगवान् विष्णुने मत्स्य और कच्छपका |