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देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
अ० २४] पञ्चम स्कन्ध ६५७
पृष्ठ 666स्थायी लिंक
अ० २४] पञ्चम स्कन्ध ६५७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| श्रुत्वा शुम्भगुणानत्र प्राप्तास्म्यद्य दिदृक्षया।<br>गच्छ दूत महाभाग ब्रूहि शुम्भं महाबलम् ॥ ५७<br><br>निर्जने श्लक्ष्णया वाचा वचनं वचनान्मम।<br>त्वां ज्ञात्वा बलिनां श्रेष्ठं सुन्दराणां च सुन्दरम् ॥ ५८<br><br>दातारं गुणिनं शूरं सर्वविद्याविशारदम्।<br>जेतारं सर्वदेवानां दक्षं चोग्रं कुलोत्तरम् ॥ ५९<br><br>भोक्तारं सर्वरत्नानां स्वाधीनं स्वबलोन्नतम्।<br>पतिकामास्म्यहं सत्यं तव योग्या नराधिप ॥ ६०<br><br>स्वेच्छया नगरे तेऽत्र समायाता महामते।<br>ममास्ति कारणं किञ्चिद्विवाहे राक्षसोत्तम ॥ ६१<br><br>बालभावाद् व्रतं किञ्चित्कृतं राजन् मया पुरा।<br>क्रीडन्त्या च वयस्याभिः सहैकान्ते यदृच्छया ॥ ६२<br><br>स्वदेहबलदर्पेण सखीनां पुरतो रहः।<br>मत्समानबलः शूरो रणे मां जेष्यति स्फुटम् ॥ ६३<br><br>तं वरिष्याम्यहं कामं ज्ञात्वा तस्य बलाबलम्।<br>जहसुर्वचनं श्रुत्वा सख्यो विस्मितमानसाः ॥ ६४<br><br>किमेतया कृतं क्रूरं व्रतमद्भुतमाशु वै।<br>तस्मात्त्वमपि राजेन्द्र ज्ञात्वा मे हीदृशं बलम् ॥ ६५<br><br>जित्वा मां स्वबलेनात्र वाञ्छितं कुरु चात्मनः।<br>त्वं वा तवानुजो भ्राता समेत्य समराङ्गणे।<br>जित्वा मां समरेणात्र विवाहं कुरु सुन्दर ॥ ६६ | शुम्भके गुण सुनकर उन्हें देखनेकी इच्छासे मैं इस समय यहाँ आयी हुई हूँ। हे महाभाग्यशाली दूत! तुम जाओ और महाबली शुम्भसे एकान्त स्थानमें मधुर वाणीमें मेरे शब्दोंमें यह बात कहो—हे राजन्! आपको बलवानोंमें सबसे बली, सुन्दरोंमें अति सुन्दर, दानी, गुणी, पराक्रमी, सभी विद्याओंमें पारंगत, सभी देवताओंको जीत लेनेवाला, कुशल, प्रतापी, श्रेष्ठ कुलवाला, समस्त रत्नोंका भोग करनेवाला, स्वतन्त्र तथा अपनी शक्तिसे समृद्धिशाली बना हुआ जानकर मैं आपको पति बनानेकी इच्छुक हूँ। हे नराधिप! मैं भी निश्चितरूपसे आपके योग्य हूँ। हे महामते! मैं आपके इस नगरमें अपनी इच्छासे आयी हूँ। किंतु हे राक्षसश्रेष्ठ! मेरे विवाहमें कुछ शर्त है। हे राजन्! पूर्वमें मैंने सखियोंके साथ खेलते समय बालस्वभाववश अपने शारीरिक बलके अभिमानके कारण संयोगसे उन सखियोंके समक्ष एकान्तमें यह प्रतिज्ञा कर ली थी कि मेरे समान पराक्रम रखनेवाला जो वीर रणमें मुझे स्पष्टरूपसे जीत लेगा, उसके बलाबलको जानकर ही मैं पतिरूपमें उसका वरण करूँगी। मेरी यह बात सुनकर सखियोंके मनमें बड़ा विस्मय हुआ और वे जोर-जोरसे हँसने लगीं। [वे कहने लगीं] ‘इसने शीघ्रतापूर्वक यह कैसी भीषण तथा अद्भुत प्रतिज्ञा कर ली।’ अतएव हे राजेन्द्र! आप भी मेरे ऐसे पराक्रमको जानकर यहींपर अपने बलसे मुझे जीतकर अपना मनोरथ पूर्ण कर लीजिये। हे सुन्दर! आप अथवा आपका छोटा भाई समरांगणमें आकर युद्धके द्वारा मुझे जीतकर [मेरे साथ] विवाह कर लें॥ ५७—६६॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे
देव्या सुग्रीवदूताय स्वव्रतकथनं नाम त्रयोविंशोऽध्यायः ॥ २३ ॥
~ ० ~
अथ चतुर्विंशोऽध्यायः
शुम्भका धूम्रलोचनको देवीके पास भेजना और धूम्रलोचनका देवीको समझानेका प्रयास करना
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
|---|---|
| देव्यास्तद्वचनं श्रुत्वा स दूतः प्राह विस्मितः।<br>किं ब्रूषे रुचिरापाङ्गि स्त्रीस्वभावाद्धि साहसात् ॥ १ | भगवतीका वह वचन सुनकर वह दूत विस्मित हो गया और उसने देवीसे कहा—हे सुन्दर कटाक्षवाली! तुम स्त्रीस्वभावके कारण साहसपूर्वक यह क्या बोल रही हो?॥ १॥ |
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| ६५८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २४ |
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| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| इन्द्राद्या निर्जिता येन देवा दैत्यास्तथापरे।<br>तं कथं समरे देवि जेतुमिच्छसि भामिनि॥ २ | हे भामिनि! हे देवि! जिन्होंने इन्द्र आदि देवताओं तथा अन्य दैत्योंको पराजित कर दिया है, उन्हें तुम संग्राममें जीतनेकी अभिलाषा कैसे रखती हो?॥ २॥ |
| त्रैलोक्ये तादृशो नास्ति यः शुम्भं समरे जयेत्।<br>का त्वं कमलपत्राक्षि तस्याग्रे युधि साम्प्रतम्॥ ३ | त्रिलोकीमें वैसा कोई नहीं है, जो शुम्भको संग्राममें जीत सके; तब हे कमलसदृश नेत्रोंवाली! तुम कौन-सी सामर्थ्यशालिनी हो जो इस समय युद्धमें उनके सामने टिक सको?॥ ३॥ |
| अविचार्य न वक्तव्यं वचनं क्वापि सुन्दरि।<br>बलं स्वपरयोर्ज्ञात्वा वक्तव्यं समयोचितम्॥ ४ | हे सुन्दरि! बिना सोचे-समझे कोई बात नहीं बोलनी चाहिये, अपितु अपने तथा शत्रुके बलको जानकर ही समयके अनुसार बोलना चाहिये॥ ४॥ |
| त्रैलोक्याधिपतिः शुम्भस्तव रूपेण मोहितः।<br>त्वाञ्च प्रार्थयते राजा कुरु तस्येप्सितं प्रिये॥ ५ | तीनों लोकोंके अधिपति महाराज शुम्भ तुम्हारे रूपपर मोहित हो गये हैं और तुमसे प्रार्थना कर रहे हैं। अतः हे प्रिये! उनका मनोरथ पूर्ण करो॥ ५॥ |
| त्यक्त्वा मूर्खस्वभावं त्वं सम्मान्य वचनं मम।<br>भज शुम्भं निशुम्भं वा हितमेतद् ब्रवीमि ते॥ ६ | मूर्खतापूर्ण स्वभाव त्यागकर मेरी बातको मान करके तुम शुम्भ अथवा निशुम्भ किसीको [पतिरूपमें] स्वीकार कर लो; मैं तुम्हारे लिये यह हितकर बात कह रहा हूँ॥ ६॥ |
| शृङ्गारः सर्वथा सर्वैः प्राणिभिः परया मुदा।<br>सेवनीयो बुद्धिमद्भिर्नवानामुत्तमो यतः॥ ७ | सभी बुद्धिमान् प्राणियोंको चाहिये कि बड़े हर्षके साथ शृंगाररसका उपभोग करें; क्योंकि यह सभी नौ रसोंमें उत्तम माना गया है॥ ७॥ |
| नागमिष्यसि चेद् बाले संक्रुद्धः पृथिवीपतिः।<br>अन्यानाज्ञाकरान्प्रेष्य बलान्नेष्यति साम्प्रतम्॥ ८ | हे बाले! यदि तुम मेरे साथ नहीं चलोगी तो राजा शुम्भ अत्यन्त कुपित होकर अन्य बहुत-से सेवकोंको अभी भेजकर तुम्हें बलपूर्वक पकड़वाकर ले जायँगे॥ ८॥ |
| केशेष्वाकृष्य ते नूनं दानवा बलदर्पिताः।<br>त्वां नयिष्यन्ति वामोरु तरसा शुम्भसन्निधौ॥ ९ | हे वामोरु! वे बलाभिमानी दानव तुम्हारे केश-पाश पकड़कर बलपूर्वक तुम्हें निश्चय ही शुम्भके पास ले जायँगे॥ ९॥ |
| स्वलज्जां रक्ष तन्वङ्गि साहसं सर्वथा त्यज।<br>मानिता गच्छ तत्पार्श्वे मानपात्रं यतोऽसि वै॥ १० | अतः हे कोमलांगी! अपनी लज्जाकी रक्षा करो और इस दुस्साहसको पूर्णरूपसे छोड़ दो। तुम सम्मानित होकर उनके पास चलो; क्योंकि तुम सम्मानकी पात्र हो॥ १०॥ |
| क्व युद्धं निशितैर्बाणैः क्व सुखं रतिसङ्गजम्।<br>सारासारं परिच्छेद्य कुरु मे वचनं पटु॥ ११<br>भज शुम्भं निशुम्भं वा लप्स्यसि परमं सुखम्। | कहाँ तीक्ष्ण बाणोंसे होनेवाला युद्ध और कहाँ रतिक्रीड़ासे उत्पन्न होनेवाला सुख! सार-असार बातपर सही-सही विचार करके तुम मेरे हितकर वचनको मान लो और शुम्भ अथवा निशुम्भको अपना पति स्वीकार कर लो; इससे तुम परम सुख प्राप्त करोगी॥ ११ १/२ ॥ |