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देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—6 A

अ० १८ ]प्रथम स्कन्ध१६१

| सम्प्राप्तोऽहं महाराज त्वत्पुरे च तदाज्ञया।<br>मोक्षकामोऽस्मि राजेन्द्र ब्रूहि कृत्यं ममानघ॥ १३<br><br>तपस्तीर्थव्रतेज्याश्च स्वाध्यायस्तीर्थसेवनम्।<br>ज्ञानं वा वद राजेन्द्र मोक्षं प्रति च कारणम्॥ १४ | हे महाराज! मैं उन्हींके आदेशसे आपकी पुरीमें आया हूँ। हे राजेन्द्र! हे अनघ! मैं मोक्षका अभिलाषी हूँ, अतः जो कार्य मेरे लिये उचित हो, वह बताइये॥ १३॥<br>हे राजेन्द्र! तप, तीर्थ, व्रत, यज्ञ, स्वाध्याय, तीर्थसेवन और ज्ञान—इनमेंसे जो मोक्षका साक्षात् साधन हो, वह मुझे बताइये॥ १४॥ |
| जनक उवाच<br>शृणु विप्रेण कर्तव्यं मोक्षमार्गाश्रितेन यत्।<br>उपनीतो वसेदादौ वेदाभ्यासाय वै गुरौ॥ १५<br><br>अधीत्य वेदवेदान्तान्दत्त्वा च गुरुदक्षिणाम्।<br>समावृत्तस्तु गार्हस्थ्ये सदारो निवसेन्मुनिः॥ १६<br><br>न्यायवृत्तिस्तु सन्तोषी निराशी गतकल्मषः।<br>अग्निहोत्रादिकर्माणि कुर्वाणः सत्यवाक्शुचिः॥ १७<br><br>पुत्रं पौत्रं समासाद्य वानप्रस्थाश्रमे वसेत्।<br>तपसा षड्रिपूञ्जित्वा भार्यां पुत्रे निवेश्य च॥ १८<br><br>सर्वानग्नीन्यथान्यायमात्मन्यारोप्य धर्मवित्।<br>वसेत्तुर्याश्रमे श्रान्तः शुद्धे वैराग्यसम्भवे॥ १९<br><br>विरक्तस्याधिकारोऽस्ति संन्यासे नान्यथा क्वचित्।<br>वेदवाक्यमिदं तथ्यं नान्यथेति मतिर्मम॥ २० | **जनकजी बोले—**मोक्षमार्गावलम्बी विप्रको जो करना चाहिये, उसे सुनिये। उपनयनसंस्कारके बाद सर्वप्रथम वेदशास्त्रका अध्ययन करनेहेतु गुरुके सांनिध्यमें रहना चाहिये। वहाँ वेद-वेदान्तोंका अध्ययन करके दीक्षान्त गुरुदक्षिणा देकर वापस लौटे मुनिको विवाह करके पत्नीके साथ गृहस्थीमें रहना चाहिये। [गृहस्थाश्रममें रहते हुए] न्यायोपार्जित धनका अर्जन करे, सर्वदा सन्तुष्ट रहे और किसीसे कोई आशा न रखे। पापोंसे मुक्त होकर अग्निहोत्र आदि कर्म करते हुए सत्यवचन बोले और [मन, वचन, कर्मसे सदा] पवित्र रहे। पुत्र-पौत्र हो जानेपर [समयानुसार] वानप्रस्थ-आश्रममें रहे। वहाँ तपश्चर्याद्वारा [काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह और मात्सर्य—इन] छहों शत्रुओंपर विजय प्राप्त करके अपनी स्त्रीरक्षाका भार पुत्रको सौंप देनेके पश्चात् वह धर्मात्मा सब अग्नियोंका अपनेमें न्यायपूर्वक आधान कर ले और सांसारिक विषयोंके भोगसे शान्ति मिल जानेके बाद हृदयमें विशुद्ध वैराग्य उत्पन्न होनेपर चौथे आश्रमका आश्रय ले ले। विरक्तको ही संन्यास लेनेका अधिकार है, अन्य किसीको नहीं—यह वेदवाक्य सर्वथा सत्य है, असत्य नहीं—ऐसा मेरा मानना है॥ १५—२०॥ |
| शुकाष्टचत्वारिंशद्वै संस्कारा वेदबोधिताः।<br>चत्वारिंशद् गृहस्थस्य प्रोक्तास्तत्र महात्मभिः॥ २१<br><br>अष्टौ च मुक्तिकामस्य प्रोक्ताः शमदमादयः।<br>आश्रमादाश्रमं गच्छेदिति शिष्टानुशासनम्॥ २२ | हे शुकदेवजी! वेदोंमें कुल अड़तालीस संस्कार कहे गये हैं। उनमें गृहस्थके लिये चालीस संस्कार महात्माओंने बताये हैं। मुमुक्षुके लिये शम, दम आदि आठ संस्कार कहे गये हैं। एक आश्रमसे ही [क्रमशः] दूसरे आश्रममें जाना चाहिये, ऐसा शिष्टजनोंका आदेश है॥ २१-२२॥ |
| शुक उवाच<br>उत्पन्ने हृदि वैराग्ये ज्ञानविज्ञानसम्भवे।<br>अवश्यमेव वस्तव्यमाश्रमेषु वनेषु वा॥ २३ | **शुकदेवजी बोले—**चित्तमें वैराग्य और ज्ञान-विज्ञान उत्पन्न हो जानेपर अवश्य ही गृहस्थादि आश्रमोंमें रहना चाहिये अथवा वनोंमें॥ २३॥ |

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—6 A

१६२श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १८
जनक उवाचजनकजी बोले—
इन्द्रियाणि बलिष्ठानि न नियुक्तानि मानद।<br>अपक्वस्य प्रकुर्वन्ति विकारांस्ताननेकंशः॥ २४हे मानद! इन्द्रियाँ बड़ी बलवान् होती हैं, वे वशमें नहीं रहतीं। वे अपरिपक्व बुद्धिवाले मनुष्यके मनमें नाना प्रकारके विकार उत्पन्न कर देती हैं॥ २४॥
भोजनेच्छां सुखेच्छां च शय्येच्छामात्मजस्य च।<br>यती भूत्वा कथं कुर्याद्विकारे समुपस्थिते॥ २५यदि मनुष्यके मनमें भोजनकी, शयनकी, सुखकी और पुत्रकी इच्छा बनी रहे तो वह संन्यासी होकर भी इन विकारोंके उपस्थित होनेपर क्या कर पायेगा?॥ २५॥
दुर्जयं वासनाजालं न शान्तिमुपयाति वै।<br>अतस्तच्छमनार्थाय क्रमेण च परित्यजेत्॥ २६वासनाओंका जाल बड़ा ही कठिन होता है, वह शीघ्र नहीं मिटता। इसलिये उसकी शान्तिके लिये मनुष्यको क्रमसे उसका त्याग करना चाहिये॥ २६॥
ऊर्ध्वं सुप्तः पतत्येव न शयानः पतत्यधः।<br>परिव्रज्य परिभ्रष्टो न मार्गं लभते पुनः॥ २७ऊँचे स्थानपर सोनेवाला मनुष्य ही नीचे गिरता है, नीचे सोनेवाला कभी नहीं गिरता। यदि संन्यास-ग्रहण कर लेनेपर भ्रष्ट हो जाय तो पुनः वह कोई दूसरा मार्ग नहीं प्राप्त कर सकता॥ २७॥
यथा पिपीलिका मूलाच्छाखायामधिरोहति।<br>शनैः शनैः फलं याति सुखेन पदगामिनी॥ २८<br><br>विहङ्गमस्तरसा याति विघ्नशङ्कामुदस्य वै।<br>श्रान्तो भवति विश्रम्य सुखं याति पिपीलिका॥ २९जिस प्रकार चींटी वृक्षकी जड़से चढ़कर शाखापर चढ़ जाती है और वहाँसे फिर धीरे-धीरे सुखपूर्वक पैरोंसे चलकर फलतक पहुँच जाती है। विघ्न-शंकाके भयसे कोई पक्षी बड़ी तीव्र गतिसे आसमानमें उड़ता है और [परिणामतः] थक जाता है, किंतु चींटी सुखपूर्वक विश्राम ले-लेकर [अपने अभीष्ट स्थानपर] पहुँच जाती है॥ २८-२९॥
मनस्तु प्रबलं काममजेयमकृतात्मभिः।<br>अतः क्रमेण जेतव्यमाश्रमानुक्रमेण च॥ ३०मन अत्यन्त प्रबल है; यह अजितेन्द्रिय पुरुषोंके द्वारा सर्वथा अजेय है। इसलिये आश्रमोंके अनुक्रमसे ही इसे क्रमशः जीतनेका प्रयत्न करना चाहिये॥ ३०॥
गृहस्थाश्रमसंस्थोऽपि शान्तः सुमतिरात्मवान्।<br>न च हृष्येन्न च तपेल्लाभालाभे समो भवेत्॥ ३१गृहस्थ-आश्रममें रहते हुए भी जो शान्त, बुद्धिमान् एवं आत्मज्ञानी होता है, वह न तो प्रसन्न होता है और न खेद करता है। वह हानि-लाभमें समान भाव रखता है॥ ३१॥
विहितं कर्म कुर्वाणस्त्यजंश्चिन्तान्वितं च यत्।<br>आत्मलाभेन सन्तुष्टो मुच्यते नात्र संशयः॥ ३२जो पुरुष शास्त्रप्रतिपादित कर्म करता हुआ, सभी प्रकारकी चिन्ताओंसे मुक्त रहता हुआ आत्मचिन्तनसे सन्तुष्ट रहता है; वह निःसन्देह मुक्त हो जाता है॥ ३२॥
पश्याहं राज्यसंस्थोऽपि जीवन्मुक्तो यथानघ।<br>विचरामि यथाकामं न मे किञ्चित्प्रजायते॥ ३३हे अनघ! देखिये, मैं राजकार्य करता हुआ भी जीवन्मुक्त हूँ; मैं अपने इच्छानुसार सब काम करता हूँ, किंतु मुझे शोक या हर्ष कुछ भी नहीं होता॥ ३३॥

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—6 B

अ० १८ ]प्रथम स्कन्ध१६३

| भुञ्जानो विविधान्भोगान्कुर्वन्कार्याण्यनेकresource? | जिस प्रकार मैं अनेक भोगोंको भोगता हुआ तथा अनेक कार्योंको करता हुआ भी अनासक्त हूँ, उसी प्रकार हे अनघ! आप भी मुक्त हो जाइये ॥ ३४ ॥ |
| भुञ्जानो विविधान्भोगान्कुर्वन्कार्याण्यनेकresource? <br> भविष्यामि यथाऽहं त्वं तथा मुक्तो भवानघ ॥ ३४ | |

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| भुञ्जानो विविधान्भोगान्कुर्वन्कार्याण्यनेकresource? |
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भुञ्जानो विविधान्भोगान्कुर्वन्कार्याण्यनेकशः ।<br>भविष्यामि यथाऽहं त्वं तथा मुक्तो भवानघ ॥ ३४

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संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
भुञ्जानो विविधान्भोगान्कुर्वन्कार्याण्यनेकशः ।<br>भविष्यामि यथाऽहं त्वं तथा मुक्तो भवानघ ॥ ३४जिस प्रकार मैं अनेक भोगोंको भोगता हुआ तथा अनेक कार्योंको करता हुआ भी अनासक्त हूँ, उसी प्रकार हे अनघ! आप भी मुक्त हो जाइये ॥ ३४ ॥
कथ्यते खलु यद्दृश्यमदृश्यं बध्यते कुतः ।<br>दृश्यानि पञ्चभूतानि गुणास्तेषां तथा पुनः ॥ ३५ऐसा कहा भी जाता है कि जो यह दृश्य जगत् दिखायी देता है, उसके द्वारा अदृश्य आत्मा कैसे बन्धनमें आ सकता है ? पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु एवं आकाश—ये पंचमहाभूत और गन्ध, रस, रूप, स्पर्श एवं शब्द—ये उनके गुण दृश्य कहलाते हैं ॥ ३५ ॥
आत्मा गम्योऽनुमानेन प्रत्यक्षो न कदाचन ।<br>स कथं बध्यते ब्रह्मन्निर्विकारो निरञ्जनः ॥ ३६आत्मा अनुमानगम्य है और कभी भी प्रत्यक्ष नहीं होता। ऐसी स्थितिमें हे ब्रह्मन् ! वह निरंजन एवं निर्विकार आत्मा भला बन्धनमें कैसे पड़ सकता है ?
मनस्तु सुखदुःखानां महतां कारणं द्विज ।<br>जाते तु निर्मले ह्यस्मिन्सर्वं भवति निर्मलम् ॥ ३७हे द्विज ! मन ही महान् सुख-दुःखका कारण है, इसीके निर्मल होनेपर सब कुछ निर्मल हो जाता है ॥ ३६-३७ ॥
भ्रमन्सर्वेषु तीर्थेषु स्नात्वा स्नात्वा पुनः पुनः ।<br>निर्मलं न मनो यावत्तावत्सर्वं निरर्थकम् ॥ ३८सभी तीर्थोंमें घूमते हुए वहाँ बार-बार स्नान करके भी यदि मन निर्मल नहीं हुआ तो वह सब व्यर्थ हो जाता है।
न देहो न च जीवात्मा नेन्द्रियाणि परन्तप ।<br>मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः ॥ ३९हे परन्तप ! बन्धन तथा मोक्षका कारण न यह देह है, न जीवात्मा है और न ये इन्द्रियाँ ही हैं, अपितु मन ही मनुष्योंके बन्धन एवं मुक्तिका कारण है ॥ ३८-३९ ॥
शुद्धो मुक्तः सदैवार्त्मा न वै बध्येत कर्हिचित् ।<br>बन्धमोक्षौ मनःसंस्थौ तस्मिञ्छान्ते प्रशाम्यति ॥ ४०आत्मा तो सदा ही शुद्ध तथा मुक्त है, वह कभी बँधता नहीं है। अतः बन्धन और मोक्ष तो मनके भीतर हैं, मनकी शान्तिसे ही शान्ति है ॥ ४० ॥
शत्रुमित्रमुदासीनो भेदाः सर्वे मनोगताः ।<br>एकात्मत्वे कथं भेदः सम्भवेद् द्वैतदर्शनात् ॥ ४१शत्रुता, मित्रता या उदासीनताके सभी भेदभाव भी मनमें ही रहते हैं। इसलिये एकात्मभाव होनेपर यह भेदभाव नहीं रहता; यह तो द्वैतभावसे ही उत्पन्न होता है ॥ ४१ ॥
जीवो ब्रह्म सदैवाहं नात्र कार्या विचारणा ।<br>भेदबुद्धिस्तु संसारे वर्तमाना प्रवर्तते ॥ ४२‘मैं जीव सदा ही ब्रह्म हूँ’—इस विषयमें और विचार करनेकी आवश्यकता ही नहीं है। भेदबुद्धि तो संसारमें आसक्त रहनेपर ही होती है ॥ ४२ ॥
अविद्येयं महाभाग विद्या चैतन्निवर्तनम् ।<br>विद्याविद्ये च विज्ञेये सर्वदैव विचक्षणैः ॥ ४३हे महाभाग ! बन्धनका मुख्य कारण अविद्या ही है। इस अविद्याको दूर करनेवाली विद्या है। इसलिये ज्ञानी पुरुषोंको चाहिये कि वे सदा विद्या तथा अविद्याका अनुसन्धानपूर्वक अनुशीलन किया करें ॥ ४३ ॥
विनातपं हि छायाया ज्ञायते च कथं सुखम् ।<br>अविद्यया विना तद्वत्कथं विद्यां च वेत्ति वै ॥ ४४धूपके बिना छायाके सुखका ज्ञान कैसे हो सकता है, उसी प्रकार अविद्याके बिना विद्याका ज्ञान कैसे किया जा सकता है ॥ ४४ ॥

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ] — 6 C

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  • शुद्धो मुक्तः सदैवार्त्मा or सदैवात्मा? In the image: शुद्धो मुक्तः सदैवात्मा (wait, let's look at सदैवार्त्मा - there is no repha, it is सदैवात्मा).
  • तस्मिञ्छान्ते - yes, तस्मिञ्छान्ते.
  • गम्योऽनुमानेन - yes.
  • यद्दृश्यमदृश्यं - yes.
  • ह्यस्मिन्सर्वं - yes.
  • सम्भवेद् द्वैतदर्शनात् - yes.
  • विनातपं - yes.
  • विद्या चैतन्निवर्तनम् - yes.

All looks very accurate.| अ० १८ ] | प्रथम स्कन्ध | १६३ |
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| भुञ्जानो विविधान्भोगान्कुर्वन्कार्याण्यनेकResource? No: <br>भुञ्जानो विविधान्भोगान्कुर्वन्कार्याण्यनेकresource? <br>भुञ्जानो विविधान्भोगान्कुर्वन्कार्याण्यनेकशः ।<br>भविष्यामि यथाऽहं त्वं तथा मुक्तो भवानघ ॥ ३४ | जिस प्रकार मैं अनेक भोगोंको भोगता हुआ तथा अनेक कार्योंको करता हुआ भी अनासक्त हूँ, उसी प्रकार हे अनघ ! आप भी मुक्त हो जाइये ॥ ३४ ॥ |
| कथ्यते खलु यद्दृश्यमदृश्यं बध्यते कुतः ।<br>दृश्यानि पञ्चभूतानि गुणास्तेषां तथा पुनः ॥ ३५ | ऐसा कहा भी जाता है कि जो यह दृश्य जगत् दिखायी देता है, उसके द्वारा अदृश्य आत्मा कैसे बन्धनमें आ सकता है ? पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु एवं आकाश—ये पंचमहाभूत और गन्ध, रस, रूप, स्पर्श एवं शब्द—ये उनके गुण दृश्य कहलाते हैं ॥ ३५ ॥ |
| आत्मा गम्योऽनुमानेन प्रत्यक्षो न कदाचन ।<br>स कथं बध्यते ब्रह्मन्निर्विकारो निरञ्जनः ॥ ३६ | आत्मा अनुमानगम्य है और कभी भी प्रत्यक्ष नहीं होता। ऐसी स्थितिमें हे ब्रह्मन् ! वह निरंजन एवं निर्विकार आत्मा भला बन्धनमें कैसे पड़ सकता है ? |
| मनस्तु सुखदुःखानां महतां कारणं द्विज ।<br>जाते तु निर्मले ह्यस्मिन्सर्वं भवति निर्मलम् ॥ ३७ | हे द्विज ! मन ही महान् सुख-दुःखका कारण है, इसीके निर्मल होनेपर सब कुछ निर्मल हो जाता है ॥ ३६-३७ ॥ |
| भ्रमन्सर्वेषु तीर्थेषु स्नात्वा स्नात्वा पुनः पुनः ।<br>निर्मलं न मनो यावत्तावत्सर्वं निरर्थकम् ॥ ३८ | सभी तीर्थोंमें घूमते हुए वहाँ बार-बार स्नान करके भी यदि मन निर्मल नहीं हुआ तो वह सब व्यर्थ हो जाता है। |
| न देहो न च जीवात्मा नेन्द्रियाणि परन्तप ।<br>मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः ॥ ३९ | हे परन्तप ! बन्धन तथा मोक्षका कारण न यह देह है, न जीवात्मा है और न ये इन्द्रियाँ ही हैं, अपितु मन ही मनुष्योंके बन्धन एवं मुक्तिका कारण है ॥ ३८-३९ ॥ |
| शुद्धो मुक्तः सदैवात्मा न वै बध्येत कर्हिचित् ।<br>बन्धमोक्षौ मनःसंस्थौ तस्मिञ्छान्ते प्रशाम्यति ॥ ४० | आत्मा तो सदा ही शुद्ध तथा मुक्त है, वह कभी बँधता नहीं है। अतः बन्धन और मोक्ष तो मनके भीतर हैं, मनकी शान्तिसे ही शान्ति है ॥ ४० ॥ |
| शत्रुमित्रमुदासीनो भेदाः सर्वे मनोगताः ।<br>एकात्मत्वे कथं भेदः सम्भवेद् द्वैतदर्शनात् ॥ ४१ | शत्रुता, मित्रता या उदासीनताके सभी भेदभाव भी मनमें ही रहते हैं। इसलिये एकात्मभाव होनेपर यह भेदभाव नहीं रहता; यह तो द्वैतभावसे ही उत्पन्न होता है ॥ ४१ ॥ |
| जीवो ब्रह्म सदैवाहं नात्र कार्या विचारणा ।<br>भेदबुद्धिस्तु संसारे वर्तमाना प्रवर्तते ॥ ४२ | ‘मैं जीव सदा ही ब्रह्म हूँ’—इस विषयमें और विचार करनेकी आवश्यकता ही नहीं है। भेदबुद्धि तो संसारमें आसक्त रहनेपर ही होती है ॥ ४२ ॥ |
| अविद्येयं महाभाग विद्या चैतन्निवर्तनम् ।<br>विद्याविद्ये च विज्ञेये सर्वदैव विचक्षणैः ॥ ४३ | हे महाभाग ! बन्धनका मुख्य कारण अविद्या ही है। इस अविद्याको दूर करनेवाली विद्या है। इसलिये ज्ञानी पुरुषोंको चाहिये कि वे सदा विद्या तथा अविद्याका अनुसन्धानपूर्वक अनुशीलन किया करें ॥ ४३ ॥ |
| विनातपं हि छायाया ज्ञायते च कथं सुखम् ।<br>अविद्यया विना तद्वत्कथं विद्यां च वेत्ति वै ॥ ४४ | धूपके बिना छायाके सुखका ज्ञान कैसे हो सकता है, उसी प्रकार अविद्याके बिना विद्याका ज्ञान कैसे किया जा सकता है ॥ ४४ ॥ |


1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ] — 6 C

| १६४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १८ |
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| गुणा गुणेषु वर्तन्ते भूतानि च तथैव च।<br>इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु को दोषस्तत्र चात्मनः॥ ४५ | गुणोंमें गुण, पंचभूतोंमें पंचभूत तथा इन्द्रियोंके विषयोंमें इन्द्रियाँ स्वयं रमण करती हैं; इसमें आत्माका क्या दोष है?॥ ४५॥ |
| मर्यादा सर्वरक्षार्थं कृता वेदेषु सर्वशः।<br>अन्यथा धर्मनाशः स्यात्सौगतानामिवानघ॥ ४६<br><br>धर्मनाशे विनष्टः स्याद्वर्णाचारोऽतिवर्तितः।<br>अतो वेदप्रदिष्टेन मार्गेण गच्छतां शुभम्॥ ४७ | हे पवित्रात्मन्! सबकी सुरक्षाके लिये वेदोंमें सब प्रकारसे मर्यादाकी व्यवस्था की गयी है। यदि ऐसा न होता तो नास्तिकोंकी भाँति सब धर्मोंका नाश हो जाता। धर्मके नष्ट हो जानेपर सब कुछ नष्ट हो जायगा और सब वर्णोंकी आचार-परम्पराका उल्लंघन हो जायगा। इसलिये वेदोपदिष्ट मार्गपर चलनेवालोंका कल्याण होता है॥ ४६-४७॥ |
| शुक उवाच<br>सन्देहो वर्तते राजन्न निवर्तति मे क्वचित्।<br>भवता कथितं यत्तच्छृण्वतो मे नराधिप॥ ४८ | शुकदेवजी बोले—हे राजन्! आपने जो बात कही उसे सुनकर भी मेरा सन्देह बना हुआ है; वह किसी प्रकार भी दूर नहीं होता॥ ४८॥ |
| वेदधर्मेषु हिंसा स्यादधर्मबहुला हि सा।<br>कथं मुक्तिप्रदो धर्मो वेदोक्तो बत भूपते॥ ४९<br><br>प्रत्यक्षेण त्वनाचारः सोमपानं नराधिप।<br>पशूनां हिंसनं तद्वद्भक्षणं चामिषस्य च॥ ५०<br><br>सौत्रामणौ तथा प्रोक्तः प्रत्यक्षेण सुराग्रहः।<br>द्यूतक्रीडा तथा प्रोक्ता व्रतानि विविधानि च॥ ५१ | हे भूपते! वेदधर्मोंमें हिंसाका बाहुल्य है, उस हिंसामें अनेक प्रकारके अधर्म होते हैं। [ऐसी दशामें] वेदोक्त धर्म मुक्तिप्रद कैसे हो सकता है? हे राजन्! सोमरस-पान, पशुहिंसा और मांस-भक्षण तो स्पष्ट ही अनाचार है। सौत्रामणियज्ञमें तो प्रत्यक्षस्वरूपसे सुराग्रहणका वर्णन किया गया है। इसी प्रकार द्यूतक्रीड़ा एवं अन्य अनेक प्रकारके व्रत बताये गये हैं॥ ४९-५१॥ |
| श्रूयते स्म पुरा ह्यासीच्छशबिन्दुर्नृपोत्तमः।<br>यज्वा धर्मपरो नित्यं वदान्यः सत्यसागरः॥ ५२<br><br>गोप्ता च धर्मसेतूनां शास्ता चोत्पथगामिनाम्।<br>यज्ञाश्च विहितास्तेन बहवो भूरिदक्षिणाः॥ ५३ | सुना जाता है कि प्राचीन कालमें शशबिन्दु नामके एक श्रेष्ठ राजा थे। वे बड़े धर्मात्मा, यज्ञपरायण, उदार एवं सत्यवादी थे। वे धर्मरूपी सेतुके रक्षक तथा कुमार्गगामी जनोंके नियन्ता थे। उन्होंने पुष्कल दक्षिणावाले अनेक यज्ञ सम्पादित किये थे॥ ५२-५३॥ |
| चर्मणां पर्वतो जातो विन्ध्याचलसमः पुनः।<br>मेघाम्बुप्लावनाज्जाता नदी चर्मण्वती शुभा॥ ५४ | [उन यज्ञोंमें] पशुओंके चर्मसे विन्ध्यपर्वतके समान ऊँचा पर्वत-सा बन गया। मेघोंके जल बरसानेसे चर्मण्वती नामकी शुभ नदी बह चली॥ ५४॥ |
| सोऽपि राजा दिवं यातः कीर्तिरस्याचला भुवि।<br>एवं धर्मेषु वेदेषु न मे बुद्धिः प्रवर्तते॥ ५५ | वे राजा भी दिवंगत हो गये, किंतु उनकी कीर्ति भूमण्डलपर अचल हो गयी। जब इस प्रकारके धर्मोंका वर्णन वेदमंत्रोंमें/वेदमें है, तब हे राजन्! मेरी श्रद्धाबुद्धि उनमें नहीं है॥ ५५॥ |
| स्त्रीसङ्गेन सदा भोगे सुखमाप्नोति मानवः।<br>अलाभे दुःखमत्यन्तं जीवन्मुक्तः कथं भवेत्॥ ५६ | स्त्रीके साथ भोगमें पुरुष सुख प्राप्त करता है और उसके न मिलनेपर वह बहुत दुःखी होता है तो ऐसी दशामें भला वह जीवन्मुक्त कैसे हो सकेगा?॥ ५६॥ |

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—6 D

अ० १९]प्रथम स्कन्ध१६५
जनक उवाचजनकजी बोले—
हिंसा यज्ञेषु प्रत्यक्षा साहिंसा परिकीर्तिता।<br>उपाधियोगतो हिंसा नान्यथेति विनिर्णयः॥ ५७यज्ञोंमें जो हिंसा दिखायी देती है, वह वास्तवमें अहिंसा ही कही गयी है; क्योंकि जो हिंसा उपाधियोगसे होती है वही हिंसा कहलाती है, अन्यथा नहीं—ऐसा शास्त्रोंका निर्णय है॥ ५७॥
यथा चेन्धनसंयोगादग्नौ धूमः प्रवर्तते।<br>तद्वियोगात्तथा तस्मिन्निर्धूमत्वं विभाति वै॥ ५८<br>अहिंसां च तथा विद्धि वेदोक्तां मुनिसत्तम।<br>रागिणां सापि हिंसैव निःस्पृहाणां न सा मता॥ ५९जिस प्रकार [गीली] लकड़ीके संयोगसे अग्निसे धुआँ निकलता है, उसके अभावमें उस अग्निमें धुँआ नहीं दिखायी देता, उसी प्रकार हे मुनिवर! वेदोक्त हिंसाको भी आप अहिंसा ही समझिये। रागीजनोंद्वारा की गयी हिंसा ही हिंसा है, किंतु अनासक्त जनोंके लिये वह हिंसा नहीं कही गयी है॥ ५८-५९॥
अरागेण च यत्कर्म तथाहङ्कारवर्जितम्।<br>अकृतं वेदविद्वांसः प्रवदन्ति मनीषिणः॥ ६०जो कर्म रागरहित तथा अहंकाररहित होकर किया जाता हो, उस कर्मको वैदिक विद्वान् मनीषीजन न किये हुएके समान ही कहते हैं॥ ६०॥
गृहस्थानां तु हिंसैव या यज्ञे द्विजसत्तम।<br>अरागेण च यत्कर्म तथाहंकारवर्जितम्॥ ६१<br>साहिंसैव महाभाग मुमुक्षूणां जितात्मनाम्॥ ६२हे द्विजश्रेष्ठ! रागी गृहस्थोंके द्वारा यज्ञमें जो हिंसा होती है, वही हिंसा है। हे महाभाग! जो कर्म रागरहित तथा अहंकारशून्य होकर किया जाता है, वह जितात्मा मुमुक्षुजनोंके लिये अहिंसा ही है॥ ६१-६२॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे शुकस्य जनकोपदेशवर्णनं नामाष्टादशोऽध्यायः॥ १८॥


अथैकोनविंशोऽध्यायः

शुकदेवजीका व्यासजीके आश्रममें वापस आना, विवाह करके सन्तानोत्पत्ति करना तथा परम सिद्धिकी प्राप्ति करना

शुक उवाचशुकदेवजी बोले—
सन्देहोऽयं महाराज वर्तते हृदये मम।<br>मायामध्ये वर्तमानः स कथं निःस्पृहो भवेत्॥ १<br>शास्त्रज्ञानं च सम्प्राप्य नित्यानित्यविचारणम्।<br>त्यजते न मनो मोहं स कथं मुच्यते नरः॥ २हे महाराज! मेरे हृदयमें यह शंका हो रही है कि मायामें लिप्त रहते हुए कोई मनुष्य निःस्पृह कैसे हो सकता है? शास्त्रका ज्ञान प्राप्त करके नित्यानित्यका विचार करनेपर भी चित्तसे मोह नहीं दूर होता। तब भला वह मनुष्य मुक्त कैसे हो सकेगा?॥ १-२॥
अन्तर्गतं तमश्छेत्तुं शास्त्राद् बोधो हि न क्षमः।<br>यथा न नश्यति तमः कृतया दीपवार्तया॥ ३<br>अद्रोहः सर्वभूतेषु कर्तव्यः सर्वदा बुधैः।<br>स कथं राजशार्दूल गृहस्थस्य भवेत्तथा॥ ४मनुष्यके मनमें स्थित मोहको दूर करनेके लिये केवल शास्त्रबोध ही समर्थ नहीं हो सकता, जैसे केवल दीप जलानेकी बात करनेसे अन्धकार दूर नहीं होता। अतः बुद्धिमान् मनुष्योंको चाहिये कि वे कभी किसीसे द्वेष-भाव न रखें, परंतु हे नृपश्रेष्ठ! गृहस्थसे वह कैसे सम्भव है?॥ ३-४॥
१६६श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १९

| वित्तैषणा न ते शान्ता तथा राज्यसुखैषणा।<br>जयैषणा च सङ्ग्रामे जीवन्मुक्तः कथं भवेः॥ ५ | अभी भी आपकी धनप्राप्तिकी कामना, राज्यसुख तथा युद्धमें विजय प्राप्त करनेकी अभिलाषा शान्त नहीं हुई है, तब आप जीवन्मुक्त कैसे हो सकते हैं? ॥ ५॥ |
| चौरेषु चौरबुद्धिस्तु साधुबुद्धिस्तु तापसे।<br>स्वपरत्वं तवाप्यस्ति विदेहस्त्वं कथं नृप॥ ६ | अभी भी चोरोंके प्रति चौरबुद्धि तथा तपस्वीके प्रति साधुबुद्धि आपकी है ही। अपने-परायेका भेदभाव भी अभी आपमें है, तो फिर हे राजन्! आप विदेह कैसे? ॥ ६॥ |
| कटुतीक्ष्णकषायाम्लरसान्वेत्सि शुभाशुभान्।<br>शुभेषु रमते चित्तं नाशुभेषु तथा नृप॥ ७ | अभी आप कटु, तिक्त, कसैले एवं खट्टे रसोंका तथा भले-बुरेका ज्ञान रखते ही हैं। हे राजन्! आपका चित्त शुभ कर्मोंमें रमता है, अशुभ कर्मोंमें नहीं। |
| जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिश्च तव राजन् भवन्ति हि।<br>अवस्थास्तु यथाकालं तुरीया तु कथं नृप॥ ८ | जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति—ये अवस्थाएँ अभी आपको समयानुसार होती ही हैं; तब भला आपको तुरीयावस्था कैसे प्राप्त होती होगी? ॥ ७-८॥ |
| पदात्यश्वरथेभाश्च सर्वे वै वशगा मम।<br>स्वाम्यहं चैव सर्वेषां मन्यसे त्वं न मन्यसे॥ ९ | हे राजन्! घोड़े, रथ, हाथी तथा पैदल सैनिक—ये सब मेरे अधीन हैं और मैं इन सबका स्वामी हूँ—ऐसा आप अपनेको मानते हैं या नहीं? |
| मिष्टमत्सि सदा राजन्मुदितो विमनास्तथा।<br>मालायां च तथा सर्पे समदृक् क्व नृपोत्तम॥ १० | आप मधुर भोजनको प्रसन्नतापूर्वक अथवा बेमनसे खाते ही होंगे। हे नृपश्रेष्ठ! आप माला और सर्पमें क्या समान दृष्टिवाले हैं? ॥ ९-१०॥ |
| विमुक्तस्तु भवेद्राजन् समलोष्टाश्मकाञ्चनः।<br>एकात्मबुद्धिः सर्वत्र हितकृत्सर्वजन्तुषु॥ ११ | हे राजन्! विमुक्त पुरुष तो वह कहलाता है, जो मिट्टीके ढेले और स्वर्णको समान समझता हो, सब जीवोंमें एकात्मबुद्धि रखता हो तथा जीवमात्रका उपकार करता हो॥ ११॥ |
| न मेऽद्य रमते चित्तं गृहदारादिषु क्वचित्।<br>एकाकी निःस्पृहोऽत्यर्थं चरेयमिति मे मतिः॥ १२ | मेरा मन घर-स्त्री आदिमें कभी नहीं लगता। इसलिये अकेले ही निःस्पृह भावसे मैं सदा विचरण करता रहूँ—यही मेरा विचार है॥ १२॥ |
| निःसङ्गो निर्ममः शान्तः पत्रमूलफलाशनः।<br>मृगवद्विचरिष्यामि निर्द्वन्द्वो निष्परिग्रहः॥ १३ | निःसंग, ममतारहित और शान्त होकर केवल पत्र, मूल, फल इत्यादि ग्रहण करता हुआ मैं निर्द्वन्द्व एवं अपरिग्रही होकर मृगकी भाँति स्वच्छन्द विचरण करूँगा॥ १३॥ |
| किं मे गृहेण वित्तेन भार्यया च सुरूपया।<br>विरागमनसः कामं गुणातीतस्य पार्थिव॥ १४ | हे पार्थिव! गृह, धन तथा रूपवती स्त्रीसे मुझ विरक्तचित्त और गुणातीतका क्या प्रयोजन है? ॥ १४॥ |
| चिन्त्यसे विविधाकारं नानारागसमाकुलम्।<br>दम्भोऽयं किल ते भाति विमुक्तोऽस्मीति भाषसे॥ १५ | आप अनेक प्रकारकी राग-द्वेषयुक्त बातें सोचते हैं, फिर भी 'मैं विमुक्त हूँ'—ऐसा आप कहते हैं। यह सब मुझे तो केवल आपका दम्भ ही जान पड़ता है। |
| कदाचिच्छत्रुजा चिन्ता धनजा च कदाचन।<br>कदाचित्सैन्यजा चिन्ता निश्चिन्तोऽसि कदा नृप॥ १६ | आपको कभी शत्रुकी, कभी धनकी तथा कभी सेनाकी चिन्ता रहती ही है, तब हे राजन्! आप निश्चिन्त कहाँ? ॥ १५-१६॥ |

अ० १९ ]प्रथम स्कन्ध१६७
संस्कृतहिन्दी
वैखानसा ये मुनयो मिताहारा जितव्रताः।<br>तेऽपि मुह्यन्ति संसारे जानन्तोऽपि ह्यसत्यताम्॥ १७स्वल्पाहारी, अटल व्रतवाले जो वैखानस मुनि हैं, वे इस संसारकी अनित्यताको जानते हुए भी इसमें आसक्त हो जाते हैं॥ १७॥
तव वंशसमुत्थानां विदेहा इति भूपते।<br>कुटिलं नाम जानीहि नान्यथेति कदाचन॥ १८हे राजन्! आपके वंशमें उत्पन्न सभी राजाओंका नाम विदेह—यह हो जाता है, इसमें भी आप धोखा समझिये, दूसरा कुछ नहीं॥ १८॥
विद्याधरो यथा मूर्खो जन्मान्धस्तु दिवाकरः।<br>लक्ष्मीधरो दरिद्रश्च नाम तेषां निरर्थकम्॥ १९<br><br>तव वंशोद्भवा ये ये श्रुताः पूर्वे मया नृपाः।<br>विदेहा इति विख्याता नामतः कर्मतो न ते॥ २०जिस प्रकार किसी मूर्खका नाम विद्याधर, जन्मान्धका नाम दिवाकर तथा सतत दरिद्री मनुष्यका नाम लक्ष्मीधर रखना निरर्थक है, उसी प्रकार पूर्वकालमें आपके वंशमें उत्पन्न जिन-जिन राजाओंको मैंने सुना है, वे नामसे ही विदेह प्रसिद्ध हुए हैं कर्मसे नहीं॥ १९-२०॥
निमिनामाभवद्राजा पूर्वं तव कुले नृप।<br>यज्ञार्थं स तु राजर्षिर्वसिष्ठं स्वगुरुं मुनिम्॥ २१<br><br>निमन्त्रयामास तदा तमुवाच नृपं मुनिः।<br>निमन्त्रितोऽस्मि यज्ञार्थं देवेन्द्रेणाधुना किल॥ २२<br><br>कृत्वा तस्य मखं पूर्णं करिष्यामि तवापि वै।<br>तावत्कुरुष्व राजेन्द्र सम्भारं तु शनैः शनैः॥ २३हे नृप! आपके कुलमें पहले निमि नामके राजा हो चुके हैं। उन राजर्षिने एक बार अपने गुरु वसिष्ठमुनिको यज्ञके लिये निमन्त्रित किया। उस समय वसिष्ठजीने उनसे कहा कि आपसे पहले इन्द्रने मुझे यज्ञके लिये आमन्त्रित कर रखा है। इन्द्रका यज्ञ सम्पन्न कराकर मैं आपका भी यज्ञ पूर्ण करूँगा। अतः हे राजेन्द्र! तब तक आप धीरे-धीरे यज्ञ-सामग्री एकत्र कराइये॥ २१—२३॥
इत्युक्त्वा निर्ययौ सोऽथ महेन्द्रयजने मुनिः।<br>निमिरन्यं गुरुं कृत्वा चकार मखमुत्तमम्॥ २४ऐसा कहकर वसिष्ठमुनि इन्द्रका यज्ञ करानेके लिये चले गये और महाराज निमिने किसी दूसरेको आचार्य बनाकर अपना उत्तम यज्ञ सम्पन्न कर लिया॥ २४॥
तच्छ्रुत्वा कुपितोऽत्यर्थं वसिष्ठो नृपतिं पुनः।<br>शशाप च पतत्वद्य देहस्ते गुरुलोपक॥ २५यह सुनकर वसिष्ठजी राजापर अत्यन्त क्रोधित हुए और उन्हें शाप देते हुए बोले—'हे गुरुका परित्याग करनेवाले! तुम्हारा शरीर नष्ट हो जाय'॥ २५॥
राजापि तं शशापाथ तवापि च पतत्वयम्।<br>अन्योन्यशापात्पतितौ तावेव च मया श्रुतम्॥ २६यह सुनकर महाराज निमिने भी शाप दिया कि आपका भी शरीर नष्ट हो जाय। इस प्रकार वे दोनों एक-दूसरेके शापसे नष्ट हो गये—ऐसा मैंने सुना है॥ २६॥
विदेहेन च राजेन्द्र कथं शप्तो गुरुः स्वयम्।<br>विनोद इव मे चित्ते विभाति नृपसत्तम॥ २७हे राजेन्द्र! विदेह होकर भी राजाने अपने गुरुको स्वयं शाप क्यों दे डाला! हे नृपश्रेष्ठ! यह तो मेरे मनमें परिहास-जैसा प्रतीत हो रहा है॥ २७॥
जनक उवाच<br>सत्यमुक्तं त्वया नात्र मिथ्या किञ्चिदिदं मतम्।<br>तथापि शृणु विप्रेन्द्र गुरुर्मम सुपूजितः॥ २८जनकजी बोले—हे विप्रवर! आपने ठीक ही कहा है; इसमें मिथ्या कुछ भी नहीं है—ऐसा मैं मानता हूँ। फिर भी आप मेरी बात सुनें। हे विप्रेन्द्र!