देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
६४८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २२
६४८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २२
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| नमो देवि विश्वेश्वरि प्राणनाथे<br>सदानन्दरूपे सुरानन्ददे ते।<br>नमो दानवान्तप्रदे मानवाना-<br>मनेकार्थदे भक्तिगम्यस्वरूपे ॥ २५ | हे विश्वेश्वरि! हे प्राणोंकी स्वामिनि! सदा आनन्दरूपमें रहनेवाली तथा देवताओंको आनन्द प्रदान करनेवाली हे देवि! आपको नमस्कार है। दानवोंका अन्त करनेवाली, मनुष्योंकी समस्त कामनाएँ पूर्ण करनेवाली तथा भक्तिके द्वारा अपने रूपका दर्शन देनेवाली हे देवि! आपको नमस्कार है॥ २५॥ |
| न ते नामसंख्यां न ते रूपमीदृ-<br>क्तथा कोऽपि वेदादिदेवस्वरूपे।<br>त्वमेवासि सर्वेषु शक्तिस्वरूपा<br>प्रजासृष्टिसंहारकाले सदैव ॥ २६ | हे आदिदेवस्वरूपिणि! आपके नामोंकी निश्चित संख्या तथा आपके इस रूपको कोई भी नहीं जान सकता। सबमें आप ही विराजमान हैं। जीवोंके सृजन और संहारकालमें शक्तिस्वरूपसे सदा आप ही कार्य करती हैं॥ २६॥ |
| स्मृतिस्त्वं धृतिस्त्वं त्वमेवासि बुद्धि-<br>र्जरा पुष्टितुष्टी धृतिः कान्तिशान्ती।<br>सुविद्या सुलक्ष्मीर्गतिः कीर्तिमेधे<br>त्वमेवासि विश्वस्य बीजं पुराणम् ॥ २७ | आप ही स्मृति, धृति, बुद्धि, जरा, पुष्टि, तुष्टि, धृति, कान्ति, शान्ति, सुविद्या, सुलक्ष्मी, गति, कीर्ति, मेधा और विश्वकी पुरातन मूल प्रकृति हैं॥ २७॥ |
| यदा यैः स्वरूपैः करोषीह कार्यं<br>सुराणां च तेभ्यो नमामोऽद्य शान्त्यै।<br>क्षमा योगनिद्रा दया त्वं विवक्षा<br>स्थिता सर्वभूतेषु शस्तैः स्वरूपैः ॥ २८ | आप जिस समय जिन स्वरूपोंसे देवताओंका कार्य सम्पन्न करती हैं, हम शान्तिके लिये आपके उन स्वरूपोंको नमस्कार करते हैं। आप ही क्षमा, योगनिद्रा, दया तथा विवक्षा—इन कल्याणकारी रूपोंसे सभी जीवोंमें निवास करती हैं॥ २८॥ |
| कृतं कार्यमादौ त्वया यत्सुराणां<br>हतोऽसौ महारिर्मदान्धो हयारिः।<br>दया ते सदा सर्वदेवेषु देवि<br>प्रसिद्धा पुराणेषु वेदेषु गीता॥ २९ | पूर्वकालमें आपने हम देवताओंका कार्य किया था जो कि महान् शत्रु मदान्ध महिषासुरका वध कर डाला था। हे देवि! सभी देवताओंपर आपकी दया सदैव रहती है, आपकी दया पूर्ण प्रसिद्ध है और पुराणों तथा वेदोंमें भी उसका वर्णन किया गया है॥ २९॥ |
| किमत्रास्ति चित्रं यदम्बा सुतं स्वं<br>मुदा पालयेत्पोषयेत्सम्यगेव।<br>यतस्त्वं जनित्री सुराणां सहाया<br>कुरुष्वैकचित्तेन कार्यं समग्रम् ॥ ३० | इसमें आश्चर्यकी क्या बात; क्योंकि माता प्रसन्नतापूर्वक सम्यक् प्रकारसे अपने पुत्रका पालन-पोषण करती ही है। क्योंकि आप देवताओंकी जननी हैं, अतः उनका सहायक बनकर एकाग्र मनसे हमलोगोंका सम्पूर्ण कार्य सम्पन्न करें॥ ३०॥ |
| न वा ते गुणानामियत्तां स्वरूपं<br>वयं देवि जानीमहे विश्ववन्द्ये।<br>कृपापात्रमित्येव मत्वा तथास्मा-<br>न्भयेभ्यः सदा पाहि पातुं समर्थे॥ ३१ | हे देवि! हे विश्ववन्द्ये! हमलोग न आपके गुणोंकी सीमा जानते हैं और न आपका स्वरूप ही जानते हैं। अतः रक्षा करनेमें समर्थ हे देवि! हमें केवल अपना कृपापात्र मानकर आप भयोंसे निरन्तर हमारी रक्षा करती रहें॥ ३१॥ |
| अ० २२ ] | पञ्चम स्कन्ध | ६४९ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| विना बाणपातैर्विना मुष्टिघातै-<br>र्विना शूलखड्गैर्विना शक्तिदण्डैः ।<br>रिपूहन्तुमेवासि शक्ता विनोदा-<br>त्तथापीह लोकोपकाराय लीला ॥ ३२ | यद्यपि बिना बाण चलाये; बिना मुष्टिप्रहार किये और बिना त्रिशूल, तलवार, बर्छी, दण्ड आदिका प्रयोग किये भी आप विनोदपूर्वक शत्रुओंका संहार करनेमें समर्थ हैं, फिर भी जगत्के उपकारके लिये ही आपकी यह लीला दृष्टिगोचर होती है ॥ ३२ ॥ |
| इदं शाश्वतं नैव जानन्ति मूढा<br>न कार्यं विना कारणं सम्भवेद्वा ।<br>वयं तर्कयामोऽनुमानं प्रमाणं<br>त्वमेवासि कर्तास्य विश्वस्य चेति ॥ ३३ | आपका यह रूप सनातन है—इस रहस्यको अविवेकी लोग नहीं जानते हैं। [हे माता!] बिना कारणके कोई कार्य नहीं होता। अतः अनुमान और प्रमाणके आधारपर हम यही जानते हैं कि इस विश्वकी रचना करनेवाली आप ही हैं ॥ ३३ ॥ |
| अजः सृष्टिकर्ता मुकुन्दोऽवितायं<br>हरो नाशकद्वै पुराणे प्रसिद्धः ।<br>न किं त्वत्प्रसूतास्त्रयस्ते युगादौ<br>त्वमेवासि सर्वस्य तेनैव माता ॥ ३४ | ब्रह्मा सृष्टिकर्ता, विष्णु पालनकर्ता और शंकर संहारकर्ताके रूपमें पुराणमें प्रसिद्ध हैं, किंतु क्या वे तीनों देव आपसे उत्पन्न नहीं हुए हैं? युगके प्रारम्भमें केवल आप ही रहती हैं, अतः आप ही सबकी माता हैं ॥ ३४ ॥ |
| त्रिभिस्त्वं पुराराधिता देवि दत्ता<br>त्वया शक्तिरुग्रा च तेभ्यः समग्रा ।<br>त्वया संयुतास्ते प्रकुर्वन्ति कामं<br>जगत्पालनोत्पत्तिसंहारमेव ॥ ३५ | हे देवि! पूर्वकालमें इन तीनोंने आपकी आराधना की थी, तब आपने उन्हें अपनी समस्त प्रबल शक्ति प्रदान की थी। वास्तवमें उसी शक्तिसे सम्पन्न होकर वे जगत्का सृजन, पालन तथा संहार करते हैं ॥ ३५ ॥ |
| ते किं न मन्दमतयो यतयो विमूढा-<br>स्त्वां ये न विश्वजननीं समुपाश्रयन्ति ।<br>विद्यां परां सकलकामफलप्रदां तां<br>मुक्तिप्रदां विबुधवृन्दसुवन्दिताङ्घ्रिम् ॥ ३६ | जो संन्यासी लोग विश्वकी जननी, परम विद्या-स्वरूपिणी, समस्त वांछित फल प्रदान करनेवाली, मुक्तिदायिनी तथा सभी देवताओंसे वन्दित चरणोंवाली आप भगवतीकी उपासना नहीं करते, क्या वे मन्दबुद्धि तथा अज्ञानी नहीं हैं? ॥ ३६ ॥ |
| ये वैष्णवाः पाशुपताश्च सौरा<br>दम्भास्त एव प्रतिभान्ति नूनम् ।<br>ध्यायन्ति न त्वां कमलाञ्च लज्जां<br>कान्तिं स्थितिं कीर्तिमथापि पुष्टिम् ॥ ३७ | विष्णु, शिव तथा सूर्यकी आराधना करनेवाले जो लोग कमला, लज्जा, कान्ति, स्थिति, कीर्ति और पुष्टि नामोंसे विख्यात आप भगवतीका ध्यान नहीं करते हैं, वे निश्चितरूपसे दम्भी प्रतीत होते हैं ॥ ३७ ॥ |
| हरिहरादिभिरप्यथ सेविता<br>त्वमिह देववरैरसुरैस्तथा ।<br>भुवि भजन्ति न येऽल्पधियो नरा<br>जननि ते विधिना खलु वञ्चिताः ॥ ३८ | विष्णु और शंकर आदि श्रेष्ठ देवता तथा असुर भी आपकी पूजा करते हैं। अतः हे माता! इस जगत्में जो मन्दबुद्धि मनुष्य आपकी आराधना नहीं करते, निश्चय ही विधाताने उन्हें ठग लिया है ॥ ३८ ॥ |
| जलधिजापदपङ्कजरञ्जनं<br>जतुरसेन करोति हरिः स्वयं ।<br>त्रिनयनोऽपि धराधरजाङ्घ्रिपं-<br>कजपरागनिषेवणतत्परः ॥ ३९ | भगवान् विष्णु अपने पास लक्ष्मीरूपमें विराजमान आप भगवतीके चरणकमलोंमें स्वयं महावर लगाते हैं। इसी प्रकार त्रिनेत्र भगवान् शिव भी अपने पास पार्वती-रूपमें विराजमान आप भगवतीके चरणकमलकी रजके सेवनमें निरन्तर तत्पर रहते हैं; तब अन्य |
| ६५० | श्रीमद्देवीभागवत | [अ० २२ |
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| किमपरस्य नरस्य कथानकै-<br>स्तव पदाब्जयुगं न भजन्ति के।<br>विगतरागगृहाश्च दयां क्षमां<br>कृतधियो मुनयोऽपि भजन्ति ते॥ ४० | मनुष्यकी बात ही क्या! आपके चरणकमलोंकी आराधना कौन नहीं करते? घर-गृहस्थीसे विरक्त बुद्धिमान् मुनिगण भी दया और क्षमारूपमें प्रतिष्ठित आप भगवतीकी उपासना करते हैं॥ ३९-४०॥ |
| देवि त्वदङ्घ्रिभजने न जना रता ये<br>संसारकूपपतिताः पतिताः किलामी।<br>ते कुष्ठगुल्मशिरआधियुता भवन्ति<br>दारिद्र्यदैन्यसहिता रहिताः सुखौघैः॥ ४१ | हे देवि! जो लोग आपके चरणोंकी उपासनामें संलग्न नहीं रहते, उन्हें निश्चय ही इस संसाररूप अगाध कूपमें गिरना पड़ता है। वे पतित लोग कुष्ठ, गुल्म और शिरोरोगसे ग्रस्त रहते हैं, दरिद्रता तथा दीनतासे युक्त रहते हैं और सुखोंसे सदा वंचित रहते हैं॥ ४१॥ |
| ये काष्ठभारवहने यवसावहारे<br>कार्ये भवन्ति निपुणा धनदारहीनाः।<br>जानीमहेऽल्पमतिभिर्भवदङ्घ्रिसेवा<br>पूर्वे भवे जननि तैर्न कृता कदापि॥ ४२ | हे माता! धन और स्त्रीसे रहित जो मनुष्य लकड़ीका बोझ ढोने और तृण आदिका वहन करनेमें लगे हैं, [उनके विषयमें] हम तो यही समझते हैं कि उन मन्दबुद्धि मनुष्योंने पूर्वजन्ममें आपके चरणोंकी उपासना कभी नहीं की॥ ४२॥ |
| व्यास उवाच<br>एवं स्तुता सुरैः सर्वैरम्बिका करुणान्विता।<br>प्रादुर्बभूव तरसा रूपयौवनसंयुता॥ ४३<br><br>दिव्याम्बरधरा देवी दिव्यभूषणभूषिता।<br>दिव्यमाल्यसमायुक्ता दिव्यचन्दनचर्चिता॥ ४४<br><br>जगन्मोहनलावण्या सर्वलक्षणलक्षिता।<br>अद्वितीयस्वरूपा सा देवानां दर्शनं गता॥ ४५ | व्यासजी बोले— इस प्रकार समस्त देवताओंके स्तुति करनेपर अम्बिका करुणासे ओत-प्रोत होकर तुरंत प्रकट हो गयीं। [उस समय] वे भगवती रूप तथा यौवनसे सम्पन्न थीं, उन्होंने दिव्य वस्त्र धारण कर रखा था, वे अलौकिक आभूषणोंसे अलंकृत थीं, दिव्य मालाओंसे सुशोभित हो रही थीं, दिव्य चन्दनसे अनुलिप्त थीं, जगत्को मोहित कर देनेवाले सौन्दर्यसे सम्पन्न थीं और समस्त शुभ लक्षणोंसे समन्वित थीं। इस प्रकार अद्वितीय स्वरूपवाली वे भगवती देवताओंके समक्ष प्रकट हुईं॥ ४३—४५॥ |
| जाह्नव्यां स्नातुकामा सा निर्गता गिरिगुहरात्।<br>दिव्यरूपधरा देवी विश्वमोहनमोहिनी॥ ४६ | दिव्य रूप धारण करनेवाली तथा विश्वको मोह लेनेमें समर्थ कामदेवको भी मोहित करनेवाली वे भगवती गंगामें स्नान करनेकी अभिलाषासे पर्वतकी कन्दरासे बाहर निकली थीं॥ ४६॥ |
| देवान्स्तुतिपरानाह मेघगम्भीरया गिरा।<br>प्रेमपूर्वं स्मितं कृत्वा कोकिलामञ्जुवादिनी॥ ४७ | कोकिलके समान मधुर बोलनेवाली भगवती प्रेमपूर्ण भावसे मुसकराकर स्तुति करनेमें संलग्न देवताओंसे मेघके समान गम्भीर वाणीमें कहने लगीं॥ ४७॥ |
| देव्युवाच<br>भो भोः सुरवराः कात्र भवद्भिः स्तूयते भृशम्।<br>किमर्थं ब्रूत वः कार्यं चिन्ताविष्टाः कुतः पुनः॥ ४८ | देवी बोलीं— हे श्रेष्ठ देवतागण! आपलोग यहाँपर इतनी बड़ी स्तुति किसलिये कर रहे हैं? आपलोग इस प्रकार चिन्तासे व्याकुल क्यों हैं? मुझे अपना कार्य बताइये॥ ४८॥ |
| अ० २२ ] | पञ्चम स्कन्ध | ६५१ |
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| व्यास उवाच <br> तच्छ्रुत्वा भाषितं तस्या मोहिता रूपसम्पदा। <br> प्रेमपूर्वं हृदुत्साहास्तामूचुः सुरसत्तमाः॥ ४९ | **व्यासजी बोले—**भगवतीका यह वचन सुनकर उनके रूप-वैभवसे मोहित श्रेष्ठ देवताओंका हृदय उत्साहसे परिपूर्ण हो गया, जिससे वे प्रेमपूर्वक उनसे कहने लगे॥ ४९॥ |
| देवा ऊचुः <br> देवि स्तुमस्त्वां विश्वेशि प्रणताः स्म कृपार्णवे। <br> पाहि नः सर्वदुःखेभ्यः संविग्नान्दैत्यतापितान्॥ ५० | **देवता बोले—**जगत्को नियन्त्रणमें रखनेवाली हे देवि! हम आपकी स्तुति कर रहे हैं, हम आपके शरणागत हैं। हे कृपासिन्धो! दैत्योंसे सताये गये हम देवताओंकी सम्पूर्ण दुःखोंसे रक्षा कीजिये॥ ५०॥ |
| पुरा त्वया महादेवि निहत्यासुरकण्टकम्। <br> महिषं नो वरो दत्तः स्मर्तव्याहं सदापदि॥ ५१ <br><br> स्मरणाद्दैत्यजां पीडां नाशयिष्याम्यसंशयम्। <br> तेन त्वं संस्मृता देवि नूनमस्माभिरित्यपि॥ ५२ | हे महादेवि! पूर्वकालमें देवताओंके लिये कंटक बने महिषासुरका वध करके आपने हमें वर प्रदान किया था—‘आपलोग संकटमें मुझे सदा याद कीजियेगा, स्मरण करते ही मैं दैत्योंके द्वारा आपलोगोंको पहुँचायी गयी पीड़ाका निःसन्देह नाश कर दूँगी।’ हे देवि! इसीलिये हमलोगोंने आपका स्मरण किया है॥ ५१-५२॥ |
| अद्य शुम्भनिशुम्भौ द्वावसुरौ घोरदर्शनौ। <br> उत्पन्नौ विघ्नकर्तारावहन्त्यौ पुरुषैः किल॥ ५३ <br><br> रक्तबीजश्च बलवांश्चण्डमुण्डौ तथासुरौ। <br> एतैरन्यैश्च देवानां हृतं राज्यं महाबलैः॥ ५४ <br><br> गतिरन्या न चास्माकं त्वमेवासि महाबले। <br> कुरु कार्यं सुराणां वै दुःखितानां सुमध्यमे॥ ५५ | इस समय शुम्भ और निशुम्भ नामक दो दानव उत्पन्न हुए हैं, जो देखनेमें महाभयंकर हैं। वे [हमारे कार्योंमें] विघ्न डाला करते हैं। वे पुरुषोंसे सर्वथा अवध्य हैं। ऐसे ही बलशाली दानव रक्तबीज तथा चण्ड और मुण्ड भी हैं। इन सभी तथा अन्य महाबली दानवोंने हम देवताओंका राज्य छीन लिया है। हे महाबले! हमलोगोंका दूसरा कोई अवलम्ब नहीं, एकमात्र आप ही हमारी शरण हैं। हे सुमध्यमे! आप दुःखित देवताओंका कार्य सिद्ध करें॥ ५३—५५॥ |
| देवास्त्वदङ्घ्रिभजने निरताः सदैव <br> ते दानवैरतिबलैर्विपदं सुनीताः। <br> तान्देवि दुःखरहितान्कुरु भक्तियुक्ता- <br> न्मातस्त्वमेव शरणं भव दुःखितानाम्॥ ५६ | देवता आपके चरणोंकी उपासनामें सदैव संलग्न रहते हैं। [इस समय] वे सब महान् बलशाली दैत्योंके द्वारा विपत्तिमें डाल दिये गये हैं। अतः हे देवि! आप उन भक्तिपरायण देवताओंको दुःखरहित कर दीजिये। हे माता! आप दुःखित देवताओंका आश्रय बन जाइये॥ ५६॥ |
| सकलभुवनरक्षा देवि कार्या त्वयाद्य <br> स्वकृतमिति विदित्वा विश्वमेतद् युगादौ। <br> जननि जगति पीडां दानवा दर्पयुक्ताः <br> स्वबलमदसमेतास्ते प्रकुर्वन्ति मातः॥ ५७ | हे देवि! युगके आरम्भमें इस विश्वकी रचना आप भगवतीने स्वयं की थी—यह जानकर आप इस समय सम्पूर्ण भूमण्डलकी रक्षा करें। हे जननि! हे माता! अपने बलसे मदान्वित तथा अभिमानमें चूर दानव जगत्में लोगोंको पीड़ित कर रहे हैं॥ ५७॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे
देवकृतदेव्याराधनवर्णनं नाम द्वाविंशोऽध्यायः॥ २२॥