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देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

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DevanagariHindipublished889 pages

Page 841 of 889

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Page 841
८३२श्रीमद्देवीभागवत[ अ० २२
कथमन्यं भजे कान्तं त्यक्त्वा धर्मं सनातनम्।<br>कन्याधर्मं विहायाद्य वेत्सि शास्त्रविनिश्चयम् ॥ ३२<br><br>यस्मै दद्यात्पिता कामं कन्या तं पतिमाप्नुयात्।<br>परतन्त्रा सदा कन्या न स्वातन्त्र्यं कदाचन ॥ ३३सनातनधर्मका त्याग करके तथा कन्याधर्म छोड़कर मैं दूसरेको पतिरूपमें कैसे स्वीकार करूँ ? आप भी तो शास्त्रीय नियमको जानते ही हैं। पिता कन्याको जिसे सौंप दे, कन्या उसीको पति बना ले। कन्या इस विषयमें सदा पराधीन रहती है, उसे स्वतन्त्रता कभी नहीं रहती ॥ ३२-३३ ॥
इत्युक्तोऽपि तया पापी विरराम न मोहितः।<br>न मुमोच विशालाक्षीं मां च पार्श्वस्थितां तथा ॥ ३४[हे राजकुमार !] उस एकावलीके ऐसा कहनेपर भी वह पापात्मा कालकेतु राजकुमारीपर मोहित रहनेके कारण अपने निश्चयसे विचलित नहीं हुआ और उसने विशाल नेत्रोंवाली एकावलीको तथा उसके पासमें स्थित मुझको नहीं छोड़ा ॥ ३४ ॥
पातालविवरे तस्य पुरं परमसङ्कटे।<br>राक्षसै रक्षितं दुर्गं मण्डितं परिखावृतम् ॥ ३५<br><br>तत्र तिष्ठति दुःखार्ता सखी मे प्राणवल्लभा।<br>तेनाहं विरहेणात्र ररटीमि सुदुःखिता ॥ ३६उस कालकेतुका नगर अनेक प्रकारके संकटोंसे युक्त एक पाताल-विवरमें विद्यमान है। वहींपर चारों ओर खाइयोंसे घिरा हुआ तथा राक्षसोंसे पूर्णतया रक्षित उसका सुन्दर दुर्ग है। मेरी प्राणप्यारी सखी एकावली वहींपर दुःखके साथ पड़ी हुई है। इसलिये उसके विरहसे अत्यन्त व्यथित होकर मैं यहाँ विलाप कर रही हूँ ॥ ३५-३६ ॥
एकवीर उवाच<br>कथं त्वमत्र सम्प्राप्ता पुरातत्तस्य दुरात्मनः।<br>विस्मयो मे महानत्र तत्त्वं ब्रूहि वरानने ॥ ३७एकवीरने कहा—हे वरानने! उस दुष्टात्मा कालकेतुके नगरसे तुम यहाँ कैसे आ गयी ? इस बातसे मैं बहुत ही आश्चर्यचकित हूँ; तुम मुझसे इस विषयमें बताओ ॥ ३७ ॥
त्वया च कथितं वाक्यं सन्दिग्धं भाति भामिनि।<br>हैहयार्थे कल्पिता सा पित्रेति मम साम्प्रतम् ॥ ३८<br><br>हैहयो नाम राजाहं नान्योऽस्ति पृथिवीपतिः।<br>मदर्थे कथिता सा किं सखी तव सुलोचना ॥ ३९हे भामिनि! अभी तुमने जो कहा है कि एकावलीके पिताने उसका विवाह हैहयके साथ करनेका निश्चय किया है, वह बात मुझे अत्यन्त सन्देहास्पद प्रतीत हो रही है। हैहय नामका राजा मैं ही हूँ; अन्य कोई राजा नहीं है। सुन्दर नेत्रोंवाली वह तुम्हारी सखी अपने पिताके द्वारा कहीं मेरे लिये ही तो कल्पित नहीं की गयी है ? ॥ ३८-३९ ॥
एतन्मे संशयं सुभ्रु छेत्तुमर्हसि भामिनि।<br>अहं तामानयिष्यामि तं हत्वा राक्षसाधमम् ॥ ४०<br><br>स्थानं दर्शय मे तस्य यदि जानासि सुव्रते।<br>राज्ञे निवेदितं किं वा तत्पित्रे चातिदुःखिता ॥ ४१हे सुभ्रु! हे भामिनि! तुम मेरे इस सन्देहको दूर करो। मैं उस अधम राक्षसका वध करके उस एकावलीको ले आऊँगा। हे सुव्रते! यदि तुम उस राक्षसका स्थान जानती हो तो वह स्थान मुझे दिखा दो। उसके पिता राजा रैभ्यको तुमने यह बताया अथवा नहीं कि वह अत्यन्त दुःखित है ॥ ४०-४१ ॥