देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे
| ४८० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १६ |
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| अष्टाविंशे युगे शस्तौ द्वापरेऽर्जुनशौरिणौ।<br>धराभारावतारार्थं जातौ कृष्णार्जुनौ भुवि॥ १८<br><br>कृतवन्तौ महायुद्धं कुरुक्षेत्रेऽतिदारुणम्। | और श्रीकृष्ण पृथ्वीतलपर अवतीर्ण हुए। श्रीकृष्ण तथा अर्जुनने पृथ्वीका भार उतारनेके लिये ही भूमण्डलपर अवतार लिया और कुरुक्षेत्रमें अत्यन्त भयंकर महायुद्ध किया॥ १७-१८ १/२॥ |
| एवं युगे युगे राजन्नवतारा हरेः किल॥ १९<br><br>भवन्ति बहवः कामं प्रकृतेरनुरूपतः।<br>प्रकृतेरखिलं सर्वं वशमेतज्जगत्त्रयम्॥ २०<br><br>यथेच्छति तथैवेयं भ्रामयत्यनिशं जगत्।<br>पुरुषस्य प्रियार्थं सा रचयत्यखिलं जगत्॥ २१ | हे राजन्! इस प्रकार प्रकृतिके आदेशानुसार युग-युगमें भगवान् विष्णुके अनेक अवतार हुआ करते हैं। यह सम्पूर्ण त्रिलोकी प्रकृतिके अधीन रहती है। ये भगवती प्रकृति जैसे चाहती हैं वैसे ही जगत्को निरन्तर नचाया करती हैं। परमपुरुषकी प्रसन्नताके लिये ही वे समस्त संसारकी रचना करती हैं॥ १९-२१॥ |
| सृष्ट्वा पुरा हि भगवाञ्जगदेतच्चराचरम्।<br>सर्वादिः सर्वगश्चासौ दुर्ज्ञेयः परमोऽव्ययः॥ २२<br><br>निरालम्बो निराकारो निःस्पृहश्च परात्परः।<br>उपाधितस्त्रिधा भाति यस्याः सा प्रकृतिः परा॥ २३ | प्राचीनकालमें इस चराचर जगत्का सृजन करके सबके आदिरूप, सर्वत्र गमन करनेवाले, दुर्ज्ञेय, महान्, अविनाशी, स्वतन्त्र, निराकार, निःस्पृह और परात्पर वे भगवान् जिन मायारूपिणी भगवतीके संयोगसे उपाधिरूपमें [ब्रह्मा, विष्णु, महेश] तीन प्रकारके प्रतीत होते हैं, वे ही ‘परा प्रकृति’ हैं॥ २२-२३॥ |
| उत्पत्तिकालयोगात्सा भिन्ना भाति शिवा तदा।<br>सा विश्वं कुरुते कामं सा पालयति कामदा॥ २४<br><br>कल्पान्ते संहरत्येव त्रिरूपा विश्वमोहिनी।<br>तया युक्तोऽसृजद् ब्रह्मा विष्णुः पाति तयान्वितः॥ २५<br><br>रुद्रः संहरते कामं तया सम्मिलितः शिवः। | उत्पत्ति और कालके योगसे ही वे कल्याणमयी प्रकृति उस परमात्मासे भिन्न भासती हैं। सबका मनोरथ पूर्ण करनेवाली वे प्रकृति ही विश्वकी रचना करती हैं, सम्यक् रूपसे पालन करती हैं और कल्पके अन्तमें संहार भी कर देती हैं। इस प्रकार वे विश्वमोहिनी भगवती प्रकृति ही तीन रूपोंमें विराजमान रहती हैं। उन्हींसे संयुक्त होकर ब्रह्माने जगत्की सृष्टि की है, उन्हींसे सम्बद्ध होकर विष्णु पालन करते हैं और उन्हींके साथ मिलकर कल्याणकारी रुद्र संहार करते हैं॥ २४-२५ १/२॥ |
| सा चैवोत्पाद्य काकुत्स्थं पुरा वै नृपसत्तमम्॥ २६<br><br>कुत्रचित्स्थापयामास दानवानां जयाय च।<br>एवमस्मिंश्च संसारे सुखदुःखान्विताः किल॥ २७<br><br>भवन्ति प्राणिनः सर्वे विधितन्त्रनियन्त्रिताः॥ २८ | पूर्वकालमें उन भगवती परा प्रकृतिने ही ककुत्स्थवंशी नृपश्रेष्ठको उत्पन्न करके दानवोंको पराजित करनेके लिये उन्हें कहींपर स्थापित कर दिया। इस प्रकार इस संसारमें सभी प्राणी विधिके नियमोंमें बँधकर सदा सुख तथा दुःखसे युक्त रहते हैं॥ २६-२८॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे
हरेर्नानावतारवर्णनं नाम षोडशोऽध्यायः॥ १६॥
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अ० १७ ] चतुर्थ स्कन्ध ४८१
अथ सप्तदशोऽध्यायः
श्रीनारायणद्वारा अप्सराओंको वरदान देना, राजा जनमेजयद्वारा व्यासजीसे श्रीकृष्णावतारका चरित सुनानेका निवेदन करना
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| जनमेजय उवाच<br>वाराङ्गनास्त्वयाख्याता नरनारायणाश्रमे।<br>एकं नारायणं शान्तं कामयानाः स्मरातुराः॥ १<br>शप्तुकामस्तदा जातो मुनिर्नारायणश्च ताः।<br>निवारितो नरेणाथ भ्रात्रा धर्मविदा नृप॥ २ | **जनमेजय बोले—**हे मुने! आप नर-नारायणके आश्रममें आयी हुई अप्सराओंकी चर्चा पहले ही कर चुके हैं, जो काम-पीड़ित होकर शान्तचित्त मुनि नारायणपर आसक्त हो गयी थीं। उसके बाद मुनि नारायण उन्हें शाप देनेको उद्यत हो गये। इसपर उनके भाई धर्मवेत्ता नरने उन्हें ऐसा करनेसे रोक दिया था॥ १-२॥ |
| किं कृतं मुनिना तेन व्यसने समुपस्थिते।<br>ताभिः संकल्पितेनाथ कामार्थाभिर्भृशं मुने॥ ३<br>शक्रेणोत्पादिताभिश्च बहुप्रार्थनया पुनः।<br>याचितेन विवाहार्थं किं कृतं तेन जिष्णुना॥ ४<br>इत्येतच्छ्रोतुमिच्छामि चरितं तस्य मोक्षदम्।<br>नारायणस्य मे ब्रूहि विस्तरेण पितामह॥ ५ | हे मुने! अत्यन्त कामासक्त उन अप्सराओं के द्वारा [अपने मनमें पतिरूपमें] संकल्पित किये गये उन मुनि नारायणने इस विषम संकटके उपस्थित होनेपर क्या किया? इन्द्रके द्वारा प्रेषित उन वारांगनाओंके बार-बार बहुत प्रार्थना करके विवाहके लिये याचित उन भगवान् नारायणमुनिने क्या किया? हे पितामह! मैं उन नारायणमुनिका यह मोक्षदायक चरित्र सुनना चाहता हूँ; विस्तारके साथ मुझे बतायें॥ ३-५॥ |
| व्यास उवाच<br>शृणु राजन्प्रवक्ष्यामि यथा तस्य महात्मनः।<br>धर्मपुत्रस्य धर्मज्ञ विस्तरेण वदामि ते॥ ६ | **व्यासजी बोले—**हे राजन्! सुनिये, मैं बताऊँगा। हे धर्मज्ञ! उन महात्मा धर्मपुत्र नारायणका चरित्र विस्तारपूर्वक मैं आपको बता रहा हूँ॥ ६॥ |
| शप्तुकामस्तु संदृष्टो नरेणाथ यदा हरिः।<br>वारितोऽसौ समाश्वास्य मुनिर्नारायणस्तदा॥ ७ | जब नरने मुनि नारायणको शाप देनेके लिये उद्यत देखा तब उन्होंने नारायणको आश्वासन देकर [वैसा करनेसे] रोक दिया॥ ७॥ |
| शान्तकोपस्तदोवाच तास्तपस्वी महामुनिः।<br>स्मितपूर्वमिदं वाक्यं मधुरं धर्मनन्दनः॥ ८ | तत्पश्चात् क्रोधके शान्त हो जानेपर महामुनि तपस्वी धर्मपुत्र नारायण उन अप्सराओंसे मन्द-मन्द मुसकराते हुए यह मधुर वचन कहने लगे—॥ ८॥ |
| अस्मिञ्जन्मनि चार्वङ्ग्यः कृतसंकल्पवानहम्।<br>आवाभ्याञ्च न कर्तव्यः सर्वथा दारसंग्रहः॥ ९<br>तस्माद् गच्छन्तु त्रिदिवं कृपां कृत्वा ममोपरि।<br>धर्मज्ञा न प्रकुर्वन्ति व्रतभङ्गं परस्य वै॥ १० | हे सुन्दरियो! हमने इस जन्ममें संकल्प कर रखा है कि हम दोनों कभी भी विवाह नहीं करेंगे। अतः मेरे ऊपर कृपा करके आपलोग स्वर्ग लौट जायँ। धर्मज्ञ लोग दूसरेका व्रत भंग नहीं करते॥ ९-१०॥ |
| शृङ्गारेऽस्मिन् रसे नूनं स्थायीभावो रतिः स्मृतः।<br>कथं करोमि सम्बन्धं तदभावे सुलोचनाः॥ ११ | हे सुन्दर नेत्रोंवाली! इस शृंगार-रसमें रतिको ही स्थायी भाव कहा गया है। अतः [ब्रह्मचर्यव्रत धारण करनेके कारण] उसके अभावमें मैं सम्बन्ध कैसे कर सकता हूँ?॥ ११॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ] — 16 A