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देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे ग्रन्थसंख्याविषयवर्णनं नाम द्वितीयोऽध्यायः॥ २॥
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| अ० ३ ] | प्रथम स्कन्ध | ७५ |
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| संस्कृत | हिन्दी |
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| त्वं सूत भव दीर्घायुस्तापत्रयविवर्जितः।<br>कथयाद्य पुराणं हि पुण्यं भागवतं शिवम्॥ ३७<br><br>यत्र धर्मार्थकामानां वर्णनं विधिपूर्वकम्।<br>विद्यां प्राप्य तया मोक्षः कथितो मुनिना किल॥ ३८ | अतः हे सूतजी! आप चिरंजीवी हों तथा तीनों प्रकारके तापों (दैहिक, दैविक, भौतिक)-से मुक्त रहकर अब हमलोगोंको परम पवित्र तथा कल्याणकारी श्रीमद्देवी-भागवतपुराण सुनाइये; जिसमें धर्म, अर्थ और कामका विधिवत् वर्णन किया गया है। महर्षि व्यासने भी बताया है कि इसके द्वारा ज्ञान प्राप्त करके पुनः उससे मुक्ति मिलती है॥ ३७-३८॥ |
| द्वैपायनेन मुनिना कथितं यच्च पावनम्।<br>न तृप्यामो वयं सूत कथां श्रुत्वा मनोरमाम्॥ ३९ | हे सूतजी! महर्षि वेदव्यासने जिस पवित्र पुराणको कहा है, उसके मनोहर कथा-चरित्रोंको सुननेसे हमारी कभी तृप्ति नहीं होती है॥ ३९॥ |
| सकलगुणगणानामेकपात्रं पवित्र-<br>मखिलभुवनमातुर्नाट्यवद्यद्विचित्रम् ।<br>निखिलमलगणानां नाशकत्कामदं<br>प्रकटय भगवत्या नामयुक्तं पुराणम्॥ ४० | सभी गुणोंका एकमात्र स्थान, परम पवित्र, समस्त संसारकी जननी भगवतीके लीलानाट्यके समान विचित्र, सभी पापसमूहोंका नाश करनेवाले तथा सब प्रकारकी अभिलाषाओंको पूर्ण करनेवाले तथा भगवतीके नामसे समन्वित श्रीमद्देवीभागवत-महापुराणको प्रकट कीजिये॥ ४०॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे ग्रन्थसंख्याविषयवर्णनं नाम द्वितीयोऽध्यायः॥ २॥
अथ तृतीयोऽध्यायः
सूतजीद्वारा पुराणोंके नाम तथा उनकी श्लोकसंख्याका कथन, उपपुराणों तथा प्रत्येक द्वापरयुगके व्यासोंका नाम
| संस्कृत | हिन्दी |
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| सूत उवाच<br>शृण्वन्तु सम्प्रवक्ष्यामि पुराणानि मुनीश्वराः।<br>यथाश्रुतानि तत्त्वेन व्यासात्सत्यवतीसुतात्॥ १ | सूतजी बोले—हे मुनीश्वरवृन्द! सत्यवती-सुत वेद-व्यासजीसे मैंने जिस प्रकार तत्त्वपूर्वक पुराणोंको सुना है, उसे मैं आपलोगोंसे कहता हूँ, सुनिये॥ १॥ |
| मद्वयं भद्वयं चैव ब्रत्रयं वचतुष्टयम्।<br>अनापलिङ्गकूस्कानि पुराणानि पृथक्पृथक्॥ २ | उनमें दो ‘म’ वाले (मत्स्यपुराण, मार्कण्डेयपुराण), दो ‘भ’ वाले (भविष्यपुराण तथा भागवत), तीन ‘ब्र’ वाले (ब्रह्म, ब्रह्माण्ड और ब्रह्मवैवर्तपुराण), चार ‘व’ वाले (वामन, विष्णु, वायु और वाराहपुराण), ‘अ’ वाला (अग्निपुराण), ‘ना’ वाला (नारदपुराण), ‘प’ वाला (पद्मपुराण), ‘लिं’ वाला (लिंगपुराण), ‘ग’ वाला (गरुडपुराण), ‘कू’ वाला (कूर्मपुराण), ‘स्क’ वाला (स्कन्दपुराण)—ये पृथक्-पृथक् (अठारह) पुराण हैं॥ २॥ |
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| ७६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| चतुर्दशसहस्रं च मत्स्यमाद्यं प्रकीर्तितम्।<br>तथा ग्रहसहस्रं तु मार्कण्डेयं महाद्भुतम्॥ ३<br>चतुर्दशसहस्राणि तथा पञ्चशतानि च।<br>भविष्यं परिसंख्यातं मुनिभिस्तत्त्वदर्शिभिः॥ ४ | उनमें आदिके मत्स्यपुराणमें चौदह हजार, अत्यन्त अद्भुत मार्कण्डेयपुराणमें नौ हजार तथा भविष्यपुराणमें चौदह हजार पाँच सौ श्लोक-संख्या तत्त्वदर्शी मुनियोंने बतायी है॥ ३-४॥ |
| अष्टादशसहस्रं वै पुण्यं भागवतं किल।<br>तथा चायुतसंख्याकं पुराणं ब्रह्मसंज्ञकम्॥ ५<br>द्वादशैव सहस्राणि ब्रह्माण्डं च शताधिकम्।<br>तथाष्टादशसाहस्रं ब्रह्मवैवर्तमेव च॥ ६ | पवित्र भागवतपुराणमें अठारह हजार और ब्रह्म-पुराणमें दस हजार श्लोक हैं। ब्रह्माण्डपुराणमें बारह हजार एक सौ तथा ब्रह्मवैवर्तपुराणमें अठारह हजार श्लोक हैं॥ ५-६॥ |
| अयुतं वामनाख्यं च वायव्यं षट्शतानि च।<br>चतुर्विंशतिसंख्यातः सहस्राणि तु शौनक॥ ७<br>त्रयोविंशतिसाहस्रं वैष्णवं परमाद्भुतम्।<br>चतुर्विंशतिसाहस्रं वाराहं परमाद्भुतम्॥ ८<br>षोडशैव सहस्राणि पुराणं चाग्निसंज्ञितम्।<br>पञ्चविंशतिसाहस्रं नारदं परमं मतम्॥ ९ | हे शौनक! वामनपुराणमें दस हजार तथा वायुपुराणमें चौबीस हजार छः सौ श्लोक हैं। उस परम विचित्र विष्णुपुराणमें तेईस हजार, वाराहपुराणमें चौबीस हजार, अग्निपुराणमें सोलह हजार तथा नारद-पुराणमें पचीस हजार श्लोक कहे गये हैं॥ ७-९॥ |
| पञ्चपञ्चाशतसाहस्रं पाद्माख्यं विपुलं मतम्।<br>एकादशसहस्राणि लैङ्गाख्यं चातिविस्तृतम्॥ १०<br>एकोनविंशत्साहस्रं गारुडं हरिभाषितम्।<br>सप्तदशसहस्रं च पुराणं कूर्मभाषितम्॥ ११ | विशाल पद्मपुराणमें पचपन हजार और लिंगपुराणमें ग्यारह हजार श्लोक हैं। इसी प्रकार साक्षात् भगवान्के द्वारा कहे हुए गरुडपुराणमें उन्नीस हजार तथा कूर्मपुराणमें सत्रह हजार श्लोक हैं॥ १०-११॥ |
| एकाशीतिसहस्राणि स्कान्दाख्यं परमाद्भुतम्।<br>पुराणाख्या च संख्या च विस्तरेण मयानघाः॥ १२ | परम विचित्र स्कन्दपुराणमें इक्यासी हजार श्लोक कहे गये हैं। हे पापरहित मुनियो! इस प्रकार मैंने पुराणों तथा उनके श्लोकोंकी संख्या विस्तारपूर्वक बता दी॥ १२॥ |
| तथैवोपपुराणानि शृण्वन्तु ऋषिसत्तमाः।<br>सनत्कुमारं प्रथमं नारसिंहं ततः परम्॥ १३<br>नारदीयं शिवं चैव दौर्वाससमनुत्तमम्।<br>कापिलं मानवं चैव तथा चौशनसं स्मृतम्॥ १४<br>वारुणं कालिकाख्यं च साम्बं नन्दिकृतं शुभम्।<br>सौरं पाराशरप्रोक्तमादित्यं चातिविस्तरम्॥ १५<br>माहेश्वरं भागवतं वासिष्ठं च सविस्तरम्।<br>एतान्युपपुराणानि कथितानि महात्मभिः॥ १६ | हे मुनिवरो! अब उपपुराणोंकी भी संख्या सुनिये। उनमें सर्वप्रथम उपपुराण सनत्कुमार है, तत्पश्चात् नरसिंह, नारदीय, शिव, दुर्वासा, कपिल, मनु, उशना, वरुण, कालिका, साम्ब, नन्दी, सौर, पराशर, आदित्य, माहेश्वर, भागवत तथा अठारहवाँ वासिष्ठ—ये सब उपपुराण महात्माओंद्वारा बताये गये हैं॥ १३-१६॥ |
| अष्टादश पुराणानि कृत्वा सत्यवतीसुतः।<br>भारताख्यानमतुलं चक्रे तदुपबृंहितम्॥ १७ | सत्यवतीतनय वेदव्यासजीने अठारह पुराणोंकी रचना करनेके बाद उन्हीं विषयोंसे विस्तारपूर्वक उस अतुलनीय 'महाभारत' का प्रणयन किया॥ १७॥ |
| मन्वन्तरेषु सर्वेषु द्वापरे द्वापरे युगे।<br>प्रादुःकरोति धर्मार्थी पुराणानि यथाविधि॥ १८<br>द्वापरे द्वापरे विष्णुर्व्यासरूपेण सर्वदा।<br>वेदमेकं स बहुधा कुरुते हितकाम्यया॥ १९ | प्रत्येक द्वापरयुगमें भगवान् वेदव्यासजी ही धर्मरक्षार्थ पुराणोंकी यथाविधि रचना करते रहते हैं। जब-जब द्वापरयुग आता है, तब-तब साक्षात् भगवान् विष्णु ही व्यासजीके रूपमें अवतीर्ण होकर सर्वलोकहितार्थ वेदके अनेक भेदोपभेद करते हैं॥ १८-१९॥ |