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देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

अ० १५] तृतीय स्कन्ध ३२१

अ० १५] तृतीय स्कन्ध ३२१

निषादैर्लुणि्ठता तत्र गृहीतं सकलं वसु।<br>रथञ्चापि गृहीत्वा ते निर्गता दस्यवः शठाः॥ ४६<br><br>रुदती सुतमादाय चारुवस्त्रा मनोरमा।<br>निर्ययौ जाह्नवीतीरे सैरन्ध्रीकरलम्बिता॥ ४७<br><br>आरुह्य च भयाच्छीघ्रमुडुपं सा भयाकुला।<br>तीर्त्वा भागीरथीं पुण्यां ययौ त्रिकूटपर्वतम्॥ ४८वहाँके निषादोंने उसे लूट लिया तथा उसका सारा धन और रथ छीन लिया। सब कुछ लेकर वे धूर्त दस्यु चले गये। तब वह रोती हुई अपने पुत्रको लेकर सैरंध्रीके हाथका सहारा लेकर किसी प्रकार गंगाके तटपर गयी और एक छोटी-सी नौकापर डरती हुई बैठकर पवित्र गंगाको पार करके वह भयाक्रान्त मनोरमा त्रिकूटपर्वतपर पहुँच गयी॥ ४६—४८॥
भारद्वाजाश्रमं प्राप्ता त्वरया च भयाकुला।<br>संवीक्ष्य तापसांस्तत्र सञ्जाता निर्भया तदा॥ ४९<br><br>मुनिना सा ततः पृष्टा कासि कस्य परिग्रहः।<br>कष्टेनात्र कथं प्राप्ता सत्यं ब्रूहि शुचिस्मिते॥ ५०<br><br>देवी वा मानुषी वासि बालपुत्रा वने कथम्।<br>राज्यभ्रष्टेव वामोरु भासि त्वं कमलेक्षणे॥ ५१वह भयभीत मनोरमा भारद्वाजमुनिके आश्रममें शीघ्रतासे पहुँची। तब वहाँ तपस्वियोंको देखकर वह निर्भय हो गयी। तदनन्तर भारद्वाजमुनिने पूछा—हे शुचिस्मिते! तुम कौन हो, किसकी पत्नी हो? इतने कष्टसे तुम यहाँ कैसे आ गयी हो? मुझसे सत्य कहो। तुम कोई देवी हो अथवा मानवी हो। अपने इस बालक पुत्रके साथ वनमें क्यों विचरण कर रही हो? हे सुन्दरि! हे कमलनयने! तुम राज्यभ्रष्ट-जैसी प्रतीत हो रही हो॥ ४९—५१॥
एवं सा मुनिना पृष्टा नोवाच वरवर्णिनी।<br>रुदती दुःखसन्तप्ता विदल्लं च समादिशत्॥ ५२मुनिके पूछनेपर उस रूपवती रानीने कुछ भी उत्तर नहीं दिया और दुःखसे सन्तप्त होकर रोती हुई उसने अपने मन्त्री विदल्लको सारी बातें बतानेके लिये संकेत किया॥ ५२॥
विदल्लस्तमुवाचेदं ध्रुवसन्धिर्नृपोत्तमः।<br>तस्य भार्या धर्मपत्नी नाम्ना चेयं मनोरमा॥ ५३तब विदल्लने मुनिसे कहा—ध्रुवसन्धि एक श्रेष्ठ नरेश थे। ये उन्हींकी मनोरमा नामवाली धर्मपत्नी हैं॥ ५३॥
सिंहेन निहतो राजा सूर्यवंशी महाबलः।<br>पुत्रोऽयं नृपतेस्तस्य नाम्ना चैव सुदर्शनः॥ ५४सूर्यवंशमें उत्पन्न उन महाबली महाराजको सिंहने मार डाला। सुदर्शन नामका यह बालक उन्हीं राजाका पुत्र है॥ ५४॥
अस्याः पितातिधर्मात्मा दौहित्रार्थं मृतो रणे।<br>युधाजिद्द्रव्यसन्त्रस्ता सम्प्राप्ता विजने वने॥ ५५इनके अत्यन्त धर्मात्मा पिता अपने इसी दौहित्रके लिये संग्राममें मारे गये। अतएव युधाजित्के भयसे संत्रस्त होकर ये इस निर्जन वनमें आयी हुई हैं॥ ५५॥
त्वामेव शरणं प्राप्ता बालपुत्रा नृपात्मजा।<br>त्राता भव महाभाग त्वमस्या मुनिसत्तम॥ ५६हे महाभाग! हे मुनिश्रेष्ठ! अबोध पुत्रवाली ये राजपुत्री अब आपकी शरणमें आयी हैं। अतः आप इनकी रक्षा कीजिये॥ ५६॥
आर्तस्य रक्षणे पुण्यं यज्ञाधिकमुदाहृतम्।<br>भयत्रस्तस्य दीनस्य विशेषफलदं स्मृतम्॥ ५७किसी दुःखी प्राणीकी रक्षा करनेमें यज्ञ करनेसे भी अधिक पुण्य बताया गया है। भयभीत तथा दीनकी रक्षाको तो और भी अधिक फलदायक कहा गया है॥ ५७॥

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]— 11 A

३२२श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १६

| ऋषिरुवाच | **ऋषि बोले—**हे कल्याणि! तुम यहाँ भयरहित होकर निवास करो; हे सुव्रते! अपने पुत्रका पालन-पोषण करो। हे विशालनयने! यहाँ तुम्हें शत्रुओंसे उत्पन्न होनेवाला किसी प्रकारका भी भय नहीं करना चाहिये। तुम अपने इस कान्तिमान् पुत्रका पालन करो, तुम्हारा यह पुत्र आगे चलकर राजा होगा। यहाँ तुम लोगोंको कभी भी कोई दुःख तथा शोक नहीं होगा॥ ५८-५९॥ |
| निर्भया वस कल्याणि पुत्रं पालय सुव्रते।<br>न ते भयं विशालाक्षि कर्तव्यं शत्रुसम्भवम्॥ ५८<br><br>पालयस्व सुतं कान्तं राजा तेऽयं भविष्यति।<br>नात्र दुःखं तथा शोकः कदाचित्सम्भविष्यति॥ ५९ | |
| व्यास उवाच | **व्यासजी बोले—**मुनिके इस प्रकार कहनेपर महारानी मनोरमा निश्चिन्त हो गयीं और मुनिके द्वारा प्रदान की गयी एक कुटियामें वे शोकरहित होकर निवास करने लगीं॥ ६०॥ |
| इत्युक्ता मुनिना राज्ञी स्वस्था सा सम्बभूव ह।<br>उटजे मुनिना दत्ते वीतशोका तदावसत्॥ ६० | |
| सैरन्ध्रीसहिता तत्र विदल्लेन च संयुता।<br>सुदर्शनं पालयाना न्यवसत्सा मनोरमा॥ ६१ | इस प्रकार सुदर्शनका पालन-पोषण करती हुई वे मनोरमा अपनी दासी तथा मन्त्री विदल्लके साथ वहाँ रहने लगीं॥ ६१॥ |

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे मनोरमया भारद्वाजाश्रमं प्रति गमनं नाम पञ्चदशोऽध्यायः॥ १५॥


अथ षोडशोऽध्यायः

युधाजित्का भारद्वाजमुनिके आश्रमपर आना और उनसे मनोरमाको भेजनेका आग्रह करना, प्रत्युत्तरमें मुनिका 'शक्ति हो तो ले जाओ'—ऐसा कहना

| व्यास उवाच | व्यासजी बोले—[हे राजन्!] तदनन्तर महाबली युधाजित्ने रणभूमिसे अयोध्या पहुँचकर सुदर्शनको भी मार डालनेकी इच्छासे मनोरमाके विषयमें लोगोंसे पूछा॥ १॥ |
| युधाजित्त्वथ संग्रामाद् गत्वायोध्यां महाबलः।<br>मनोरमां च पप्रच्छ सुदर्शनजिघांसया॥ १ | |
| सेवकान् प्रेषयामास क्व गतेति मुहुर्वदन्।<br>शुभे दिनेऽथ दौहित्रं स्थापयामास चासने॥ २ | 'मनोरमा कहाँ चली गयी' ऐसा बार-बार कहते हुए उसने सेवकोंको इधर-उधर भेज दिया। तत्पश्चात् किसी शुभ दिनमें अपने दौहित्रको राजसिंहासनपर बैठा दिया॥ २॥ |
| मन्त्रिभिश्च वसिष्ठेन मन्त्रैराथर्वणैः शुभैः।<br>अभिषिक्तश्च सम्पूर्णैः कलशैर्जलपूरितैः॥ ३ | समस्त मन्त्रियोंके साथ गुरु वसिष्ठने अथर्ववेदके कल्याणकारी मन्त्रोंका उच्चारण करके जलपूरित समस्त कलशोंसे राजकुमार शत्रुजित्का अभिषेक किया॥ ३॥ |
| भेरीशङ्खनिनादैश्च तूर्याणां चाथ निःस्वनैः।<br>उत्सवस्तु नगर्यां वै सम्बभूव कुरुद्वह॥ ४ | हे कुरुनन्दन! उस समय शंख, भेरीके निनादों तथा तुरहियोंकी ध्वनियोंके साथ पूरे नगरमें उत्सव मनाया गया॥ ४॥ |


1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—11 B

अ० १६ ]तृतीय स्कन्ध३२३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
विप्राणां वेदपाठैश्च बन्दिनां स्तुतिभिस्तथा।<br>अयोध्या मुदितेवासीज्जयशब्दैः सुमङ्गलैः॥ ५ब्राह्मणोंके वेदपाठों, बन्दीजनोंके स्तुतिगान तथा मंगलकारी जयघोषसे अयोध्यानगरी प्रफुल्लित-सी दिखायी दे रही थी॥ ५॥
हृष्टपुष्टजनाकीर्णा स्तुतिवादित्रनिःस्वना।<br>नवे तस्मिन्महीपाले पूर्बभौ नूतनेव सा॥ ६हृष्ट-पुष्टजनोंसे भरी-पूरी और स्तुतियों तथा वाद्योंकी ध्वनिसे निनादित वह अयोध्या उस नये नरेशके अभिषिक्त होनेपर नवीन पुरीकी भाँति सुशोभित हो रही थी॥ ६॥
केचित्साधुजना ये वै चक्रुः शोकं गृहे स्थिताः।<br>सुदर्शनं विचिन्त्याद्य क्व गतोऽसौ नृपात्मजः॥ ७<br><br>मनोरमातिसाध्वी सा क्व गता सुतसंयुता।<br>पितास्या निहतः संख्ये राज्यलोभेन वैरिणा॥ ८उस नगरीमें जो कोई भी सज्जनलोग थे, उन्होंने अपने घरमें ही रहकर शोक मनाया। वे सुदर्शनके विषयमें सोचते हुए कह रहे थे कि वह राजकुमार कहाँ चला गया? महान् पतिव्रता वह मनोरमा अपने पुत्रके साथ कहाँ चली गयी? राज्यलोभी शत्रु युधाजित्ने युद्धमें उसके पिताको मार डाला॥ ७-८॥
इत्येवं चिन्त्यमानास्ते साधवः समबुद्धयः।<br>अतिष्ठन्दुःखितास्तत्र शत्रुजिद्वशवर्तिनः॥ ९ऐसा विचार करते हुए सबमें समान बुद्धि रखनेवाले वे साधुजन शत्रुजित्के अधीन होकर दुःखी मनसे रहने लगे॥ ९॥
युधाजिदपि दौहित्रं स्थापयित्वा विधानतः।<br>राज्यञ्च मन्त्रिसात्कृत्वा चलितः स्वां पुरीं प्रति॥ १०इस प्रकार युधाजित् भी विधानपूर्वक अपने दौहित्रको राजसिंहासनपर बैठाकर तथा राज्यभार मन्त्रियोंको सौंपकर अपनी नगरीको प्रस्थान कर गया॥ १०॥
श्रुत्वा सुदर्शनं तत्र मुनीनामाश्रमे स्थितम्।<br>हन्तुकामो जगामाशु चित्रकूटं स पर्वतम्॥ ११सुदर्शन मुनियोंके आश्रममें रह रहा है—ऐसा सुनकर युधाजित् उसे मार डालनेकी इच्छासे तत्काल ही चित्रकूट-पर्वतकी ओर चल पड़ा॥ ११॥
निषादाधिपतिं शूरं पुरस्कृत्य बलाभिधम्।<br>दुर्दशाख्यमगादाशु शृङ्गवेरपुराधिपम्॥ १२वह दुर्दर्श नामक शृंगवेरपुरके राजाके यहाँ पहुँचा और उस विशाल सेनासम्पन्न तथा पराक्रमी निषादराजको अगुआ बनाकर उसने शीघ्र ही आगेकी ओर प्रस्थान किया॥ १२॥
श्रुत्वा मनोरमा तत्र बभूवातिसुदुःखिता।<br>आगच्छन्तं बालपुत्रा भयार्ता सैन्यसंयुतम्॥ १३युधाजित्को सेनासहित आते हुए सुनकर अबोध सन्तानवाली वह मनोरमा भयभीत तथा अत्यन्त दुःखित हो गयी॥ १३॥
तमुवाचातिशोकार्ता मुनिं साश्रुविलोचना।<br>किं करोमि क्व गच्छामि युधाजित्समुपस्थितः॥ १४अत्यन्त शोकसन्तप्त वह मनोरमा आँखोंमें आँसू भरकर मुनि भारद्वाजसे बोली कि युधाजित् यहाँ भी आ पहुँचा; अब मैं क्या करूँ तथा कहाँ जाऊँ?॥ १४॥
पिता मे निहतोऽनेन दौहित्रो भूपतिः कृतः।<br>सुतं मे हन्तुकामोऽत्र समायाति बलान्वितः॥ १५इसने मेरे पिताका वध कर दिया तथा अपने दौहित्रको राजा बना दिया। अब वह विशाल सेनाके साथ मेरे पुत्रके वधकी कामनासे यहाँ आ रहा है॥ १५॥

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—11 C

३२४श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १६

| पुरा श्रुतं मया स्वामिन् पाण्डवा वै वने स्थिताः।<br>मुनीनामाश्रमे पुण्ये पाञ्चाल्या सहितास्तदा ॥ १६<br>गतास्ते मृगयां पार्था भ्रातरः पञ्च एव ते।<br>द्रौपदी संस्थिता तत्र मुनीनामाश्रमे शुभे ॥ १७ | हे स्वामिन्! मैंने सुना है कि पूर्वकालमें जब मुनियोंके पवित्र आश्रममें द्रौपदीके साथ पाण्डव निवास कर रहे थे, उसी समय एक दिन वे पाँचों भाई आखेटके लिये चले गये और द्रौपदी वहींपर मुनियोंके उस पावन आश्रममें रह गयी थी॥ १६-१७॥ |
| धौम्योऽत्रिर्गालवः पैलो जाबालिगौतमो भृगुः।<br>च्यवनश्चात्रिगोत्रश्च कण्वश्चैव जतुः क्रतुः ॥ १८<br>वीतिहोत्रः सुमन्तुश्च यज्ञदत्तोऽथ वत्सलः।<br>राशासनः कहोडश्च यवक्रीर्यज्ञकृत्क्रतुः ॥ १९<br>एते चान्ये च मुनयो भारद्वाजादयः शुभाः।<br>वेदपाठयुताः सर्वे संस्थिताश्चाश्रमे स्थिताः॥ २० | धौम्य, अत्रि, गालव, पैल, जाबालि, गौतम, भृगु, च्यवन, अत्रिगोत्रज कण्व, जतु, क्रतु, वीतिहोत्र, सुमन्तु, यज्ञदत्त, वत्सल, राशासन, कहोड, यवक्री, यज्ञकृत् क्रतु—ये सब और भारद्वाज आदि अन्य पुण्यात्मा मुनिगण उस पावन आश्रममें विराजमान थे। वे सभी वेदपाठ कर रहे थे॥ १८-२०॥ |
| दासीभिः सहिता तत्र याज्ञसेनी स्थिता मुने।<br>आश्रमे चारुसर्वाङ्गी निर्भया मुनिसंवृते ॥ २१ | हे मुने! मुनि-समुदायसे सम्पन्न उस आश्रममें सर्वाङ्गसुन्दरी वह द्रौपदी अपनी दासियोंके साथ निर्भय होकर रहती थी॥ २१॥ |
| पार्था मृगानुगास्तावत्प्रयाताश्च वनाद्वनम्।<br>धनुर्बाणधरा वीराः पञ्च वै शत्रुतापनाः ॥ २२ | शत्रुओंको सन्ताप पहुँचानेमें समर्थ तथा धनुष-बाण धारण किये वे पाँचों पाण्डव मृगका पीछा करते हुए एक वनसे दूसरे वनमें निकल गये॥ २२॥ |
| तावत्सिन्धुपतिः श्रीमान्मार्गस्थो बलसंयुतः।<br>आगतश्चाश्रमाभ्याशे श्रुत्वा तु निगमध्वनिम् ॥ २३ | इसी बीच समृद्धिशाली सिन्धुनरेश [जयद्रथ] वेद-ध्वनि सुनकर अपनी सेनाके साथ आश्रमके पास आ गया॥ २३॥ |
| श्रुत्वा वेदध्वनिं राजा मुनीनां भावितात्मनाम्।<br>उत्ततार रथात्तूर्णं दर्शनाकाङ्क्षया नृपः ॥ २४ | वेदपाठ सुनकर राजा जयद्रथ पुण्यात्मा मुनियोंके दर्शनकी इच्छासे शीघ्रतापूर्वक रथसे उतरा॥ २४॥ |
| यदा निरगमत्तत्र भृत्यद्वयसमन्वितः।<br>वेदपाठयुतान्वीक्ष्य मुनीनुद्यमसंस्थितः॥ २५<br>कृताञ्जलिपुटः स्वामिन्संस्थितोऽथ जयद्रथः।<br>आश्रमे मुनिभिर्जुष्टे भूपतिः संविवेश ह॥ २६ | जब वह अपने दो भृत्योंके साथ आगे बढ़ा तो मुनियोंको वेदपाठमें संलग्न देखकर वहींपर बैठ गया। हे स्वामिन्! राजा जयद्रथ हाथ जोड़कर कुछ देरतक बैठा रहा। इसके बाद वह मुनियोंसे भरे हुए उस आश्रममें प्रविष्ट हुआ॥ २५-२६॥ |
| तत्रोपविष्टं राजानं द्रष्टुकामाः स्त्रियस्तदा।<br>आययुर्मुनिभार्याश्च कोऽयमित्यब्रुवन्नृपम् ॥ २७ | तत्पश्चात् मुनियोंकी पत्नियाँ तथा अन्य स्त्रियाँ वहाँ बैठे हुए राजा जयद्रथको देखनेकी इच्छासे वहाँ आ गयीं और लोगोंसे पूछने लगीं—यह कौन है?॥ २७॥ |
| तासां मध्ये वरारोहा याज्ञसेनी समागता।<br>जयद्रथेन दृष्टा सा रूपेण श्रीरिवापरा॥ २८ | उन्हीं स्त्रियोंके साथ परम सुन्दरी द्रौपदी भी आयी थी। जयद्रथकी दृष्टि दूसरी लक्ष्मीके समान प्रतीत हो रही उस द्रौपदीपर पड़ गयी॥ २८॥ |
| तां विलोक्यासितापाङ्गीं देवकन्यामिवापराम्।<br>पप्रच्छ नृपतिर्धौम्यं केयं श्यामा वरानना॥ २९ | दूसरी देवकन्याकी भाँति प्रतीत हो रही उस श्याम नेत्रोंवाली द्रौपदीको देखकर राजा जयद्रथने ऋषि धौम्यसे पूछा कि यह सुन्दर मुखवाली युवती कौन है?॥ २९॥ |

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ] — 11 D

अ० १६ ]तृतीय स्कन्ध३२५

| भार्या कस्य सुता कस्य नाम्ना का वरवर्णिनी।<br>रूपलावण्यसंयुक्ता शचीव वसुधाङ्गता॥ ३० | यह किसकी पत्नी है, किसकी पुत्री है और इस परम सुन्दरीका नाम क्या है? रूप तथा सौन्दर्यसे सम्पन्न यह स्त्री तो धरापर उतरकर आयी हुई साक्षात् इन्द्राणीकी भाँति प्रतीत हो रही है॥ ३०॥ |
| बर्बूलवनमध्यस्था लवङ्गलतिका यथा।<br>राक्षसीवृन्दगा नूनं रम्भेवाभाति भामिनी॥ ३१ | यह स्त्री बबूलके वनमें स्थित लवंगलता तथा [कुरूपा] राक्षसियोंके समूहमें सचमुच रम्भाके समान प्रतीत हो रही है॥ ३१॥ |
| सत्यं वद महाभाग कस्येयं वल्लभाबला।<br>राजपत्नीव चाभाति नैषा मुनिवधूर्द्विज॥ ३२ | हे महाभाग! आप सच-सच बताइये कि यह स्त्री किसकी पत्नी है? हे द्विज! यह तो किसी रानी-जैसी प्रतीत हो रही है; मुनिपत्नी तो यह कदापि नहीं हो सकती॥ ३२॥ |
| धौम्य उवाच<br>पाण्डवानां प्रिया भार्या द्रौपदी शुभलक्षणा।<br>पाञ्चाली सिन्धुराजेन्द्र वसत्यत्र वराश्रमे॥ ३३ | धौम्य बोले—हे सिन्धुराजेन्द्र! समस्त शुभ लक्षणोंवाली यह पाण्डवोंकी प्रिय भार्या तथा पांचालनरेशकी पुत्री द्रौपदी है। यह इसी पवित्र आश्रममें निवास करती है॥ ३३॥ |
| जयद्रथ उवाच<br>क्व गताः पाण्डवाः पञ्च शूराः सम्प्रति विश्रुताः।<br>वसन्त्यत्र वने वीरा वीतशोका महाबलाः॥ ३४ | जयद्रथ बोला—विख्यात पराक्रमी पाँचों पाण्डव कहाँ गये हुए हैं? क्या वे महान् बलशाली वीर निश्चिन्त होकर इस समय इसी वनमें रह रहे हैं?॥ ३४॥ |
| धौम्य उवाच<br>मृगयार्थं गताः पञ्च पाण्डवा रथसंस्थिताः।<br>आगमिष्यन्ति मध्याह्ने मृगानादाय पार्थिवाः॥ ३५ | धौम्य बोले—पाँचों पाण्डव इस समय रथपर आरूढ़ होकर आखेटके लिये वनमें गये हुए हैं। वे राजागण मध्याह्नकालमें मृगोंको लेकर आ जायँगे॥ ३५॥ |
| तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य उदतिष्ठदसौ नृपः।<br>द्रौपदीसन्निधौ गत्वा प्रणम्येदमुवाच ह॥ ३६<br><br>कुशलं ते वरारोहे क्व गताः पतयश्च ते।<br>एकादश गतान्यद्य वर्षाणि च वने किल॥ ३७ | मुनिका यह वचन सुनकर वह राजा जयद्रथ अपने आसनसे उठा और द्रौपदीके पास जाकर उन्हें प्रणाम करके इस प्रकार बोला—हे परम सुन्दरि! आप सकुशल तो हैं न, आपके पतिगण कहाँ गये हुए हैं? आपको वनमें निवास करते हुए आज ग्यारह वर्ष बीत चुके हैं॥ ३६-३७॥ |
| द्रौपदी तु तदोवाच स्वस्ति तेऽस्तु नृपात्मज।<br>विश्रमस्वाश्रमाभ्याशे क्षणादायान्ति पाण्डवाः॥ ३८ | तत्पश्चात् द्रौपदीने कहा—हे राजकुमार! आपका कल्याण हो। अभी थोड़ी ही देरमें पाण्डव आ जायँगे, तबतक आप आश्रमके समीप ही विश्राम कीजिये॥ ३८॥ |
| एवं ब्रुवन्त्यां तस्यां तु लोभाविष्टः स भूपतिः।<br>जहार द्रौपदीं वीरोऽनादृत्य मुनिसत्तमान्॥ ३९ | उसके ऐसा कहनेपर लोभसे आक्रान्त उस वीर जयद्रथने मुनिवरोंकी अवहेलना करके द्रौपदीका हरण कर लिया॥ ३९॥ |