देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
५८८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० ११
५८८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० ११
| संस्कृत मूल (श्लोक) | हिन्दी अनुवाद |
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| व्यंग्याधिक्येन वाक्येन वरयत्युत्तमा नृप॥ २७<br><br>तद्वै विचारतो ज्ञेयं रसग्रन्थविचक्षणैः।<br>इति ज्ञात्वा महाराज कर्तव्यं रससंयुतम्॥ २८<br><br>सामदानद्वयं तस्या नान्योपायोऽस्ति भूपते।<br>रुष्टा वा गर्विता वापि वशगा मानिनी भवेत्॥ २९<br><br>तादृशैर्मधुरैर्वाक्यैरानयिष्ये तवान्तिकम्।<br>किं बहूक्तेन मे राजन् कर्तव्या वशवर्तिनी॥ ३०<br><br>गत्वा मयाधुनैवेयं किङ्करीव सदैव ते। | हे राजन्! व्यंग्यभरे इस कथनके द्वारा वह सुन्दरी आपको पतिके रूपमें वरण करना चाहती है। रसशास्त्रके विद्वानोंको विचारपूर्वक इस कथनका अभिप्राय भलीभाँति जान लेना चाहिये। हे महाराज! ऐसा जानकर आपको उसके प्रति रसमय व्यवहार करना चाहिये। हे राजन्! साम (प्रिय वचन) और दान (प्रलोभन आदि)—ये ही दो उपाय उसे वशमें करनेके हैं, इनके अतिरिक्त कोई दूसरा उपाय नहीं है। रुष्ट अथवा मदगर्वित कोई भी मानिनी स्त्री इन उपायोंसे वशवर्तिनी हो जाती है। उसी प्रकारके मधुर वचनोंसे प्रसन्न करके मैं उसे आपके पास ले आऊँगा। हे राजन्! बहुत कहनेसे क्या लाभ! अभी वहाँ जाकर मैं उस स्त्रीको एक दासीकी भाँति सदाके लिये आपके वशमें कर दूँगा॥ २७—३० १/२॥ |
| व्यास उवाच<br>इत्थं निशम्य तद्वाक्यं ताम्रस्तत्त्वविचक्षणः॥ ३१<br><br>उवाच वचनं राजन्निशामय मयोदितम्।<br>हेतुमद्धर्मसहितं रसयुक्तं नयान्वितम्॥ ३२ | **व्यासजी बोले—**दुर्धरकी यह बात सुनकर तत्त्वविद् ताम्र बोला—हे राजन्! अब आप मेरेद्वारा कही गयी बात सुनिये जो तर्कयुक्त, धर्मसे ओतप्रोत, रसमय तथा नीतिसे भरी हुई है॥ ३१-३२॥ |
| नैषा कामातुरा बाला नानुरक्ता विचक्षणा।<br>व्यंग्यानि नैव वाक्यानि तयोक्तानि तु मानद॥ ३३ | हे मानद! यह बुद्धिसम्पन्न स्त्री न कामातुर है, न आपपर आसक्त है और न तो उसने व्यंग्यपूर्ण बातें ही कही हैं॥ ३३॥ |
| चित्रमत्र महाबाहो यदेका वरवर्णिनी।<br>निरालम्बा समायाति चित्ररूपा मनोहरा॥ ३४<br><br>अष्टादशभुजा नारी न श्रुता न च वीक्षिता।<br>केनापि त्रिषु लोकेषु पराक्रमवती शुभा॥ ३५<br><br>आयुधान्यपि तावन्ति धृतानि बलवन्ति च।<br>विपरीतमिदं मन्ये सर्वं कालकृतं नृप॥ ३६ | हे महाबाहो! यह तो महान् आश्चर्य है कि एक अत्यधिक रूपवती और मनोहर स्त्री बिना किसीका आश्रय लिये अकेली ही युद्धहेतु आयी हुई है। अठारह भुजाओंसे सम्पन्न ऐसी पराक्रमशालिनी तथा सुन्दर स्त्री किसीके भी द्वारा तीनों लोकोंमें न तो देखी गयी और न तो सुनी ही गयी। उसने अनेक प्रकारके सुदृढ़ आयुध धारण कर रखे हैं। हे राजन्! इससे मैं तो यह मानता हूँ कि समयने सब कुछ हमारे विपरीत कर दिया है॥ ३४—३६॥ |
| स्वप्नानि दुर्निमित्तानि मया दृष्टानि वै निशि।<br>तेन जानाम्यहं नूनं वैशसं समुपागतम्॥ ३७ | मैंने रातमें अपशकुनसूचक अनेक स्वप्न देखे हैं, इससे मैं तो यह समझता हूँ कि अब निश्चय ही हमारा विनाश आ चुका है॥ ३७॥ |
| कृष्णाम्बरधरा नारी रुदती च गृहाङ्गणे।<br>दृष्टा स्वप्नेऽप्युषःकाले चिन्तितव्यस्तदत्ययः॥ ३८ | मैंने आज ही उषाकालमें स्वप्न देखा कि काले वस्त्र धारण किये एक स्त्री घरके आँगनमें रुदन कर रही है। यह विनाशसूचक स्वप्न विचारणीय है॥ ३८॥ |
| अ० ११ ] | पञ्चम स्कन्ध | ५८९ |
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| विकृताः पक्षिणो रात्रौ रोरुवन्ति गृहे गृहे।<br>उत्पाता विविधा राजन् प्रभवन्ति गृहे गृहे॥ ३९<br><br>तेन जानाम्यहं नूनं कारणं किञ्चिदेव हि।<br>यत्त्वां प्रार्थयते बाला युद्धाय कृतनिश्चया॥ ४० | हे राजन्! आजकल घर-घरमें भयानक पक्षी रोया करते हैं और घर-घरमें विविध प्रकारके उपद्रव होते रहते हैं। इससे मैं तो यह समझता हूँ कि इसमें निश्चितरूपसे कुछ और ही कारण है, तभी तो युद्धके लिये कृतसंकल्प यह स्त्री आपको ललकार रही है॥ ३९-४०॥ | |
| नैषास्ति मानुषी नो वा गान्धर्वी न तथासुरी।<br>देवैः कृतेयं ज्ञातव्या माया मोहकरी विभो॥ ४१ | हे राजन्! यह न तो मानुषी, न गान्धर्वी और न आसुरी ही है; अपितु इसे देवताओंकी रची हुई मोहकरी माया समझना चाहिये॥ ४१॥ | |
| कातरत्वं न कर्तव्यं ममैतन्मतमित्यलम्।<br>कर्तव्यं सर्वथा युद्धं यद्भाव्यं तद्भविष्यति॥ ४२<br><br>को वेद दैवकर्तव्यं शुभं वाप्यशुभं तथा।<br>अवलम्ब्य धिया धैर्यं स्थातव्यं वै विचक्षणैः॥ ४३ | अतः मेरा यह दृढ़ मत है कि इस समय कायरता नहीं प्रदर्शित करनी चाहिये, अपितु हर तरहसे युद्ध करना चाहिये; जो होना होगा वह होगा। भविष्यमें विधाताके द्वारा किये जानेवाले शुभ या अशुभके बारेमें कौन जानता है? अतः विद्वान् पुरुषोंको चाहिये कि बुद्धिपूर्वक धैर्य धारण करके समयकी प्रतीक्षा करें॥ ४२-४३॥ | |
| जीवितं मरणं पुंसां दैवाधीनं नराधिप।<br>कोऽपि नैवान्यथा कर्तुं समर्थो भुवनत्रये॥ ४४ | हे नरेश! प्राणियोंका जन्म तथा मरण दैवके अधीन है। तीनों लोकोंमें कोई भी व्यक्ति इसके विपरीत कुछ भी करनेमें समर्थ नहीं है॥ ४४॥ | |
| महिष उवाच<br>गच्छ ताम्र महाभाग युद्धाय कृतनिश्चयः।<br>तामानय वरारोहां जित्वा धर्मेण मानिनीम्॥ ४५ | महिष बोला—हे महाभाग! हे ताम्र! युद्धके लिये दृढ़ निश्चय करके तुम जाओ और धर्मपूर्वक उस मानिनी स्त्रीको जीतकर यहाँ ले आओ॥ ४५॥ | |
| न भवेद्वशगा नारी संग्रामे यदि सा तव।<br>हन्तव्या नान्यथा कामं माननीया प्रयत्नतः॥ ४६ | यदि संग्राममें वह स्त्री तुम्हारे अधीन न हो सके, तब तुम उसे मार डालना; नहीं तो जहाँतक सम्भव हो, प्रयत्नपूर्वक उसका सम्मान करना॥ ४६॥ | |
| वीरस्त्वमसि सर्वज्ञ कामशास्त्रविशारदः।<br>येन केनाप्युपायेन जेतव्या वरवर्णिनी॥ ४७ | हे सर्वज्ञ! तुम पराक्रमी तथा कामशास्त्रके पूर्ण विद्वान् हो, अतः किसी भी युक्तिसे उस सुन्दरीपर विजय प्राप्त करना॥ ४७॥ | |
| त्वरन्वीर महाबाहो सैन्येन महता वृतः।<br>तत्र गत्वा त्वया ज्ञेया विचार्य च पुनः पुनः॥ ४८<br><br>किमर्थमागता चेयं ज्ञातव्यं तद्धि कारणम्।<br>कामाद्वा वैरभावाच्च माया कस्येयमित्युत॥ ४९ | हे वीर! हे महाबाहो! विशाल सेनाके साथ तुम वहाँ शीघ्रतापूर्वक जाओ और वहाँ पहुँचकर बार-बार चिन्तन-मनन करके इसका पता लगाओ कि यह किसलिये आयी हुई है? तुम यह भी ज्ञात करना कि वह कामभाव अथवा वैरभाव—किस भावसे आयी है और वह किसकी माया है?॥ ४८-४९॥ | |
| आदौ तन्निश्चयं कृत्वा ज्ञातव्यं तच्चिकीर्षितम्।<br>पश्चाद्युद्धं प्रकर्तव्यं यथायोग्यं यथाबलम्॥ ५० | आरम्भमें इन बातोंकी जानकारी कर लेनेपर तुम यह पता करना कि वह क्या करना चाहती है? तत्पश्चात् उसकी सबलता तथा निर्बलताको भलीभाँति समझकर ही उसके साथ तुम युद्ध करना॥ ५०॥ |
| ५९० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ११ ] |
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| कातरत्वं न कर्तव्यं निर्दयत्वं तथा न च।<br>यादृशं हि मनस्तस्याः कर्तव्यं तादृशं त्वया॥ ५१ | तुम उसके समक्ष न तो कायरता प्रदर्शित करना और न बिलकुल निर्दयताका ही व्यवहार करना। उसकी जैसी मनोदशा देखना, उसीके अनुसार उससे बर्ताव करना॥ ५१॥ |
| व्यास उवाच<br>इति तद्भाषितं श्रुत्वा ताम्रः कालवशं गतः।<br>निर्गतः सैन्यसंयुक्तः प्रणम्य महिषं नृपम्॥ ५२<br><br>गच्छन्मार्गे दुरात्मासौ शकुनान्वीक्ष्य दारुणान्।<br>विस्मयञ्च भयं प्राप यममार्गप्रदर्शकान्॥ ५३ | व्यासजी बोले— महिषासुरकी यह बात सुनकर कालके वशीभूत वह ताम्र राजा महिषको प्रणाम करके सेनाके साथ चल पड़ा। चलते समय मार्गमें यमका द्वार दिखलानेवाले अत्यन्त भयानक अपशकुनोंको देख-देखकर वह बहुत विस्मित तथा भयभीत होता था॥ ५२-५३॥ |
| स गत्वा तां समालोक्य देवीं सिंहोपरिस्थिताम्।<br>स्तूयमानां सुरैः सर्वैः सर्वायुधविभूषिताम्॥ ५४<br><br>तामुवाच विनीतः सन् वाक्यं मधुरया गिरा।<br>सामभावं समाश्रित्य विनयावनतः स्थितः॥ ५५<br><br>देवि दैत्येश्वरः शृङ्गी त्वद्रूपगुणमोहितः।<br>स्पृहां करोति महिषस्त्वत्पाणिग्रहणाय च॥ ५६ | देवीके समीप पहुँचकर उसने देखा कि वे सिंहपर सवार हैं, वे विविध प्रकारके आयुधोंसे विभूषित हैं तथा सभी देवता उनकी स्तुति कर रहे हैं। तदनन्तर उस ताम्रने विनम्र भावसे खड़े होकर सामनीतिका आश्रय लेकर मधुर वाणीमें शान्तिपूर्वक देवीसे यह वचन कहा—हे देवि! दैत्योंके अधिपति तथा विशाल सींगोंवाले राजा महिष आपके रूप तथा गुणपर मोहित होकर आपसे विवाह करनेकी अभिलाषा रखते हैं॥ ५४—५६॥ |
| भावं कुरु विशालाक्षि तस्मिन्नमरदुर्जये।<br>पतिं तं प्राप्य मृद्वङ्गि नन्दने विहराद्भुते॥ ५७ | विशाल नयनों तथा सुकुमार अंगोंवाली हे सुन्दरि! देवताओंके लिये भी अजेय उन महिषसे आप प्रेम कीजिये और उन्हें पतिरूपमें प्राप्त करके अद्भुत नन्दनवनमें विहार कीजिये॥ ५७॥ |
| सर्वाङ्गसुन्दरं देहं प्राप्य सर्वसुखास्पदम्।<br>सुखं सर्वात्मना ग्राह्यं दुःखं हेयमिति स्थितिः॥ ५८ | सभी प्रकारके सुखोंके निधानस्वरूप इस सर्वांगसुन्दर शरीरको प्राप्त करके हर तरह सुख भोगना चाहिये और दुःखका तिरस्कार करना चाहिये, यही बात सर्वमान्य है॥ ५८॥ |
| करभोरु किमर्थं ते गृहीतान्यायुधान्यलम्।<br>पुष्पकन्दुकयोग्यास्ते कराः कमलकोमलाः॥ ५९ | हे करभोरु! आपने अपने हाथोंमें ये आयुध किसलिये धारण कर रखे हैं? कमलके समान कोमल आपके ये हाथ तो पुष्पोंके गेंद धारण करनेयोग्य हैं॥ ५९॥ |
| भ्रूचापे विद्यमानेऽपि धनुषा किं प्रयोजनम्।<br>कटाक्षा विशिखाः सन्ति किं बाणैर्निष्प्रयोजनैः॥ ६० | भौंहरूपी धनुषके रहते आपको यह धनुष धारण करनेसे क्या प्रयोजन है और जब आपके पास ये कटाक्षरूपी बाण हैं तो फिर व्यर्थ बाणोंको धारण करनेसे क्या लाभ?॥ ६०॥ |
| संसारे दुःखदं युद्धं न कर्तव्यं विजानता।<br>लोभासक्ताः प्रकुर्वन्ति संग्रामञ्च परस्परम्॥ ६१ | इस संसारमें युद्ध दुःखदायी होता है, अतः ज्ञानीजनको युद्ध नहीं करना चाहिये। राज्य तथा धनके लोलुप लोग ही परस्पर युद्ध करते हैं॥ ६१॥ |
| अ० १२ ] | पञ्चम स्कन्ध | ५९१ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| पुष्पैरपि न योद्धव्यं किं पुनर्विशिखैः शरैः।<br>भेदनं निजगात्राणां कस्य तज्जायते मुदे॥ ६२<br><br>तस्मात्त्वमपि तन्वङ्गि प्रसादं कर्तुमर्हसि।<br>भर्तारं भज मे नाथं देवदानवपूजितम्॥ ६३ | पुष्पोंसे भी युद्ध नहीं करना चाहिये, फिर तीक्ष्ण बाणोंसे युद्धकी बात ही क्या? अपने अंगोंका छिद जाना भला किसकी प्रसन्नताका कारण बन सकता है? अतएव हे तन्वंगि! आप कृपा करें और देवताओं तथा दानवोंके द्वारा पूजित मेरे स्वामी महिषको पतिके रूपमें स्वीकार कर लें॥ ६२-६३॥ |
| स तेऽत्र वाञ्छितं सर्वं करिष्यति मनोरथम्।<br>त्वं पट्टमहिषी राज्ञः सर्वथा नात्र संशयः॥ ६४ | वे आपके सभी वांछित मनोरथ पूर्ण कर देंगे और उन्हें पतिरूपमें पाकर आप सदाके लिये उनकी पटरानी बन जायँगी; इसमें सन्देह नहीं है॥ ६४॥ |
| वचनं कुरु मे देवि प्राप्स्यसे सुखमुत्तमम्।<br>संग्रामे जयसन्देहः कष्टं प्राप्य न संशयः॥ ६५ | हे देवि! आप मेरी बात मान लें, इससे आपको उत्तम सुख मिलेगा। कष्ट पाकर भी संग्राममें विजयका सन्देह बना रहता है, इसमें संशय नहीं है॥ ६५॥ |
| जानासि राजनीतिं त्वं यथावद्वरवर्णिनि।<br>भुंक्ष्व राज्यसुखं पूर्णं वर्षाणामयुतायुतम्॥ ६६ | हे सुन्दरि! आप राजनीति भलीभाँति जानती हैं, अतः हजारों-हजारों वर्षोंतक राज्यसुखका भोग करें॥ ६६॥ |
| पुत्रस्ते भविता कान्तः सोऽपि राजा भविष्यति।<br>यौवने क्रीडयित्वान्ते वार्धक्ये सुखमाप्स्यसि॥ ६७ | आपको तेजस्वी पुत्र प्राप्त होगा; वह भी राजा बनेगा। इस प्रकार आप युवावस्थामें क्रीड़ासुख प्राप्त करके वृद्धावस्थामें आनन्द प्राप्त करेंगी॥ ६७॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे ताम्रकृतं देवीं प्रति विस्रंसनवचनवर्णनं नामैकादशोऽध्यायः॥ ११॥
अथ द्वादशोऽध्यायः
देवीके अट्टहाससे भयभीत होकर ताम्रका महिषासुरके पास भाग आना, महिषासुरका अपने मन्त्रियोंके साथ पुनः विचार-विमर्श तथा दुर्धर, दुर्मुख और बाष्कलकी गर्वोक्ति
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| व्यास उवाच<br>तन्निशम्य वचस्तस्य ताम्रस्य जगदम्बिका।<br>मेघगम्भीरया वाचा हसन्ती तमुवाच ह॥ १ | **व्यासजी बोले—**उस ताम्रकी वह बात सुनकर भगवती जगदम्बिका मेघके समान गम्भीर वाणीमें उससे हँसते हुए कहने लगीं॥ १॥ |
| देव्युवाच<br>गच्छ ताम्र पतिं ब्रूहि मुमूर्षुं मन्दचेतसम्।<br>महिषं चातिकामार्तं मूढं ज्ञानविवर्जितम्॥ २<br><br>यथा ते महिषी माता प्रौढा यवसभक्षिणी।<br>नाहं तथा शृङ्गवती लम्बपुच्छा महोदरी॥ ३ | **देवी बोलीं—**हे ताम्र! तुम अपने स्वामी महिषके पास जाओ और मरनेको उद्यत, मन्दबुद्धि, अति कामातुर तथा ज्ञानशून्य उस मूर्खसे कहो कि जिस प्रकार तुम्हारी माता महिषी घास खानेवाली, प्रौढा, विशाल सींगोंवाली, लम्बी पूँछवाली तथा महान् उदरवाली है; वैसी मैं नहीं हूँ॥ २-३॥ |
| न कामयेऽहं देवेशं नैव विष्णुं न शङ्करम्।<br>धनदं वरुणं नैव ब्रह्माणं न च पावकम्॥ ४ | मैं न देवराज इन्द्रको, न विष्णुको, न शिवको, न कुबेरको, न वरुणको, न ब्रह्माको और न तो |
| ५९२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १२ |
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| एतान्देवगणान्हित्वा पशुं केन गुणेन वै।<br>वृणोम्यहं वृथा लोके गर्हणा मे भवेदिति॥ ५ | अग्निदेवको ही चाहती हूँ। जब मैंने इन देवताओंकी उपेक्षा कर दी, तब भला मैं एक पशुका उसके किस गुणसे प्रसन्न होकर वरण करूँगी; इससे तो संसारमें मेरी निन्दा ही होगी!॥ ४-५॥ |
| नाहं पतिंवरा नारी वर्तते मे पतिः प्रभुः।<br>सर्वकर्ता सर्वसाक्षी ह्यकर्ता निःस्पृहः स्थिरः॥ ६<br><br>निर्गुणो निर्ममोऽनन्तो निरालम्बो निराश्रयः।<br>सर्वज्ञः सर्वगः साक्षी पूर्णः पूर्णाशयः शिवः॥ ७<br><br>सर्वावासक्षमः शान्तः सर्वदृक्सर्वभावनः।<br>तं त्यक्त्वा महिषं मन्दं कथं सेवितुमुत्सहे॥ ८ | मैं पतिका वरण करनेवाली साधारण स्त्री नहीं हूँ। मेरे पति तो साक्षात् प्रभु हैं। वे सब कुछ करनेवाले, सबके साक्षी, कुछ भी न करनेवाले, इच्छारहित, सदा रहनेवाले, निर्गुण, मोहरहित, अनन्त, निरालम्ब, आश्रयरहित, सर्वज्ञ, सर्वव्यापी, साक्षी, पूर्ण, पूर्ण आशयवाले, कल्याणकारी, सबको आश्रय देनेमें समर्थ, शान्त, सबको देखनेवाले तथा सबकी भावनाओंको जाननेवाले हैं। उन प्रभुको छोड़कर मैं मूर्ख महिषको अपना पति क्यों बनाना चाहूँगी?॥ ६-८॥ |
| प्रबुध्य युध्यतां कामं करोमि यमवाहनम्।<br>अथवा मनुजानां वै करिष्ये जलवाहकम्॥ ९ | [उससे कह देना—] अब तुम उठकर युद्ध करो। मैं तुम्हें या तो यमका वाहन बना दूँगी अथवा मनुष्योंके लिये पानी ढोनेवाला महिष बना दूँगी॥ ९॥ |
| जीवितेच्छास्ति चेत्याप गच्छ पातालमाशु वै।<br>समस्तैर्दानवैर्युक्तस्त्वन्यथा हन्मि सङ्गरे॥ १० | अरे पापी! यदि जीवित रहनेकी तुम्हारी इच्छा हो तो शीघ्र ही समस्त दानवोंको साथ लेकर पाताललोक चले जाओ, अन्यथा मैं युद्धमें मार डालूँगी॥ १०॥ |
| कामं सदृशयोर्र्योगः संसारे सुखदो भवेत्।<br>अन्यथा दुःखदो भूयादज्ञानाद्यदि कल्पितः॥ ११ | इस संसारमें समान कुल तथा आचारवालोंका परस्पर सम्बन्ध सुखदायक होता है, इसके विपरीत बिना सोचे-समझे यदि सम्बन्ध हो जाता है, तो वह बड़ा दुःखदायी होता है॥ ११॥ |
| मूर्खस्त्वमसि यद् ब्रूषे पतिं मे भज भामिनि।<br>क्वाहं क्व महिषः शृङ्गी सम्बन्धः कीदृशो द्वयोः॥ १२ | [अरे महिष!] तुम मूर्ख हो जो यह कहते हो कि 'हे भामिनि! मुझे पतिरूपमें स्वीकार कर लो।' कहाँ मैं और कहाँ तुम सींग धारण करनेवाले महिष! हम दोनोंका यह कैसा सम्बन्ध! अतः अब तुम |
| गच्छ युध्यस्व वा कामं हनिष्येऽहं सबान्धवम्।<br>यज्ञभागं देवलोकं नोचेत्त्यक्त्वा सुखी भव॥ १३ | [पाताललोक] चले जाओ अथवा मुझसे युद्ध करो, मैं तुम्हें बन्धु-बान्धवोंसहित निश्चय ही मार डालूँगी, नहीं तो देवताओंका यज्ञभाग दे दो और देवलोक छोड़कर सुखी हो जाओ॥ १२-१३॥ |
| व्यास उवाच<br>इत्युक्त्वा सा तदा देवी जगर्ज भृशमद्भुतम्।<br>कल्पान्तसदृशं नादं चक्रे दैत्यभयावहम्॥ १४ | व्यासजी बोले—ऐसा कहकर देवीने बड़े जोरसे अद्भुत गर्जन किया। वह गर्जन प्रलयकालीन भीषण ध्वनिके समान तथा दैत्योंको भयभीत कर देनेवाला था। उस नादसे पृथ्वी काँप उठी और पर्वत डगमगाने |
| चकम्पे वसुधा चेलुस्तेन शब्देन भूधराः।<br>गर्भाश्च दैत्यपत्नीनां सस्रंसुर्गर्जितस्वनात्॥ १५ | लगे तथा दैत्योंकी पत्नियोंके गर्भ गिर गये॥ १४-१५॥ |
| अ० १२ ] | पञ्चम स्कन्ध | ५९३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| ताम्रः श्रुत्वा च तं शब्दं भयत्रस्तमनास्तदा।<br>पलायनं ततः कृत्वा जगाम महिषान्तिकम्॥ १६ | उस शब्दको सुनकर ताम्रके मनमें भय व्याप्त हो गया और तब वह वहाँसे भागकर महिषासुरके पास जा पहुँचा॥ १६॥ |
| नगरे तस्य ये दैत्यास्तेऽपि चिन्तामवाप्नुवन्।<br>बधिरीकृतकर्णाश्च पलायनपरा नृप॥ १७ | हे राजन्! उसके नगरमें जो भी दैत्य थे, वे सब बड़े चिन्तित हुए। वे उस ध्वनिके प्रभावसे बधिर हो गये और वहाँसे भागने लगे॥ १७॥ |
| तदा क्रोधेन सिंहोऽपि ननाद भृशमुत्सटः।<br>तेन नादेन दैतेया भयं जग्मुरपि स्फुटम्॥ १८ | उसी समय देवीका सिंह भी क्रोधपूर्वक अपने अयालों (गर्दनके बालों)-को फैलाकर बड़े जोरसे दहाड़ा। उस गर्जनसे सभी दैत्य बहुत डर गये॥ १८॥ |
| ताम्रं समागतं दृष्ट्वा हयारिरपि मोहितः।<br>चिन्तयामास सचिवैः किं कर्तव्यमतः परम्॥ १९ | ताम्रको वापस आया हुआ देखकर महिषासुरको बहुत विस्मय हुआ। वह उसी समय मन्त्रियोंके साथ विचार-विमर्श करने लगा कि अब आगे क्या किया जाय?॥ १९॥ |
| दुर्गग्रहो वा कर्तव्यो युद्धं निर्गत्य वा पुनः।<br>पलायने कृते श्रेयो भवेद्वा दानवोत्तमाः॥ २० | [उसने कहा—] हे श्रेष्ठ दानवो! हमें आत्मरक्षार्थ किलेके भीतर ही रहना चाहिये अथवा बाहर निकलकर युद्ध करना चाहिये अथवा भाग जानेमें ही हमारा कल्याण है?॥ २०॥ |
| बुद्धिमन्तो दुराधर्षाः सर्वशास्त्रविशारदाः।<br>मन्त्रः खलु प्रकर्तव्यः सुगुप्तः कार्यसिद्धये॥ २१<br><br>मन्त्रमूलं स्मृतं राज्यं यदि स स्यात्सुरक्षितः।<br>मन्त्रिभिश्च सदाचारैर्विधेयः सर्वथा बुधैः॥ २२ | आपलोग बुद्धिमान्, अजेय तथा सभी शास्त्रोंके विद्वान् हैं। अतः मेरे कार्यकी सिद्धिके लिये आपलोग अत्यन्त गुप्त मन्त्रणा करें; क्योंकि मन्त्रणाको ही राज्यका मूल कहा गया है। यदि मन्त्रणा सुरक्षित (गुप्त) रहती है, तभी राज्यकी सुरक्षा सम्भव है। अतएव राजाको चाहिये कि बुद्धिमान् तथा सदाचारी मन्त्रियोंके साथ सदा गुप्त मन्त्रणा करे॥ २१-२२॥ |
| मन्त्रभेदे विनाशः स्याद्राज्यस्य भूपतेस्तथा।<br>तस्माद्द्भेदभयाद् गुप्तः कर्तव्यो भूतिमिच्छता॥ २३ | मन्त्रणाके खुल जानेपर राज्य तथा राजा—इन दोनोंका विनाश हो जाता है। अतः अपने अभ्युदयकी इच्छा करनेवाले राजाको चाहिये कि भेद खुल जानेके भयसे सदा गुप्त मन्त्रणा करे॥ २३॥ |
| तदत्र मन्त्रिभिर्वाच्यं वचनं हेतुमद्धितम्।<br>कालदेशानुसारेण विचिन्त्य नीतिनिर्णयम्॥ २४ | अतः इस समय आप मन्त्रिगण नीति-निर्णयपर सम्यक् विचार करके देश-कालके अनुसार मुझे सार्थक तथा हितकर परामर्श प्रदान करें॥ २४॥ |
| या योषात्र समायाता प्रबला देवनिर्मिता।<br>एकाकिनी निरालम्बा कारणं तद्विचिन्त्यताम्॥ २५ | देवताओंद्वारा निर्मित जो यह अत्यन्त बलवती स्त्री बिना किसी सहायताके अकेली ही यहाँ आयी हुई है, उसके रहस्यपर आपलोग विचार करें॥ २५॥ |
| युद्धं प्रार्थयते बाला किमाश्चर्यमतः परम्।<br>श्रेयोऽत्र विपरीतं वा को वेत्ति भुवनत्रये॥ २६ | वह बाला हमें युद्धके लिये चुनौती दे रही है, इससे बढ़कर आश्चर्य और क्या हो सकता है? इसमें मेरी विजय होगी अथवा पराजय—इसे तीनों लोकोंमें भला कौन जानता है?॥ २६॥ |