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देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

अथ चतुर्थोऽध्यायः

५४६श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ४

अथ चतुर्थोऽध्यायः

इन्द्रका देवताओं तथा गुरु बृहस्पतिसे परामर्श करना तथा बृहस्पतिद्वारा जय-पराजयमें दैवकी प्रधानता बतलाना

व्यास उवाचव्यासजी बोले—
गते दूते सुरेन्द्रोऽपि समाहूय सुरानथ।<br>यमवायुधनाध्यक्षवरुणानिदमूचिवान् ॥ १हे राजन्! दूतके चले जानेपर इन्द्रने भी यम, वायु, कुबेर तथा वरुण—इन देवताओंको बुलाकर यह बात कही॥ १॥
महिषो नाम दैत्येन्द्रो रम्भपुत्रो महाबलः।<br>वरदर्पमदोन्मत्तो मायाशतविचक्षणः॥ २रम्भका पुत्र महाबली दैत्यराज महिषासुर इस समय वरदानके अभिमानमें मदोन्मत्त हो गया है। वह सैकड़ों प्रकारकी माया रचनेमें पारंगत है॥ २॥
तस्य दूतोऽद्य सम्प्राप्तः प्रेषितस्तेन भोः सुराः।<br>स्वर्गकामेन लुब्धेन मामुवाचेदृशं वचः॥ ३हे देवताओ! स्वर्ग-प्राप्तिकी कामना करनेवाले उस लोभी महिषासुरके द्वारा भेजा गया दूत आज ही यहाँ आया था। उसने मुझसे इस प्रकारकी बात कही—॥ ३॥
त्यज देवालयं शक्र यथेच्छं व्रज वासव।<br>सेवा वा कुरु दैत्यस्य महिषस्य महात्मनः॥ ४हे शक्र! तुम तत्काल देवलोक छोड़ दो और अपनी इच्छाके अनुसार जहाँ जाना चाहो, वहाँ चले जाओ; अथवा हे वासव! महान् महिषासुरका सेवकत्व स्वीकार कर लो॥ ४॥
दयावान्दानवेन्द्रोऽसौ स ते वृत्तिं विधास्यति।<br>नतेषु भृत्यभूतेषु न कुप्यति कदाचन॥ ५वे दैत्यराज महिषासुर बड़े दयालु हैं। वे आपके लिये किसी जीविकाका प्रबन्ध अवश्य कर देंगे। विनम्र सेवकोंपर वे कभी भी क्रोध नहीं करते हैं॥ ५॥
नोचेद्युद्धाय देवेश सेनोद्योगं कुरु स्वयम्।<br>गते मयि स दैत्येन्द्रस्त्वरितः समुपेष्यति॥ ६हे देवेश! यदि आपको यह स्वीकार नहीं है तो युद्धके लिये सेनाके संगठनमें जुट जाइये। मेरे वहाँ पहुँचते ही वे दैत्येन्द्र महिषासुर [देवलोकपर आक्रमणके लिये] यहाँ शीघ्र आ पहुँचेंगे॥ ६॥
इत्युक्त्वा स गतो दूतो दानवस्य दुरात्मनः।<br>किं कर्तव्यमतः कार्यं चिन्तयध्वं सुरोत्तमाः॥ ७ऐसा कहकर दुष्टात्मा दानव महिषासुरका वह दूत यहाँसे चला गया। हे श्रेष्ठ देवगण! आपलोग विचार कीजिये कि अब क्या करना चाहिये?॥ ७॥
दुर्बलोऽपि न चोपेक्ष्यः शत्रुर्वलवता सुराः।<br>विशेषेण सदोद्योगी बलवान्बलदर्पितः॥ ८हे देवताओ! स्वयं बलवान् होते हुए भी अत्यन्त दुर्बल शत्रुको भी उपेक्षा नहीं करनी चाहिये। अपने बलका अभिमान करनेवाले, बलशाली तथा सदा उद्यमशील शत्रुको तो विशेषरूपसे उपेक्षा नहीं करनी चाहिये॥ ८॥
उद्यमः किल कर्तव्यो यथाबुद्धि यथाबलम्।<br>दैवाधीनो भवेन्नूनं जयो वाथ पराजयः॥ ९अतः हमलोगोंको अपने बल तथा विवेकके अनुसार पुरुषार्थ अवश्य करना चाहिये। जीत अथवा हार तो दैवके अधीन रहती है॥ ९॥

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]— 18 B

अ० ४ ]पञ्चम स्कन्ध५४७
संस्कृतहिन्दी अनुवाद
सन्धियोगो न चात्रास्ति खले सन्धिर्निरर्थकः।<br>सर्वथा साधुभिः कार्यं विचार्य च पुनः पुनः॥ १०इस परिस्थितिमें सन्धिकी भी सम्भावना नहीं है; क्योंकि नीचके साथ की गयी सन्धि व्यर्थ सिद्ध होती है। अतएव बार-बार विचार करके केवल सज्जनोंके साथ ही सन्धि करनी चाहिये॥ १०॥
यानमप्यधुना नैव कर्तव्यं सहसा पुनः।<br>प्रेक्षकाः प्रेषणीयाश्च शीघ्रगाः सुप्रवेशकाः॥ ११<br><br>इङ्गितज्ञाश्च निःसङ्गा निःस्पृहाः सत्यवादिनः।<br>सेनाभियोगं प्रस्थानं बलसंख्यां यथार्थतः॥ १२<br><br>वीराणां च परिज्ञानं कृत्वायान्तु त्वरान्विताः।<br>ज्ञात्वा दैत्यपतेस्तस्य सैन्यस्य च बलाबलम्॥ १३<br><br>करिष्यामि ततस्तूर्णं यानं वा दुर्गसंग्रहम्।<br>विचार्य खलु कर्तव्यं कार्यं बुद्धिमता सदा।<br>सहसा विहितं कार्यं दुःखदं सर्वथा भवेत्॥ १४<br><br>तस्माद्विमृश्य कर्तव्यं सुखदं सर्वथा बुधैः।<br>नात्र भेदविधिर्न्याय्यो दानवेषु च सर्वथा॥ १५इस समय अचानक आक्रमण करना भी उचित नहीं है। अतएव सर्वप्रथम शीघ्रगामी तथा सुगमतासे प्रवेश करनेमें दक्ष गुप्तचर वहाँ भेजे जाने चाहिये, जो शत्रुओंके अभिप्राय समझनेमें समर्थ, किसीके साथ अधिक भावासक्ति न रखनेवाले, निर्लोभी तथा सत्यवादी हों। वे गुप्तचर शत्रु-सेनाकी गतिविधि, प्रस्थान, सेनाकी ठीक-ठीक संख्या और शत्रुदलके वीरोंकी वास्तविक जानकारी करके शीघ्रतापूर्वक वापस आ जाएँ। इस प्रकार दैत्यपति महिषासुरकी सेनाके बलाबलको भलीभाँति जान लेनेके पश्चात् मैं शीघ्र ही आक्रमण अथवा किलेबन्दी करनेका प्रबन्ध करूँगा। सर्वदा भलीभाँति सोच-समझकर बुद्धिमान् मनुष्यको कार्य करना चाहिये; क्योंकि बिना विचार किये अचानक किया गया कार्य हर तरहसे दुःखदायक ही होता है। अतएव बुद्धिमान् मनुष्योंको सम्यक् रूपसे विचार-विमर्श करके ऐसा कार्य करना चाहिये, जो सुखकर हो॥ ११—१४ १/२ ॥
एकचित्तेषु कार्येऽस्मिंस्तस्माच्चारा व्रजन्तु वै।<br>ज्ञात्वा बलाबलं तेषां पश्चान्नीतिर्विचार्य च॥ १६<br><br>विधेया विधिवत्तज्ज्ञैस्तेषु कार्यपरेषु च।<br>अन्यथा विहितं कार्यं विपरीतफलप्रदम्॥ १७<br><br>सर्वथा तद्भवेन्नूनमज्ञातमौषधं यथा।दानवोंमें मतभेद पैदा करनेवाली भेदनीतिका आश्रय लेना भी उचित नहीं जान पड़ता; क्योंकि उनमें पूर्ण मतैक्य है। अतएव इस कार्यके लिये पहले गुप्तचर भेजे जाएँ। उनके द्वारा उन दानवोंके बलाबलको जाननेके पश्चात् श्रेष्ठ नीतिविदोंसे भलीभाँति विचार करके उन कार्योंके लिये नीति निर्धारित की जानी चाहिये। नीतिसे हटकर किया गया कार्य अज्ञात औषधिके सेवनसे उत्पन्न होनेवाले कष्टकी भाँति विपरीत फल देनेवाला होता है॥ १५—१७ १/२ ॥
व्यास उवाच<br>इति सञ्चिन्त्य तैः सर्वैः प्रणिधिं कार्यवेदिनम्॥ १८**व्यासजी बोले—**हे राजन्! इस प्रकार उन सभी देवताओंसे विचार-विमर्श करके देवराज इन्द्रने शत्रुपक्षके रहस्योंकी जानकारीके उद्देश्यसे एक कार्यकुशल गुप्तचर भेजा॥ १८ १/२ ॥
प्रेषयामास देवेन्द्रः परिज्ञानाय पार्थिव।<br>दूतस्तु त्वरितो गत्वा समागम्य सुराधिपम्॥ १९उस दूतने तत्काल पहुँचकर शत्रुपक्षके सैन्य-बलाबलकी जानकारी प्राप्त की और पुनः इन्द्रके पास वापस आकर उनको सब कुछ बता दिया। शत्रुसेनाकी

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—18 C

५४८श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ४
मूल संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
निवेदयामास तदा सर्वसैन्यबलाबलम्।<br>ज्ञात्वा तद्बलमुद्योगं तुराषाडतिविस्मितः॥ २०<br>देवानचोदयत्तूर्णं समाहूय पुरोहितम्।<br>मन्त्रं मन्त्रविदां श्रेष्ठं चकार त्रिदशेश्वरः॥ २१<br>उवाचाङ्गिरसश्रेष्ठं समासीनं वरासने।तैयारीके विषयमें जानकर इन्द्रको महान् आश्चर्य हुआ और उन्होंने देवताओंको तैयारीमें लगनेकी आज्ञा दे दी। तत्पश्चात् मन्त्रविदोंमें श्रेष्ठ पुरोधा देवगुरु बृहस्पतिको बुलाकर इन्द्र उनके साथ परामर्श करने लगे। उत्तम आसनपर विराजमान श्रेष्ठ अंगिरापुत्र बृहस्पतिसे इन्द्रने कहा॥ १९—२१ १/२॥
इन्द्र उवाच<br>भो भो देवगुरो विद्वन्किं कर्तव्यं वदस्व नः॥ २२<br>सर्वज्ञोऽसि समुत्पन्ने कार्ये त्वं गतिरद्य नः।<br>दानवो महिषो नाम महावीर्यो मदान्वितः॥ २३<br>योद्धुकामः समायाति बहुभिर्दानवैर्वृतः।<br>तत्र प्रतिक्रिया कार्या त्वया मन्त्रविदाधुना॥ २४<br>तेषां शुक्रस्तथा त्वं मे विघ्नहर्ता सुसंयतः।इन्द्र बोले—हे देवगुरो! हे विद्वन्! हमलोगोंको क्या करना चाहिये, हमें बताइये। आप सर्वज्ञ हैं। आज उत्पन्न इस विषम परिस्थितिमें एकमात्र आप ही हमारे अवलम्ब हैं। महाबली तथा मदोन्मत्त दानव महिषासुर बहुतसे दानवोंको अपने साथ लेकर हम सबसे युद्ध करनेके लिये यहाँ आ रहा है। आप मन्त्रणाविद् हैं, अतएव इस समय कोई प्रतिक्रियात्मक युक्ति बतानेकी कृपा करें। जैसे शुक्राचार्य दानवोंकी रक्षा करते हैं, उसी प्रकार हम देवताओंके कष्टका निवारण करने हेतु आप सदा उद्यत रहते हैं॥ २२—२४ १/२॥
व्यास उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं प्राह तुरासाहं बृहस्पतिः॥ २५<br>विचिन्त्य मनसा कामं कार्यसाधनतत्परः।व्यासजी बोले—यह वचन सुनकर अपने मनमें भलीभाँति सोचकर सदा कार्यसिद्धिके लिये तत्पर रहनेवाले बृहस्पति इन्द्रसे कहने लगे॥ २५ १/२॥
गुरुरुवाच<br>स्वस्थो भव सुरेन्द्र त्वं धैर्यमालम्ब्य मारिष॥ २६<br>व्यसने च समुत्पन्ने न त्याज्यं धैर्यमाशु वै।<br>जयाजयौ सुराध्यक्ष दैवाधीनौ सदैव हि॥ २७<br>स्थातव्यं धैर्यमालम्ब्य तस्माद् बुद्धिमता सदा।<br>भवितव्यं भवत्येव जानन्नेव शतक्रतो॥ २८<br>उद्यमः सर्वथा कार्यो यथापौरुषमात्मनः।<br>मुनयोऽपि हि मुक्त्यर्थमुद्यमैकरताः सदा॥ २९<br>दैवाधीनं च जानन्तो योगध्यानपरायणाः।<br>तस्मात्सदैव कर्तव्यो व्यवहारोदितोद्यमः॥ ३०गुरु बोले—हे देवेन्द्र! आप निश्चिन्त हो जाइये। हे महानुभाव! धैर्य धारण कीजिये, विषम परिस्थिति आ जानेपर सहसा धैर्य नहीं खोना चाहिये। हे सुराध्यक्ष! हार तथा जीत सदा दैवाधीन होती हैं, अतएव बुद्धिमान् प्राणीको चाहिये कि वह सदैव धैर्य धारण करके स्थित रहे। हे शतक्रतो! होनी होकर रहती है, ऐसा समझते हुए मनुष्यको अपनी सामर्थ्यके अनुसार सदा उद्यम करना चाहिये। सब कुछ दैवके अधीन है—यह जानते हुए भी योगध्यानपरायण मुनिगण भी मुक्ति-प्राप्ति हेतु निरन्तर उद्यमशील रहते हैं। अतएव मनुष्यको अपने सामर्थ्यानुसार सदैव उद्योग करते रहना चाहिये॥ २६—३०॥
सुखं भवतु वा मा वा दैवे का परिदेवना।<br>विना पुरुषकारेण कदाचित्सिद्धिमाप्नुयात्॥ ३१सुख मिले अथवा न मिले—इस दैवाधीन विषयमें चिन्ताकी क्या आवश्यकता? बिना पुरुषार्थ किये ही संयोगसे सिद्धि मिल जाय—ऐसा मानकर अन्धे तथा

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—18 D