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देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

अ० २९ ] पञ्चम स्कन्ध ६८९

अ० २९ ] पञ्चम स्कन्ध ६८९


अजेयेयं महाराज सर्वथा दैत्यदानवैः।<br>गन्धर्वासुरयक्षैश्च पन्नगोरगराक्षसैः॥ ३९हे महाराज! यह देवी दैत्य, दानव, गन्धर्व, असुर, यक्ष, पन्नग, उरग और राक्षस—इन सभीसे सर्वथा अजेय है॥ ३९॥
अन्यास्तत्रागता देव्य इन्द्राणीप्रमुखा भृशम्।<br>युध्यमाना महाराज वाहनैरायुधैर्युताः॥ ४०<br><br>ताभिः सर्वं हतं सैन्यं दानवानां वरायुधैः।<br>रक्तबीजोऽपि राजेन्द्र तरसा विनिपातितः॥ ४१हे महाराज! इन्द्राणी आदि अन्य प्रमुख देवियाँ भी वहाँ आयी हुई हैं। वे अपने-अपने वाहनोंपर सवार होकर नानाविध आयुध धारण करके घोर युद्ध कर रही हैं। हे राजेन्द्र! उन देवियोंने अपने उत्तम अस्त्रोंसे दानवोंकी सारी सेनाका विध्वंस कर डाला और रक्तबीजको भी बड़ी शीघ्रतासे मार गिराया॥ ४०-४१॥
एकापि दुःसहा देवी किं पुनस्ताभिरन्विता।<br>सिंहोऽपि हन्ति संग्रामे राक्षसानमितप्रभः॥ ४२एकमात्र देवी अम्बिका ही हमलोगोंके लिये असह्य थी, और फिर जब वह उन देवियोंके साथ हो गयी है तब कहना ही क्या? असीम तेजवाला उसका वाहन सिंह भी संग्राममें राक्षसोंका वध कर रहा है॥ ४२॥
अतो विचार्य सचिवैर्यद्युक्तं तद्विधीयताम्।<br>न वैरमनया युक्तं सन्धिरैव सुखप्रदः॥ ४३अतएव मन्त्रियोंके साथ विचार-विमर्श करके जो उचित हो, वह कीजिये। इसके साथ शत्रुता उचित नहीं है, अपितु सन्धि कर लेना ही सुखदायक होगा॥ ४३॥
आश्चर्यमेतदखिलं यन्नारी हन्ति राक्षसान्।<br>रक्तबीजोऽपि निहतः पीतं तस्यापि शोणितम्॥ ४४<br><br>अन्ये निपातिता दैत्याः संग्रामेऽम्बिकया नृप।<br>चामुण्डया च मांसं वै भक्षितं सकलं रणे॥ ४५यह आश्चर्य है कि एक स्त्री राक्षसोंका संहार कर रही है! रक्तबीज भी मार डाला गया! देवी चामुण्डा उसका सारा रक्त भी पी गयी! हे नृप! अम्बिकाने संग्राममें अन्य दैत्योंको मार डाला और देवी चामुण्डा उनका सम्पूर्ण मांस खा गयी॥ ४४-४५॥
वरं पातालगमनं तस्याः सेवाथवा वरा।<br>न तु युद्धं महाराज कार्यमम्बिकया सह॥ ४६<br><br>न नारी प्राकृता ह्येषा देवकार्यार्थसाधिनी।<br>मायेयं प्रबला देवी क्षपयन्तीयमुत्थिता॥ ४७हे महाराज! अब हमलोगोंके लिये या तो पाताल चला जाना श्रेयस्कर है अथवा उसकी दासता स्वीकार कर लेना; किंतु उस अम्बिकाके साथ युद्ध नहीं करना चाहिये। यह साधारण स्त्री नहीं है, यह देवताओंका कार्य सिद्ध करनेवाली है और यह मायारूपिणी शक्तिसम्पन्न देवीके रूपमें दैत्योंका नाश करनेके लिये प्रकट हुई है॥ ४६-४७॥
व्यास उवाच<br>इति तेषां वचस्तथ्यं श्रुत्वा कालविमोहितः।<br>मुमूर्षुः प्रत्युवाचेदं शुम्भः प्रस्फुरिताधरः॥ ४८**व्यासजी बोले—**उन सैनिकोंकी यह यथार्थ बात सुनकर कालसे मोहित तथा मरनेके लिये उद्यत वह काँपते हुए ओठोंवाला शुम्भ उनसे कहने लगा॥ ४८॥
शुम्भ उवाच<br>यूयं गच्छत पातालं शरणं वा भयातुराः।<br>हनिष्याम्यहमद्यैव ताञ्च ताश्च समुद्यतः॥ ४९**शुम्भ बोला—**तुमलोग भयभीत होकर पाताल चले जाओ अथवा उसकी शरणमें चले जाओ, किंतु मैं तो युद्धमें पूर्णरूपसे तत्पर रहते हुए उस अम्बिका तथा उन देवियोंको आज ही मार डालूँगा॥ ४९॥

६९० श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २९

संस्कृत श्लोकहिन्दी टीका
जित्वा सर्वान्सुरानाजौ कृत्वा राज्यं सुपुष्कलम्।<br>कथं नारीभयोद्विग्नः पातालं प्रविशाम्यहम्॥ ५०<br>निहत्य पार्षदान्सर्वान् रक्तबीजमुखान् रणे।<br>प्राणत्राणाय गच्छामि हित्वा किं विपुलं यशः॥ ५१रणभूमिमें सभी देवताओंको जीतकर तथा विशाल राज्यका भोग करके भला एक स्त्रीके भयसे व्याकुल होकर मैं पाताल क्यों चला जाऊँ? रक्तबीज आदि प्रमुख पार्षदोंको रणमें मरवाकर और अपनी विशद कीर्तिका नाश करके प्राणरक्षाके लिये मैं पाताल क्यों चला जाऊँ?॥ ५०-५१॥
मरणं त्वनिवार्यं वै प्राणिनां कालकल्पितम्।<br>तद्भयं जन्मनोपात्तं त्यजेत्को दुर्लभं यशः॥ ५२कालके द्वारा निर्धारित प्राणियोंकी मृत्यु तो अनिवार्य है। जन्मके साथ ही मृत्युका भय प्राणीके साथ लग जाता है। तब भला कौन (बुद्धिमान्) व्यक्ति दुर्लभ यशका त्याग कर सकता है?॥ ५२॥
निशुम्भाहं गमिष्यामि रथारूढो रणाजिरे।<br>हत्वा तामागमिष्यामि नागमिष्यामि चान्यथा॥ ५३हे निशुम्भ! मैं रथपर सवार होकर युद्धभूमिमें जाऊँगा और उसे मारकर ही वापस आऊँगा और यदि मैं उसे मार न सका तो फिर वापस नहीं लौटूँगा॥ ५३॥
त्वं तु सेनायुतो वीर पार्ष्णिग्राहो भवस्व मे।<br>तरसा तां शरैस्तीक्ष्णैर्नारीं नय यमालये॥ ५४हे वीर! तुम भी सेना साथमें लेकर चलो और युद्धमें मेरे सहायक बनो। वहाँ अपने तीक्ष्ण बाणोंसे मारकर तुम उस स्त्रीको शीघ्र ही यमलोक पहुँचा दो॥ ५४॥
निशुम्भ उवाच<br>अहमद्य हनिष्यामि गत्वा दुष्टाञ्च कालिकाम्।<br>आगमिष्याम्यहं शीघ्रं गृहीत्वा तामथाम्बिकाम्॥ ५५निशुम्भ बोला—मैं अभी युद्धक्षेत्रमें जाकर दुष्ट कालिकाको मार डालूँगा और उस अम्बिकाको लेकर शीघ्र ही आपके पास आ जाऊँगा॥ ५५॥
मा चिन्तां कुरु राजेन्द्र वराकायास्तु कारणे।<br>क्वौषा बाला क्व मे बाहुवीर्यं विश्ववशङ्करम्॥ ५६<br>त्यक्त्वार्त्तिं विपुलां भ्रातृर्भुङ्क्ष्व भोगाननुत्तमान्।<br>आनयिष्याम्यहं कामं मानिनीं मानसयुताम्॥ ५७हे राजेन्द्र! आप उस बेचारीके विषयमें चिन्ता मत कीजिये। कहाँ यह एक साधारण स्त्री और कहाँ पूरे विश्वको अपने वशमें कर लेनेवाला मेरा बाहुबल! हे भाई! आप इस भारी चिन्ताको छोड़कर सर्वोत्तम सुखोंका उपभोग कीजिये। मैं आदरकी पात्र उस मानिनीको अवश्य ही ले आऊँगा॥ ५६-५७॥
मयि तिष्ठति ते राजन्न युक्तं गमनं रणे।<br>गत्वाहमानयिष्यामि तवार्थे वै जयश्रियम्॥ ५८हे राजन्! मेरे रहते युद्धक्षेत्रमें आपका जाना उचित नहीं है। आपका कार्य सिद्ध करनेके लिये मैं वहाँ जाकर विजयश्री अवश्य ही प्राप्त करूँगा॥ ५८॥
व्यास उवाच<br>इत्युक्त्वा भ्रातरं ज्येष्ठं कनीयान्बलगर्वितः।<br>रथमास्थाय विपुलं सन्नद्धः स्वबलावृतः॥ ५९व्यासजी बोले—बड़े भाई शुम्भसे ऐसा कहकर अपने बलपर अभिमान रखनेवाले छोटे भाई निशुम्भने कवच धारण कर लिया और अपनी सेना साथमें लेकर एक विशाल रथपर आरूढ़ हो स्वयं अनेकविध
अ० ३० ]पञ्चम स्कन्ध६९१
जगाम तरसा तूर्णं सङ्गरे कृतमङ्गलः।<br>संस्तुतो बन्दिसूतैश्च सायुधः सपरिष्करः॥ ६०आयुध लेकर वह पूरी तैयारीके साथ तुरंत बड़ी तेजीसे युद्धभूमिकी ओर चल पड़ा। उस समय मंगलाचार किया जा रहा था और बन्दीजन तथा चारण उसका यशोगान कर रहे थे॥ ५९-६०॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे देव्या सह युद्धकरणाय निशुम्भप्रयाणं नामैकोनत्रिंशोऽध्यायः॥ २९॥


अथ त्रिंशोऽध्यायः

देवीद्वारा निशुम्भका वध

व्यास उवाचव्यासजी बोले—
निशुम्भो निश्चयं कृत्वा मरणाय जयाय वा।<br>सोद्यमः सबलः शूरो रणे देवीमुपाययौ॥ १[हे राजन्!] वह पराक्रमी निशुम्भ अब मृत्यु अथवा विजयका निश्चय करके पूरी तैयारीके साथ सेनासहित समरभूमिमें उपस्थित हो गया॥ १॥
तमाजगाम शुम्भोऽपि स्वबलेन समावृतः।<br>प्रेक्षकोऽभूद्रणे राजा संग्रामरसपण्डितः॥ २अपनी सेना साथमें लेकर शुम्भ भी उस निशुम्भके पास आ गया और युद्धकलाका पूर्ण ज्ञान रखनेवाला वह दैत्यराज शुम्भ रणमें दर्शक बनकर युद्धका अवलोकन करने लगा॥ २॥
गगने संस्थिता देवास्तदाभ्रपटलावृताः।<br>दिदृक्षवस्तु संग्रामे सेन्द्रा यक्षगणास्तथा॥ ३इन्द्रसहित समस्त देवता तथा यक्षगण संग्राम देखनेकी इच्छासे आकाशमण्डलमें मेघपटलोंमें छिपकर विराजमान हो गये॥ ३॥
निशुम्भोऽथ रणे गत्वा धनुरादाय शार्ङ्गकम्।<br>चकार शरवृष्टिं स भीषयञ्जगदम्बिकाम्॥ ४निशुम्भ रणभूमिमें पहुँचकर सींगका बना हुआ धनुष लेकर भगवती जगदम्बाको भयभीत करता हुआ उनके ऊपर बाणोंकी बौछार करने लगा॥ ४॥
मुञ्चन्तं शरजालानि निशुम्भं चण्डिका रणे।<br>वीक्ष्यादाय धनुः श्रेष्ठं जहास सुस्वरं मुहुः॥ ५<br><br>उवाच कालिकां देवी पश्य मूर्खत्वमेतयोः।<br>मरणायागतौ कालि मत्समीपमिहाधुना॥ ६युद्धभूमिमें निशुम्भको बाण-समूह छोड़ते हुए देखकर भगवती चण्डिका अपना उत्कृष्ट धनुष धारण करके उच्च स्वरमें बार-बार हँसने लगीं। देवी चण्डिकाने कालीसे कहा—हे काली! इन दोनोंकी मूर्खता तो देखो, ये दोनों इस समय यहाँ मेरे पास मरनेके लिये ही आये हुए हैं॥ ५-६॥
दृष्ट्वा दैत्यवधं घोरं रक्तबीजात्ययं तथा।<br>जयाशां कुरुतस्त्वेतौ मोहितौ मम मायया॥ ७दैत्योंका भीषण संहार तथा रक्तबीजकी मृत्यु देखकर भी मेरी मायासे विमोहित हुए ये दोनों दैत्य विजयकी आशा कर रहे हैं॥ ७॥
आशा बलवती ह्येषा न जहाति नरं क्वचित्।<br>भग्नं हृतबलं नष्टं गतपक्षं विचेतनम्॥ ८यह आशा बड़ी बलवती होती है; यह प्राणियोंको कभी नहीं छोड़ती है। यहाँतक कि अंगहीन, बलहीन, नष्टप्राय, असहाय तथा अचेत प्राणी भी आशाके प्रभावसे छूट नहीं पाता है॥ ८॥
६१२श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ३०

| आशापाशनिबद्धौ द्वौ युद्धाय समुपागतौ।<br>निहन्तव्यौ मया कालि रणे शुम्भनिशुम्भकौ॥ ९ | हे कालि! इस प्रकार आशा-पाशमें बँधे हुए ये दोनों शुम्भ-निशुम्भ युद्धके लिये समरभूमिमें आये हुए हैं, अब मुझे इन दोनोंका वध कर देना चाहिये॥ ९॥ |
| आसन्नमरणावेतौ सम्प्राप्तौ दैवमोहितौ।<br>पश्यतां सर्वदेवानां हनिष्याम्यहमद्य तौ॥ १० | आसन्न मृत्युवाले ये दोनों दैत्य प्रारब्धकी प्रेरणासे यहाँ आये हुए हैं। सभी देवताओंके समक्ष आज ही मैं इन्हें मार डालूँगी॥ १०॥ |
| व्यास उवाच<br>इत्युक्त्वा कालिकां चण्डी कर्णाकृष्टशरोत्करैः।<br>छादयामास तरसा निशुम्भं पुरतः स्थितम्॥ ११ | व्यासजी बोले—भगवती चण्डिकाने कालिकासे ऐसा कहकर कानोंतक खींचकर छोड़े गये बाण-समूहोंसे अपने समक्ष खड़े निशुम्भको शीघ्र ही आच्छादित कर दिया॥ ११॥ |
| दानवोऽपि शरांस्तस्याश्चिच्छेद निशितैः शरैः।<br>तयोः परस्परं युद्धं बभूवातिभयानकम्॥ १२ | दैत्य निशुम्भने भी उन चण्डिकाके बाणोंको अपने तीक्ष्ण बाणोंसे काट डाला। इस प्रकार उन दोनोंमें परस्पर अत्यन्त भयंकर युद्ध होने लगा॥ १२॥ |
| केसरी केशजालानि धुन्वानः सैन्यसागरम्।<br>गाहयामास बलवान्सरसीं वारणो यथा॥ १३ | देवीका सिंह भी अपने गर्दनके बालोंको झाड़ता हुआ दैत्योंके सेनारूपी समुद्रको उसी प्रकार मथने लगा, जैसे कोई बलवान् हाथी तालाबको मथ रहा हो॥ १३॥ |
| नखैर्दन्तप्रहारैस्तु दानवान्पुरतः स्थितान्।<br>चखाद च विशीर्णाङ्गान् गजानिव मदोत्कटान्॥ १४ | जिस प्रकार कोई सिंह मतवाले हाथियोंके अंग-प्रत्यंग चीरकर खा डालता है, उसी प्रकार भगवतीका वह सिंह अपने समक्ष स्थित दानवोंको अपने नखों तथा दाँतोंके प्रहारसे फाड़कर खाने लगा॥ १४॥ |
| एवं विमथ्यमाने तु सैन्ये केसरिणा तदा।<br>अभ्यधावन्निशुम्भोऽथ विकृष्टवरकार्मुकः॥ १५ | भगवतीके उस सिंहद्वारा दानवी सेनाका इस प्रकार संहार होते देखकर निशुम्भ अपना श्रेष्ठ धनुष चढ़ाकर सिंहके पीछे दौड़ा॥ १५॥ |
| अन्येऽपि क्रुद्धा दैत्येन्द्रा देवीं हन्तुमुपाययुः।<br>सन्दष्टदन्तरसना रक्तनेत्रा ह्यनेकशः॥ १६ | उसी समय कोपके कारण लाल नेत्रोंवाले अन्य बहुत-से प्रधान दानव भी दाँतोंसे अपनी जीभ चबाते हुए भगवतीको मारनेके लिये उनपर टूट पड़े॥ १६॥ |
| तत्राजगाम तरसा शुम्भः सैन्यसमावृतः।<br>निहत्य कालिकां कोपाद् ग्रहीतुं जगदम्बिकाम्॥ १७ | उसी अवसरपर कुपित होकर शुम्भ भी कालिकापर प्रहार करके भगवती अम्बिकाको पकड़नेके लिये अपनी सेनाके साथ बड़े वेगसे वहाँ आ पहुँचा॥ १७॥ |
| तत्रागत्य ददर्शाजावम्बिकाञ्च पुरःस्थिताम्।<br>रौद्ररसयुतां कान्तां शृङ्गाररससंयुताम्॥ १८ | वहाँ आकर उसने जगदम्बिकाको युद्धभूमिमें अपने सामने खड़ी देखा; जो परम सुन्दरी, शृङ्गाररससे परिपूर्ण तथा रौद्ररससे भरी हुई थीं॥ १८॥ |