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देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

अ० ११] द्वितीय स्कन्ध २३१

अ० ११] द्वितीय स्कन्ध २३१

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
यं यं सर्प प्रपश्यामि तं तं हन्यायुधेन वै।<br>एवं कृत्वा प्रतिज्ञां स शस्त्रपाणी रुरुस्तदा ॥ २७<br>व्यचरत्पृथिवीं राजन्निघ्नन्सर्पान्यतस्ततः।<br>एकदा स वने घोरं डुण्डुभं जरसान्वितम् ॥ २८<br>अपश्यद्दण्डमुद्यम्य हन्तुं तं समुपाययौ।<br>अभ्यहन् रुषितो विप्रस्तमुवाचाथ डुण्डुभः ॥ २९<br>नापराध्नोमि ते विप्र कस्मान्मामभिहंसि वै।अत्यन्त भीषण प्रतिज्ञा की कि मैं जिस किसी भी सर्पको देखूँगा, उसे तत्काल आयुधसे मार डालूँगा। हे राजन्! इस प्रकार प्रतिज्ञा करके हाथमें शस्त्र लेकर मुनि रुरु सर्पोंका वध करते हुए इधर-उधर घूमते रहे। एक बार उन्हें वनमें एक बूढ़ा डुंडुभ साँप दिखायी दिया। वे लाठी उठाकर रोषपूर्वक उसे मारनेके लिये तत्पर हुए, तब डुंडुभने उन ब्राह्मणसे कहा— हे विप्र! मैं आपके प्रति कोई अपराध नहीं कर रहा हूँ, तो फिर आप मुझे क्यों मार रहे हैं?॥ २४—२९ १/२ ॥
रुरुरुवाच<br>प्राणप्रिया मे दयिता दष्टा सर्पेण सा मृता॥ ३०<br>प्रतिज्ञेयं तदा सर्प दुःखितेन मया कृता।**रुरु बोले—**मेरी प्राणप्रिया भार्याको सर्पने डँस लिया था और उसकी मृत्यु हो गयी थी। अतः हे सर्प! उसी समयसे दुःखित होकर मैंने ऐसी प्रतिज्ञा कर ली थी॥ ३० १/२ ॥
डुण्डुभ उवाच<br>नाहं दशामि तेऽन्ये वै ये दशन्ति भुजङ्गमाः ॥ ३१<br>शरीरसमयोगेन न मां हिंसितुमर्हसि।**डुंडुभ बोला—**मैं किसीको काटता नहीं। जो सर्प काटते हैं, वे दूसरे होते हैं। इसलिये सर्पसदृश शरीर होनेके कारण मुझे आप मत मारिये॥ ३१ १/२ ॥
उत्तङ्क उवाच<br>श्रुत्वा तां मानुषीं वाणीं सर्पेणोक्तां मनोहराम् ॥ ३२<br>रुरुः पप्रच्छ कोऽसि त्वं कस्माद् डुण्डुभतां गतः।**उत्तंक बोले—**मनुष्यके समान उसकी सुन्दर वाणी सुनकर रुरुने पूछा—तुम कौन हो? और डुंडुभयोनिको कैसे प्राप्त हो गये?॥ ३२ १/२ ॥
सर्प उवाच<br>ब्राह्मणोऽहं पुरा विप्र सखा मे खगमाभिधः ॥ ३३<br>विप्रो धर्मभृतां श्रेष्ठः सत्यवादी जितेन्द्रियः।<br>स मया वञ्चितो मौर्ख्यात्सर्पं कृत्वा च तार्णकम् ॥ ३४**सर्प बोला—**हे विप्र! पहले मैं ब्राह्मण था और ‘खगम’ नामका मेरा एक ब्राह्मण मित्र था। वह धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ, सत्यवादी तथा जितेन्द्रिय था। एक बार अपनी मूर्खतावश मैंने तृणका सर्प बनाकर उसे धोखेमें डाल दिया॥ ३३-३४॥
भयं च प्रापितोऽत्यर्थमग्निहोत्रगृहे स्थितः।<br>तेन भीतेन शप्तोऽहं विह्वलेनातिवेपिना ॥ ३५<br>भव सर्पो मन्दबुद्धे येनाहं धर्षितस्त्वया।<br>मया प्रसादितोऽत्यर्थं सर्पेणासौ द्विजोत्तमः ॥ ३६<br>मामुवाचाथ तत्क्रोधात्किञ्चिच्छान्तिमवाप्य च।<br>रुरुस्ते मोचिता शापस्यास्य सर्प भविष्यति ॥ ३७<br>प्रमतेस्तु सुतो नूनमिति मां सोऽब्रवीद्वचः।<br>सोऽहं सर्पो रुरुस्त्वं च शृणु मे परमं वचः ॥ ३८उस समय वह अग्निहोत्रगृहमें विद्यमान था, सर्पको देखकर अत्यन्त डर गया। भयसे थर-थर काँपते हुए उस ब्राह्मणने विह्वल होकर मुझे शाप दे दिया—हे मन्दबुद्धि! तुमने सर्प दिखाकर मुझे डराया है, अतः तुम सर्प हो जाओ। सर्परूपमें मैंने उस ब्राह्मणकी बड़ी प्रार्थना की। तब उस ब्राह्मणने क्रोधसे थोड़ा शान्त होनेपर मुझसे कहा—हे सर्प! प्रमतिपुत्र रुरु तुम्हें इस शापसे मुक्त करेंगे। उन्होंने यह बात स्वयं मुझसे कही थी। मैं वही सर्प हूँ और आप रुरु हैं। आप मेरे वचनको ध्यानपूर्वक सुनिये—ब्राह्मणोंके
२३२श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ११

| अहिंसा परमो धर्मो विप्राणां नात्र संशयः।<br>दया सर्वत्र कर्तव्या ब्राह्मणेन विजानता॥ ३९<br>यज्ञादन्यत्र विप्रेन्द्र न हिंसा याज्ञिकी मता। | लिये अहिंसा परम धर्म है, इसमें सन्देह नहीं। अतः विद्वान् ब्राह्मणको चाहिये कि वह सर्वत्र दया करे। हे विप्रवर! यज्ञसे अतिरिक्त कहीं भी की गयी हिंसा याज्ञिकी हिंसा नहीं कही गयी है॥ ३५-३९ १/२ ॥ |
| उत्तङ्क उवाच | उत्तंक बोले— |
| सर्पयोनेर्विनिर्मुक्तो ब्राह्मणोऽसौ रुरुस्ततः॥ ४०<br>कृत्वा तस्य च शापान्तं परित्यक्तं च हिंसनम्।<br>विवाहिता तेन बाला मृता सञ्जीविता पुनः॥ ४१ | तब वह ब्राह्मण सर्पयोनिसे मुक्त हो गया। इस प्रकार उस ब्राह्मणके शापका अन्त करके रुरुने भी हिंसा छोड़ दी। उन्होंने मरी हुई उस सुन्दरीको पुनः जीवित कर दिया और उसके साथ विवाह कर लिया॥ ४०-४१॥ |
| कदनं सर्वसर्पाणां कृतं वैरमनुस्मरन्।<br>त्वं तु वैरं समुत्सृज्य वर्तसे पन्नगेष्वथ॥ ४२<br>विमन्युर्भरतश्रेष्ठ पितृघातकरेषु वै।<br>अन्तरिक्षे मृतस्तातः स्नानदानविवर्जितः॥ ४३<br>तस्योद्धारं च राजेन्द्र कुरु हत्वाथ पन्नगान्।<br>पितुर्वैरं न जानाति जीवन्नेव मृतो हि सः॥ ४४<br>दुर्गतिस्ते पितुस्तावद्यावत्तान्न हनिष्यसि।<br>अम्बामखमिशं कृत्वा कुरु यज्ञं नृपोत्तम॥ ४५<br>सर्पसत्रं महाराज पितुर्वैरमनुस्मरन्। | हे राजन्! उस मुनिने इस प्रकार शत्रुताका स्मरण करते हुए सभी सर्पोंका संहार किया था, परंतु हे भरतश्रेष्ठ! आप तो वैर भूलकर अपने पिताको मारनेवाले सर्पोंके प्रति क्रोधशून्य बने रहते हैं। आपके पिता स्नान-दान किये बिना अन्तरिक्षमें ही मर गये। इसलिये हे राजेन्द्र! सर्पोंका नाश करके आप उनका उद्धार कीजिये। जो पुत्र पिताके शत्रुओंसे बदला नहीं लेता, वह जीते हुए भी मृतकवत् है। हे नृपश्रेष्ठ! जबतक आप सर्पोंका विनाश नहीं करते, तबतक आपके पिताकी दुर्गति ही रहेगी। हे महाराज! आप देवीयज्ञके व्याजसे अपने पिताकी शत्रुताका स्मरण करते हुए सर्पसत्र नामक यज्ञ कीजिये॥ ४२—४५ १/२ ॥ |
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
| इति तस्य वचः श्रुत्वा राजा जन्मेजयस्तदा॥ ४६<br>नेत्राभ्यामश्रुपातं च चकारातीव दुःखितः।<br>धिङ्मामस्तु सुदुर्बुद्धेर्वृथा मानकरस्य वै॥ ४७<br>पिता यस्य गतिं घोरां प्राप्तः पन्नगपीडितः।<br>अद्याहं मखमारभ्य करोम्यपचितिं पितुः॥ ४८<br>हत्वा सर्पानसन्दिग्धो दीप्यमाने विभावसौ। | उत्तंकमुनिका यह वचन सुनकर राजा जनमेजय अत्यन्त दुःखी हुए और उनके नेत्रोंसे अश्रुपात होने लगा। [वे मनमें सोचने लगे] जिसके पिता सर्पसे दंशित होकर इस प्रकार गतिको प्राप्त हों, उस मुझ मिथ्याभिमानी तथा दुर्बुद्धिको धिक्कार है। मैं आज ही यज्ञ आरम्भ करके प्रज्वलित अग्निमें सर्पोंकी आहुति देकर अवश्य ही पिताकी मृत्युका बदला लूँगा॥ ४६—४८ १/२ ॥ |
| आहूय मन्त्रिणः सर्वान् राजा वचनमब्रवीत्॥ ४९<br>कुर्वन्तु यज्ञसम्भारं यथार्हं मन्त्रिसत्तमाः।<br>गङ्गातीरे शुभां भूमिं मापयित्वा द्विजोत्तमैः॥ ५० | सभी मन्त्रियोंको बुलाकर राजाने यह वचन कहा—हे मन्त्रिप्रवरो! गंगाके किनारे श्रेष्ठ ब्राह्मणोंसे उत्तम भूमिकी माप कराकर आपलोग यथोचित यज्ञसामग्रीका प्रबन्ध करें। हे मेरे बुद्धिमान् मन्त्रियो! सौ खंभोंवाले एक सुरम्य मण्डपका निर्माण कराकर |

अ० ११]द्वितीय स्कन्ध२३३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
कुर्वन्तु मण्डपं स्वस्थाः शतस्तम्भं मनोहरम्।<br>वेदी यज्ञस्य कर्तव्या ममाद्य सचिवाः खलु॥ ५१<br><br>तदङ्गत्वे विधेयो वै सर्पसत्रः सुविस्तरः।<br>तक्षकस्तु पशुस्तत्र होतोत्तङ्को महामुनिः॥ ५२<br><br>शीघ्रमाहूयतां विप्राः सर्वज्ञा वेदपारगाः।आपलोग उसमें आज ही यज्ञके लिये वेदीका भी निर्माण सम्पन्न करा लें। उस यज्ञके अंगरूपमें विस्तारसहित सर्पसत्र भी करना है। महामुनि उतंक उस यज्ञके होता होंगे और तक्षकनाग उसमें यज्ञपशु होगा। आपलोग शीघ्र ही सर्वज्ञाता एवं वेदपारगामी ब्राह्मणोंको आमन्त्रित करें॥ ४९—५२ १/२॥
सूत उवाच<br>मन्त्रिणस्तु तदा चक्रुर्भूपवाक्यैर्विचक्षणाः॥ ५३<br><br>यज्ञस्य सर्वसम्भारं वेदीं यज्ञस्य विस्तृताम्।<br>हवने वर्तमाने तु सर्पाणां तक्षको गतः॥ ५४<br><br>इन्द्रं प्रति भयार्तोऽहं त्राहि मामिति चाब्रवीत्।<br>भयभीतं समाश्वास्य स्वासने सन्निवेश्य च॥ ५५**सूतजी बोले—**बुद्धिमान् मन्त्रियोंने राजाके कथनानुसार यज्ञसम्बन्धी समस्त सामग्रीका प्रबन्ध कर लिया और विस्तृत यज्ञवेदी भी निर्मित करायी। सर्पोंका हवन आरम्भ होनेपर तक्षक इन्द्रके यहाँ गया और उनसे बोला—मैं भयाकुल हूँ, मेरी रक्षा कीजिये। तत्पश्चात् इन्द्रने उस भयभीत तक्षकको सान्त्वना देकर अपने आसनपर बैठाकर उसे अभय प्रदान किया और कहा—हे पन्नग! तुम निर्भय हो जाओ॥ ५३—५५ १/२॥
ददावभयमत्यर्थं निर्भयो भव पन्नग।<br>तमिन्द्रशरणं ज्ञात्वा मुनिर्दत्ताभयं तथा॥ ५६<br><br>उत्तङ्कोऽह्वयदुद्विग्नः सेन्द्रं कृत्वा निमन्त्रणम्।<br>स्मृतस्तदा तक्षकेण यायावरकुलोद्भवः॥ ५७<br><br>आस्तीको नाम धर्मात्मा जरत्कारुसुतो मुनिः।<br>तत्रागत्य मुनेर्बालस्तुष्टाव जनमेजयम्॥ ५८तदनन्तर उतंकमुनि उस तक्षकको इन्द्रका शरणागत और उनसे अभयदान पाया हुआ जानकर उद्विग्न हो उठे और उन्होंने मन्त्रप्रभावसे इन्द्रसहित तक्षकका आवाहन किया। तब तक्षकने यायावरवंशमें उत्पन्न जरत्कारुपुत्र धर्मनिष्ठ आस्तीक-नामक मुनिका स्मरण किया। वे मुनिबालक आस्तीक वहाँ आकर जनमेजयकी प्रशंसा करने लगे॥ ५६—५८॥
राजा तमर्चयामास दृष्ट्वा बालं सुपण्डितम्।<br>अर्चयित्वा नृपस्तं तु छन्दयामास वाञ्छितैः॥ ५९राजा जनमेजयने उस बालकको महान् पण्डित देखकर उसकी पूजा की। पूजन-अर्चन करके राजाने अपनी मनोवांछित वस्तु माँगनेके लिये उससे निवेदन किया॥ ५९॥
स तु वव्रे महाभाग यज्ञोऽयं विरमत्विति।<br>सत्यबद्धो नृपस्तेन प्रार्थितश्च पुनस्तथा॥ ६०तब आस्तीकने याचना की—हे महाभाग! इस यज्ञको समाप्त किया जाय। उसने सत्य वचनमें आबद्ध राजासे बार-बार ऐसी प्रार्थना की॥ ६०॥
होमं निवर्तयामास सर्पाणां मुनिवाक्यतः।<br>भारतं श्रावयामास वैशम्पायन विस्तरात्॥ ६१तत्पश्चात् मुनिके वचनानुसार राजाने सर्पोंका हवन बन्द कर दिया और फिर वैशम्पायनऋषिने उन्हें विस्तारपूर्वक महाभारतकी कथा सुनायी॥ ६१॥
श्रुत्वापि नृपतिः कामं न शान्तिमभिजग्मिवान्।<br>व्यासं पप्रच्छ भूपालो मम शान्तिः कथं भवेत्॥ ६२उस कथाको सुनकर भी राजाको विशेष शान्ति नहीं प्राप्त हुई तब राजाने व्यासजीसे पूछा—मुझे किस प्रकार शान्ति मिलेगी? मेरा मन अशान्तिकी