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देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

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DevanagariHindipublished889 pages

Page 828 of 889

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Page 828

अ० २०] षष्ठ स्कन्ध ८१९

अथ विंशोऽध्यायः

राजा हरिवर्माको भगवान् विष्णुद्वारा अपना हैहयसंज्ञक पुत्र देना, राजाद्वारा उसका 'एकवीर' नाम रखना

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
जनमेजय उवाच<br>संशयोऽयं महानत्र जातमात्रः शिशुस्तथा।<br>मुक्तः केन गृहीतोऽसावेकाकी विजने वने॥ १<br><br>का गतिस्तस्य बालस्य जाता सत्यवतीसुत।<br>व्याघ्रसिंहादिभिर्हिंस्रैर्गृहीतो नातिबालकः॥ २जनमेजय बोले—[हे मुनिवर!] मुझे इस विषयमें यह महान् संशय हो रहा है कि भगवान्ने उत्पन्न होते ही उस बालकका त्याग कर दिया। निर्जन वनमें उस असहाय बालककी देखभाल किसने की?॥ १॥<br><br>हे सत्यवतीनन्दन! उस बालककी क्या गति हुई? बाघ, सिंह आदि हिंसक जानवर उस छोटे-से बालकको उठा तो नहीं ले गये॥ २॥
व्यास उवाच<br>लक्ष्मीनारायणौ तस्मात्स्थानाच्च चलितौ यदा।<br>तदैव तत्र चम्पाख्यः प्राप्तो विद्याधरः किल॥ ३<br><br>विमानवरमारूढः कामिन्या सहितो नृप।<br>मदनालसया कामं क्रीडमानो यदृच्छया॥ ४**व्यासजी बोले—**हे राजन्! जब भगवान् विष्णु तथा लक्ष्मीजी उस स्थानसे चले गये, उसी समय चम्पक नामक विद्याधर उत्तम विमानपर आरूढ़ होकर अपनी प्रेयसी मदनालसाके साथ इच्छापूर्वक विहार करते हुए संयोगवश वहाँ आ पहुँचा॥ ३-४॥
विलोक्य तं शिशुं भूमावेकाकिनमनुत्तमम्।<br>देवपुत्रप्रतीकाशं रममाणं यथासुखम्॥ ५<br><br>विमानात्तरसोत्तीर्य चम्पकस्तं शिशुं जवात्।<br>जग्राह च मुदं प्राप निधिं प्राप्य यथाधनः॥ ६देवपुत्र-तुल्य उस उत्तम शिशुको पृथ्वीपर सुखपूर्वक अकेले खेलते हुए देखकर चम्पकने शीघ्रतापूर्वक विमानसे उतरकर झटसे उस बालकको उठा लिया और वह उसी प्रकार आनन्दित हो गया, जिस प्रकार कोई धनहीन व्यक्ति धनका खजाना पाकर आनन्दित हो जाता है॥ ५-६॥
गृहीत्वा चम्पकः प्रादाद्देव्यै तं मदनोपमम्।<br>मदनालसायै तं बालं जातमात्रं मनोहरम्॥ ७कामदेवके समान अत्यन्त सुन्दर उस नवजात शिशुको उठाकर चम्पकने (अपनी पत्नी) मदनालसाको सौंप दिया॥ ७॥
सा गृहीत्वा शिशुं प्रेम्णा सरोमाञ्चा सविस्मया।<br>मुखं चुचुम्ब बालस्य कृत्वा तु हृदये भृशम्॥ ८उस बालकको लेते ही प्रेमसे रोमांचित तथा विस्मित मदनालसा हृदयसे लगाकर उस बालकका मुख चूमने लगी॥ ८॥
आलिङ्गितश्चुम्बितश्च तयाऽसौ प्रीतिपूर्वकम्।<br>उत्सङ्गे च कृतस्तन्व्या पुत्रभावेन भारत॥ ९हे भारत! प्रीतिपूर्वक हृदयसे लगाने तथा चूमनेके पश्चात् उस तन्वंगी मदनालसाने उसे अपना पुत्र समझकर गोदमें ले लिया॥ ९॥
कृत्वाङ्के तौ समारूढौ विमानं दम्पती मुदा।<br>पतिं पप्रच्छ चार्वङ्गी प्रहस्य मदनालसा॥ १०<br><br>कस्यायं बालकः कान्त त्यक्तः केन च कानने।<br>पुत्रोऽयं मम देवेन दत्तस्त्र्यम्बकपाणिना॥ ११उसे गोदमें लेकर पति-पत्नी प्रसन्नतापूर्वक विमानपर आरूढ़ हो गये। तब कमनीय अंगोंवाली मदनालसाने हँसकर अपने पतिसे पूछा—हे कान्त! बालक किसका है तथा किसने इसे निर्जन वनमें छोड़ दिया है? त्रिनेत्रधारी भगवान् शंकरने इसे मुझे पुत्ररूपमें दिया है॥ १०-११॥