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देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

अ० १०] चतुर्थ स्कन्ध ४४९

अ० १०] चतुर्थ स्कन्ध ४४९

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ततः पराजिता दैत्याः काव्यस्य शरणं गताः ॥ ४०<br><br>किं त्वं न कुरुषे ब्रह्मन् साहाय्यं नः प्रतापवान् ।<br>स्थातुं न शक्नुमो ह्यत्र प्रविशामो रसात लम् ॥ ४१<br><br>यदि त्वं न सहायोऽसि त्रातुं मन्त्रविदुत्तम ।<br>व्यास उवाच<br>इत्युक्तः सोऽब्रवीद्दैत्यान्काव्यः कारुणिको मुनिः ॥ ४२तदनन्तर हारे हुए दैत्य [अपने गुरु] शुक्राचार्यकी शरणमें गये। [सभी दैत्य उनसे कहने लगे—] हे ब्रह्मन्! आप प्रतापशाली होते हुए भी हमारी सहायता क्यों नहीं कर रहे हैं? हे मन्त्रज्ञोंमें श्रेष्ठ! यदि हमारी रक्षाहेतु आप सहायक न हुए तो हमलोग यहाँ नहीं रह पायेंगे और निश्चय ही हमें पातालमें जाना पड़ेगा ॥ ४०-४१ १/२ ॥<br>व्यासजी बोले— दैत्योंके ऐसा कहनेपर दयालु शुक्राचार्यमुनिने उनसे कहा—हे असुरो! डरो मत। मैं अपने तेजसे [तुमलोगोंको धरातलपर] स्थापित करूँगा और मन्त्रों तथा औषधियोंसे सर्वदा तुमलोगोंकी सहायता करूँगा। तुमलोग चिन्तामुक्त होकर उत्साह बनाये रखो ॥ ४२-४३ १/२ ॥
मा भैष्ट धारयिष्यामि तेजसा स्वेन भोऽसुराः ।<br>मन्त्रैस्तथौषधीभिश्च साहाय्यं वः सदैव हि ॥ ४३<br><br>करिष्यामि कृतोत्साहा भवन्तु विगतज्वराः ।<br>व्यास उवाच<br>ततस्ते निर्भया जाता दैत्याः काव्यस्य संश्रयात् ॥ ४४<br><br>देवैः श्रुतस्तु वृत्तान्तः सर्वैश्चारमुखात्किल ।<br>तत्र संमन्त्र्य ते देवाः शक्रेण च परस्परम् ॥ ४५<br><br>मन्त्रं चक्रुः सुसंविग्नाः काव्यमन्त्रप्रभावतः ।<br>योद्धुं गच्छामहे तूर्णं यावन्न च्यावयन्ति वै ॥ ४६व्यासजी बोले— इस प्रकार शुक्राचार्यका आश्रय पाकर वे दैत्य निर्भय हो गये। उधर देवताओंने गुप्तचरोंसे यह समाचार सुन लिया। तत्पश्चात् शुक्राचार्यके मन्त्रके प्रभावको समझकर अत्यन्त घबराये हुए देवताओंने इन्द्रके साथ परस्पर मन्त्रणा करके यह योजना बनायी कि जबतक शुक्राचार्यके मन्त्रके प्रभावसे दैत्य हमें राज्यच्युत करें, उसके पहले ही हमलोग युद्ध करनेके लिये शीघ्रतापूर्वक प्रस्थान कर दें और बलपूर्वक उनका वध करके बचे हुए दैत्योंको पाताल भेज दें ॥ ४४-४६ १/२ ॥
प्रसह्य हत्वा शिष्टांस्तु पातालं प्रापयामहे ।<br>दैत्याञ्जग्मुस्ततो देवाः संरुष्टाः शस्त्रपाणयः ॥ ४७<br><br>जग्मुस्तान्विष्णुसहिता दानवान् हरिणोदिताः ।<br>वध्यमानास्तु ते दैत्याः सन्त्रस्ता भयपीडिताः ॥ ४८<br><br>काव्यस्य शरणं जग्मू रक्ष रक्षेति चाब्रुवन् ।<br>ताञ्छुक्रः पीडितान्दृष्ट्वा देवैर्दैत्यान्महाबलान् ॥ ४९तदनन्तर अत्यधिक रोषमें भरे देवताओंने हाथोंमें शस्त्र धारणकर दैत्योंपर चढ़ाई कर दी। इन्द्रकी प्रेरणासे भगवान् विष्णुसहित सभी देवता उनपर टूट पड़े। तब देवताओंके द्वारा मारे जा रहे वे दैत्य आतंकित तथा भयभीत होकर शुक्राचार्यकी शरणमें गये और 'रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये'—ऐसा बार-बार कहने लगे ॥ ४७-४८ १/२ ॥
मा भैष्टेति वचः प्राह मन्त्रौषधिबलाद्विभुः ।<br>दृष्ट्वा काव्यं सुराः सर्वे त्यक्त्वा तान्प्रययुः किल ॥ ५०देवताओंके द्वारा पीड़ित किये गये उन महाबली दैत्योंको देखकर मन्त्र और औषधिके प्रभावसे शक्तिशाली बने शुक्राचार्यने उनसे 'डरो मत'—ऐसा वचन कहा। तब शुक्राचार्यको देखते ही सभी देवता उन दैत्योंको छोड़कर चले गये ॥ ४९-५० ॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे
भृगुशापकारणवर्णनं नाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥
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1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—15 A

४५०श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ११

अथैकादशोऽध्यायः

मन्त्रविद्याकी प्राप्तिके लिये शुक्राचार्यका तपस्यारत होना, देवताओं द्वारा दैत्योंपर आक्रमण, शुक्राचार्यकी माताद्वारा दैत्योंकी रक्षा और इन्द्र तथा विष्णुको संज्ञाशून्य कर देना, विष्णुद्वारा शुक्रमाताका वध

व्यास उवाचव्यासजी बोले—
तथा गतेषु देवेषु काव्यस्तान्प्रत्युवाच ह।<br>ब्रह्मणा पूर्वमुक्तं यच्छृणुध्वं दानवोत्तमाः॥ १तत्पश्चात् देवताओंके चले जानेपर शुक्राचार्यने उन दैत्योंसे कहा—हे श्रेष्ठ दानवो! पूर्वकालमें ब्रह्माजीने मुझसे जो कहा था, उसे तुमलोग सुनो। दैत्योंके वधके लिये भगवान् विष्णु सदा प्रत्यनरत रहते हैं, वे दैत्योंका वध अवश्य करेंगे। जैसे वाराहका रूप धारण करके उन्होंने हिरण्याक्षका वध किया और नृसिंहरूपसे हिरण्यकशिपुको मारा, उसी प्रकार उत्साहसम्पन्न होकर वे सब दैत्योंका संहार करेंगे; इसमें सन्देह नहीं है॥ १-३॥
विष्णुर्दैत्यवधे युक्तो हनिष्यति जनार्दनः।<br>वाराहरूपं संस्थाय हिरण्याक्षो यथा हतः॥ २
यथा नृसिंहरूपेण हिरण्यकशिपुर्हतः।<br>तथा सर्वान्कृतोत्साहो हनिष्यति न चान्यथा॥ ३
न मे मन्त्रबलं सम्यक्प्रतिभाति यथा हरिम्।<br>जेतुं यूयं समर्थाः स्थ मया त्राताः सुरानथ॥ ४मुझे जान पड़ता है कि वैसा समुचित मन्त्रबल अभी मेरे पास नहीं है, जिससे मेरे द्वारा सुरक्षित होकर तुमलोग इन्द्र तथा देवताओंको जीतनेमें समर्थ हो सको। अतः हे श्रेष्ठ दानवगण! तुमलोग कुछ समयतक प्रतीक्षा करो। मैं मन्त्रसिद्धिके लिये आज ही भगवान् शिवके पास जा रहा हूँ। हे श्रेष्ठ दानवो! महादेवजीसे मन्त्र लेकर मैं तत्काल आऊँगा और यथावत् रूपमें तुमलोगोंको सिखा दूँगा॥ ४-६॥
तस्मात्कालं प्रतीक्षध्वं कियन्तं दानवोत्तमाः।<br>अहमद्य महादेवं मन्त्रार्थं प्रव्रजामि वै॥ ५
प्राप्य मन्त्रान्महादेवादागमिष्यामि साम्प्रतम्।<br>युष्मभ्यं तान्प्रदास्यामि यथार्थं दानवोत्तमाः॥ ६
दैत्या ऊचुःदैत्यों ने कहा—
पराजिताः कथं स्थातुं पृथिव्यां मुनिसत्तम।<br>शक्ता भवामोऽप्यबलास्तावत्कालं प्रतीक्षितुम्॥ ७हे मुनिश्रेष्ठ! देवताओंसे पराजित होकर हमलोग अत्यन्त निर्बल हो गये हैं, अतः उतने समयतक प्रतीक्षा करनेके लिये हम पृथ्वीपर रहनेमें कैसे समर्थ हो सकते हैं? सभी पराक्रमी दानव मारे जा चुके हैं और जो शेष बचे हुए हैं, सुखकी इच्छा करनेवाले वे अब युद्धमें ठहरनेमें समर्थ नहीं हैं॥ ७-८॥
निहता बलिनः सर्वे केचिच्छिष्टाश्च दानवाः।<br>नाद्य युक्ताश्च संग्रामे स्थातुमेवं सुखावहाः॥ ८
शुक्र उवाचशुक्राचार्य बोले—
यावदहं मन्त्रविद्यामानयिष्यामि शङ्करात्।<br>तावद्भवद्भिः स्थातव्यं तपोयुक्तैः शमान्वितैः॥ ९जबतक मैं शिवजीसे मन्त्रविद्या लेकर नहीं आता हूँ, तबतक तुमलोग शान्ति और तपस्यासे युक्त होकर यहीं रुके रहो॥ ९॥
सामदानादयः प्रोक्ता विद्वद्भिः समयोचिताः।<br>देशं कालं बलं वीरैर्ज्ञात्वा शक्तिं बलं बुधैः॥ १०विद्वानोंने कहा है कि समयानुसार साम, दान आदिका प्रयोग करना चाहिये। बुद्धिमान् तथा वीर पुरुष देश, काल, बल, शक्ति और सेनाकी जानकारी करके ही अपना सामर्थ्य दिखाते हैं॥ १०॥

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ] — 15 B