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देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

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DevanagariHindipublished889 pages

Page 844 of 889

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Page 844
अ० २३ ]षष्ठ स्कन्ध८३५
इत्येतत्कथितं सर्वं कारणं मम दुःखजम्।<br><br>कस्त्वं कस्य सुतश्चेति वद वीर यथा तथा॥ ६५हे वीर ! इस प्रकार मैंने अपने दुःखी होनेका समस्त कारण आपको बता दिया। अब जिस प्रकार मैंने आपको अपने विषयमें बताया, उसी प्रकार आप भी बताइये कि आप कौन हैं तथा किसके पुत्र हैं ? ॥ ६५ ॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे हैहयैकवीराय यशोवत्यैकावलीमोचनाय देवीस्वप्नवर्णनं नाम द्वाविंशोऽध्यायः ॥ २२ ॥


अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

भगवतीके सिद्धिप्रदायक मन्त्रसे दीक्षित एकवीरद्वारा कालकेतुका वध, एकवीर और एकावलीका विवाह तथा हैहयवंशकी परम्परा

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
व्यास उवाच<br>तस्यास्तु वचनं श्रुत्वा रमापुत्रः प्रतापवान्।<br>प्रफुल्लवदनाम्भोजस्तामुवाच विशांपते॥ १व्यासजी बोले— हे राजन्! उस यशोवतीकी बात सुनकर लक्ष्मीपुत्र प्रतापी एकवीरका मुखारविन्द प्रसन्नतासे खिल उठा और वे उससे कहने लगे— ॥ १ ॥
राजोवाच<br>रम्भोरु यस्त्वया पृष्टो वृत्तान्तो विशदाक्षरः।<br>हैहयोऽहं चैकवीरनाम्ना सिन्धुसुतासुतः॥ २राजा बोले— हे रम्भोरु! जो तुमने सुन्दर वाणीमें मेरा वृत्तान्त पूछा है, वह सुनो। एकवीर नामसे प्रसिद्ध लक्ष्मीपुत्र हैहय मैं ही हूँ॥ २ ॥
मनो मे यत्त्वया नूनं परतन्त्रं कृतं किल।<br>किं करोमि क्व गच्छामि विरहेणातिपीडितः॥ ३[एकावलीके विषयमें वर्णन करके] तुमने मेरे मनको परतन्त्र बना दिया है। विरहसे अत्यन्त पीडित मैं अब क्या करूँ, कहाँ जाऊँ? ॥ ३ ॥
प्रथमं रूपमाख्यातं सर्वलोकातिगं त्वया।<br>तेन मे विह्वलं जातं कामबाणहतं मनः॥ ४तुमने सर्वप्रथम एकावलीके सम्पूर्ण लोकको तिरस्कृत कर देनेवाले रूपका जो वर्णन किया है, उससे मेरा मन कामबाणसे आहत होकर व्याकुल हो उठा है॥ ४॥
ततस्तस्या गुणाः प्रोक्तास्तैस्तु चित्तं हृतं पुनः।<br>यत्त्वयोक्तं पुनर्वाक्यं तेन मे विस्मयोऽभवत्॥ ५तत्पश्चात् तुमने उसके जिन गुणोंका मुझसे वर्णन किया है, उनके द्वारा मेरा चित्त हर लिया गया है। पुनः तुमने जो बात कही, इससे मुझे बहुत विस्मय हो गया है। दानव कालकेतुके सामने एकावलीने यह बात कही थी कि मैं हैहयका वरण कर चुकी हूँ, उसके अतिरिक्त मैं किसी अन्यका वरण नहीं कर सकती; यह मेरा निश्चय है। हे तन्वंगि! एकावलीके इस कथनके द्वारा तुमने मुझे उसका दास बना दिया है। हे सुन्दर केशोंवाली! तुम्हीं बताओ, अब मैं तुम दोनोंके लिये क्या करूँ ? ॥ ५—७ ॥
एकावल्या वचः प्रोक्तं दानवाग्रे मया वृतः।<br>हैहयस्तं विना नान्यं वृणोमीति विनिश्चयः॥ ६
तेन वाक्येन तन्वङ्गि भृत्योऽहमधुना कृतः।<br>त्वया तस्याः सुकेशान्ते ब्रूहि किं करवाणि वाम्॥ ७